स्वार्थ-त्यागसे मुक्ति
भगवत्प्राप्तिमें स्वार्थ-त्याग ही मुख्य है। जहाँ स्वार्थ है वहीं पाप है।
न मां कर्माणि लिम्पन्ति न मे कर्मफले स्पृहा।
इति मां योऽभिजानाति कर्मभिर्न स बध्यते॥
एवं ज्ञात्वा कृतं कर्म पूर्वैरपि मुमुक्षुभि:।
कुरु कर्मैव तस्मात्त्वं पूर्वै: पूर्वतरं कृतम्॥
(गीता ४। १४-१५)
कर्मोंके फलमें मेरी स्पृहा नहीं है, इसलिये मुझे कर्म लिप्त नहीं करते—इस प्रकार जो मुझे तत्त्वसे जान लेता है, वह भी कर्मोंसे नहीं बँधता। पूर्वकालके मुमुक्षुओंने भी इस प्रकार जानकर ही कर्म किये हैं। इसलिये तू भी पूर्वजोंद्वारा सदासे किये जानेवाले कर्मोंको ही कर।
फलका अर्थात् स्वार्थका त्याग करके जो कर्म करता है, उसे कर्म नहीं बाँध सकते हैं। मोक्ष चाहनेवालोंने इसी प्रकार कर्म किये हैं। पहले तीर्थोंमें लोग आते थे तो कभी कोई चीज बिना मूल्य नहीं लेते थे, पर आजकल लोगोंमें वह विचार नहीं रहा।
स्वार्थका कोई भी सम्बन्ध रखे ही नहीं। स्वार्थके त्यागसे मान, बड़ाई मिले तो उसका भी त्याग कर दे, तब मुक्ति मिले। हमारे सोनेके लिये अच्छी जगह हो, पर दूसरेकी इच्छा उस जगहके लिये हो तो वह जगह छोड़ दे। कोई भी चीज खाने, पीने, पहननेकी हो बढ़िया दूसरेको दे दे।
परमात्माके मिलनेमें विलम्ब हो रहा है, उसका कारण स्वार्थ ही है। भजन भले ही कम हो, पर स्वार्थका त्याग कर दे।
विहाय कामान् य: सर्वान् पुमांश्चरति नि:स्पृह:।
निर्ममो निरहङ्कार: स शान्तिमधिगच्छति॥
(गीता २। ७१)
जो पुरुष सम्पूर्ण कामनाओंको त्यागकर ममतारहित, अहंकाररहित और स्पृहारहित हुआ विचरता है, वही शान्तिको प्राप्त होता है अर्थात् वह शान्तिको प्राप्त है।
कमण्डलुमें जल भरा हुआ हो, दूसरेको आवश्यकता है तो उसे दे दें। इसपर कोई मान-बड़ाई करे तो मान-बड़ाईको त्याग दे। पके हुए खेतको चिड़िया खा जाती है, उसी तरह मान-बड़ाई साधनकी पूँजीको खा जाती है।
एक कहानी है—राजस्थानमें एक बार अकाल पड़ गया। वहाँका एक बनिया अपने एक मित्रके यहाँ पंजाब चला गया। वहाँ इसने गेहूँ, चनेका ढेर देखा। मित्रने कहा तुम चाहो तो तुम भी ऐसा ढेर लगा सकते हो। कैसे करें? मित्रने उसे खेती करनेकी विधि बता दी एवं खेत भी दे दिया। बनियेने अपनी स्त्रीका गहना चार सौ रुपयेमें बेचकर दो सौ रुपयेके बीज बो दिये। कुछ दिन बाद खेत देखकर रोने लगा कि मैं बरबाद हो गया। मेरे रुपये डूब गये। मेरे खेतमें घास-ही-घास हो गया। मित्रने कहा—खेती बहुत ही बढ़िया हुई है। इसकी रखवाली करो, कहीं गधे खेत न चर जायँ।
थोड़े दिनों बाद पौधोंमें दाने लगने लगे। मित्रने कहा—अब खेतकी निराई कर दो। गेहूँके अतिरिक्त और जो कुछ भी है उसे साफ कर दो। उसके कुछ दिनों बाद मित्रने कहा—अब खेतकी रखवाली चिड़ियोंसे करनी है। मनुष्यका एक पुतला बनाकर बाँध दे, उससे पक्षी पास नहीं आते। जब खेती पककर तैयार हो गयी, तब बनियेने कहा कि तूने मुझे निहाल कर दिया। इसे दृष्टान्तमें घटाना है। साधु, महात्मा मित्र एवं जीव-बनिया है। मित्रके पास गया तो देखा आनन्दका ढेर लग रहा है। पहले गेहूँ, चनेको धूलमें मिलाते हैं। पहले आनन्दको धूलमें मिला दे, सुख-आरामको छोड़ दे। अन्नके अंकुर फूटे। कष्ट सहने पर छाले हो गये। पालथी मारकर साधनके लिये बैठनेपर घुटने दुखने लगे। घास भजन-ध्यानकी वृद्धि है। गधा साधकको मिठाई आदि देनेवाले यानि सेवा करनेवाले हैं।
निराई यह है कि भजन, ध्यान, सत्संग, सेवाके अतिरिक्त अन्य किसी काममें समय न लगाये। दाने कच्चे पड़ गये अर्थात् ध्यान लगने लगा। पक्का नहीं हुआ, अर्थात् समाधि नहीं लगी।
मान-बड़ाई करनेवाले पक्षी हैं, उन्हें पत्थरसे मारे अर्थात् कड़े वचन कहे। कोई मान-बड़ाई करे, तो विरोध करे। उसके भी धान-ही-धान अर्थात् आनन्द ही आनन्द हो जाय। सुख, भोग, आरामको धूलमें मिलानेपर सदाके लिये आनन्द हो जाता है।
बखतरनाथजी बाजरेकी दो तीन दिनकी बनी हुई सूखी रोटी लेते थे। गाँवसे दो तीन मील दूर एक कुटिया बना रखी थी। वहाँ नित्य दो रोटी भिगो देते और भीग जानेपर नमक डालकर खा लेते और वही पानी पी लेते। उसी तरह जीवन बिता दिया।
वे बड़े विरक्त थे, खूब भजन-ध्यान करते थे। रात-दिन उनके और कुछ काम नहीं था। गाँवमें केवल रोटी माँगने जाते थे।
विधवा स्त्रीको गहना और सुन्दर कपड़ोंका त्याग कर देना चाहिये। गहना पास भले ही रहे, पर पहने नहीं। साधुओंकी तरह रहे और खूब भजन-ध्यान करे। बहुत-सी विधवाएँ कहती हैं कि हमें आनन्द नहीं आता। आनन्द कहाँसे आये, झूठे आनन्दको निकालो, तभी सच्चा आनन्द आयेगा।