भक्त और चमत्कार
भारतीय भक्तोंकी जीवनीमें कुछ-न-कुछ चमत्कारका उल्लेख रहना एक नियमित प्रथा-सी हो गयी है। भक्त-जीवनमें अलौकिक घटनाओंका होना कोई आश्चर्यकी बात नहीं है। जो सर्वशक्तिमान् भगवान् ‘कर्तुमकर्तुमन्यथा कर्तुम्’ समर्थ है। अघटनघटनापटीयसी माया-नर्तकी जिसके साधारण इंगितपर सदा सावधानीसे पैतरे बदलती हुई चलती हैं। जो संकल्पमात्रसे ही अवकाशमें अनवकाश और अनवकाशमें अवकाश कर सकता है, समस्त विश्वकी रचना, स्थिति और विनाश जिसका केवल क्रीड़ा-कौतुक है, उस प्रकृतिसे पर परमात्मामें सर्वथा आत्मसमर्पण कर चुकनेवाले प्रेमी भक्तोंद्वारा उसी अचिन्त्य-समर्थके सामर्थ्य-बलपर असाधारण और अप्राकृतिक कर्मोंका बन जाना असाधारण बात नहीं है। इसीमें बालक प्रह्लादका अग्निमें न जलना, विषपान करके भी जीते रहना आदि समर्थ विश्वसनीय भी है। हम अभक्तोंको भक्त-जीवनकी अलौकिक घटनाओंपर अविश्वास करनेका कोई अधिकार नहीं है। हमारी अनिश्चयात्मिका विषयरसविमुग्ध बुद्धि उनके यथार्थ स्वरूपको पहचाननेमें समर्थ नहीं हो सकती। अहंकार, बल, दर्पादिके त्यागसे ब्रह्मभावमें स्थिति होनेपर परम भक्तिके द्वारा जब साधक परमात्माके यथार्थ तत्त्वको समझता है, तभी वह उस भक्तके चरित्रको समझनेका अधिकारी होता है। भगवान्की भाँति सच्चे भक्तके कर्म भी दिव्य होते हैं। अतएव प्रह्लादसे लेकर भक्त तुकाराम, तुलसीदास आदिके जीवनकी अलौकिक घटनाओंको पढ़कर, सुनकर उनपर कभी संदेह नहीं करना चाहिये। आजकल हमें ऐसे भक्त दिखायी नहीं देते या हममें ऐसी शक्ति नहीं है, इससे यह नहीं मान लेना चाहिये कि इन लोगोंके चरित्र भी मिथ्या, कल्पित या अतिरंजित घटनाओंके घर हैं। हमें उनपर विश्वास और श्रद्धा करनी चाहिये।
किंतु विचारणीय प्रश्न तो यह है कि क्या, चमत्कार या अलौकिक घटनाओंमें ही भक्त-जीवनकी पूर्णता है? क्या भक्त-जीवनमें चमत्कारकी घटना अवश्य रहनी चाहिये? क्या चमत्काररहित जीवन भक्त-जीवन नहीं बन सकता और क्या भक्तोंकी पहचान चमत्कारोंसे होती है? इन सब प्रश्नोंके उत्तरमें मेरी समझमें तो यही बात आती है कि भक्तोंके किये चमत्कार वास्तवमें अत्यन्त तुच्छ चीज है। भक्तोंके चरितमें जिन चमत्कारोंका वर्णन हुआ है उनपर अविश्वास न करता हुआ भी मैं यह अवश्य कहूँगा कि भक्त-जीवनकी पूर्णता तो एक ओर रही, चमत्कारके बलपर भक्त कहलाना या कहना यथार्थ सच्ची भक्तिका तिरस्कार करना है। जो भक्त भगवत्कृपासे असम्भवको सम्भव कर सकते हैं, उनके लिये किसी एक कोढ़ीका कोढ़ दूर कर देना या एक मृतकको जिला देना बड़ी बात नहीं है। इस तरहकी घटनाओंसे वास्तवमें भक्त-जीवनका महत्त्व कदापि नहीं बढ़ता। भक्तका जीवन तो इन बातोंसे बहुत ही ऊँचा उठा हुआ होता है। भगवान्के यथार्थ तत्त्वका सम्यक् अपरोक्ष ज्ञान हो जानेके कारण भक्तकी दृष्टिमें अखिल विश्व परमात्माके रूपमें बदल जाता है। ऐसी दशामें जगत्में दु:ख-भावना उसके मनमें उठ ही कैसे सकती है। सारा जगत् ईश्वररूप है। ईश्वरमें दु:ख और कष्टकी कल्पना करना ईश्वरत्वमें बट्टा लगाना है। जब कोई दु:ख ही नहीं, तब दु:ख दूर करनेकी बात कैसी? परमात्मा नित्य आनन्द-स्वरूप है। उस आनन्दघनमें दु:ख नामक किसी अन्यको अवकाश ही कहाँ? जब दु:ख ही नहीं, तब मिटाना कैसा? कारण बिना कार्य नहीं होता। ऐसी अवस्थामें अमुक भक्तने अमुकके दु:खसे दु:खी होकर अपने चमत्कारसे उसका दु:ख दूर कर दिया यह कहना युक्तिसंगत नहीं। इतना होनेपर भी मंगलमय बन जानेके कारण भक्तके ईश्वरार्पित और ईश्वरमय तन, मन, धनसे जगत्का सदा स्वाभाविक ही मंगल हुआ करता है। अमृतसे किसीकी मृत्यु नहीं होती। इसी भाँति भक्तसे किसीका अनिष्ट नहीं होता। उसका अन्त:करण ईश्वरीय गुणसम्पन्न रहनेके कारण स्वभावसे ही अखिल विश्वरूप परमात्माकी सेवामें सदा संलग्न रहता है। शरीर तो अन्त:करणके अनुसार चलता ही है। अतएव भक्त सदा ही लोकसेवक है। पर वह चमत्कारसे नहीं है; स्वाभाविक वृत्तिसे है।
चमत्कारी वर्णनोंकी अधिक विस्तृति और महत्तापर विश्वास हो जानेके कारण भारतवर्षमें अनर्थ भी कम नहीं हुआ है। चमत्कारने साधुके सच्चे स्वरूपको ढक दिया। साधुकी कसौटी चमत्कारोंपर होने लगी, इसीसे सच्चे सीधे-सादे संतोंकी दुर्दशा हुई। भण्ड और पाखण्डियोंका काम बना। सिद्ध-साधककी जोड़ी बनाकर अनेक प्रकारकी चमत्कारपूर्ण मिथ्या और अतिरंजित बातें फैलायी जाती हैं। ‘अमुक बाबाजीने रोग मिटा दिया, अमुकने छूते ही कोढ़ दूर कर दिया, अमुकने कमण्डलुके जलसे पुत्रदान दे दिया, अमुकने आशीर्वादमात्रसे जज साहबकी मति बदलकर मुकदमा जिता दिया।’ कहीं काकतालीय न्यायसे कोई घटना हो गयी कि उसको चमत्कारका रूप दे दिया गया। यों भेड़की खालमें अनेकों भेड़िये घुस बैठे और वे भक्तकी पवित्र गद्दीको कलंकित करने लगे। इसी चमत्कारकी भावनाने अनेक अपात्र और अभक्तोंको—अनेक मिथ्यावादी, व्यभिचारी, शराबखोर, ढोंगी और पाखण्डियोंतकको लोगोंकी दृष्टिमें भक्त बना दिया और वे लोग भक्तके पवित्र नामपर मनमानी घरजानी करने लगे।
इसलिये हमलोगोंको भक्तकी पहचान उसमें किसी चमत्कारको देख-सुनकर नहीं करनी चाहिये। चमत्कार तो चालाकी या जादूसे भी दिखलाया जा सकता है। चमत्कार दिखलानेवाले आजकल अधिकांश तो धोखा ही देनेवाले हैं। भक्तमें तो उसके आराध्यदेव भगवान्के सदृश दैवी सम्पत्तिके गुणोंका विकास होना चाहिये। अतएव भक्तकी कसौटी भी उन्हीं गुणोंपर हो सकती है। भक्त-जीवनका सर्वथा शुद्ध लोक-परलोक-हितकारी स्वाभाविक प्रभुमय जीवनमें परिणत हो जाना ही उसका सबसे बड़ा आदरणीय और स्तुत्य चमत्कार है, भक्त बननेवालोंको अपने अंदर इसी चमत्कारके विकासके लिये प्रयत्न करना चाहिये।