विपरीत परिस्थिति भगवान्की परीक्षा
प्रवचन दिनांक—३०-१-१९४१, कलकत्ता
ट्राम या बसका पास एक भाईका दूसरा भाई काममें ले तो ये तीन दोष आते हैं—चोरी, झूठ एवं छिपाव। दूसरेको पास न देना चाहिये, न उसका पास लेना चाहिये। यह तो मामूली बात है। हमलोगोंको बड़े कामके लिये भी चोरी, झूठका प्रयोग नहीं करना चाहिये।
खूब ध्यान देना चाहिये। बहुत ही महत्त्वपूर्ण बात है। भगवान् श्रीकृष्ण और अर्जुनका बहुत ही अलौकिक प्रेम है। अर्जुनका सख्य और दास्यभाव था। गीतामें भगवान्ने कहा है— भक्तोऽसि मे सखा चेति।
अर्जुन एवं दुर्योधन सहायता लेनेके लिये भगवान्के पास जाते हैं। अर्जुन भगवान्के चरणोंकी ओर हाथ जोड़े खड़ा है। दुर्योधन भगवान्के सिरहाने बैठा है। भगवान् उठे, अर्जुनको देखकर बड़े प्रसन्न हुए। दुर्योधन बोला मैं पहले आया हूँ, भगवान्ने कहा—मैंने पहले अर्जुनको देखा है। मैं दोनोंकी ही सहायता करूँगा। एक ओर मैं बिना शस्त्रके रहूँगा, दूसरी ओर मेरी एक अक्षौहिणी नारायणी सेना रहेगी। मैंने अर्जुनको पहले देखा है, अत: पहला अधिकार इसका है, यह जो चाहे ले ले। अर्जुनने भगवान्को लिया, दुर्योधनने सेना ली। रास्तेमें जाते-जाते दुर्योधनने किसीसे कहा—आज मैंने इतने चतुर श्रीकृष्णको ठग लिया। उसकी मोगरी उसका सिर। उसके मित्रसे लड़नेके लिये उसकी ही सेना ले ली।
उधर भगवान्ने अर्जुनसे कहा—तुमने ऐसी मूर्खता क्यों की? तू मेरेको लेकर क्या करेगा? उसने कहा—मुझे तो आपसे ही काम है। बिना शस्त्रके मेरा क्या करेगा? अर्जुन बोला—घोड़ा हँकवाऊँगा। भगवान् प्रसन्न हो गये। बोले—यदि तू सेना ले लेता तो तेरी हार होती।
विचारनेकी बात है कितनी विशेष मित्रता थी। आज यदि कोई ऐसी बात हो तो देखो क्या दशा होती है।
मान लो, टोरमलजीसे मेरी मित्रता है। एक व्यक्ति अन्यायसे उनपर मुकदमा चलाता है। मुझसे आकर कहे कि एक हजार रुपया दीजिये, मेरे पास पैसा नहीं है। मैं उसे यदि एक हजार दे दूँ तो फिर हमलोगोंकी मित्रता कैसे ठहरती है, यह देखना है।
तेरह वर्षके बाद अन्यायपूर्वक पाण्डवोंके राज्यको न देना, युद्ध करना, उस युद्धमें पाण्डवोंके विरोधियोंको एक अक्षौहिणी सेना भगवान् देते हैं। अर्जुनने कभी इसकी बात भी नहीं की। परवाह ही नहीं की। भगवान्पर श्रद्धा थी। यह अर्जुनकी अग्निपरीक्षा थी। भगवान् मनके अत्यन्त विपरीत कार्य करके परीक्षा लेते रहे हैं। युधिष्ठिर-भीमकी तो बात जाने दें। नकुल-सहदेवने भी कभी इस बातके लिये नहीं कहा कि हमारे मित्र होकर दुर्योधनको सहायता क्यों दी? भगवान् ऐसे ही परीक्षा लिया करते हैं। युधिष्ठिरकी परीक्षाके लिये कुत्तेके रूपमें आते हैं। इन्द्रने कहा—चलो, स्वर्गमें। युधिष्ठिरने कहा—कुत्तेको साथ ले चलो, यह नहीं जा सकता तो मैं भी नहीं जा सकता। इन्द्रने कहा—कुत्तेको पालनेवाले अमुक-अमुक नरकको जाते हैं। युधिष्ठिरने कहा—अपनेपर श्रद्धा करनेवाले भक्तको त्यागनेवाले भी तो नरकको जाते हैं। मैं अकेला नहीं जाना चाहता। कुत्तेके रूपमें धर्मराज प्रकट हो गये, परीक्षा पूरी हुई।
अध्यापक स्वयं ही पढ़ाता है। वह यह जानता है कि यह विद्यार्थी कितना पढ़ा हुआ है, फिर भी परीक्षा लेता रहता है। भगवान् भी पद-पदपर परीक्षा लेते रहते हैं। हम अपनेको महात्मा न मान लें, भगवान् इसीलिये परीक्षा लेते हैं। डॉक्टर मवाद निकालनेके लिये चीरा देता है। मवाद थोड़ी भी अन्दर रह जाय तो रोगीको मार डालती है। ऐसे ही भगवान् हमारे अहंकारका नाश करनेके लिये चीरा लगाते रहते हैं।
हमारे मनके विपरीत भारीसे भारी काम हो तो भी भगवान्की दया, पुरस्कार समझकर प्रसन्न होते रहें। विचलित न हों, उनकी लीला देखते रहें। तुलसीदासजी कहते हैं—
धीरज धर्म मित्र अरु नारी।
आपद काल परिखिअहिं चारी॥
(रा.च.मा.३। ५। ७)
आपत्तिकालमें चारोंकी परीक्षा हो जाती है। आपत्तिकालमें सहायता करे वह नारी नारी है, अन्यथा कुनारी है। आपत्तिकालका मित्र-ही-मित्र है। आपत्तिमें धर्मकी रक्षा करना ही धर्मका पालन है। धीरजका पता आपत्तिमें ही लगता है। मित्रके साथ आपत्तिकालमें सौ गुना प्रेम करना चाहिये।
बिपति काल कर सतगुन नेहा।
श्रुति कह संत मित्र गुन एहा॥
(रा.च.मा.४। ७। ६)
संत मित्रकी यह बात है। वे आपत्तिकालमें सौ गुना प्रेम करते हैं। यह वेदकी मर्यादा है। परीक्षा होती रहती है। हमको भी जब विपत्ति पड़े तो खूब आनन्द मानना चाहिये। जो कुछ हो रहा है, भगवान्की लीला है। लीला समझकर खूब आनन्द मानना चाहिये।