सबकी सेवा नारायणकी सेवा
चींटीसे लेकर ब्रह्मापर्यन्त सब प्राणी भगवान्के पुत्र हैं। भगवान्ने हमें इन सबकी सेवा करनेके लिये भेजा है। इन सबको सुख कैसे पहुँचे, यह समझकर हमें यह चेष्टा करनी चाहिये कि सबको सुख पहुँचे। नौकरी, दलाली, खेती, व्यापार सबसे सबको सुख पहुँचाना, आनन्द देना, हित करना, सबका कल्याण हो—ऐसा ही हमारा भाव हो। ऐसी ही हमारी क्रिया हो। जितनी दूसरोंकी सेवा हमसे हो गयी, उतना ही वास्तविक धन है।
जो पुरुष एक स्त्रीके बाल-बच्चोंको हृदयसे प्रेम करता है, उनकी सेवा करता है, उनकी माँको वह खरीद लेता है। सबकी माँ भगवान् हैं। सबको प्रसन्न करना भगवान्को ही प्रसन्न करना है। बालकोंको सुख पहुँचानेसे माँ उसके आधीन हो जाती है। दासी बन जाती है। कहीं-कहीं मेम साहबको प्रसन्न करनेसे जज साहब डिग्री दे देते हैं। काम बन जाता है। ऐसे ही भगवान्की परम भक्त राधिकाजी हैं, उनको हम प्रसन्न कर लें तो भगवान् उसके अन्तर्गत ही आ गये। सब भगवान्के बच्चे हैं। भगवान् इनकी माँ हैं। बच्चोंसे जो प्रेम है, वह वास्तवमें माँसे ही है। बच्चे विशेष नहीं समझते, पर माँ तो देख रही है। जो बच्चोंकी सेवा करते हैं, वे इस उद्देश्यसे नहीं करते कि ये बच्चे हमारी सेवा करते हैं। माँको ही प्रसन्नता मिलती है। ये सब बच्चे भगवान्के हैं। हमलोगोंको सबके साथ भगवत्प्रीत्यर्थ प्रेम करना चाहिये। इस उद्देश्यका पालन ही वास्तविक धन है। इससे भगवान् मिलते हैं। इस झूठे धनका सच्चा धन बन जाता है। जैसे लोहेको पारसके छूनेसे सोना बन जाता है।
मिथ्या धन रुपये हमारे पास हैं। उनको दूसरोंके हितमें, सेवामें, सुख पहुँचानेमें लगा दिये तो वह निष्काम सेवा हो गयी। बिना ही कारण लोगोंका हित करना, उनसे प्रेम करना—इस चीजके मूल्यमें भगवान् मिलते हैं। सच्चा धन निष्काम प्रेम है। अतएव स्वार्थको त्यागकर सबसे प्रेम करना चाहिये। स्वार्थके त्यागसे ही प्रेम होता है। यह प्रेम हम मान-बड़ाईके लिये करेंगे तो मान-बड़ाई ही मिलेगी। भगवान् नहीं मिलेंगे। झूठे धनके बदले झूठा धन ही मिलेगा।
लोहेका ताँबा हो गया, चाँदी भी हो गयी, तब भी सोना तो सोना ही है। कुछ दाम बढ़े। यहाँ तो सोना नहीं पारस बनता है।
पारस में औ संत में बहुत अन्तरा जान।
वह लोहा कंचन करे वह करे आप समान॥
महात्मा तो अपने-जैसा बना लेता है। जब संत ऐसा बनाते हैं तो भगवान् और ऊँची बात करते हैं। क्या बनाते हैं? स्वयं सेवक बन जाते हैं। भगवान् कहते हैं—अहं भक्तपराधीनो। भक्तकी चरणोंकी धूलिसे भगवान् अपना कल्याण समझते हैं। भगवान् कहते हैं—
ये यथा मां प्रपद्यन्ते तांस्तथैव भजाम्यहम्।
(गीता ४। ११)
हे अर्जुन! जो भक्त मुझे जिस प्रकार भजते हैं; मैं भी उनको उसी प्रकार भजता हूँ।
सारा जीवन मान, बड़ाई, प्रतिष्ठाको लात मारकर, स्वार्थ त्यागकर सबकी सेवामें अर्पण कर देना चाहिये। ऐसा करनेवालेको भगवान्के समान बतलाया गया है।
हेतु रहित जग जुग उपकारी।
तुम तुम्हार सेवक असुरारी॥
बिना कारण सेवा करनेवाले दो ही हैं। बाकी सब स्वार्थी हैं।
स्वारथ मीत सकल जग माहीं।
सपनेहुँ प्रभु परमारथ नाहीं॥
सुर नर मुनि सबकै यह रीती।
स्वारथ लागि करहिं सब प्रीती॥
सब मतलबके मित्र हैं। भगवान् कहते हैं—
ते प्राप्नुवन्ति मामेव सर्वभूतहिते रता:।
(गीता १२। ४)
वे सम्पूर्ण भूतोंके हितमें रत और सबमें समान भाववाले योगी मुझको ही प्राप्त होते हैं।
कितनी ऊँची श्रेणीकी बात है—स्वार्थको त्यागकर दूसरेके हितमें रत रहना। तुलसीदासजी कहते हैं—
परहित बस जिन्ह के मन माहीं।
तिन्ह कहुँ जग दुर्लभ कछु नाहीं॥
उसके लिये संसारमें कोई भी वस्तु दुर्लभ नहीं है। मनसे दूसरोंका भला चाहना। यह भगवान्की हृदयकी बात है। हृदयका भाव उत्तम होगा तो क्रिया भी उत्तम होगी। हृदयके भावको ही सुधारना है। संसारको दिखलाना नहीं है। हर समय हृदयमें यही भाव रखना चाहिये कि जिस किसी प्रकारसे हमारा मनुष्यजन्म वास्तवमें सबके हितमें लग जाय। जैसे मनुष्य अपने स्त्री, बालक जिनमें ममता है, उनका हित चाहता है, उनसे भी बढ़कर सबका हित चाहे। हृदयका भाव चाहिये, पैसेकी आवश्यकता नहीं है। जकात (चुंगी) मालपर ही है। धर्मका पालन करनेमें पैसेकी आवश्यकता नहीं है। भाव ही वास्तविक चीज है। उदाहरण दिया जाता है।
एक राजा कहीं जा रहे थे। वे बड़े दानी थे। साथमें एक गरीब व्यक्ति भी जा रहा था। बादल उनके ऊपर छाया करते हुए चल रहे थे। राजाने उसे अलग चलनेके लिये कहा। बादलकी छाया इस व्यक्तिपर पड़ने लगी। किसीने उससे पूछा कि तुमने ऐसा कौन-सा पुण्य किया है कि तुम्हारे ऊपर बादल छाया करते चल रहे हैं? उसने बताया मैंने कोई पुण्य नहीं किया। फिर पूछनेपर कि तुमने कोई चीज दानमें दी होगी उसने बताया कि एक व्यक्ति बिना कपड़ेके ठण्डमें काँप रहा था, मैंने उसे अपनी धोती दे दी।
एक धोतीके दानका फल प्रत्यक्ष हुआ, लाखों करोड़ोंका उतना नहीं हुुआ। युधिष्ठिरका यज्ञ भी उतना महान् नहीं हुआ, जितना स्वयं भूखे रहकर अतिथिको भोजन करानेसे हुआ। यह बात महाराज युधिष्ठिरके यज्ञमें नेवलेने बतायी।
रन्तिदेवके दिये मिट्टीके बर्तनके जलसे भगवान् प्रगट हो गये। हृदयके भावकी आवश्यकता है। सबकी सेवा भगवान्की सेवा है। अथवा यह समझो सब भगवान्के पुत्रोंकी सेवा है। इससे भगवान् प्रसन्न होते हैं। जैसे लोभीका एक ही ध्येय रहता है कि रुपये कैसे मिलें? रात-दिन यही चेष्टा रहती है। ऐसे ही सबसे स्वार्थरहित प्रेम बढ़ाना, सबका हित चाहना, उस उद्देश्यका पालन—यह सब धन है। उससे मिलनेवाले भगवान् धनका केन्द्र हैं। दो बात बतलायी—
१-संसारमें जो कुछ हो रहा है, सब भगवान्की लीला है।
२-सब नारायणके अंश, भक्त, संतान हैं। इनकी सेवा ही नारायणकी सेवा है। इनसे प्रेम, इनका सत्कार यह नारायणसे प्रेम, नारायणका सत्कार है। इनकी सेवासे भगवान् प्रसन्न होते हैं, इससे झूठा धन जाकर बदलेमें सच्चा धन मिलता है।