भगवान्का भजन करनेकी विधि
यद्यपि परब्रह्म परमात्मा ॐकारस्वरूप भगवान् श्रीशिव और भगवान् श्रीविष्णुके नामस्मरणकी अनन्त महिमा वेद-शास्त्रोंमें विस्तारपूर्वक वर्णित है तथापि कोई-कोई यह कहा ही करते हैं कि ‘भाई! हम नित्य ईश्वरका स्मरण करते हैं, फिर भी हमें इसका कुछ भी फल मिलता प्रतीत नहीं होता—इसका क्या कारण है?’ इस लेखमें इसी एक प्रश्नको लेकर कुछ विचार किया जा रहा है।
प्रकृतिका यह अटल नियम है कि कोई भी कार्य क्यों न हो, उसे उपयुक्त पद्धति या विधिके साथ करनेसे ही वह सफल होता है। यही बात ईश्वर-स्मरणके सम्बन्धमें भी है। यदि उसे विधिपूर्वक किया जायगा तो निश्चय ही वह शास्त्रोक्त फलका दाता होगा। कितने ही भोले-भाले भाई कहते हैं कि परमात्माके नामस्मरणमें नियमकी आवश्यकता नहीं है। देखो न, श्रीगोस्वामी तुलसीदासजीने कहा है—
तुलसी अपने रामको, रीझ भजौ या खीज।
उलटे सुलटे नीपजै, खेत पड़े सो बीज॥
अर्थात् रामको प्रेमसे अथवा द्वेषसे किसी भी प्रकार भजो उसका फल अवश्य मिलेगा; जैसे खेतमें बीज सीधा पड़े, चाहे उलटा, वह जमेगा अवश्य। परंतु वे भाई गोस्वामी तुलसीदासजीके आशयको समझे नहीं। गोस्वामीजी-जैसे मर्यादाके पोषक महात्मा शास्त्रविरुद्ध आदेश कभी नहीं दे सकते। उन्होंने उपर्युक्त दोहेमें भजन-विधिका खण्डन नहीं बल्कि समर्थन किया है और इसके प्रमाणस्वरूप उक्त दोहेमें ‘खेत’ शब्द बैठा है। बीज उलटा पड़े या सीधा, इसकी विशेष परवा नहीं है; परंतु उसके लिये नियमानुसार उर्वराभूमि, यथोचित हवा-पानी और रखवालीकी जरूरत तो रहती ही है। इसलिये गोस्वामीजीने जो ‘रीझ’ और ‘खीझ’ शब्द रखे हैं, उन्हें विकल्पमात्र मानना चाहिये। दोहेका तात्पर्य तो यही है कि शुद्ध अन्त:करणरूपी खेतमें ही ईश्वर-नामस्मरणरूपी बीज उगता है, न कि अशुद्ध मनरूपी ऊसर भूमिमें। और साथ-साथ ‘खेत’ शब्दसे संकेत कर दिया है कि ईश्वर-प्रेमरूपी जल सींचते रहनेसे ईश्वरके नामके (आगे कहे जानेवाले) दस अपराधरूपी घास-फूसको हटा देनेसे, शास्त्रविरुद्ध, मन:कल्पित मतवादरूपी कीड़ों, पशु-पक्षी और तुषारसे उसे बचाते रहनेसे, सच्चे संतोंके सत्संगरूपी प्रचण्ड सूर्यके ब्रह्मविचार या तत्त्वविचाररूपी तापके निरन्तर लगते रहनेसे और मनरूपी चन्द्रमाकी उत्साह (लगन)- रूपी अमृत-वर्षा आदि सम्पूर्ण साधनरूप विधिसे ही भजनरूपी बीज परमात्म-साक्षात्काररूपी धान्य उत्पन्न करनेमें हेतु होता है। इसमें शास्त्र-विधिका निषेध कहाँ है? अवश्य ही यह बात जाननेकी है कि ईश्वर-स्मरण अर्थात् भजन करनेकी शास्त्रोक्त विधि क्या है?
शास्त्रका वचन है—
सन्निन्दासति नामवैभवकथा
श्रीशेशयोर्भेदधी-
रश्रद्धा श्रुतिशास्त्रदैशिकगिरां
नाम्न्यर्थवादभ्रम:।
नामास्तीतिनिषिद्धवृत्तिविहित-
त्यागो हि धर्मान्तरै:
साम्यं नाम्नि जपे शिवस्य च हरे-
र्नामापराधा दश॥
अर्थात् (१) संतोंकी निन्दा, (२) असत् (पापी) पुरुषके सामने नामके वैभवकी कथा कहना, (३) शिव और विष्णु (उनसे उपलक्षित गणेश, सूर्य, शक्ति)-में भेद-बुद्धि रखना, (४) वेद-वचनोंमें अश्रद्धा, (५) शास्त्र-वचनोंमें अश्रद्धा, (६) सद्गुरुके वचनोंमें अश्रद्धा, (७) ईश्वरके नामकी महिमाको अर्थवाद समझनेका भ्रम, (८) सब पापोंको मिटानेवाला ईश्वरका नाम मेरे पास ही है, इसमें मैं जो-जो पाप करूँगा, वे सब-के-सब नाम लेनेसे ही मिटते रहेंगे—ऐसा समझकर पाप करते रहना, (९) ईश्वरके नामसे सबसे अधिक पुण्य होता है, इसलिये संध्या-वन्दन, गायत्री-जप, देव-पूजा, दान-यज्ञ-तप आदि अन्य कृत्य करनेकी कोई आवश्यकता न मानकर नित्य-नैमित्तिक वेद-शास्त्रोक्त शुभ कर्मोंको छोड़ देना और (१०) ईश्वरके नामको अन्य धर्मोंके बराबर समझना—ये ऊपर कहे हुए भगवान् शिव और विष्णुके नाम-जप-सम्बन्धी दस अपराध हैं, अतएव उन्हें छोड़कर ईश्वरका नाम जपना चाहिये। इसी भावको लेकर किसी महात्माने कहा है —
राम राम सब कोई कहे,
दसरित कहे न कोय।
एक बार दसरित कहे,
(तो) कोटि यज्ञ फल होय॥
अर्थात् ‘राम-राम’ सभी कहते हैं, परंतु नाम-जपके दस अपराधोंसे रहित होकर नहीं जपते। यदि इन दस अपराधोंसे रहित होकर एक बार भी जपे तो कोटि यज्ञोंका फल होता है। आश्चर्य है, शास्त्रकी ऐसी स्पष्ट आज्ञा होते हुए भी कोई-कोई शिव और विष्णुमें भेद मानते हैं; परंतु ऐसा करके वे अपना अनिष्ट-साधन करते हैं।
भगवान्के किसी भी नाम और स्वरूपकी निन्दा न करते हुए भगवान्के समस्त नाम मेरे इष्टके ही नाम-रूप हैं —ऐसा समझना चाहिये।
उपरिलिखित दस अपराधोंसे बचते हुए, शुद्ध और स्थिर चित्तसे उत्साह और प्रेमके साथ, प्रतिदिन यथाशक्ति नित्य-नैमित्तिक शुभ कर्मोंको करते हुए, प्रात:-सायं संध्याओंमें तथा यथासम्भव मध्याह्न और मध्यरात्रिके समय एकान्तमें बैठकर नित्यप्रति कम-से-कम एक लक्ष ईश्वरके नाम शान्तिपूर्वक दीर्घकालतक जपने चाहिये। ईश्वरके नामके जपमें चित्तकी वृत्तिको लगाकर राम, कृष्ण, शिव, विष्णु, ब्रह्मा, गणपति, सूर्य, शक्ति, नृसिंह, गोविन्द, नारायण, महादेव आदि ईश्वरके प्रसिद्ध नामोंमेंसे अपनी रुचिके अनुसार किसी भी नामका जप किया जा सकता है।
यही ईश्वरके भजनकी सामान्य विधि है। इस विधिसे नियमितरूपसे दीर्घकालतक किया हुआ नाम-जप निस्सन्देह शास्त्रोक्त फलोंको प्रदान कर अन्तमें परमपदकी प्राप्ति करानेवाला होता है।