व्यवहारमें सच्चाई और निरभिमानता लावें
प्रवचन दिनांक—१८-७-१९५०, गीताप्रेस, गोरखपुर
सभी भाइयोंको अपने कल्याणके लिये अपना सुधार करना चाहिये। समूहका, सबका कल्याण करना तो कठिन है, पर व्यक्ति स्वयं अपना कल्याण कर सकता है।
इसमें हम अधिक कड़ाई करें तो कोई कठिन नहीं है। परमात्माकी प्राप्तिके सामने फाँसी स्वीकार करना भी कठिन नहीं है। जबतक परमात्माकी प्राप्ति नहीं होगी, तबतक न मालूम कितनी बार जन्म-मरणकी फाँसी पड़ेगी। जीये तबतक कष्ट सह ले। धर्मके लिये, ईश्वरके लिये मरना स्वीकार कर ले तो वह मरना सार्थक हो गया। कठिनाई स्वीकार करनेसे कल्याण हो सकता है। ढिलाईसे कल्याण होना कठिन है। अत: जो कोई कठिनाई प्राप्त हो, उसको हम सहन करें। संस्थाके अधिकारियोंके लिये ये बातें बतायी जाती हैं—
जितने पत्र आते हैं, उनके उत्तरमें जो भी समाचार जाते हों, उनको स्वयं देखे कि उनमें कोई भी झूठ-कपट नहीं है। जितने कर्मचारी हैं, उनका हित सोचे तथा अपने कामका हित सोचे। लोगोंमें जो यह धारणा बैठी हुई है कि सच्चाईसे काम नहीं हो सकता, फिर यह हो जाय कि हो तो सकता है, क्योंकि यहाँ होता है।
पोस्ट आफिस आदि कहीं भी पत्रादिकी शिकायत करें, उसमें कभी भी झूठ, कपट न हो, उसका हित हो। किसीका अनिष्ट न हो—ऐसा ध्यान रखे। दूसरेका अनिष्ट न होकर अपना काम हो जाय—ऐसी चेष्टा करे।
गीता-रामायणका अधिकसे अधिक प्रचार हो, ऐसा प्रयत्न करना चाहिये। पदका अभिमान त्यागकर लोगोंका हित हो, ऐसी चेष्टा करे। अहंकारके लिये पद नहीं है। सबको भगवद्भावसे देखे। अधीनस्थ कर्मचारियोंको अपनेसे अच्छा समझे। अपनेमें अपनी दृष्टिसे अच्छापन आ जाय तो भी अपनी कमीकी ओर देखे। दूसरोंके गुणोंसे अपने गुणोंका मिलान करे, दूसरोंके अवगुणोंसे अपने अवगुणोंको नहीं मिलावे। अपने गुणको तो गुण ही नहीं समझे।
खूब खटकर काम करे, खून-पानी एक कर दे। उससे यदि कुछ कमजोरी आ जाय तो वह भी हमारे लिये कल्याणकारी है।
अपनी ओरसे सत्य-न्यायका व्यवहार करे। किसीकी निन्दा न करे। दूसरा यदि हमारी निन्दा करता है तो उससे कुछ हर्ज नहीं। ईश्वरके घर न्याय है। वह सबको जानता है कि कौन सच्चा है। सबका हित सोचे। गीताप्रेसका नुकसान नहीं हो और सामने वालेका भी अहित न हो। सच्चाई रखे, अन्यायपूर्वक घूस न दे। घरपर आ जाय तो अतिथिरूपमें सेवा करनी ठीक है। पुस्तक देनी, भोजन कराना, सत्कार करना उसमें कोई हर्ज नहीं। चाहे किसीके भी सामने दे। खाने-पीनेका सत्कार, पुस्तक, कल्याण देनेमें कोई आपत्ति नहीं है। पर किसी एक कामके लिये रुपया देना घूस है। कानून भंग न करे। कहीं भंग हो जाय तो कह दे। सत्यकी हानि न हो। किसीकी हिंसा नहीं करनी, प्रतिहिंसाका भाव भी नहीं हो। प्रतिहिंसा कभी नहीं करनी चाहिये।
सबके साथ प्रेमका व्यवहार करे। यह न समझे कि मैं अधिकारी हूँ। यह पद तो कामकी सुविधाके लिये है। अपने साथ काम करनेवालोंको ऊँची बोलीसे अर्थात् सम्मानपूर्वक बोले। नरमाईसे कहे, ऊपर बैठावे।
अपनी बात न माने तो सच्चाईसे नरमाईके शब्दोंसे हटा सकते हैं। बिलकुल ही न माने तभी जवाब दे। उसके साथ हितका व्यवहार करे। उसका हित ही सोचे। नीति, शासनका व्यवहार करना ही नहीं है, यह बात नहीं है। पहले प्रेमसे, हितके व्यवहारसे उसका सुधार करनेकी चेष्टा करे। उससे काम न निकले, वह माने ही नहीं, तब शासन करे। स्वार्थ, हिंसा, अहितका भाव आवे ही नहीं। झूठ, कपट, चोरी, बेईमानी हमारे लिये महान् कलंक है। अपनेमें कहीं दोष आ जाय तो उसे स्वीकार कर ले, कह दे। अपनी सफाई भी नहीं दे तो उत्तम है। पर सत्यतासे, नरमाईसे सफाई दे दे। भ्रम-निवारणके लिये दे दे तो भी हर्ज नहीं।
समान अधिकारवालोंको विशेषता दे। मतभेद हो जाय तो उनको प्रसन्नतासे प्रधानता दे, दु:ख नहीं माने। अपनी बात जना दे। पर फिर उनको आदर देनेके लिये उनकी बात मान ले।
किसीका व्यवहार अनुचित देखकर उत्तेजना न हो। प्रेमसे समझाकर न्यायसे काम ले। जोशको, उत्तेजनाको रोके। बाहरमें प्रकाश न हो, भीतरमें उत्तेजना आ जाय तो उसे भीतर रखे।
इसी प्रकार जितने भी कर्मचारी काम करते हैं, उनको हृदयसे भगवान् समझे। यह न हो तो उनको अपनेसे किसी भी हालतमें कम न समझे। पद तो कामकी सुविधाके लिये है, अहंकारके लिये नहीं। न्यायका काम पड़े तो किसीका भी पक्ष न ले। निष्पक्ष विचार करे। न्याय करे। जो अपनेमें श्रद्धा-प्रेम रखे, उसे समझावे।
कोई भी काम करे, खूब खटे तो दूसरोंपर प्रभाव पड़े। झाडू देनेका काम पड़ जाय तो स्वयं करने लग जाय। ऊँच-नीचका भाव नहीं रखे। अधिकार, पद केवल जिम्मेवारीके लिये है। पदकी बात खतरेकी चीज है। सावधान न हो तो खतरा है। व्यवहारसे उन लोगोंको मालिक समझे। त्यागका व्यवहार करे तो उसका अच्छा प्रभाव पडे़। मैं आपको कहता हूँ, उसकी अपेक्षा मैं करके दिखाऊँ, तब अच्छा प्रभाव पड़े। काम, क्राेध, स्वार्थ, अहंकारका मेरा व्यवहार हो तो फिर उसका कुछ प्रभाव नहीं होता। कहूँ नहीं और करूँ तो उसका प्रभाव होता है। कहूँ भी करूँ भी तो उसका भी प्रभाव होता है। पर कहूँ और करूँ नहीं तो कुछ प्रभाव नहीं होता।
दो व्यक्ति काम करें तो उसका श्रेय स्वयं न लेकर दूसरेपर मँढ़ देवे। भगवान् रामकी बात—समर विजयका श्रेय इन बंदरोंको ही है।
हमको तो यही समझना चाहिये कि हम मान-बड़ाईके भूखे हैं, इसीलिये वे ऐसा कहते हैं, ऐसा समझनेसे मान-बड़ाईका दोष दूर हो जाय।
कोई बात समूहरूपसे सुधार करनेकी हो, वह समूहमें कह दे, एकान्तमें कहनेकी हो तो एकान्तमें कहे।
जिसे धर्म-पालन करना हो, उसको कष्ट सहना होगा। दमयन्तीको याद करो, द्रौपदीको देखो।
आराम भी रहे, धर्मका पालन भी न करना पड़े और भगवान् भी मिल जायँ, यह कैसे होगा। धर्मका पालन करना होगा तो कष्ट सहन करना पड़ेगा।
धर्मपालनमें सबको संतोष न करा सके तो न सही। अपने यह सोच ले कि धर्मपालन करना ही है, चाहे जो हो। राजा रन्तिदेव अड़तालिस दिनसे भूखे हैं। न्यायसे थोड़ा भोजन प्राप्त हुआ, उसका भी त्याग कर दिया तो उन्हें भगवान् मिल गये। आराम खोजनेवालेको भगवान्से मिलनेका अवसर कैसे आयेगा।
रुपयोंका नुकसान, शरीरका कष्ट सहन करना पड़े तो कर ले, व्यवस्था भले ही खराब हो, परन्तु धर्मपालन न छोड़े।
कठिनाईका सामना करके तपका आचरण करनेसे ही भगवान् मिलते हैं। कष्ट सहना चाहिये।
जिस तरह काम निकाल लेते हैं, वह तो चलता ही है। उसमें विचार करना है। सुखसे जीवन बिता रहे हैं। सुखकी कमी नहीं आयी, पर कमी आयी तो यही कि भगवान् नहीं मिले।
एक झूठ बोले, उसे छिपानेके लिये पाँच झूठ बोलना पड़े तो यह नहीं करे। उसे छिपावे नहीं। उसका दण्ड भोगना पड़े सो भोग ले। परमात्माकी प्राप्तिके लिये मरना हो तो अच्छा है। मरना तो है ही, फिर कुत्तेकी मौत क्यों मरे?
सच्चाई कहनेसे दण्ड कम मिलेगा, यह इच्छा करना कामनाका भाव है, सत्यको बेचना है। अपने तो सत्य कहना है, चाहे जो भी दण्ड मिले।
चुंगीकी चोरी नहीं करनी चाहिये, चोरी परमात्माकी प्राप्तिमें बहुत बाधक है। आगेके लिये सावधानीसे काम लेना चाहिये। कहीं भी चोरी न करे। मेरी समझमें आजसे दस वर्ष पहले परमात्माकी प्राप्तिमें इतनी सुगमता नहीं थी, जितनी आज है। कष्ट सहन करनेसे ही परमात्माकी प्राप्ति होती है।
कोई झूठ-कपटका काम हो गया, उसके लिये झूठ न बोले। चाहे सो दण्ड भुगत ले, दण्डके लिये तैयार रहे। यह बात यदि हमारे आचरणमें आ गयी तो बहुत शीघ्र कल्याण हो सकता है।
भगवान्के लिये धर्म-कर्म सब छोड़ दे, वह क्या गलत है? नहीं। प्रह्लाद पिताकी आज्ञारूप धर्मको त्यागकर ईश्वरभक्ति करता है, भगवान्के लिये धर्मका त्याग है।
जब भगवान् मिलते हैं, तब हम उनसे मिले बिना कैसे रह सकते हैं? भगवान्की प्रतीक्षा करनी चाहिये, भगवान् अब आयेंगे, हर समय प्रतीक्षा करनी चाहिये। भाव खूब बढ़ाना चाहिये, विरह व्याकुलता हो तब रोवें।
गुप्त रूपसे भक्ति करें। हरिका दास हरिका ही चिन्तन करता है।