विशेष चेतावनी

श्रावण कृष्ण ५, संवत् १९७८

भजन, ध्यान, सत्संगमें भी कुछ समय बिताना चाहिये। आपके काम भजन, ध्यान, सत्संग ही आयेंगे और कुछ भी साथ नहीं जायेगा। आगे भी बहुतसे कुटुम्ब तथा रुपये बहुत बार छोड़कर आये हैं, वे आपके कुछ काम नहीं आये। ऐसा जानकर अपने उद्धारके लिये विशेष चेष्टा करनी चाहिये। आप यदि बुद्धिमान हों तो विचारना चाहिये। आप किसलिये आये थे और क्या कर रहे हैं? केवल पेट भरनेके लिये और रुपया इकट्ठा करनेके लिये ही संसारमें मनुष्य जन्म नहीं मिला है। इस काममें अपने जन्मको बितानेवालेको अंतमें पश्चात्ताप ही करना होगा। आप विचारें कि आप कौन हैं और आपका क्या कर्तव्य है और जिस कामके लिये आये हैं, उसको भी याद करना चाहिये और विचार करना चाहिये। रुपये, वस्तुएँ तथा कुटुम्ब आपके कौन हैं? आपका तो शरीर भी नहीं है, परन्तु आपको विचारनेका समय मिलेगा तो कुछ चेत हो सकता है। नहीं तो समय बीता जा रहा है। दिन दिन करारका दिन निकट आ रहा है। आपने मनुष्य शरीर लेकर रुपया इकट्ठा करनेके सिवाय क्या किया। खैर, अब तो रुपया भी इकट्ठा हो गया और ब्याजसे खर्चका काम चल सकता है। अब तो अपने जन्मको सुधारनेके लिये तत्पर होना चाहिये। जैसे रुपया रोजगार करनेको तत्पर हुए तो रुपया वाला काम सिद्ध कर लिया, अब आगेका काम भी बनाना चाहिये। सदा तो इस जगह नहीं रहना है। चेष्टा नहीं करेंगे तो फिर आगे आपका कौन सहायक होगा। और आपके पास क्या बल है, जिसके भरोसे आप निश्चिंतसे हो रहे हैं। अभी नहीं चेतोगे तो फिर कब चेतोगे। आग लगनेके बाद कुँआ खोदना काम नहीं आयेगा। ऐसा विचार कर भगवान‍्के स्वरूप और नामके जपकी शरण लेनी चाहिये।

••••

श्रावण कृष्ण ९, संवत् १९७८

पहलेसे भगद्विषयक साधन कुछ ठीक लिखा सो बहुत ही आनन्दकी बात है। मेरी बड़ाई लिखी सो नहीं लिखनी चाहिये। बड़ाईके योग्य तो परमात्म देव हैं। उनकी खूब करो और किसी भी बड़ाई लिखनी ठीक नहीं। भगवान‍्के भजनके लिये चेष्टा किस तरह करनी चाहिये पूछी। सब समय भगवान‍्को याद रखते हुए ही हो सके उतना संसारका काम निष्कामभावसे ही कर्तव्य जानकर करना चाहिये। आपने पूछा संसारका काम किस तरह करना चाहिये, उसका विस्तृत विवेचन मिलनेपर अच्छी तरह किया जा सकता है। बाकी साधारण रूपसे लिखा जाता है।

भाव ठहराकर कोई भी वस्तु वजन, नाप तथा गिनतीमें कम देनी नहीं चाहिये, अधिक लेनी नहीं चाहिये।

वस्तु जो दिखायी जाय वही देनी चाहिये, दिखायी हुई ही देनी चाहिये, बदलनी नहीं चाहिये, कोई दूसरी वस्तु मिलानी भी नहीं चाहिये।

लाभ निश्चित करके कम नहीं देना चाहिये, अधिक नहीं लेना चाहिये।

व्यवहारमें बिना हकका पैसा नहीं लेना चाहिये। झूठ कपटसे, जबरदस्तीसे और बिना हक माँगकर किसीसे छूट नहीं करानी चाहिये।

निषिद्ध वस्तुका व्यवहार भी नहीं करना चाहिये तथा विशेष पाप यानि जिसमें जीव हिंसा विशेष हो इस प्रकारकी वस्तुका व्यापार भी नहीं करना चाहिये।

अपने मनको पूछ लेना चाहिये, जिसमें विशेष पाप हो वह काम नहीं करना चाहिये।

आपको लिखी वे सभी बातें पापके भयसे, मृत्युके भयसे तथा परलोकमें इसका दण्ड मिलेगा इस भयसे तथा ईश्वरके मिलनेमें ढील होगी इस भयसे कम हो सकती है। किंतु लोभ छोड़े बिना एकदम नहीं छूट सकती। भगवान‍्में प्रेम होकर कुछ भगवान‍्का प्रभाव जाना जाय, तब लोभ तुरन्त छूट सकता है। इसलिये भगवान‍्में प्रेम हो वह उपाय करना चाहिये।

लोभ छोड़कर केवल धर्म समझकर भगवान‍्को सभी कुछ जानकर, भगवान‍्की आज्ञा मानकर, भगवान‍्के लिये किया जाय और संसारके लोगोंको उससे बहुत लाभ हो, अपना तो केवल शरीर निर्वाहमात्र ही हो, भले ही लाभ हानिमें हर्ष शोक न हो, उनका व्यवहार केवल लोगोंके हितके लिये ही है। रुपयोंके लिये नहीं है। ऐसा व्यवहार बहुत ही उत्तम समझा जाता है। उसका निष्काम व्यवहार है। उससे हृदय बहुत शुद्ध होता है।

घरवालोंसे तथा संसारी सब मनुष्योंसे स्वार्थ छोड़कर उनके हितका चिंतन करते हुए उनके साथ बर्ताव किया जाय, वह बर्ताव उत्तम है। यह हृदय शुद्ध करनेवाला है। ध्यान करनेका अभ्यास करनेसे ध्यान भी हो सकता है। कुछ चेष्टासे अभ्यास करनेसे हो सकता है। सत्संग और जपका अभ्यास अधिक होनेसे भी ध्यान निरन्तर हो सकता है। काम करते हुए भी नामका जप श्वास द्वारा और भगवान‍्के स्वरूपका ध्यान मन द्वारा करनेकी चेष्टा करनेसे एकान्तमें भी बहुत लाभदायक है। सत्संग कम हो तो भगवान‍्की भक्तिकी पुस्तक पढ़नी चाहिये। वह भी सत्संग है।

श्रावण कृष्ण १४, संवत् १९७८

आपने लिखा कि मेरा साधन तेज होनेके लिये उपाय होना चाहिये। उपाय आपको करना है तो कटिबद्ध होकर उस काममें लगना चाहिये। पहले तो भगवत्प्राप्तिके लिये जन्म बिता दिया करते। जन्म जन्म चेष्टा करनेसे भगवत्प्राप्ति होती। अब कलियुगमें बहुत ही शीघ्र भगवत्प्राप्ति होती है, क्योंकि इस समय भगवान‍्में श्रद्धा भक्तिवाले बहुत कम हैं। इसलिये थोड़ी ही चेष्टासे यानि थोड़े ही साधनसे भगवान् मिल जाते हैं, फिर भी जिन मूर्खोंके विश्वास नहीं है, उनका कुछ भी उपाय नहीं है।

आपको यदि भगवान‍्के मिलनेकी इच्छा हो और बहुत आवश्यक हो तो भगवान‍्की ओरसे कोई ढील नहीं है। आपके साधनकी ओरसे ही ढील है। ध्यानका साधन तेज करनेसे सत्संग करनेसे, भजन करनेसे भगवान‍्से मिलना हो सकता है। इसलिये बहुत जोरसे चेष्टा करनी चाहिये।

••••

आषाढ़ शुक्ल ११ संवत् १९७७

संसार और शरीरको मिथ्या समझकर तथा कालके मुखमें समझकर विश्वास करके भगवान‍्के नामका जप तथा ध्यान चेष्टा सहित करना चाहिये। भाईजी! विपत्ति तो अच्छे अच्छे लोगोंपर आती है। जिन्होंने आपत्तिकालमें भी अपने धर्मको नहीं छोड़ा, वे ही धन्यवाद देने योग्य हैं। सत्संग, भजन करनेकी विशेष चेष्टा करनी चाहिये। सत्संग और भजनमें आनन्द आने लग जाय तो इतना लिखनेकी भी आवश्यकता नहीं, बाकी जबतक प्रभाव तथा मर्म नहीं जाने, तबतक आनन्द आना कठिन है। साधारण प्रसन्नताको आनन्द नहीं कहा जा सकता। सच्चा आनन्द प्रभाव जाननेसे आता है। जबतक आनन्द नहीं आवे, तबतक अच्छे पुरुषोंका कहना मानकर ही मनुष्यको उचित है कि भजन, ध्यानमें विश्वास करके ही करनेकी विशेष चेष्टा करनी चाहिये। मनुष्यका दिन एक-सा नहीं रहता। अपनी नियत साफ रखनी चाहिये और अपने मनमें ऐसा भाव रहना चाहिये कि प्राण भले ही जायँ शरीर बेचकर भी लोगोंका ऋण चुकाना चाहिये।

••••

श्रावण कृष्ण १, संवत् १९७७

दिन बीते जा रहे हैं। समय बहुत चला गया, तुम किसलिये ढील कर रहे हो। समयको अमोलक समझनेपर इस तरह साधनकी ढील नहीं रह सकती, इसलिये सत्संग करके समयकी अमोलकता जाननी चाहिये। आप किसलिये गोहाटीमें बैठे हो। मिथ्या शरीर तथा शरीरके भोगकी आसक्ति छोड़कर आपको भगवान‍्के परायण होना चाहिये। आपसे मिथ्या काममें समय किस तरह बिताया जाता है। आप इस मिथ्या संसारके भोगोंके जालमें किस तरह फँसे पड़े हैं। आपको अपने प्रिय मित्रोंका विश्वास करना चाहिये। इस असार संसारके भोगोंमें फँसकर किसीका भी उद्धार नहीं हुआ है। संसारके भोग देखनेमें अच्छे हैं, बाकी अन्तमें नाश करनेवाले हैं।

१. स्वार्थ त्यागकर सेवा करनेसे बर्ताव सुधरता है।

२. हिंसा, कपट, झूठके त्यागसे धर्मका ज्ञान होता है।

३. भजन-ध्यान करनेसे भी अन्त:करण शुद्ध और भगवान‍्में प्रेम होता है।

४. शास्त्रका संग, सत्पुरुषोंका संग करनेसे उनके अनुसार चलनेसे ध्यान होता है।

५. स्वाद और आरामके त्यागनेसे वैराग्य होता है।