संयमकी आवश्यकता और भगवत्प्रेमके उपाय
प्रवचन दिनांक—३०-१-१९४१, कलकत्ता
जिससे दूसरोंको हानि पहुँचे, वह पापका काम है। यज्ञ, दान सब तामसी हो सकते हैं। तामसीका फल अधो गच्छन्ति तामसा: जो जीव स्वत: मरते हैं, वे तो परमात्माके आदेशसे मरते हैं। प्लेग बीमारी आदि नाना प्रकार कारणोंसे जीव मरते हैं।
किसीकी हानिमें निमित्त नहीं बनना चाहिये। न्यायालयके द्वारा यदि किसीको फाँसीकी सजा सुनायी गयी हो तो उसे भी मार देनेके लिये सिवाय जल्लादके अन्य किसीको अधिकार नहीं है। यदि उसका वैरी जाकर उसको मार डालता है, उसे भी फाँसी होती है।
जो लोग मदिरा, मांस, अण्डा, टट्टी, पेशाबके हाथ जहाँ चाहे वहाँ लगा देते हैं। उसके परमाणु सब जगह प्रवेश करते हैं। धीरे-धीरे लोग मांस, मदिरा आदि चीजें खाने लगते हैं। खानपान भ्रष्ट करके लोग गिरते जा रहे हैं।
संयममें कठिनता पड़ती है। संयम तोड़नेमें क्या देर लगती है। जितना संयम है, उतना ही उत्तम है। संयम त्याग करके भोगका दायरा बढ़ा लेना पतन करना है।
किसीकी आत्माको दु:ख नहीं पहुँचाना चाहिये। मान-बड़ाईतकका स्वार्थ नहीं रहना सात्त्विक है।
लक्षणोंसे ही सात्त्विक-राजस-तामसका निर्णय किया जाता है। सुनी हुई बातोंको चेष्टापूर्वक काममें लाना चाहिये।
जप-ध्यानका खूब अभ्यास करना चाहिये। शरीरसे दूसरोंकी सेवा उनके उपकारकी चेष्टा रखनी चाहिये।
हर समय प्रसन्न रहना यह एक साधन है। इससे सारे दु:खोंका नाश होकर परमात्माकी प्राप्ति हो जाती है।
कंचन, कामिनी, मान, बड़ाई—इन चार चीजोंसे बचनेकी चेष्टा करनी चाहिये। आलस्य, भोग, प्रमाद, पाप—इन चारोंका कतई त्याग करना चाहिये।
गीताकी पुस्तक भगवान्की मूर्तिसे भी बढ़कर भगवान्की साक्षात् वाङ्मयी मूर्ति है। जो जितनी भावना करता है उससे भी बढ़कर है। पाण्डवोंमें सबसे बड़ी बात यही थी कि भगवान्का संकेत देखकर तुरन्त वैसे ही बन जाते। भगवान्का प्रभाव जाननेसे भगवान्में प्रेम होता है। जैसे रुपयोंका प्रभाव जाननेसे रुपयोंमें प्रेम होता है। रुपयोंमें प्रेम होनेसे भी वे हमें मिलें या न भी मिलें, किन्तु भगवान्से प्रेम होनेपर भगवान्का मिलना सहज है। भगवत्प्रेमके उपाय—
१-भगवान्की आज्ञापालनसे प्रेम होता है।
२-भजन ध्यान करनेसे प्रेम होता है।
३-सत्संग करनेसे प्रेम होता है।
४-तत्त्व, रहस्य, लीला, प्रेमकी बातें सुनने पढ़नेसे प्रेम होता है।
५-स्त्रियोंको पतिव्रतधर्मके पालनसे प्रेम होता है।
तुलसीदासजीने कहा है—
बिनु श्रम नारि परम गति लहई।
पतिब्रत धर्म छाड़ि छल गहई॥
पति और घरमें जो बड़े हों उन्हें नित्य प्रणाम करना चाहिये।
अतिथिकी आत्माको सुख पहुँचाना, घरमें बड़े हों उनकी आज्ञाका पालन—यह सबसे बढ़कर है। भगवान्के नामका जप, उनका आह्वान, फिर बातचीत, भोग, आरती, स्तुति-प्रार्थना— इस प्रकारसे नित्य नियमपूर्वक करनेसे भगवान्में प्रेम होता है।
नवधाभक्तिसे प्रेम होता है—
श्रवणं कीर्त्तनं विष्णो: स्मरणं पादसेवनम्।
अर्चनं वन्दनं दास्यं सख्यमात्मनिवेदनम्॥
विष्णुभगवान्की भक्तिके नौ भेद हैं—भगवान्के गुण-लीला-नाम आदिका श्रवण, उन्हींका कीर्तन, उनके रूप-नाम आदिका स्मरण, उनके चरणोंकी सेवा, पूजा-अर्चा, वन्दन, दास्य, सख्य और आत्मनिवेदन।
प्रेमसे राग-द्वेषका नाश हो जाता है। हर समय शान्ति प्रसन्नता रहे, क्लेश न रहे, झूठ, कपट, छल तो पासमें ही न रहे, खाने-पीनेमें आसक्ति न रहे, किसी चीजमें आसक्ति न रहे।
शरीरसे सबकी सेवा, मनमें परमात्माका ध्यान, वाणीसे नामका जप—ये न हो तो घरमें बड़ोंकी आज्ञाका पालन करे।
स्वार्थको त्यागकर व्यवहार करना चाहिये। सत्यका पालन करना चाहिये।