अन्तर्याग और बहिर्याग
पूजन दो प्रकारसे होता है—आन्तर और बाह्य। आन्तरमें समस्त क्रियाएँ मानसिक होती हैं और बाह्यमें सामग्रियोंद्वारा। आन्तरपूजनको अन्तर्याग और बाह्यपूजनको बहिर्याग कहते हैं। बहिर्यागकी साधनाका अभ्यास किये बिना अन्तर्याग होना अत्यन्त कठिन है। बहिर्यागके मुख्यत: पाँच अंग हैं—(१) जप, (२) होम, (३) तर्पण, (४) मार्जन और (५) ब्रह्मभोजन। महाशक्तिके किसी एक स्वरूपके बोधक मन्त्रका विधिवत् पुरश्चरणादि नियमानुसार जप करना, मन्त्र, जपकी दशांश संख्याका हविर्द्रव्योंद्वारा अग्निमें हवन करना, पंचद्रव्योंके उपयोगोंद्वारा अपने-अपने अधिकारके अनुसार संतर्पण करना और न्याय तथा सत्यके द्वारा कमाये हुए धनसे देवीके प्रसन्नार्थ सुयोग्य ब्राह्मणोंको भोजन कराना। इन पाँच अंगोंके द्वारा शक्ति-साधक जब शरीर और वाणीसे पूजन कर चुकता है, तब वह मानस-पूजा अथवा अन्तर्यागका अधिकारी होता है। अन्तर्यागके भी पाँच पटल हैं—(१) पटल, (२) पद्धति, (३) कर्म, (४) स्तुति और (५) नमस्कार। देवीके स्वरूपबोधक मन्त्रके अक्षरोंसे पिण्डके नाड़ी-व्यूहमें विस्तारसहित भावनाका पटल बनाना। यानी मन्त्राक्षरोंद्वारा मूलाधार, स्वाधिष्ठान, मणिपूरक, अनाहत, विशुद्ध, आज्ञा और सहस्र-दलचक्रमें देवीके स्वरूपकी भावना करके चित्तको शक्ति-सम्पन्न करना पटल कहलाता है। उस मन्त्रपटलके द्वारा पंच अथवा षोडश उपचारोंसे हृदयादि पीठमें देवीका पूजन करना पद्धति कहलाती है। इस तरह नाड़ियोंमें और हृदयादि पीठ-स्थानोंमें पटल और पद्धतिकी रचना करनेके बाद विद्याके अर्थात् इष्ट मन्त्रके अक्षरोंद्वारा स्थूल देहपर कवचकी रचना करके, देवीके अनेक नामोंद्वारा पिण्डकी रक्षण-भावना करना वर्म अथवा कवच कहलाता है। इसके बाद देवीके मन्त्रकी स्मृति जाग्रत् रहे, ऐसे लघुस्तवी आदि रहस्यस्तोत्रके द्वारा देवीके गुण-गानको स्तुति कहते हैं और अनेक गुणोंमेंसे विशेष ध्यानमें रखनेयोग्य हजार गुणोंके बोधक नामोंद्वारा आन्तर भूमिकामें देवीको नमस्कार करना—ये पाँच अंग अन्तर्यागके हैं।