भगवान्के आश्वासनपर विश्वास करो
अपि चेत्सुदुराचारो भजते मामनन्यभाक्।
साधुरेव स मन्तव्य: सम्यग्व्यवसितो हि स:॥
क्षिप्रं भवति धर्मात्मा शश्वच्छान्तिं निगच्छति।
कौन्तेय प्रति जानीहि न मे भक्त: प्रणश्यति॥
(गीता ९। ३०-३१)
‘यदि कोई अतिशय दुराचारी भी अनन्यभावसे मेरा भक्त होकर मुझको निरन्तर भजता है तो वह साधु ही माननेयोग्य है। क्योंकि वह यथार्थ निश्चयवाला है, इसलिये वह शीघ्र ही धर्मात्मा हो जाता है और सदा रहनेवाली परम शान्तिको प्राप्त होता है। अर्जुन! तू निश्चयपूर्वक सत्य जान, मेरा भक्त नष्ट नहीं होता।’
इन दो श्लोकोंमें दयामय भगवान् श्रीकृष्णने पापग्रस्त निराश जीवोंको बड़ा ही आश्वासन दिया है। कोई किसी भी स्थितिमें क्यों न हो, उसका अबतकका जीवन किसी भी प्रकारसे क्यों न बीता हो, वह कितने ही बड़े-से-बड़े दुराचारमें प्रवृत्त क्यों न रहा हो, यदि वह इस समय अपने मनमें यह दृढ़ निश्चय कर ले कि एकमात्र भगवान् ही मेरे त्राणकर्ता, रक्षक और आश्रयदाता हैं, इस रक्षकत्वमें दूसरेको जरा भी भाग न दे, साथ ही यह भी निश्चय कर ले कि जितना जीवन अब बचा है, वह सब-का-सब—पूरा-का-पूरा—केवल भगवान्के लिये ही लगाया जायगा और भगवान्को पुकारने लगे तो वह तुरंत धर्मात्मा बन जाता है। ‘क्षिप्र’ शब्द इसी बातको प्रकट करता है। तदनन्तर वह उस परम शान्तिको—शाश्वत परम धामको प्राप्त हो जाता है, जिसको पाकर फिर कुछ भी पाना शेष नहीं रहता। इसी सिद्धान्तको और भी दृढ़ करनेके लिये भगवान् प्रतिज्ञापूर्वक यह घोषणा करते हैं कि अर्जुन! इस बातको ‘सत्य समझ कि मेरे भक्तका नाश नहीं होता।’ अनन्यभाक् होकर भजन करनेका तथा शेष जीवन भगवदर्थ बितानेका निश्चय करनेवालेको भक्तवत्सल भगवान् अपना भक्त—निजजन समझ लेते हैं। जो अबतक महापापी था, वह तुरंत ‘भक्त’ हो जाता है। उसने अबतक क्या किया था, इस बातकी ओर भगवान् कुछ भी ध्यान नहीं देते। वे देखते हैं, केवल उसके मनकी वर्तमान स्थितिको। इस बातको समझकर अपना कल्याण चाहनेवाले पुरुषको चाहिये कि वह विश्वासपूर्वक अपने वर्तमान जीवनको श्रीहरिके चरणोंमें समर्पण करनेकी चेष्टा करे।
भविष्य तो वर्तमानका फल है और वर्तमान जीवन अनन्यभावसे श्रीहरि-चरणाश्रित हो जानेपर भूतकालके सभी पाप-कर्म जल जाते हैं। मनुष्य जो कुछ कर्म करता है, उसका संचित बनता है। संचितसे स्फुरणा होती है। जो नया कर्म किया जाता है, उसीकी स्फुरणा अधिक और पुरानेकी कम होती है। गोदाममें माल भरा होता है और नया-नया माल भरता जाता है, निकालनेके समय हालका भरा हुआ ऊपरका माल पहले निकलता है और बहुत समय पूर्वका भरा हुआ नीचेका माल पीछे निकलता है, वैसे ही नये कर्मोंके संकल्प अधिक आते हैं। यही सबका अनुभव है कि जिन कर्मोंमें हम दिन-रात लगे रहते हैं, प्राय: उन्हींके संकल्प अधिक आते रहते हैं। पूर्वके कर्मोंको हम धीरे-धीरे भूलते जाते हैं। नवीन संचितकी स्फुरणा ज्यादा होगी। बार-बार जैसी स्फुरणा होगी वैसा ही कर्म होगा और वही कर्म फिर संचित बनकर नयी स्फुरणाओंका हेतु बनेगा एवं उन्हीं स्फुरणाओंसे फिर वैसे ही कर्म होंगे। तात्पर्य यह कि अच्छे कर्मोंसे अच्छा संचित, अच्छे संचितसे अच्छी स्फुरणा और अच्छी स्फुरणासे फिर अच्छे कर्म होते हैं। इस प्रकार शुभके चक्रमें पड़ा हुआ जीवन क्रमश: अत्यन्त शुद्ध बन जायगा एवं अशुभ संचितको अपना कार्य (अशुभ संकल्पोंकी उत्पत्ति) करनेका अवसर ही प्राप्त नहीं हो सकेगा। पुराने अशुभ संचित नये शुभके नीचे दब जाते हैं और वह शुभ बढ़कर जब भगवान्की परमभक्तिरूपमें परिणत हो जाता है तब उन पहलेके समस्त शुभाशुभ संचितमें आग लग जाती है, जिससे वे तमाम जलकर नष्ट हो जाते हैं।
‘ज्ञानाग्नि: सर्वकर्माणि भस्मसात्कुरुते तथा।’
यही मुक्तावस्था है। इसीलिये ‘गयी सो गयी, अब राख रहीको’ इस लोकोक्तिके अनुसार भगवान्की उपर्युक्त आश्वासनवाणीका अनुसरण करते हुए महापुरुषगण जीवोंको वर्तमान जीवनके वर्तमान सुधारका उपदेश करते हैं।
कोई यह समझे कि मैं तो बड़ा पापी हूँ, मेरा उद्धार कैसे हो सकता है, मेरे भजन करनेसे क्या होगा? तो उसका यह समझना निरा भ्रम ही है। किसी पर्वत-कन्दराका अन्तरतम प्रदेश लाखों वर्षोंसे चाहे जितने घने अन्धकारसे आवृत क्यों न हो, किसी प्रकार सूर्यका प्रकाश वहाँ पहुँचनेपर वह अँधेरा क्या यह कहकर वहाँ स्थिर रह सकता है कि मैं अनन्त वर्षोंसे यहाँ डेरा डाले बैठा हूँ, इसलिये कुछ समय बाद पीछे हटूँगा। ठीक इसी प्रकार जीवके अशेष पापपुंज भगवान्के सम्मुख होते ही जलकर भस्म हो जाते हैं। भगवान् कहते हैं—
सनमुख होइ जीव मोहि जबहीं।
जन्म कोटि अघ नासहिं तबहीं॥
जब जीव निष्कपट होकर अनन्यभावसे अपने-आपको भगवच्चरणोंमें समर्पित कर सरल हृदयसे पुकार उठता है कि ‘प्रभो! मैंने आजतक दुनियाके भोगोंकी सेवा की, विषयोंका गुलाम रहा, धनिकोंकी चापलूसी की, अबसे—इसी क्षणसे आपके प्रणतपापहारी पुण्य चरणकमलोंका आश्रित बनता हूँ, मुझे शरण दीजिये।’ बस, तभी तत्काल ही पतितपावन नाथ उसे अपना लेते हैं। जहाँ भगवान्ने जिसको अपना लिया वहाँ फिर उसमें नाममात्रको भी कोई पाप नहीं रह जाता। विभीषण रावणका भाई राक्षस था। भगवान्के सामने आते ही वह निष्पाप हो गया, परम भक्त बन गया। जीवका भूतकाल कैसा ही रहा हो, यदि उसका वर्तमान सुधर जाय, वह दृढ़ निश्चय कर ले कि आगेका समय केवल भगवद्भक्तिमें ही बीतेगा, तो वे अशरणशरण स्वत: ही अपना अभय हाथ फैलाकर उसे ऊपर उठा लेते हैं और अपनी स्नेह-शान्तिमयी गोदमें बिठा लेते हैं। ऐसा न होता तो जीवका उद्धार कभी होता ही नहीं। जीव समस्त पापोंके फलोंको भोगकर कभी उन्हें नि:शेष नहीं कर सकता। भगवान् बड़े दयालु हैं। इसलिये उन्होंने यह नियम बना दिया है कि चाहे कोई कितना ही बड़ा पापी क्यों न हो, मेरे सम्मुख आते ही धर्मात्मा बन जायगा। बात भी सर्वथा ठीक ही है। भला, प्रज्वलित अग्निमें पड़ा हुआ कूड़ा-करकट क्या कभी बिना जले रह सकता है?
खेद तो इस बातका है कि भगवान्के इस दयापूर्ण विधानको जानता हुआ भी यह अज्ञानी जीव अपनी कामाग्निको विषय-भोगरूपी घृतकी आहुतियोंसे पूर्णकर सुखी होना चाहता है। पूज्यपाद गोस्वामी तुलसीदासजीने विषय-भोगपरायण जीवोंको लक्ष्य करके कैसी सुन्दर चेतावनी दी है—
अब नाथहिं अनुरागु जागु जड़ त्याग दुरासा जी ते।
बुझै न काम-अगिनि तुलसी कहुँ बिषय भोग बहु घी ते॥
मनुष्य चाहता है कि मैं बहुत-से विषयोंको प्राप्त करके सुखी बन जाऊँ, पर यह हो ही नहीं सकता। ज्यों-ज्यों मनचाहे विषयोंकी प्राप्ति होती है, त्यों-ही-त्यों उसकी लिप्सा बढ़ती चली जाती है। घीसे आग बुझती नहीं, बढ़ती है। भोगोंसे तृप्ति नहीं, ताप होता है; शान्ति नहीं, अशान्ति होती है। इसीलिये गोस्वामीजी चेतावनी दे रहे हैं कि ‘इस भ्रमको छोड़ दो, यह तो दुराशामात्र है। इसे छोड़कर अमृतोपम भगवत्प्रेमको प्राप्त करो। यदि तुम विषयोंको न भी छोड़ना चाहोगे तो ये अन्तमें जबरदस्ती छूटेंगे। इससे अच्छा है कि पहलेसे ही तुम इनकी आसक्ति छोड़कर भगवच्चरणकमलोंके अनुरागी भ्रमर बन जाओ।’
वास्तवमें मनुष्य-जीवनका परम उद्देश्य भगवान्के चरणारविन्दोंका अनुराग प्राप्त करना ही है। परंतु यह तभी हो सकता है जब जीव परमात्माको अपना एकमात्र आश्रय बनाकर सब प्रकारसे आत्मसमर्पण कर दे और यह वस्तुत: बहुत कठिन बात नहीं, बल्कि भगवत्कृपाके बलसे बहुत ही सहज है, जो लोग ऐसा मानते हैं कि हमारे भाग्यमें भगवत्प्राप्ति लिखी ही नहीं, हमारे वैसे संस्कार ही नहीं, वे वास्तवमें बड़ी भूल करते हैं। भगवान्के दरबारका दरवाजा सबके लिये सदा खुला रहता है, वह कभी बंद होता ही नहीं। चाहे कोई आधी रातको अपने प्रियतम परमात्माका द्वार खटखटावे, वे तत्काल उसकी पुकारका उत्तर देकर उसे अपने हृदयसे लगानेको तैयार मिलेंगे। बच्चा जब कभी भी रोकर माँको पुकारता है तो माँ समय-असमयका विचार न कर झटसे अपनी स्नेहभरी गोदमें उठाकर उसे स्तन-पान कराने लगती है। पुकार सुननेपर न तो वह बच्चेका पाप-पुण्य देखती है और न क्षणभर रुकती ही है। उस समय वह स्नेहकातरा जननी केवल दोनों हाथ बढ़ाकर बच्चेको ऊपर उठाना और पुचकारना ही जानती है। फिर भला, भगवान् तो सारी माताओंकी माता—स्नेहके सागर हैं। माँ तो किसी समय शायद दूर रहनेके कारण न भी सुने अथवा किसी दूसरे काममें लगी हो तो उसे पूरा करके भी आवे, पर भगवान्में ये दोनों बातें नहीं। वे कहीं दूर नहीं हैं, सर्वदा सर्वत्र वर्तमान हैं। वे तो मन्दिरमें, मूर्तिमें, बाहर-भीतर सर्वत्र समभावसे सदा सर्वदा रम रहे हैं, पूर्ण हो रहे हैं। वे सर्वशक्तिसम्पन्न हैं। एक कामको करते हुए दूसरेको न कर सकें—ऐसी कठिनाईका उनके लिये कोई प्रश्न ही नहीं। वे एक ही समय असंख्य स्थानोंमें प्रकट होकर असंख्य काम कर सकते हैं और ऐसा करते हुए भी वे सर्वत्र ही रहते हैं। अत: कोई किसी भी कारणसे कभी भी उन्हें पुकारे, वे सुनते हैं और उत्तर देते हैं। उन्हें पुकारनेमें ही कसर है—यह जीवकी ओरसे ही देर हो रही है।
उन्हें पुकारनेमें किसी काल, स्थान, पात्र आदिका कोई भेद नहीं है। पापी न पुकारे, पुण्यात्मा ही पुकारे; नरकमें न पुकारे, स्वर्गमें पहुँचकर पुकारे; आधी रातको न पुकारे, उषाकालमें पुकारे; मूर्ख न पुकारे, विद्वान् पुकारे; गरीब न पुकारे, धनी ही पुकारे; स्त्री या बालक न पुकारे, पुरुष ही पुकारे; चाण्डाल न पुकारे, ब्राह्मण ही पुकारे; गृहस्थ न पुकारे, संन्यासी ही पुकारे—इस प्रकार उनकी पुकारके सम्बन्धमें ऐसी कोई बात नहीं। देवर्षि नारद कहते हैं—
नास्ति तेषु जातिविद्यारूपकुलधनक्रियादिभेद:।
‘भक्तोंमें जाति, विद्या, रूप, कुल, धन, क्रिया आदिका भेद नहीं है।’
पुकार सच्ची होनी चाहिये। पुकारनेवाला कौन है—वे इस बातको नहीं देखते; अवश्य ही पुकारनेवालेकी चाहकी परख करते हैं। ऊपरकी दिखाऊ पुकार उनकी स्नेह-धाराको उमड़ानेमें समर्थ नहीं हो सकती। वे हमारे अंदरकी बात जानते हैं, हमारे भीतरका कोई भेद उनसे छिपा नहीं है। ऊपरकी पुकार होगी तो वे समझ लेंगे कि यह कोरी ठगई है। मनमें चाह नहीं है। कोई ऐसा हो जिसके मनमें पुकार मची हो, परंतु किसी कारणवश बाहरसे न पुकार सके तो उस पुकारको भी वे सुन लेते हैं। उनको हृदयके कपटहीन शब्दोंकी आवश्यकता है, बाह्य शब्दोंकी नहीं। श्रीरामचरितमानसमें भगवान्के वचन हैं—
पुरुष नपुंसक नारि वा जीव चराचर कोइ।
सर्ब भाव भज कपट तजि मोहि परम प्रिय सोइ॥
(उत्तर० ८७ क)
भक्तिमती शबरीको उन्होंने अपने विरदका भेद स्पष्ट शब्दोंमें यही बतलाया—
‘मानउँ एक भगति कर नाता।’
वास्तवमें यही है भी यथार्थ। भगवान् कहते हैं—
समोऽहं सर्वभूतेषु न मे द्वेष्योऽस्ति न प्रिय:।
ये भजन्ति तु मां भक्त्या मयि ते तेषु चाप्यहम्॥
(गीता ९। २९)
‘मैं सब भूतोंमें समभावसे व्यापक हूँ, न कोई मेरा अप्रिय है न कोई प्रिय, परंतु जो भक्त मुझे प्रेमसे भजते हैं, वे मेरेमें और मैं भी उनमें प्रत्यक्ष प्रकट हूँ।’ जैसे सूर्य किसीको अपना प्रकाश या गरमी देनेसे इनकार नहीं करता, पर जो उसके सामने आकर बैठता है उसीको प्रकाश और गरमीकी अधिक प्राप्ति होती है। जो अपने घरके किवाड़ ही बन्द करके बैठ जाय उसके लिये सूर्य क्या करे? इसी प्रकार भगवान्के सम्मुख होनेवाले ही पापमुक्त होकर भगवत्प्रेम प्राप्त करनेके अधिकारी हो सकते हैं। उनसे विमुख रहनेवाले नहीं! अमुक मनुष्य ही भगवत्प्रेम प्राप्त कर सकता है और अमुक नहीं कर सकता, यह भेद उनमें नहीं है। ध्रुव बालक था। उसके समयमें अनेक राजा थे, ऋषि थे, मुनि थे, पर उन सभीको भगवत्प्राप्ति हुई हो ऐसी बात नहीं है। जिसे यह पता भी नहीं कि भगवान् क्या वस्तु है, जिसने कभी किसी पाठशालामें जाकर गुरुमुखसे उनके स्वरूपका वर्णन ही नहीं सुना, उनका प्रभाव ही नहीं जाना, वही नन्हा-सा बालक ध्रुव ‘पद्मपलाशलोचन—’ कमलनेत्र प्रभुकी खोजमें निर्भय होकर निकल पड़ा। विद्या-बुद्धि-बलहीन बालक जब अनन्य भावसे दृढ़संकल्प होकर पुकार मचाने लगा तो वहाँ भगवान्को प्रकट होना पड़ा। उस भोले, किंतु अटल निश्चयी ध्रुवको अलौकिक ज्ञान और अचल पद देकर सदाके लिये कृतकृत्य कर दिया। प्रह्लाद भी बालक ही थे, वयोवृद्ध अथवा ज्ञानवृद्ध नहीं थे। इसी प्रकारके बहुत-से उदाहरणोंसे यह बात सिद्ध होती है कि भगवद्भक्तिमें विद्या, बुद्धि, बल, आयु आदिका कोई विचार नहीं है। अमुक स्थान और अमुक समयमें ही अमुक व्यक्ति भजन कर सकता है यह बात भी नहीं है, कालका निर्देश भी नहीं है। यदि ऐसा हो तो मरता हुआ आदमी काल अच्छा न होनेपर सद्गतिको प्राप्त ही न हो सके। देशका बन्धन हो तो बिना किसी तीर्थस्थानमें गये मुक्ति ही न हो सके। पर यह बात नहीं है। बुरे-से-बुरे देश, काल और वर्णमें जब कभी जीव निष्कपटभावसे परमात्माको पुकारता है, तभी उनकी ओरसे उसे आशापूर्ण आश्वासन मिलता है।
चक्रिक नामक एक भील जंगलमें रहा करता था। वहीं भगवान्की एक मूर्ति थी। उसे वह जड पत्थर न मानकर प्रत्यक्ष भगवान् मानता था। घूमते-घूमते उसे वनमें जो फलादि मिल जाते, प्रभुको उनका भोग लगाकर फिर स्वयं प्रसाद पाता। एक बार उसे पियालका एक फल मिला। उसने भूलसे उसको मुँहमें डाल लिया। डालते ही उसे अपनी भूल सूझ पड़ी, पर वह गलेमें उतर चुका था। अपना कोई वश न चलता देख वह फलको नीचे न उतरने देनेके लिये गलेको जोरसे पकड़ दौड़ता हुआ मूर्तिके पास जा पहुँचा। वमनद्वारा बाहर निकालनेकी चेष्टा करनेमें कोई कसर न रखी, पर जिस प्रकार वह उसे पेटमें न गिरने देनेका हठ किये हुए था, उसी प्रकार फल भी बाहर न आनेमें मचल गया। भोग लगाना जरूरी था। अन्तमें कुल्हाड़ीसे गला काटनेकी तैयारी होते ही भक्तवत्सल भगवान् अपनेको रोक न सके। प्रकट होकर हाथ पकड़ लिया। वह जातिका भील था, बुद्धिसे हीन था, पर था सच्चे हृदयसे पुकार मचानेवाला। कोई हो, होना चाहिये केवल सच्चा प्रेमी अन्तस्तलसे पुकारनेवाला भक्त!
यह निर्विवाद सिद्ध है कि भगवत्प्राप्तिमें केवल निष्कपट पुकारकी ही अपेक्षा है, अन्य किसी बातकी नहीं। जिस क्षण सच्ची पुकार होगी उसी क्षण परमात्माका आश्रय मिल सकेगा, इसमें कोई निश्चित कालकी अपेक्षा नहीं है। भोगोंकी प्राप्तिमें काल आदि निश्चित होता है। उचित अवसरपर ही उनकी प्राप्ति हो सकती है। परंतु भगवत्प्राप्तिके लिये कोई बन्धन नहीं है। इसमें प्रारब्ध कुछ भी बाधा नहीं दे सकता। जब जीव व्याकुल हो जाय, विरह-तापसे जल उठे, प्रियतम श्रीकृष्णके बिना रह न सके, प्यारे रामके बिना उसे तनिक भी आराम न मिले, तभी भगवान् भी उसके बिना नहीं रह सकते। उनकी यह घोषणा ही है—
ये यथा मां प्रपद्यन्ते तांस्तथैव भजाम्यहम्।
‘जो मुझको जैसे भजता है उसे मैं वैसे ही भजता हूँ।’* भगवान्का कहना बहुत ठीक है। पर वे भजते हैं अपने स्वरूप और अपनी शक्तिके अनुसार तथा जीव भजता है अपनी शक्ति और योग्यताके अनुसार।
इसलिये यदि जीव इच्छा करे तो उनसे मिलनेमें देर नहीं हो सकती। यदि यह चल पड़े तो वे इतनी जल्दी मिलते हैं कि जीव उतनी जल्दीकी कल्पना ही नहीं कर सकता।
जहाँ हृदयमें विरहजनित व्याकुलता उत्पन्न हुई कि फिर उसे यह आवश्यकता नहीं कि वह वैकुण्ठ जाय। वे स्वयं उसके सामने आकर अपने सुरदुर्लभ दर्शनोंसे, अपनी अलौकिक रूपमाधुरीसे उसे मत्त और कृतार्थ कर देते हैं। छ: मासके बच्चेको माँके पास जाना नहीं पड़ता। माता स्वयं ही भागती हुई उसके पास आ पहुँचती है। यदि हम वैसे ही सरल हृदयके मातृपरायण बच्चे बन जायँ तो भगवान्रूपी जगज्जननीके आनेमें देर ही क्या है? परायणता अवश्य ऐसी होनी चाहिये, जो सब अवस्थाओंमें रहे। जैसे माँकी मारसे बचनेके लिये भी बच्चा माँकी ही गोदमें घुसता है। माँकी गोद वास्तवमें बच्चेके लिये सदा ही खाली रहती है, बच्चा क्या करके आया है इस बातको माता नहीं देखती। इसी प्रकार भगवान् भी यह नहीं कहते कि पापी मेरे सामने नहीं आ सकता। पापियोंके लिये स्वर्गका द्वार बंद है सही, पर भगवान्का द्वार तो नरकके कीड़ोंके लिये भी खुला है। वहाँ यह नहीं होता कि पहले पापोंका दु:ख भोगो और फिर मेरे यहाँ आओ। जो चाहता है उसीको वैकुण्ठ मिल जाता है। विशेषता यह है कि उसके पापोंका नाश भी वे ही स्वयं कर देते हैं। बस, केवल तीव्र इच्छाकी आवश्यकता है। उन्होंने घोषणा की है—
अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुच:।
‘अरे! तू मेरी शरण आ जा, तुझे सारे पापोंसे मैं छुड़ा दूँगा, तू चिन्ता न कर।’ हम कैसे अभागे हैं कि इस घोषणाको सुनकर भी सुख-शान्ति पानेके लिये उनके मुक्त द्वारकी ओर नहीं जाते और मदमाते धनियों तथा झूठे अधिकारियोंके बंद दरवाजे खटखटाते हैं और जगह-जगह ठोकरें खाते हैं।
यदि एक बार भी उस सर्वलोकमहेश्वर, जीवोंके स्वाभाविक सुहृद् परम प्यारे प्रभुके विरदपर विश्वास कर उसकी शरण पानेके लिये उत्कण्ठित हो उठें तो तुरंत निहाल हो जायँ, स्वयं धनियोंके धनी हो जायँ, फिर कुछ भी पाना शेष न रह जाय।
न मे भक्त: प्रणश्यति
भगवान्की इस दिव्य वाणीको याद करो—विश्वास करो और सच्चे हृदयसे अपने शेष जीवनको उनके भजनमें लगाकर संसार-सागरसे अनायास ही तर जाओ।