राग-द्वेषका नाश एवं समताकी महिमा

प्रवचन दिनांक—२९-१-१९४१, कलकत्ता

जबतक राग-द्वेष रहता है, तबतक परमात्माकी प्राप्ति दूर है। किसी भी सिद्धान्तसे आध्यात्मिक मार्गपर चलो, समता तो होनी ही चाहिये।

ज्ञानके मार्गमें—समता, भक्तिके मार्गमें—समता, योगके मार्गमें— समता, साधनकालमें—समता, सिद्ध अवस्थामें—समता, भगवान‍्ने समता कहीं नहीं छोड़ी। न्याययुक्त विषमता समता ही है।

न्याययुक्त पक्षपात भी दोषी नहीं है। गीताके अनुसार यह बात न्याययुक्त सच्ची है। उसका पक्ष करना कोई पक्षपात नहीं है। आपके जँचे सो बात कह देनी चाहिये, चाहे किसीके पक्षका समर्थन हो जाय।

माँके साथ माँका, स्त्रीके साथ स्त्रीका, गदहेके साथ गदहेका-सा, कुत्तेके कुत्तेका-सा व्यवहार करनेमें यह विषमता दोषी नहीं है।

महात्माको जाननेसे महात्मा ही हो जाता है। महात्मा नहीं हुए तो महात्माको जाना ही नहीं। भगवान‍्को जाननेसे भगवान‍्की प्राप्ति हो जाती है। भगवान‍्ने अपनी गुप्त बात बहुत ही अन्तरंगको जैसे अर्जुन और गोपियोंको कही। युधिष्ठिरने अपने मुँहसे कहा है कि आप ईश्वर हैं, परमात्मा हैं, पर भगवान‍्ने उन्हें कभी नहीं कहा कि मैं ईश्वर हूँ। भीम, नकुल, सहदेव किसीसे नहीं कहा। अर्जुनसे ही कहा। उसे कहकर यह बात भी कह दी—

इदं ते नातपस्काय नाभक्ताय कदाचन।

न चाशुश्रूषवे वाच्यं न च मां योऽभ्यसूयति॥

(गीता १८। ६७)

तुझे यह गीतारूप रहस्यमय उपदेश किसी भी कालमें न तो तपरहित मनुष्यसे कहना चाहिये, न भक्तिरहितसे और न बिना सुननेकी इच्छावालेसे ही कहना चाहिये; तथा जो मुझमें दोषदृष्टि रखता है उससे तो कभी भी नहीं कहना चाहिये।

हमें भी कोई गुप्त बात हो तो हर कहीं नहीं कहनी चाहिये। कभी कभी कहना भी पड़ जाता है।

भक्तिकी एकताका उदाहरण—

दूध-पानीकी मित्रता हुई, एक हो गये। आगपर चढ़े। पहले पानी जला। जलका छींटा पड़ा, मित्र आ गया, दूधका उफान ठंडा हो गया। ऐसी मित्रता भगवान‍्से करे। दूधमें पानीकी तरह भगवान‍्से मिल जाय।

भक्त्या त्वनन्यया शक्य अहमेवंविधोऽर्जुन।

ज्ञातुं द्रष्टुं च तत्त्वेन प्रवेष्टुं च परन्तप॥

(गीता ११। ५४)

परन्तु हे परंतप अर्जुन! अनन्य भक्तिके द्वारा इस प्रकार चतुर्भुज-रूपवाला मैं प्रत्यक्ष देखनेके लिये, तत्त्वसे जाननेके लिये तथा प्रवेश करनेके लिये अर्थात् एकीभावसे प्राप्त होनेके लिये भी शक्य हूँ।

कंचन-कामिनी, मान-बड़ाईमें आसक्तिका त्याग करना चाहिये। कंचन-कामिनीके पीछे पड़कर लोग संसारमें नास्तिकता फैला रहे हैं। कलियुग, वातावरण एवं स्वभाव—यह उनके सहायक होता है। महात्माको जाननेवाला महात्मा ही हो जाता है।

१. एक ही बात—उनके मनके अनुसार चलना।

२. मनका ज्ञान न हो तबतक संकेतके अनुसार चलना।

३. संकेतका ज्ञान न हो तबतक आदेशके अनुसार चलना।

कामिनी-कंचन, मान-बड़ाईमें आसक्ति-वैराग्य होनेसे, सत्संगसे, भजन-ध्यान करनेसे और सत्शास्त्रोंके अध्ययनसे नष्ट होती है।

मर्मकी बात—किसीको भी हमारे निमित्तसे उद्वेग, क्रोध, दु:ख, भय हो तो इसको हमारे बर्तावकी, व्यवहारकी कमी माननी चाहिये।

लोगोंके साधनकी कमजोरी देखकर यह मनमें आता है। थोड़ी निराशा-सी होती है, तब ये शब्द कहे जाते हैं।

स्पष्ट बताता हूँ, छप्पन वर्ष लगभगकी मेरी आयु हो गयी। पुस्तकोंमें जैसा वर्णन आता है, बुद्धिके द्वारा जो समझमें आता है—ऐसा प्रेमी कोई नहीं मिला, न कोई ऐसा श्रद्धालु मिला। मनमें, बुद्धिमें जो बात आती है, पुस्तकोंमें भी पढ़ते हैं, पर ऐसे प्रेमीका दर्शन नहीं हुआ, इसलिये यह कहा जाता है कि क्या बताऊँ। भगवत्प्राप्तिका मार्ग बहुत सीधा है, परंतु व्यवहार कठिनका-सा हो रहा है। कारण लोग तत्पर नहीं होते।

भगवान‍्पर विश्वास होनेसे, उनके आश्रित होनेसे खूब बल मिलता है। सत् वस्तुका कभी नाश नहीं हो सकता। पहले हृदयमें भाव पैदा होते हैं। शब्द और लक्ष्यमें जितने क्षणमें आते हैं, उनको वर्णन करनेमें दो-तीन घंटे लगें। उदाहरण—लोग बोले महाभारतकी बात कहो, हृदयमें सारी महाभारत खड़ी हो गयी।

किसीने पूछा प्रेम कैसे मिले? सुनते ही शब्दोंके ढेरसे बँध गये। एक साथ तो बोले जाते नहीं, शृंखला बैठायी जाती है। बीचमें बातचीत दूसरी चल पड़ी, अब उसके चित्र आ गये। पहले वाले चले गये। फिर पकड़नेके लिये पूछते हैं कि क्या बात चल रही थी?

ज्ञानके चार भेद—१-जो कुछ है सो ब्रह्म है। २-जो कुछ है सो मैं हूँ। ३-दृश्य वर्ग कुछ नहीं है, केवल एक सच्चिदानन्दघन परमात्मा है। ४-जो कुछ प्रतीत होता है वह वास्तवमें नहीं है, एक चेतन आत्मा है।