सत्संग-वाटिकाके बिखरे सुमन

• भजन, ध्यान, सत्संग—यह बढ़िया काम है। नित्य कमसे कम एक घंटा इसमें लगाना चाहिये।

• प्रथम श्रद्धा-प्रेम, दूसरा भय, तीसरा लोगोंके कहनेसे साधनमें लगे, श्रद्धा-प्रेम सबसे बढ़कर है।

नियम, समय, प्रेम (नेम, टेम, प्रेम)

१. सन्ध्या करनेके लिये पहले नियम लेना चाहिये। न करनेकी अपेक्षा सन्ध्या करना बहुत ऊँची श्रेणीकी बात है।

२. समय-पालनमें महात्मा जरत्कारुका दृष्टान्त आता है। एक दिन महात्मा जरत्कारु अपनी पत्नीकी गोदमें सिर रखकर सायंकालके समय लेटे हुए थे। उन्हें तन्द्रा-सी आ गयी थी। सूर्य भगवान् अस्त होनेवाले थे; कहीं धर्मका लोप न हो जाय इसलिये उनकी पत्नीने उन्हें सावधान किया। जरत्कारुने कहा—मैं नियमित सन्ध्यावन्दन करता हूँ। ऐसा सम्भव ही नहीं है कि भगवान् सूर्य मेरे द्वारा दिया गया अर्घ्य ग्रहण किये बिना अस्ताचलको चले जायँ।

३. मुझे पैंतालिस वर्ष यज्ञोपवीत संस्कारके हो गये, बराबर सन्ध्या की है। १०३-१०४ डिग्री ज्वर होनेपर भी, बहुत कष्ट होनेपर भी सन्ध्या नहीं छोड़ी, मानसिक ही की।

४. सन्ध्यामें विलम्ब होनेपर एक समयके उपवासका नियम लेनेपर बीस वर्षमें एक बार भी उपवासका काम नहीं पड़ा।

५. सूर्यको तीन अंजलि दी जाती है, इससे तीनों लोक तृप्त हो जाते हैं।

६. सूर्य अस्त होनेके पहले पाँच-पाँच मिनटपर बराबर सन्ध्या करनेकी स्मृति होती रहती है।

• महात्माके दर्शन, भाषण, स्पर्श, चिन्तन आदि ये सब बिजलीके करेन्टकी तरह तत्क्षण असर करने वाले हैं।

• महात्माके दर्शनमात्रसे, उनके स्पर्शमात्रसे तथा महात्माकी स्पर्शकी हुई वस्तुको स्पर्श करनेसे विलक्षण आनन्द हो जाता है। जिस प्रकार कस्तूरीकी सुगन्ध दूरसे ही प्रतीत होती है, उसी प्रकार महापुरुषका प्रभाव साधकपर होना चाहिये।

• भगवान् राम कहते हैं कि मैं पृथ्वीको स्पर्श करता हूँ तो मुझे सीताके मिलनका-सा आनन्द आता है, क्योंकि सीता भी इसे स्पर्श कर रही है।

• महापुरुषोंकी महिमा विचित्र है। उनके दर्शनमात्रसे उद्धार हो जाता है।

• जहाँतक महापुरुषके नेत्रोंकी वृत्ति जाती है, वहाँतक सबमें प्रवेश कर जाती है।

• समता महात्माका गुण है। जहाँतक मनुष्यमें समता आ गयी, उतना उसमें महात्माके गुण आ गये।

• जहाँ महापुरुष बैठे हों, वहाँ नीचसे नीच व्यक्तिकी दूसरी स्त्रीपर कुदृष्टि नहीं हो सकती।

• महात्माकी वाणी हमारे कानोंमें पड़े तो हमारे लाभ, हमारी वाणी महात्माके कानोंमें पड़े तो लाभ। गंगासे लाभ ही लाभ है।

• महात्माके उपदेशमें भी चेतन शक्ति आ जाती है, क्योंकि वह चेतन पुरुषके हैं। जैसे भूले हुए हनुमान‍्में जामवन्तके कहनेसे कितनी शक्ति आ गयी कि वे समुद्रको लाँघ गये।

• महापुरुषके वचनसे हमारेमें जागृति हो जाती है। उनके नेत्रोंकी वृत्ति जहाँतक जाती है, वहाँतक सब पवित्र हो जाता है।

• महापुरुषोंकी कृपासे हमलोगोंमें जो सबसे गया बीता है, वह भी युधिष्ठिरसे बढ़कर बन सकता है। भगवान‍्से भी बढ़कर बन सकता है। भगवान‍्ने अपने भक्तोंके लिये गुंजाइश छोड़ रखी है।

• एक ओर त्रिलोकीका राज्य और एक ओर भगवान‍्का नाम हो तो भगवान‍्का नाम ही भारी रहेगा।

• ईश्वरकी भक्ति, सदाचार, गीताका प्रचार, निष्कामभाव—इनके प्रचारकी बहुत आवश्यकता है।

• शीघ्र-से-शीघ्र भगवान‍्से मिलना हो तो दुखी, अनाथ, आतुर व्यक्तियोंकी निष्कामभावसे सेवा करो।

• हम सबको प्रह्लादकी तरह निष्काम बनना चाहिये।

• भगवद्भाव अमृतका स्रोत है। मान-बड़ाईमें आकर वह स्रोत सूख जाता है। यह कभी नहीं मानना चाहिये कि मुझको भगवान‍्की प्राप्ति हो गयी, आगे मुझको कोई कर्तव्य नहीं है। मैं भूल-भुलैयासे बहुत डरता हूँ। भूल-भुलैया ये कि भगवान‍्की अप्राप्तिको प्राप्ति मान लेनी। मेरे साथ यह बीती हुई है। मैं पहले योगवासिष्ठ पढ़ा करता, तब यह स्थिति हो जाया करती। मुझे ऐसा भान होता कि मुझको प्राप्ति हो गयी, पीछे पोल निकल जाया करती। यह अनुभवकी बात कहता हूँ। ऐसा चेतानेवाला आपको और कौन मिलेगा।

• गुरु एक परमात्माको ही बनाना चाहिये। यदि और गुरु बनाओ तो दत्तात्रेयकी तरह बनाओ।*

•दूसरोंके हककी वस्तु नहीं लेना चाहिये।

• मन और इन्द्रियोंका संयम करना चाहिये।

• मान, बड़ाई, प्रतिष्ठा—यह बहुत धोखेकी चीज है। इनसे बहुत बचना चाहिये। यह पूरी खेतीको ही नष्ट कर डालती है।

• भजन नहीं हो तो जबरदस्ती करें। भगवान‍्की शरण होकर, भगवान‍्का आश्रय लेकर करें। भजन होगा, अवश्य होगा। भजन करनेकी लालसा बढ़ानी चाहिये।

• मन फालतू काममें संसारमें चक्‍कर लगाता फिरता है। उसकी आदतको छुड़ाना चाहिये, उसकी आदत छूटेगी भजन, ध्यान, सत्संगसे।

• वैराग्यके नशेमें चूर होकर संसारमें बिचरे। असली नहीं तो नकली वैराग्य लाओ, नकलीसे पीछे असली हो जायगा, वैराग्यसे उपरति हो जाती है।

• ध्यान ही असली चीज है। ध्यानके समान और कुछ नहीं है। एक ओर त्रिलोकीका राज्य, एक ओर एक क्षणका ध्यान हो तो उस ध्यानके आगे त्रिलोकीके राज्यका कोई मूल्य नहीं है।

• ध्यानसे शान्ति, आनन्दकी बाढ़ आ जाती है, प्रकाश हो जाता है, अणु-अणुमें शान्ति परिपूर्ण हो जाती है।

• यं लब्ध्वा चापरं लाभं मन्यते नाधिकं तत:।

यस्मिन्स्थितो न दु:खेन गुरुणापि विचाल्यते॥

(गीता ६। २२)

परमात्माकी प्राप्तिरूप जिस लाभको प्राप्त होकर उससे अधिक दूसरा कुछ भी लाभ नहीं मानता और परमात्मप्राप्तिरूप जिस अवस्थामें स्थित योगी बड़े भारी दु:खसे भी चलायमान नहीं होता।

• प्रह्लाद और सुधन्वाका उदाहरण सामने रखकर परमात्माका ध्यान लगाकर मस्त हो जाना चाहिये। चाहे कोई हमें आगमें डाल देवे, पर ध्यान नहीं छूटना चाहिये।

• मन एकाग्र करके आसनसे बैठे। एक परमात्माके सिवाय किसीका चिन्तन न करे। एक परमात्माके सिवाय किसीका ज्ञान न रहे, ऐसा ध्यान करे।

• प्रश्न—शीघ्रसे शीघ्र भगवान‍्की प्राप्ति कैसे हो?

उत्तर—भगवान‍्के नामका जप, ध्यान, सत्पुरुषोंका सत्संग, दुखियोंकी सेवा, धार्मिक पुस्तकोंका स्वाध्याय करनेसे शीघ्रातिशीघ्र भगवान‍्की प्राप्ति हो सकती है।

जैसे-जैसे भजन-ध्यान होता जायेगा, वैसे-वैसे दुर्गुण-दुराचार नष्ट होते चले जायँगे और सद‍्गुण-सदाचार अपने-आप आयेंगे।

जैसा भाव आपके उत्पन्न होगा, वैसा ही भाव भगवान‍्के उत्पन्न होगा। जिस दिन आपसे भगवान‍्के बिना नहीं रहा जायेगा, उसी दिन भगवान् भी आपके बिना नहीं रह पायेंगे। भगवान‍्को आना ही पड़ेगा।

• वास्तवमें अनुकूल-प्रतिकूल है ही नहीं, सभी भगवान‍्का स्वरूप है। ऐसा माननेपर प्रतिकूल रह ही नहीं जाता, सभी अनुकूल हो जाते हैं।

• अनिच्छा, परेच्छासे होनेवाली सभी बातोंमें भगवान‍्का हाथ समझें तो अनुकूलता-प्रतिकूलता नहीं रह सकती।

• अनुकूलता-प्रतिकूलताका प्रतिकार करनेमें कोई दोष नहीं है, किन्तु द्वेष-बुद्धि नहीं होनी चाहिये। मनमें शीतलता और शान्ति रहनी चाहिये।

• जो कुछ भी हो भगवान‍्का विधान मानकर, ईश्वरकी लीला मानकर प्रसन्नचित्त रहना चाहिये।

• भगवान् जो कुछ कर रहे हैं, वह हमारे हितके लिये ही कर रहे हैं, यह समझमें आ जाना बड़े ऊँचे दर्जेकी भक्ति है। यदि समझमें नहीं आये तो इसे मान लेना चाहिये।

• जो व्यक्ति ऐश्वर्यको ठुकरा सके, वही परमात्माको प्राप्त कर सकता है।

• प्रश्न—भगवान‍्का ध्यान सर्वांगका करना चाहिये या मुखका।

उत्तर—पहले सर्वांगका करके फिर चेहरेपर मन जमा दे।

रात-दिन भजन-ध्यानमें ही समय बिताना चाहिये। सत्संग करे, भजन करे, ध्यान करे। संसारके ऐश्वर्यको लात मारकर इसीमें समय बिताना चाहिये।

• उत्थानकी चेष्टा न की जाय तो स्वभाव नीचेकी ओर गिरता जाता है।

• भजन, ध्यान, सत्संग, सेवा, संयम, वैराग्य—यह बड़ी जोरदार चीज है।

• महात्माकी सेवाका बदला ईश्वरको देना पड़ता है। महात्माकी सेवाका भार ईश्वरपर पड़ जाता है, इसीलिये महात्माकी सेवाका अधिक लाभ है।

• महात्माकी सेवा करके ईश्वरको ऋणी बनाना है, यानी ईश्वर उसका ऋणी बन जाता है।

• प्रश्न—आचार्य लोग मन्त्र देकर ब्रह्म-सम्बन्ध करा देते हैं।

उत्तर—जिस सम्बन्धसे भगवान‍्का भजन बढ़े, वही सम्बन्ध असली सम्बन्ध है। जिस सम्बन्धसे भजन घटे, वह सम्बन्ध कोई कामका नहीं। हम जिस बातको बुरा समझते हुए भी करते हैं, वही पतनका कारण है। सिद्धान्त समझ लिया, जिस बातको बुरा समझ लिया, उसको भूलकर भी ग्रहण नहीं करना चाहिये।

जब भगवान् याद आ जायँ, उसी समय भगवान‍्को पकड़ लो, फिर छोड़ो मत।

• प्रश्न—भगवान‍्का नाम-स्मरण और स्वरूप-चिन्तन निरन्तर कैसे हो?

• उत्तर—भगवान‍्में प्रेम होनेसे और आवश्यकता होनेसे। आवश्यकता होनेसे मनुष्य उसीपर उतारू हो जाता है। भगवान‍्में प्रेम और भगवान‍्की आवश्यकता होनेसे नाम-स्मरण एवं स्वरूप-चिन्तन निरन्तर हो सकता है।

• तत्पर होकर साधन करनेसे परमात्माकी प्राप्ति तो हुई ही पड़ी है।

• मान, बड़ाई, प्रतिष्ठाको हटावे। अपना अपमान, निन्दा सुनकर मोरकी तरह नाचे। मान, बड़ाई, प्रतिष्ठाके धक्‍केमें नहीं चढ़े।

• भजन, ध्यान करो, शान्ति, आनन्दकी ओर मत देखो। शान्ति आनन्द हो चाहे मत हो, भजन, साधन करता ही चला जाय।

• निन्दाके योग्य कार्य नहीं करे, किन्तु निन्दा हो तो प्रसन्न होवे।

• बुरे कामका त्याग करे, अच्छा काम करनेपर स्तुति सुनकर प्रसन्न नहीं होवे।

• किसी भी प्रकारकी कामना हृदयमें नहीं रखे। कामनाको गुंजाइश देवे ही नहीं।

• अनुकूलता-प्रतिकूलताका मूलसहित नाश कर डाले।

• जिस प्रकार श्वास स्वाभाविक चलता है, उसी प्रकार साधन स्वाभाविक निरन्तर होना चाहिये। जप, ध्यान निरन्तर होना चाहिये। तार नहीं टूटना चाहिये।

• जो अनन्य रूपसे भगवान‍्का स्मरण करता है, उसको भगवान् सुलभतासे ही मिल जाते हैं।

• जो निरन्तर जप ध्यान करता है, उसका अन्तकालमें भी भजन ध्यान होगा ही।

• नित्य निरन्तर स्मरण हो इसकी हमें विशेष चेष्टा करनी चाहिये। नामजप और स्वरूपका ध्यान यह सर्वोपरि है। चाहे कोई भी साधन हो—इन दोनोंकी आवश्यकता है।

• जिसका निरन्तर जप-ध्यान होता है, उसके मनुष्य-जन्मकी सफलता हो गयी। यदि निरन्तर स्मरण रहते हुए प्राण जायँ तो कोई खतरा नहीं, अन्यथा बहुत खतरा है। यदि ऐसी चेष्टा करें तो जीते जी ही परमात्माकी प्राप्ति हो सकती है, अन्यथा अन्तकालमें तो हो ही जायगी।

• तीन बातोंका सबको खयाल रखना चाहिये। मन भगवान‍्में लगा दे, जीभसे भगवान‍्के नामका जप और शरीरसे भगवान‍्की सेवा करे।

• जब-जब भगवान‍्की स्मृति हो, तब-तब समझना चाहिये कि भगवान‍्की कितनी कृपा है, फिर भगवान‍्की स्मृति छोड़े ही नहीं।

• जिस किसी भी प्रकारसे भगवान‍्का ध्यान बना रहे, ऐसी चेष्टा करे।

• चलते-फिरते, खाते-पीते हर समय मनसे भगवानको अपने साथ समझे। हरेक बातोंमें स्वार्थका त्याग करे।

• प्रश्न—तत्त्व-रहस्यकी बात कहिये।

उत्तर—सेवाका काम हँस-हँसकर करना चाहिये। सेवाका काम हँस-हँसकर करना भगवत्प्राप्तिका साधन तो है ही, भजन, ध्यानसे भी बढ़कर हो सकता है। इस प्रकार हम सब भगवान‍्को याद रखते हुए हँस-हँसकर काम करने लग जायँ तो भगवान‍्को भी आकर हमारे साथ शामिल होना पड़े।

• सेवाके भावसे भावित होकर सेवा करे, दु:खियोंकी सेवासे भगवान् शीघ्र प्रसन्न होते हैं। नारायण समझकर दु:खियोंकी सेवा करे।

• सब बातोंमें भाव ही प्रधान है, भजन-ध्यानमें भी भाव ही प्रधान है, सेवामें भी भाव ही प्रधान है। भाव बिना ये सभी बेगार ही मालूम देगा। यहाँ गरीब कपड़ा लेनेवालोंकी कितनी भीड़ लग रही है, उसी सेवा कार्यमें भावसे शामिल हो जाओ।

• मुझे सेवा करनेमें खूब आनन्द आता है। व्याख्यान देना भी मैं सेवा समझता हूँ और गरीबोंको कपड़ा बेचना पड़े तो उसमें भी मुझे बहुत आनन्द आता है। सारी कामनाओंको त्यागकर एक ईश्वरकी ही कामना करे।

• लोभ भजनका करे, क्रोध अपने दुर्गुणोंपर करे।

• अपनी तो एक ही जिम्मेदारी है भगवान‍्को हर समय याद रखना।

• सब ओरसे राग हटाकर एक भगवान‍्में ही राग करे। प्रेमके योग्य भगवान् ही हैं।

• द्वेष भोगोंसे करे। जितने भोग हैं, यह सब डुबानेवाले हैं, इनको भगावे। भगवान‍्की प्राप्ति सहज-सुलभ है। यदि कठिन मानते हो तो दूसरोंके कल्याणमें तो निमित्त बन जाओ। निमित्त बनना क्या है? किसीकी मृत्यु होती हो तो उसके पास जाकर उसको भगवान‍्की ओर लगानेकी चेष्टा करो।

• यह नियम कर ले कि भगवान‍्के भोग लगाकर, बलिवैश्वदेव करके ही भोजन करेंगे।

• समता और त्याग यह दो बात समझनेकी हैं।

• ईश्वरकी भक्ति, वैराग्य, सेवा, समता—यह सबके लिये बड़ी उच्चकोटिकी चीज है।

• धन-सम्पत्ति प्रारब्धसे मिलती है और भगवान् प्रेमसे मिलते हैं। भगवान‍्के भजनसे, गुण, प्रभाव, लीला, रहस्यकी बात करने, सुनने एवं मनन करनेसे प्रेम होता है।

• भजन-ध्यान करनेवालेको यहाँ भी आनन्द है, वहाँ भी आनन्द है। भजन ध्यान करनेवालेको प्रत्यक्ष शान्ति मिलती है। इसलिये किसीकी न सुनकर विश्वास करके भजनमें लग जाना चाहिये।

• हम गुण, आचरणसे साधु बनाना चाहते हैं, भेष बदलना नहीं चाहते, क्योंकि यह समय भेष बदलनेके लिये उपयुक्त नहीं है। साधु स्वभाव होना चाहिये।

• जो निष्काम भक्ति करता है, ईश्वर उसके ऋणी हो जाते हैं, भगवान् उसके पीछे-पीछे फिरते हैं।

• सारा विश्व भगवान‍्का स्वरूप है, सारे विश्वकी सेवा भगवान‍्की सेवा है।

• जितनी भगवान‍्की स्मृति हो, उतनी ही भगवान‍्की कृपा समझनी चाहिये।

• सौ बातोंकी एक बात है—सबसे बढ़कर यह है कि हर समय भगवान‍्को याद रखें।

• जिस कामसे साधनमें कमी हो, उस कामके निकट ही नहीं जाना चाहिये।

• संसारके ऐश, आराम, भोग, विषयको लात मार देना ही शूरवीरता है। किसी शूरवीरको लात मार देना शूरवीरता नहीं है। भजनके विषयमें शूरवीर बनना चाहिये। भजन, ध्यान हमारा जीवन बन जाय। ऐसी स्थिति बन जानी चाहिये कि भजन, ध्यान बिना हम जी नहीं सकें। भजन, ध्यान बिना व्याकुलता हो जानी चाहिये।

• भजन-ध्यानकी जागृति हर समय रखनी चाहिये। चाहे सर्वस्व चला जाय, पर भजन नहीं छूटे। जैसे स्वास स्वाभाविक चलता है वैसे ही भजन-ध्यान स्वाभाविक होना चाहिये।

• हमको तो एक ही काम करना है—भगवान‍्को नहीं भूलना, फिर सारे काम भगवान् अपने-आप सँभाल लेंगे।

• हर समय भगवान‍्की स्मृति रखनी चाहिये। हर समय भगवान‍्की स्मृति रहेगी तो आपके सब अवगुण चले जायँगे, सब गुण आ जायँगे, आपके सारे काम भगवान् अपने-आप कर लेंगे और भगवान् मिल जायँगे।

• अन्त समयमें भगवान‍्की स्मृति सबसे बढ़कर है। अत: मरनेवाले भाईके पास जाकर तत्पर होकर भगवान‍्का स्मरण करायें, जिससे उसका अंतकाल सुधर जाय।

• मैं सबसे बढ़कर मुक्ति वही मानता हूँ कि जीते जी भगवान‍्की प्राप्ति हो जाय। अन्त समयमें भगवान‍्की प्राप्ति होना दो नम्बर है, क्योंकि जीते जी पहले ही भगवान‍्की प्राप्ति जिसको हो जाती है, वह और भी कई व्यक्तियोंको मुक्त कर सकता है।

• जितनी चेष्टा है, वह इसके लिये होनी चाहिये कि जीते जी भगवान‍्की प्राप्ति हो जाय, अन्यथा भगवान‍्की स्मृति होते-होते ही प्राण जायँ।

• जो निरन्तर जप-ध्यान करता है, उसको अन्त समयमें भगवान‍्की स्मृति होगी ही।

• भगवान‍्की स्मृतिसे साधकमें महात्माओंके गुण चले आते हैं, इसके लिये अलग साधन नहीं करना पड़ता है, इसलिये निरन्तर भगवान‍्का चिन्तन करना चाहिये।

• अपना काम तो यही है कि रात-दिन भजनमें लगा रहे, लगन लगनेसे भगवान् मिल जाते हैं। भजनसे सारे काम सिद्ध होते हैं।

• भजन ध्यानके समान न तो तीर्थ है, न व्रत है। जिसका परमात्मामें ध्यान लग गया, उसने सारी पृथ्वीका दान दे दिया। सारे पितरोंका तर्पण कर दिया। जिसका ध्यान हो गया, उसने सब कुछ कर लिया।

• ध्यानकी इतनी महिमा है कि एक क्षण भी भगवान‍्का ध्यान नहीं छोड़ना चाहिये।

• जिस प्रकार भगवान‍्के ध्यानकी महिमा है, उसी प्रकार भगवान‍्के नामकी महिमा है। जबतक देहमें प्राण हैं, तबतक बढ़ियासे बढ़िया काम कर लो। फिर यह अवसर मिलनेवाला नहीं है।

• जिसको भगवान‍्के भजनका चस्का लग गया, उसका वह चस्का कोई निकाल नहीं सकता।

• जो भगवान‍्में न रमकर ऐश-आराम एवं भोगोंमें रमता है, उसको धिक्‍कार है, उसके माता-पिताको धिक्‍कार है।

• त्यागसे वैराग्यका दर्जा ऊँचा है। वैराग्यपूर्वक त्याग ही ऊँचे दर्जेका त्याग है। वैराग्यके पेटमें ही त्याग भरा है।

• प्रश्न—ऐसी भी कोई चीज है कि त्याग-वैराग्य कुछ भी करना नहीं पडे़, अपने-आप भगवत्प्राप्ति हो जाय।

उत्तर—ऐसी चीज भी है। वह है भगवान‍्का भजन, जप, श्रवण-भक्ति। भगवान‍्का जप निरन्तर होना चाहिये और कुछ भी करनेकी आवश्यकता नहीं है, बाकी सब स्वत: ही हो जाते हैं। भगवान‍्के भजन, ध्यान, जपसे सारी बातें आ जाती हैं।

• अपि चेत्सुदुराचारो भजते मामनन्यभाक्।

साधुरेव स मन्तव्य: सम्यग्व्यवसितो हि स:॥

(गीता ९। ३०)

यदि कोई अतिशय दुराचारी भी अनन्यभावसे मेरा भक्त होकर मुझको भजता है तो वह साधु ही माननेयोग्य है, क्योंकि वह यथार्थ निश्चयवाला है। अर्थात् उसने भलीभाँति निश्चय कर लिया है कि परमेश्वरके भजनके समान अन्य कुछ भी नहीं है।

• भगवान‍्को हर समय याद रखना—यह सबसे मूल्यवान् बात है।

• काम, क्रोध, लोभ, मोह, व्यभिचार आदि दुर्गुण तथा नम्रता, प्रेम, सत्यभाषण आदि गुण—ये सब जप, ध्यान, सत्संग आदि करनेसे ठीक हो जाते हैं, अर्थात् दुर्गुणोंका नाश होकर सद‍्गुण अपने-आप आ जाते हैं।

• प्रश्न—ध्यान तो होता नहीं है, केवल जपसे कार्य हो सकता है क्या?

उत्तर—केवल जपसे हो सकता है। जप निष्काम होना चाहिये। श्रद्धा, प्रेम यदि साथमें हो तो और भी शीघ्र हो सकता है। ध्यान साथमें रहे तो बहुत शीघ्र हो सकता है।

• मनुष्यमें जितनी समता है, वह उतना ही भगवान‍्के निकट है। दूसरोंका दोष न देखना चाहिये, न कहना चाहिये, न सुनना चाहिये, क्योंकि ऐसा करनेसे उसके पापका हिस्सा आपको भोगना पड़ेगा। इनमें ये दोष आते हैं—उन दोषोंके संस्कार मनमें जम जाते हैं, जब वैसा वातावरण आता है, तब वे संस्कार जाग्रत होकर उसको उन बातोंकी याद आती है। जिससे उसका पतन होता है, उसके मन, बुद्धि, इन्द्रियाँ अशुद्ध हो जाते हैं।

• संसारके पदार्थ इच्छा करनेसे नहीं मिलते। केवल भगवान् ही ऐसे हैं, जो इच्छा करनेसे मिलते हैं। तीव्र इच्छा हो जाय तो और किसी साधनकी आवश्यकता नहीं है।

• ऐलोपैथी औषधि नहीं लेनी चाहिये, चाहे कुछ भी हो जाय वैद्यकी औषधि भी शास्त्रयुक्त शुद्ध हो तो लेनी चाहिये। होना तो वही है जो भगवान‍्ने रच रखा है। जो होता है वह प्रारब्धका फल एवं भगवान‍्का विधान मानकर हर समय सन्तुष्ट रहे। हर समय आनन्द माने। रोग पापका फल है। रोग भुगत लिया तो पाप कट गया। रोग मृत्युको याद दिलाता है। भगवान् चेताते हैं कि मृत्युके समय क्या करना है, उसके लिये सोचे। यदि रोगको परम तप मान ले तो परम तप हो जाता है, अर्थात् मुक्ति हो जाती है। भविष्यमें पापकी रुकावट होती है कि पिछले पापके कारण अभी दु:ख भोग रहा हूँ, यदि अब भी पाप करूँगा तो भविष्यमें भी दु:ख भोगना पड़ेगा।

• वैराग्यकी तीव्रता राग-द्वेषको खा जाती है, समता उसका फल है।

• भक्ति (भजन, ध्यान) या ज्ञानके नशेमें चूर रहे, यह मालूम ही नहीं रहे कि संसारमें क्या हो रहा है।

• भगवान‍्ने दया करके मनुष्यका शरीर दे दिया, यह अन्तिम जन्म ही है। चौरासी लाख योनियोंमें मनुष्य शरीर अन्तिम है। साधन करके उसमें काम बना ले तो यह अन्तिम जन्म है।

• भजन ही हमारे जीवनका आधार होना चाहिये।

• जैसे अन्नके बिना मनुष्य व्याकुल हो जाता है वैसे ही भगवान‍्के भजन बिना व्याकुल हो जाना चाहिये।

• जैसे जोरकी प्यास लगनेपर उसे कोई भूलना चाहे तो नहीं भुला सकता। उसी प्रकार भगवान‍्के स्मरण बिना हमारा जीवन भाररूप हो जाना चाहिये।

• हर समय भगवान‍्को याद रखना—यह बड़ी अचूक औषधि है। यह कुपथ्यको भी हजम कर सकती है।