आजका भ्रष्टाचार और उससे बचनेका उपाय
भगवत्स्वरूप भक्तशिरोमणि भरतजी भगवान् राघवेन्द्र श्रीराम-चन्द्रजीसे संत-असंतके लक्षण पूछना चाहते हैं, परंतु संकोचवश निवेदन करनेमें हिचकते हैं। भरतजी आदि भ्रातागण सब श्रीहनूमान्जीकी ओर ताकते हैं—इसलिये कि श्रीहनूमान्जी भगवान्के अतिशय प्रिय भक्त हैं, वे हमारी ओरसे निवेदन कर दें। अन्तर्यामी प्रभु सब जानते ही थे, वे कहते हैं—‘हनूमान्! कहो, क्या पूछना चाहते हो?’ हनूमान्जी हाथ जोड़कर कहते हैं—‘नाथ! भरतजी कुछ पूछना चाहते हैं, परंतु शीलवश प्रश्न करते सकुचाते हैं।’ प्रेमसिन्धु भगवान् कहते हैं—‘हनूमान्! तुम तो मेरा स्वभाव जानते हो, भरतजीमें और मुझमें क्या कोई अन्तर है?’ भरतजीने भगवान्के वचन सुनकर उनके चरण पकड़ लिये और अपने अनुरूप ही निवेदन किया—
नाथ न मोहि संदेह कछु सपनेहुँ सोक न मोह।
केवल कृपा तुम्हारिहि कृपानंद संदोह॥
फिर उन्होंने संत-असंतके भेद और लक्षण पूछे। भगवान् श्रीरामचन्द्रजीने पहले संतोंके अति सुन्दर लक्षण बतलाकर फिर असंतोंका स्वभाव बतलाते हुए कहा—
सुनहु असंतन्ह केर सुभाऊ।
भूलेहुँ संगति करिअ न काऊ॥
तिन्ह कर संग सदा दुखदाई।
जिमि कपिलहि घालइ हरहाई॥
खलन्ह हृदयँ अति ताप बिसेषी।
जरहिं सदा पर संपति देखी॥
जहँ कहुँ निंदा सुनहिं पराई।
हरषहिं मनहुँ परी निधि पाई॥
काम क्रोध मद लोभ परायन।
निर्दय कपटी कुटिल मलायन॥
बयरु अकारन सब काहू सों।
जो कर हित अनहित ताहू सों॥
झूठइ लेना झूठइ देना।
झूठइ भोजन झूठ चबेना॥
बोलहिं मधुर बचन जिमि मोरा।
खाइ महा अहि हृदय कठोरा॥
पर द्रोही पर दार रत पर धन पर अपबाद।
ते नर पाँवर पापमय देह धरें मनुजाद॥
लोभइ ओढ़न लोभइ डासन।
सिस्नोदर पर जमपुर त्रास न॥
काहू की जौं सुनहिं बड़ाई।
स्वास लेहिं जनु जूड़ी आई॥
जब काहू कै देखहिं बिपती।
सुखी भए मानहुँ जग नृपती॥
स्वारथ रत परिवार बिरोधी।
लंपट काम लोभ अति क्रोधी॥
मातु पिता गुर बिप्र न मानहिं।
आपु गए अरु घालहिं आनहिं॥
करहिं मोह बस द्रोह परावा।
संत संग हरि कथा न भावा॥
अवगुन सिंधु मंदमति कामी।
बेद बिदूषक परधन स्वामी॥
बिप्र द्रोह पर द्रोह बिसेषा।
दंभ कपट जियँ धरें सुबेषा॥
यदि सच्चाईके साथ विचार करके देखा जाय तो न्यूनाधिक रूपमें ये सभी लक्षण आज हमारे मानव-समाजमें आ गये हैं। सारी दुनियाकी यही स्थिति है। सभी ओर मनुष्य आज काम-लोभपरायण होकर असुरभावापन्न हुआ जा रहा है। परंतु हमारे देशकी स्थिति देखकर तो और भी चिन्ता तथा वेदना होती है। जिस देशमें त्यागको ही जीवनका लक्ष्य माना गया था, जहाँपर स्त्रीमात्रको स्वाभाविक ही माता माना जाता था, जहाँ परधनकी ओर मानसिक दृष्टि डालना भी भयानक पाप माना जाता था—उसको भारी जहर माना जाता था—‘बिष तें बिष भारी’, वहाँ आज कलाके नामपर पर-स्त्रियोंके साथ पर-पुरुषोंका अनैतिक सम्बन्ध बड़ी बुरी तरहसे बढ़ा जा रहा है और पर-धनकी तो कोई बात ही नहीं रही। दूसरेके स्वत्वका येन-केन प्रकारेण अपहरण करना ही बुद्धिमानी और चातुरी समझा जाता है। कुछ ही समय पूर्व ऐसा था कि मुँहसे जो कुछ कह दिया, लोग उसको प्राणपणसे निबाहते थे। आज कानूनी दस्तावेज भी बदले जानेकी नीयतसे बनाये जाते हैं। मिथ्याभाषण तो स्वभाव बन गया है। बड़े-से-बड़े पुरुष स्वार्थके लिये झूठ बोलते हैं। बड़े-बड़े धर्माचार्योंसे लेकर राष्ट्रोंके प्रसिद्ध-प्रसिद्ध अधिनायक, जनताके नेता, दलविशेषोंके संचालक, प्रख्यात संस्थाओंके पदाधिकारी, सरकारके ऊँचे-से-ऊँचे अधिकारी, बड़े-से-बड़े अफसर, छोटे-से-छोटे कर्मचारी, बड़े-बड़े व्यापारी, छोटे व्यापारी, दलाल, कमीशन-एजेंट, रेल और पोस्टके छोटे-बड़े कर्मचारी—सभी बेईमानीमें आज एक-से हो रहे हैं, मानो होड़ लगाकर एक-दूसरेसे आगे बढ़नेकी जी-तोड़ कोशिशमें लगे हुए हैं। चोर-बाजारी, घूसखोरी, भ्रष्टाचार, अनैतिकता लोगोंके स्वभावगत हो गयी है। सभी मानो बेईमानीका बाजार सजाये, एक-दूसरेको लूटने, ठगने और उसकी जड़ काटनेके लिये तैयार बैठे हैं। ऐसे बहुत थोड़े लोग होंगे, जिनकी ईमानदारीमें विश्वास किया जा सके। नये-नये कानून बनते हैं और बेईमानीके नये-नये रास्ते निकलते जाते हैं। इसका कारण यही है कि जिनको कानून मानना है और जिनके जिम्मे उसको मनवाना है, वे दोनों ही ईमानदार नहीं हैं। दोनों ही मिले हुए हैं। ऊपरसे एक-दूसरेको बेईमान बतलाते हुए भी दोनों ही नये-नये तरीकोंसे बेईमानी बढ़ानेमें लगे हैं। अफसर एवं राजकर्मचारी कहते हैं व्यापारी चोर हैं, इनको दण्ड होना चाहिये; और व्यापारी अफसरों, अधिकारियों और राजकर्मचारियोंकी खुलेआम चोरी तथा बेईमानी देखते हैं। चोरी और बेईमानी कैसे बंद हो!
एक युग था, जिसमें लोगोंका यह विश्वास था कि सर्वव्यापी सर्वान्तर्यामी भगवान् सदा-सर्वदा सर्वत्र हैं। वे हमारी प्रत्येक क्रियाको देखते हैं। हम एकान्तमें कोई पाप करते हैं, मनमें भी पापभावना करते हैं तो उसे भी भगवान् जानते-देखते हैं। इसलिये उनमें भगवान्से संकोच था। भगवान्के भयसे लोग बुरा कर्म करनेमें डरते थे।
इसके साथ ही चार बातें और हिंदू-संस्कृतिमें छोटे-बड़े सबके स्वभावगत-सी हो गयी थीं—
(१) मनुष्य-जीवनका चरम और परम उद्देश्य मोक्ष या भगवत्प्राप्ति है। इसी लक्ष्यकी प्राप्तिके लिये मानव-जीवनमें साधन करना है।
(२) पुनर्जन्म अवश्य होगा और उसमें हमें अपने अच्छे-बुरे कर्मोंका फल निश्चितरूपसे भोगना पड़ेगा।
(३) शास्त्र सत्य हैं और उनके कथनानुसार सुख-दु:ख हमारे कर्मोंका फल है।
(४) कर्तव्य पालन करना ही हमारा धर्म है, केवल अधिकार पाना धर्म नहीं।
इन चारों बातोंके कारण स्वभावसे ही भोगोंके त्यागका महत्त्व था, उसीमें जीवनकी महत्ता मानी जाती थी। चोरी-जारी आदि पापोंका फल विविध योनियोंमें एवं नरकादिमें अवश्य भोगना पड़ेगा, यह विश्वास था। दूसरेकी किसी भी वस्तुपर मन चलाना भी पाप है और उसे छल-बल-कौशलसे ले लेना तो महान् अपराध है—यह मान्यता थी। सुख-दु:ख हमारे कर्मके अनिवार्य फल हैं। बुरे कर्म करनेपर उसका अच्छा फल हो ही नहीं सकता; फिर बुरा कर्म क्यों करें—यह दृढ़ भावना थी। और हमें शास्त्रानुसार अपना कर्तव्य पालन करते जाना है, कर्मका फल तो भगवान्के हाथ है, हमारा फलमें अधिकार नहीं, कर्ममें ही अधिकार है—यह दृढ़ आस्था थी। इससे लोग स्वभावसे ही पापाचरणसे बचना चाहते थे।
आज ईश्वरका कोई भय नहीं। लोग व्याख्यान-मंचोंपर सहस्रों नर-नारियोंके सामने छाती फुलाकर और गला फाड़कर कहते हैं कि ‘ईश्वर तो कभीका मर गया। मनुष्यकी कल्पनामें ही ईश्वर था, आजका ज्ञानी और बुद्धिमान् मनुष्य इस कल्पनासे छुटकारा पाकर स्वतन्त्र हो गया है।’ और जनता ऐसे भाषणोंका स्वागत करती है। धर्मको अवनतिका कारण बताया जाता है। शास्त्रोंमें तथा कर्मोंके फल और पुनर्जन्ममें विश्वास उठता जा रहा है, सभी अधिकार चाहते हैं। कर्तव्यपर किसीका ध्यान नहीं है। शक्तिमत्ता, अधिकार और धनका लोभ इतना बढ़ गया है कि उसने मनुष्यको असुर नहीं, पिशाच बना दिया है। इसीसे आजका मानव एक-दूसरेपर खून चूसनेका दोष लगाता है और स्वयं मानो छल-बल-कौशलसे दिन-रात खून चूसनेका ही विशद व्यापार कर रहा है। उसने केवल इसी सिद्धान्तको मान लिया है कि किसी भी उपायसे हो, धनकी—भोग-पदार्थोंकी प्राप्ति होनी चाहिये; बस यह कामोपभोग ही सब कुछ है—
कामोपभोगपरमा एतावदिति निश्चिता:॥
(गीता १६।११)
यह कहा जा सकता है कि धनसे सुख मिलता है; क्योंकि उससे प्राय: सभी आवश्यकताओंकी पूर्ति होती है। यह आंशिक सत्य भी है; परंतु यह सुख वस्तुत: धनका नहीं है, हमारी आत्म-भावनाका है। धनमें तो सुख है ही नहीं। सुख है आत्माकी शान्तिमें। जो अशान्त है—दिन-रात उत्तरोत्तर बढ़ती हुई कामनाकी आगसे जलता है, उसको सुख कहाँ—‘अशान्तस्य कुत: सुखम्।’ यह नियम है कि जैसे आगमें ईंधन तथा घी डालते रहनेसे आग बुझती नहीं—प्रत्युत बढ़ती है, वैसे ही भोग-कामनाकी पूर्तिसे कामना घटती नहीं, बल्कि बढ़ती है। सौवाला हजारों-लाखोंकी चाह करता है तो लाखवाला करोड़ों-अरबोंकी चाह करता है। एक नियम यह भी है कि एक अभावकी पूर्ति अनेकों नये अभावोंकी सृष्टि करनेवाली होती है और जबतक अभावका अनुभव है, तबतक प्रतिकूलता है और प्रतिकूलता रहते चित्त सर्वथा अशान्त रहेगा और अशान्त चित्तमें सुख हो ही नहीं सकता। लोग भूलसे मानते हैं कि पैसेवाले बड़े सुखी हैं; पर यह बात वस्तुत: नहीं है। उनके हृदयमें जैसी आग धधकती है, वैसी गरीबोंके शायद नहीं धधकती! इसका अनुमान भुक्तभोगी ही कर सकते हैं।
उस दिन एक सज्जनने बहुत ठीक कहा कि पहले यद्यपि कुछ लोग ऐसे भी थे, जो भगवान् या धर्मका भय नहीं मानते थे और पाप करते थे, तथापि उनमें यह साहस नहीं था कि वे अपनेको निर्दोष ही नहीं, जनताका और समाजका सेवक बतायें और उलटे पाप न करनेवालोंको डरायें-धमकायें और उन्हें पापी सिद्ध करें। आज तो हमारी यह दशा हो गयी है कि हम स्वयं धर्म-सेवा और देश-सेवातकके नामपर अनवरत पाप करते हैं और अपने पापी गिरोहके बलपर निष्पाप लोगोंको डराते-धमकाते हैं एवं उन्हें पापी सिद्ध करना चाहते हैं। जनसेवक बतलाकर डाकूका काम करना, भाई बनकर किसीका सतीत्वापहरण करना, धार्मिक बनकर लोगोंको ठगना, गुरु बनकर धन-धर्मको लूटना, रक्षक नियुक्त होकर भक्षक बन जाना और पहरेदार बनकर चोरी करना आज बुद्धिमानी और गौरवका कार्य बन गया है। सभी क्षेत्रोंमें लोग अपने-अपने चरित्रोंपर ध्यान देकर देखें तो उन्हें उपर्युक्त कथनमें जरा भी अतिशयोक्ति नहीं मालूम होगी। यह हमारे नैतिक पतनका एक बड़ा दु:खद स्वरूप है।
चारों ओर दलबंदी है। हम मानो अपनेको ही छलते हुए कहते हैं कि ‘राष्ट्रीयता बढ़ रही है; पर वस्तुत: प्रान्तीयता, वर्गवाद और व्यक्तित्व ही बढ़ा जा रहा है। दूसरोंको फासिस्ट बताना और स्वयं वैसा ही काम करना स्वभाव-सा हो गया है, इसका प्रतीकार कैसे हो?’
हमारी समझसे इसका एक ही उपाय है और वह उपाय है अध्यात्मप्रधान प्राचीन हिंदू-संस्कृतिकी पुन: प्रतिष्ठा। जबतक मनुष्य-जीवनका लक्ष्य भगवान् नहीं होंगे, जबतक पुनर्जन्म और कर्मफलमें सुदृढ़ विश्वास नहीं होगा, जबतक शास्त्रोंके अनुसार पवित्र जीवन बनाना हमारे जीवनकी अनिवार्य साधना नहीं होगी और ऐसा बनकर जबतक किसी भी लोभ, भय या स्वार्थसे धर्मच्युत न होनेकी दृढ़ प्रतिज्ञा नहीं होगी, तबतक किसी भी आन्दोलनसे, प्रचारसे और कानूनसे भ्रष्टाचार, असदाचार और दुष्कर्म नहीं रुकेंगे। और जबतक यह पापका प्रवाह नहीं रुकेगा, इसका उद्गमस्थल नहीं सूखेगा, तबतक दु:खका प्रवाह भी नहीं रुक सकेगा। यह ध्रुव सत्य है।