उत्तरोत्तर सेवाका महत्त्व

प्रवचन दिनांक—२६-१-१९४१, सायंकाल, मैदान, कलकत्ता

प्रश्न—पुराने मित्र जो साधनोन्मुख नहीं हैं, उनका साथ हम छोड़ना चाहते हैं, पर वे नहीं छोड़ते।

उत्तर—जिस मार्गपर हम चल रहे हैं, उसपर उन्हें लगायें, यदि ऐसा न हो तो बुराईको एकदम दूर रखें। आसक्ति त्यागकर संग करनेमें आपत्ति नहीं है।

जिस तरह घरमें प्लेगकी बीमारी हो जाती है तो प्लेगसे घृणा करते हैं, उन भाइयोंसे नहीं। भाइयोंसे किसी तरह भी उपरामता नहीं है, हमारी उपरामता उनकी बीमारीसे है। हमें भय हो कि उनके संगसे उनकी बीमारी हमें भी लग जायगी तो सभ्यतासे उनसे अलग हों।

प्रश्न—हमारा क्या कर्तव्य है?

उत्तर—शरीरके ढाँचेको देखकर यह निश्चित करना चाहिये कि हमारा क्या कर्तव्य है। संसारकी अन्य योनियोंकी अपेक्षा यह मनुष्य शरीर सबसे ठीक है। मनुष्य ही सबकी सेवा कर सकते हैं। मनुष्यके अतिरिक्त अन्य जीव सबकी सेवा नहीं कर सकते, इसीलिये मनुष्यका कर्तव्य हो जाता है कि वह सबकी सेवा करे। संसारमें वह श्रेष्ठ समझा जाता है, जो कुटुम्बकी सेवा करता है, उससे वह श्रेष्ठ है, जो मोहल्लेकी सेवा करता है, उससे वह श्रेष्ठ है, जो गाँवकी सेवा करता है, उससे वह श्रेष्ठ है, जो प्रान्तकी सेवा करता है, उससे वह श्रेष्ठ है जो देशकी सेवा करता है, उससे वह श्रेष्ठ है जो पूरे विश्वकी सेवा करता है। उससे वह श्रेष्ठ है, जो केवल मनुष्योंकी ही नहीं, अपितु प्राणिमात्रकी सेवा करता है, उससे वह श्रेष्ठ है, जो सब लोकोंकी सेवा करता है।

सेवा पैसोंसे नहीं होती, अन्यथा धनी ही सेवा कर सकते हैं। हम परमात्मासे प्रार्थना करें कि वे सबका कल्याण करें।

बहिरन्तश्च भूतानामचरं चरमेव च।

सूक्ष्मत्वात्तदविज्ञेयं दूरस्थं चान्तिके च तत्॥

(गीता १३। १५)

वह चराचर सब भूतोंके बाहर-भीतर परिपूर्ण है, और चर-अचररूप भी वही है। वह सूक्ष्म होनेसे अविज्ञेय है तथा अति समीपमें और दूरमें भी स्थित वही है।

सन्नियम्येन्द्रियग्रामं सर्वत्र समबुद्धय:।

ते प्राप्नुवन्ति मामेव सर्वभूतहिते रता:॥

(गीता १२। ४)

जो पुरुष इन्द्रियोंके समुदायको भलीभाँति वशमें करके सर्वत्र समबुद्धि रखते हैं वे सम्पूर्ण भूतोंके हितमें रत और सबमें समान भाववाले योगी मुझको ही प्राप्त होते हैं।

ऐसा जिनका भाव है वह उत्तम भाव है। अपने हृदयमें ऐसा भाव बनाना चाहिये। जो सबके हितके लिये प्रार्थना करता है, वह वास्तवमें ऊँचा है, निष्कामी है।

परहित सरिस धर्म नहिं भाई।

पर पीड़ा सम नहिं अधमाई॥

परहित बस जिन्ह कें मनमाहीं।

तिन्ह कहँ जग दुर्लभ कछु नाहीं॥

जिसके हृदयमें ऐसा भाव हो कि सबका हित हो, वह जो चाहे वह कर सकता है।

वर्तमानमें जो नवयुवक विद्यालयमें पढ़ते हैं, उनको यह ज्ञान ही नहीं हो पाता है कि पूर्वमें कैसे-कैसे महापुरुष हो गये हैं। कुछ तो मनुष्यकी सेवाको ही सेवा मानते हैं, केवल जीवकी नहीं, कुछ केवल जातिकी सेवाको सेवा मानते हैं, जिससे होता यह है कि जातियोंमें फूट पड़ जाती है। फिर लड़-कटकर मर जाते हैं।

आज हमारा देश पराधीन है, निर्बल है, गरीब है। लोग कहते हैं, देशकी सेवा ठीक है। पर दूसरे देशवालोंकी विपत्ति देखकर उनकी सेवा भी करनी चाहिये। समदृष्टि रखकर सबकी सेवा करनी चाहिये।