सत्य ही बोले
प्रवचन दिनांक—२८-१-१९४१ कलकत्ता
हरेक भाईको सत्यके पालनपर बहुत जोर देना चाहिये। जो व्यक्ति सत्य बोलना चाहता है, उसको भविष्यकी बात निश्चय रूपमें नहीं कहना चाहिये, क्योंकि भविष्य प्रारब्धके अधीन है।
निन्दा-स्तुतिमें झूठ बोला जाता है। निन्दा करते समय तथा स्तुति करते समय दोनोंमें ही लोग अधिक मात्रामें कर जाते हैं। अत: जहाँतक हो सके निन्दा-स्तुति दोनों ही न करे। निन्दा करे तो अपनी करे एवं स्तुति करे तो भगवान्की करे? जिसकी कोई सीमा नहीं, चाहे जितनी भी स्तुति करो थोड़ी ही है।
मुझे आज आप लोग अच्छा समझते हैं, भविष्यका कोई क्या कह सकता है। अपनी आत्माके लिये भविष्यकी बात क्या कही जा सकती है, इसीलिये शास्त्रकारोंने कहा है कि निन्दा-स्तुति दोनों मत करो। यदि कहीं कहना भी पड़े तो नीयत शुद्ध रखनी चाहिये।
भगवान्ने गीतामें केवल लक्षणमात्र बतलाये। पापी, पुण्यात्मा, दैवी सम्पत्ति, आसुरी सम्पत्ति, योगी, गुणातीत, सकाम, निष्काम सबके लक्षण बतला दिये। ये जिसमें हों वह योगी, आसुर आदि हैं। किसी भी मत-मतान्तरकी निन्दा नहीं की। अच्छी नियतसे बात कहनी चाहिये।
झूठ बोलनेका एक कारण भय भी है। भयके कारण व्यक्ति झूठ बोल देता है। जीविका नाश तथा अन्य भयके कारण भी झूठ बोल देता है। सत्यसे भयका नाश होता है। सत्यवादीको कहीं भय नहीं है। वह निर्भय हो जाता है।
मनुष्य लोभवश भी झूठ बोल देता है। हमको लाख रुपयोंके लिये भी झूठ नहीं बोलना चाहिये। आपने झूठ बोलकर लाख रुपये कमाये। मरते समय रुपये तो यहीं रहेंगे, झूठ तुम्हारे साथ जायेगा।
रुपयोंसे भगवान् थोड़े ही मिलते हैं। सत्यता, समतासे भगवान् मिलते हैं। झूठका कारण राग-द्वेष है। जहाँ सत्य रहता है, वहाँ असत्य नहीं रह सकता। जहाँ ज्ञान है, वहाँ अज्ञान नहीं रह सकता। सत्यकी स्थापना होनेसे झूठके कार्य—काम, क्रोध, लोभ, मोह, राग-द्वेष, यह सब बन्द हो जाते हैं, अन्यथा सत्य टिक नहीं सकता।
सत्यरूपी सूर्य उदय हो गया तो सब दुर्गुण, दुराचारोंका नाश हो जाता है। मनुजीने केवल एक सत्यभाषणको ही सनातन धर्म माना है। पहले धर्मके दस लक्षण बतलाये, अन्तमें नौको छोड़कर केवल सत्यपर जोर दिया।
सत्यवादी बनो—सत्यं ब्रूयात्।
इसलिये हमलोगोंको सत्यकी स्थापना करनी चाहिये। हरेक बातका ध्यान रखना चाहिये। आज जानेका विचार है। इसलिये सार बातें, महत्त्वपूर्ण बातें कहनी हैं। सत्य, त्याग—ये बड़े महत्त्वपूर्ण हैं। हम दो भाई या दो मित्र साझेमें दुकान करते हैं। उस समय हमको त्यागका व्यवहार करना चाहिये। त्यागका व्यवहार बड़ा महत्त्वपूर्ण है। भाईके साथ या मित्रके साथ आप रुपयोंके जमा-खर्चके विषयमें बात कर रहे हैं, उस समय हमको यही चाल चलनी चाहिये कि हमारे भाई या मित्रको दो पैसे अधिक मिलने चाहिये। एक महात्माको छोड़कर अपने स्वार्थकी चाल हम सब लोगोंमें है ही। हमारे प्यारे मित्रका हित हो, वही महत्त्वपूर्ण है। त्याग ही मुक्तिको देनेवाला है। आपमें बहुत गुण हैं, परन्तु स्वार्थका त्याग नहीं है तो आपकी मुक्ति नहीं हो सकती।
एक भाईने बहुत अच्छी बात व्याख्यानमें सुनायी, हमलोग बहुत प्रसन्न हुए। लोगोंने पूछा—आप कहाँसे आये? वह बोला—वृन्दावनसे आये हैं। सेतुबन्ध रामेश्वर जायेंगे। वह ब्राह्मण था। हमलोगोंने कहा—कुछ सेवा करना चाहते हैं। वह बोला—मेरे पास व्यवस्था है, आवश्यकता नहीं है। हम कहते हैं—कुछ तो ले ही लीजिये। जितना-जितना वह इन्कार करता है, उतनी-उतनी हमारी देनेकी चाह बढ़ेगी। यदि वह ले ही नहीं तो उसके व्याख्यानसे जो प्रभाव पड़ा, उससे अधिक उसके त्यागसे प्रभाव पड़ता है। उसके त्यागके व्यवहारके कारण उसका व्याख्यान हमारेमें दृढ़ हो गया। यदि कुछ ले लेते हैं तो कम प्रभाव पड़ता है। यद्यपि लेना कोई बुरी बात नहीं है।
जितना-जितना उसमें लोभ दीखने लगता है, उतना ही प्रभाव कम होता जाता है। वह माँगने लगता है तो कुछ भी प्रभाव नहीं रह जाता। बात यह है कि त्याग ही प्रधान है।
स्वार्थ तो सबमें है ही। घरमें अच्छी चीजें आयें, अच्छी चीजें दूसरोंको दें, बची हुई अपने लें तो उस व्यवहारका बड़ा प्रभाव पड़ता है।
व्यवहारमें त्याग एक ओर है, दूसरी ओर सौ रुपया अपने हकका मैं ले रहा हूँ। इन दोनोंमें त्यागके सामने लाख रुपया भी कोई चीज नहीं है। त्यागसे भगवान् मिल सकते हैं। हम मर जायेंगे तो रुपये यहीं पड़े रहेंगे, त्यागका महत्त्व समझना चाहिये।
एक पुरानी बात कहता हूँ। चालीस वर्ष पहले विक्रम संवत् १९५६ के लगभगकी बात है। मेरी सोलह वर्षकी आयु थी। स्थिति साधारण थी। दो हजार या पाँच हजारकी पूँजी थी। मैं रोकड़से पाँच रुपये लेता था तो सच्चाईके साथ लिख देता था। पाँच रुपये खर्च खाते नाम, नगदी ह० जयदयाल। ऐसा कई बार हुआ होगा। मेरे पिताजीने कभी मुझे नहीं पूछा कि यह किस काममें लगा। हिसाब नहीं पूछा। वे जानते थे कि यह जनाकर, लिखकर लेता है। यदि पूछूँगा तो कदाचित् यह आगे छिपाकर लेने लगेगा। ऐसे ही हमलोगोंको विचारना चाहिये। बहुत-सी बातें ऐसी हैं। उनके व्यवहारका मुझपर बड़ा प्रभाव हुआ।
बहुत उच्च श्रेणीके पुरुष संसारमें वास्तवमें बहुत कम हैं। एक बहुत विशेष बात सुनाता हूँ, यदि मैं आपलोगोंको व्याख्यान सुनाकर पूछूँ कि व्याख्यान कैसा हुआ? इसका तात्पर्य यह है कि मान-बड़ाईकी इच्छा है, अन्यथा क्यों पूछता। लोग मेरे व्याख्यानको सुनकर प्रसन्न हों। यह नीचे दर्जेकी भावना है। अधिक लोग सुननेके लिये आवें, यह भाव रखना भी नीचे दर्जेकी ही बात है। महात्माका-सा व्यवहार नहीं है। अधिक लोगोंको लाभ पहुँचे—यह भावना है या मान-बड़ाईकी भावना है, कौन जाने।
दूसरोंमें नीचे दर्जेकी बुद्धि और अपनेमें ऊँचे दर्जेकी भावना यह सूक्ष्म बात है। यह भाव ही नीची श्रेणीका है। यह भाव ऊँचे साधकोंमें भी रहता है। परमात्माको प्राप्त पुरुषोंकी बात तो कुछ नहीं कही जा सकती। जो बात कही जाय उस बातको काममें लानेवाले दो ही हों तो वह भी बहुत हैं, अन्यथा लाख भी कोई कामके नहीं हैं।
हमलोगोंको विचार करना चाहिये कि हमारी आज यह स्थिति क्यों हुई? मुझे मेरे कर्तव्यकी ओर ध्यान रखना चाहिये, आपके कर्तव्यकी ओर नहीं। सब लोगोंपर यह बात घटायी जा सकती है।
आज एकान्तमें दो व्यक्तियोंसे बहुत अच्छी बातें हुईं। दो लोगोंके सामने जो बात हो, हजारके सामने उस रूपमें नहीं हो सकती। कई बातें ऐसी हो सकती हैं, जो किसीके सामने भी नहीं की जा सकती हैं।
छिपाव सभी जगह खराब नहीं होता। कोई बात कहनेकी हो, कोई न भी हो। संसारमें सबसे बढ़कर परम प्रेमी परमात्मा हैं। पुस्तकोंमें तो प्रेमीकी बातें देखते हैं, पर किसी प्रेमीका दर्शन नहीं हुआ। समझते तो हैं कि प्रेमी ऐसे होते हैं, पर ऐसा कोई मिला नहीं। श्रद्धाकी भी बातें मैं बहुत कह देता हूँ। पर जिस श्रद्धाकी महिमा हम पुस्तकोंमें पढ़ते हैं, निवेदन भी करते हैं। जिस श्रद्धाके प्रतापसे एक क्षणमें परमात्माकी प्राप्ति हो जाय, ऐसे श्रद्धालुके दर्शन नहीं हुए। श्रद्धाकी और भी बातें कुछ लोगोंने सुननेकी इच्छा प्रकट की। मैंने कहा और भी बातें है, पर कहनेकी इच्छा नहीं होती। कोई सुननेवाला पात्र होगा तो कह देंगे, नहीं तो साथ ले जायेंगे।
पतिव्रताके प्रेममें आदर, पूज्यभाव रहता है। गोपियोंका प्रेम ऊँचेसे ऊँचा उदाहरण है। निष्काम प्रेम भरतजीका, प्रह्लादका श्रेष्ठ है।
ऊँची श्रेणीका प्रेमका भाव—हमारे दो हाथ हैं। इनमें कैसा भाव है। जैसा ये वैसा ही ये, दोनों हमारे हैं। भगवान् अर्जुनके लिये वसुदेवजीकाे कहते हैं—अर्जुन है सो मैं हूँ, मैं हूँ सो अर्जुन है। यह भाव गोपियोंमें भी था, अर्जुनमें भी था। व्यवहार एक दूसरी चीज है, वास्तविक प्रेम दूसरी चीज है।
समता—सम होकर भी दो चीज हुई न। एक ही हो तो समता क्या? उदाहरण—तुम हम दो व्यक्ति बैठे हैं। यह तो है नहीं कि बद्रीदास है सो मैं हूँ, मेरा प्यारा है, प्रेमी है, पर है तो मेरेसे अलग ही। भगवान् कहते हैं—सब मेरी आत्मा हैं। वासुदेव: सर्वमिति सब मेरी आत्मा, सब मेरा स्वरूप है। भगवान् सब ब्रह्माण्डके लिये कहते हैं कि सब मैं ही हूँ। भगवान्की ही यह विशेषता है कि सब मैं हूँ। अर्जुनके लिये भगवान् दोनों बातें कहते हैं—अर्जुन है सो मैं हूँ, मैं हूँ सो अर्जुन है।
सारे विकारोंका इस बातमें नाश है। अपने आपसे किसीको लज्जा नहीं आती है। अपने आपसे कोई भय नहीं करता। अपने आपका कोई एकान्तमें मान नहीं करता। अपने आपसे कोई छिपाव नहीं करता। ये शब्द ही नहीं बनते। जहाँ स्वयं ही हैं वहाँ न लज्जा है, न भय है, न मान है, न अपमान है, न समता है, न विषमता है। हमारा हाथ है इच्छा होती है, यहाँ आता है, दूसरी ओर ले जाता है। आँख इच्छाके अनुसार खुलती है, बन्द होती है। हमलोगोंके व्यवहारमें किस बातकी कमी है? प्रेमकी कमी है। हाथको दबाकर बैठते हैं, हाथ कुछ नहीं सोचता। कष्ट होता है तो निकाल देते हैं।
सारा संसार जिसका अंग हो जाय, वह परम योगी है। प्रेम, एकता, श्रद्धा, समता सब समान हैं, सबका एक रूप है। प्रेम-श्रद्धा एक ही चीज है। बड़ा छोटा कुछ नहीं। हमलोगोंका प्रेम है, उसमें श्रद्धा बड़ी चीज है। श्रद्धासे बड़ा प्रेम है। वह हमलोगोंके समझमें आना कठिन है, क्योंकि श्रद्धा दूसरेमें ही होती है।
आत्मौपम्येन सर्वत्र समं पश्यति योऽर्जुन।
सुखं वा यदि वा दु:खं स योगी परमो मत:॥
(गीता ६। ३२)
हे अर्जुन! जो योगी अपनी भाँति सम्पूर्ण भूतोंमें सम देखता है और सुख अथवा दु:खको भी सबमें सम देखता है, वह योगी परम श्रेष्ठ माना गया है।
यह तत्त्वज्ञानकी दृष्टिसे बतलाया गया। भक्तिकी दृष्टिसे भी यही प्राप्त होता है। थोड़ा भेद तबतक है, जबतक पूरी बात नहीं समझी जाती।
तत्र को मोह: क: शोक: एकत्वमनुपश्यत:।
एकमात्र परमेश्वरका निरन्तर साक्षात् करनेवाले पुरुषके लिये कौन-सा मोह रह जाता है और कौन-सा शोक रह जाता है।
प्रेममें इतना अन्तर है कि प्रेमी एवं प्रेमास्पद एककी तरह बन जाते हैं। मिले हुए दोनों हाथ एककी ही तरह हैं। क्रिया होती है तो दोनोंकी एक साथ ही हो रही है।
सर्वभूतस्थितं यो मां भजत्येकत्वमास्थित:।
सर्वथा वर्तमानोऽपि स योगी मयि वर्तते॥
(गीता ६। ३१)
जो पुरुष एकीभावमें स्थित होकर सम्पूर्ण भूतोंमें आत्मरूपसे स्थित मुझ सच्चिदानन्दघन वासुदेवको भजता है, वह योगी सब प्रकारसे बरतता हुआ भी मुझमें ही बरतता है।
इससे पहले कहते हैं—
यो मां पश्यति सर्वत्र सर्वं च मयि पश्यति।
तस्याहं न प्रणश्यामि स च मे न प्रणश्यति॥
(गीता ६। ३०)
जो पुरुष सम्पूर्ण भूतोंमें सबके आत्मरूप मुझ वासुदेवको ही व्यापक देखता है और सम्पूर्ण भूतोंको मुझ वासुदेवके अन्तर्गत देखता है, उसके लिये मैं अदृश्य नहीं होता और वह मेरे लिये अदृश्य नहीं होता।
यह साधन है। परिणाम होता है तस्याहं न प्रणश्यामि स च मे न प्रणश्यति। इससे यह अलग नहीं, उससे वह अलग नहीं, यह इसका फल है।
अत्यन्त निकटमें स्थित होना—यह उपासना है। भगवान् कहते हैं कि भक्तकी चेष्टा मुझमें ही है। उसकी चेष्टा मेरेसे अलग नहीं है। कठपुतलीको सूत्रधार ही नचाता है। उससे यह भिन्न है। सूत्रधार तो बाहरसे नचाता है। यहाँ तो भीतर बैठकर नचाता है। सूत्रधार यह कहता है कि कठपुतलीको मैं नचाता हूँ। मैं नाचता हूँ यह नहीं कहता। पुस्तकोंमें ही देखते हैं, प्रेमी कोई मिला नहीं, क्या करें? भगवान् ज्ञानीके बारेमें बतलाते हैं—
सर्वभूतस्थमात्मानं सर्वभूतानि चात्मनि।
ईक्षते योगयुक्तात्मा सर्वत्र समदर्शन:॥
(गीता ६। २९)
सर्वव्यापी अनन्त चेतनमें एकीभावसे स्थितिरूप योगसे युक्त आत्मावाला तथा सबमें समभावसे देखनेवाला योगी आत्माको सम्पूर्ण भूतोंमें स्थित और सम्पूर्ण भूतोंको आत्मामें कल्पित देखता है।
आजकल संसारमें सच्चे महापुरुष बहुत कम हैं। बिलकुल नहीं हैं, ऐसी बात नहीं है। सौ में पचहत्तर तो महात्माके बहाने ठगनेवाले हैं। मैं सौमें पचहत्तर संकोचसे कहता हूँ, होंगे तो अधिक। इसीका परिणाम है कि आज हम धर्म और ईश्वरकी निन्दा सुनते हैं। सच्चे महात्मा बहुत कम ही कसौटीपर खरे उतरते हैं।
बहुतसे सज्जन कहानेवाले लोगोंका तो ध्येय ही कंचन-कामिनीका होता है। उनको कितनी ही शिक्षा दीजिये, वह आपकी और हमारी बातें सुननेवाले थोड़े ही हैं। आप इस ओरसे रोकिये, वे दूसरी ओरसे मार्ग खोजते हैं। बिल्ली किसी-न-किसी तरह आपके घरमें आ जाती है। मौका खोजती है। उसे चाट पड़ी हुई है। हमलोगोंको इन झूठे भक्त, झूठे ज्ञानी, झूठे महात्माओंके कारण ही गाली सुननी पड़ती है, अन्यथा कोई कैसे कह सकता है कि धर्म ढकोसला है, ईश्वर नहीं है। लोग उदाहरण देते हैं कि अमुक व्यक्ति इतनी माला फेरता है और उसके आचरण ऐसे हैं। बगुलेकी तरह मछलीको देखते ही खा जाते हैं। इससे नास्तिकताका प्रचार होता है। भगवान् क्यों नहीं रोकते? वे स्वयं करवाते हैं। कैकेयीको निमित्त बनाकर स्वयं ही वन जाते हैं। अध्यात्म-रामायणके बालकाण्डमें भगवान् कैकेयीसे कहते हैं—तू पश्चात्ताप मत कर। मैंने ही तेरी बुद्धिमें भेद उत्पन्न किया था। तू ही उसकी पात्र थी, तेरा कल्याण हो जायगा। मैं साक्षात् परमात्मा हूँ। मैंने ही तुमको निमित्त बनाया था। क्यों निमित्त बनाया? वनमें जाकर दुष्टोंका विनाश करनेके लिये। इसी प्रकार नास्तिकताका प्रचार भगवान् उन लोगोंका भण्डाफोड़ करनेके लिये करते हैं, जो कंचन-कामिनीके लिये ईश्वरके नामपर दुनियाको ठगते हैं। काँच-काँच फूट जायगा, रत्न अहरणमें प्रवेश होगा। नाश होनेवाले पदार्थोंका ही विनाश होगा। सत्यका नाश नहीं होता। सत्यका नाश हो जाय तो वह सत्य ही नहीं है।
नासतो विद्यते भावो नाभावो विद्यते सत:।
उभयोरपि दृष्टोऽन्तस्त्वनयोस्तत्त्वदर्शिभि:॥
(गीता २। १६)
असत् वस्तुकी तो सत्ता नहीं है और सत् का अभाव नहीं है। इस प्रकार इन दोनोंका ही तत्त्व तत्त्वज्ञानी पुरुषोंद्वारा देखा गया है।
सत्यकी कोई हानि नहीं होती। सच्चे पुरुषोंकी कोई हानि नहीं हो सकती। यदि हो जाय तो ईश्वर कोई है ही नहीं। पोपाँ बाईका राज्य है। (अंधेरनगरी है)
छोटे बच्चेके मुँहमें एक साथ दो अँगुली एक उसकी और एक दूसरेकी देते हैं बच्चा अपनी अँगुलीको बचाकर दूसरेकी अँगुली चबा जाता है। क्या भगवान्को इतनी बुद्धि भी नहीं है कि वह दुष्टोंके साथ-साथ शिष्टोंको भी नष्ट कर डालेगा। इसकी तो कभी शंका ही नहीं करनी चाहिये।
एक और गुप्त बात बताता हूँ। दो चीजोंमें कलियुगका वास है, कंचन और कामिनी। इन दोनोंसे हरेक प्रकारसे बचना चाहिये। वास्तविक बचना तो इनका भीतरसे त्याग करना है। ऊपरसे भी इनसे बचना चाहिये। किसी प्रकार भी इनके सम्पर्कमें पड़नेपर मामला गड़बड़ लगता है। कोई कहे तुम्हारे कानमें सोना है। बचपनमें तो इसका चलन था, शौकसे पहना था। अब क्यों नहीं निकाला? शौक है तो निकालनेपर भी क्या लाभ? शौक नहीं है तो पहननेपर भी क्या हानि? वास्तवमें यदि हमारी इनमें आसक्ति नहीं है तो इनका कोई बुरा परिणाम किसीपर नहीं होगा। आपको हिम्मत बँधायी जाती है। आश्वासन दिया जाता है कि संसारमें बिना बुरा हुए किसीपर बुरा प्रभाव नहीं होगा। सनातन धर्मका नाश हो जाय तो नाम सनातन नहीं रह सकता। अविनाशी चीजका विनाश हो ही नहीं सकता। कुछ स्त्रियाँ—गाली देती हैं कि तुम्हारा बाप मर जाय, भाई मर जाय, लड़नेको तैयार होती हैं। पता लगाओ कि उनकी गालीसे किसीके बुखार हुआ, पेट दुखा, सिर दुखा? कुछ नहीं हुआ। रत्तीभर भी अन्तर नहीं पड़ा। फिर गालियोंसे तुम्हारे क्या हानि हुई, दे गाली। नाशवान् पदार्थ पति, पिता उनकी भी कोई हानि नहीं हुई, फिर हमारा पति ईश्वर है, जो अमर है। उसके लिये हमको क्या चिन्ता कि उसका कोई नाश कर दे। उनकी सुरक्षाकी व्यवस्था हम करें, यह तो हमारी मूर्खता ही है। जिसकी व्यवस्था हम करें, वह क्या ईश्वर है।
हम सब ईश्वरकी आज्ञा मानकर ईश्वरके भक्त, सदाचारी बन जायँ। जैसे रुपयोंका लोभी धन कमानेकी चेष्टा करता है—यह लक्ष्य रखकर चेष्टा करनी चाहिये, उसी प्रकार भक्ति सदाचारका प्रचार भगवान् कर रहे हैं, निमित्त हमको बना रहे हैं। भगवान्की जिसपर विशेष दया होती है, उसे निमित्त बनाते हैं। यदि रुकावट आती है तो समझकर व्यक्तिको अपनी गलती खोजना चाहिये। भूल तो हमारी है और हम दोष लगाते हैं दूसरोंपर। समझ लो हमारी कोई भूल नहीं है और रुकावट आती है तो फिर हमको भी क्या आग्रह है? अगलेकी इच्छा। यदि चेष्टा करें तो भी कोई आपत्ति नहीं। भगवान् वनमें तो गये ही। कौसल्या और भरतका आग्रह अच्छा ही समझा गया। होगा तो वही होइहि सोइ जो राम रचि राखा।
हमको कभी भी निरुत्साह नहीं होना चाहिये। हमारे शरीरको आठ पहर ऐसे चलाना चाहिये जैसे कल (मशीन) चलती है, निरुत्साह नहीं होना चाहिये।