भक्ति और भक्तका स्वरूप तथा भक्तिकी महिमा

भगवान् नारद भक्तवर इन्द्रद्युम्नसे कहने लगे—

‘राजन्! हजारों जन्मोंके अभ्याससे भगवान् विश्वम्भरके प्रति मनुष्यकी भक्ति हुआ करती है। भगवान‍्की भक्तिसे अर्थ, धर्म, काम, मोक्ष—चारोंकी प्राप्ति सहजमें हो जाती है, भक्ति होना अल्प तपस्याका फल नहीं है। ‘नाल्पतपस: फलम्।’ अनादिकालीन अविद्याने जड़ जमा रखी है, इससे केवल पंचक्लेश ही बढ़ते रहते हैं। इस अविद्याका नाश एकमात्र विष्णु-भक्तिसे ही हो सकता है—‘एकैवेयं विष्णुभक्तिस्तदुच्छेदाय जायते।’ दु:ख-संकटपूर्ण भवाटवीमें भटकते हुए मनुष्यके लिये एकमात्र भक्ति ही सुखप्रदा है। सुख-दु:ख, हानि-लाभ आदि द्वन्द्वोंकी आँधीसे उछलते हुए संसार-सागरकी भीषण तरंगोंमें निराधार पड़े हुए मनुष्योंके लिये भगवान‍्की भक्ति ही सुदृढ़ जहाजके समान है। संतगण इस जननीरूप भक्तिकी शरण होकर ही सुखसे रहते हैं, इसीसे उन्हें कभी शोक नहीं होता। जो महात्मा भक्तिसुधा पानकर आह्लादित हो चुके हैं, उन विमुक्त पुरुषोंके सामने ब्रह्मपद भी अत्यन्त तुच्छ है। ‘ब्राह्मॺं पदं स्वल्पलाभ:’। भक्तिरूप प्रज्वलित दावानलमें जीवोंकी त्रिविध (कायिक, वाचिक और मानसिक) पापराशि पतंगके समान भस्म हो जाती है। प्रयाग, गंगादि तीर्थ-सेवन, तप, अश्वमेध यज्ञ, प्रचुर दान और हजारों व्रत-उपवासादि सत्कर्मोंका महान् आचरण भक्तिके हजारवें भागके बराबर भी नहीं हो सकता। भक्तिकी महिमा अनिर्वचनीय और अतुलनीय है।’

इस प्रकार भक्तिकी महिमा सुनकर राजा इन्द्रद्युम्नने ‘भक्तिका स्वरूप’ जाननेकी इच्छासे नारदजीसे कहा—‘मुनिवर! आपने जिस भक्तिकी महिमा सुनायी, उसका स्वरूप समझनेकी मेरी बहुत दिनोंसे इच्छा है, अत: कृपापूर्वक मुझे इस भक्तिके लक्षण बतलाइये, इस विषयमें आपके समान जानकार सद्वक्ता मुझे पृथ्वीपर और कोई नहीं मिल सकता।’

भक्तिका स्वरूप

नारदजी बोले—राजन्! तुम सच्चे भक्त हो, सत्पात्र हो इसीसे भक्तिके यथार्थ लक्षण मैं तुम्हें समझाता हूँ। पापपरायण दुष्टहृदय मनुष्योंके सामने ये बातें नहीं कही जा सकतीं। निष्पाप नरपते! तुम मन लगाकर सुनो। मैं उस सनातन भक्तिको सामान्य और विशेषरूपसे बतलाता हूँ।

अत्यन्त कष्ट आ पड़नेपर मनुष्यके लिये एकमात्र भक्तिका ही आश्रय रह जाता है, यह (गौणी) भक्ति गुणोंके भेदसे तीन प्रकारकी है। इसके सिवा एक चौथी भक्ति और है जिसे निर्गुण भक्ति कहते हैं। जो लोग काम-क्रोधके वशमें हैं और केवल दृष्ट पदार्थोंको माननेवाले हैं ऐसे लोगोंके द्वारा सांसारिक लाभके लिये जो भक्ति की जाती है, वह तामसी है। यश, कीर्ति या परलोकके लिये श्रद्धापूर्वक जो भक्ति की जाती है, वह राजसी है। ‘एक यही स्थिर है, संसारके अन्य सभी दृष्ट पदार्थ नष्ट होनेवाले हैं’ यह समझकर अपने-अपने वर्ण और आश्रम-धर्मका त्याग न करके आत्मज्ञानकी इच्छावाले मनुष्योंके द्वारा जो भक्ति की जाती है, वह भक्ति सात्त्विकी कहलाती है और यह जगत् ही जगन्नाथ है—‘जगच्चेदं जगन्नाथ:’ इसका अन्य कोई कारण नहीं है; न तो मैं इससे भिन्न हूँ और न वह मुझसे भिन्न है। बाह्य उपाधियाँ—स्थूल शरीर और इन्द्रियोंके भोग केवल भ्रमसे ही प्रीति उपजाते हैं, इससे परमात्मा नहीं मिल सकते। यह निश्चय करके जो भक्ति केवल परमात्माके लिये की जाती है, वह अद्वैतसंज्ञक दुर्लभा भक्ति कहलाती है। इसी भक्तिसे भगवान‍्का अपुनरावर्ती परमधाम मिलता है।

सात्त्विकी भक्तिसे ब्रह्मलोक, राजसीसे इन्द्रलोक और तामसीसे पितृलोककी प्राप्ति होती है। परंतु भक्तका कभी नाश नहीं होता, पुनर्बार भक्त संसारमें आकर आगे बढ़ता है, तामसी भक्ति करनेवाला राजसी करता है, राजसी करनेवाला सात्त्विकी करता है और सात्त्विकी भक्त अद्वैत भक्तिको पाकर परमात्माको प्राप्त होता है। अतएव किसी भी प्रकारसे परमात्माकी भक्तिका आश्रय लेनेपर क्रमसे मनुष्य मुक्तिमार्गमें अग्रसर हो सकता है। ‘एकामपि समाश्रित्य क्रमान्मुक्तिपथं व्रजेत्।’

भक्तिहीन मनुष्यके श्रुति-स्मृति-प्रतिपादित कर्म, प्रायश्चित्तादि, तीर्थयात्रा, कृच्छ्रादि व्रत, तप, सत्कुलमें जन्म और शिल्पविद्या आदि सभी केवल लौकिक भूषण हैं और असती स्त्रीके व्यभिचारके समान हैं। इन सब विषयोंसे उसे केवल शारीरिक कष्ट ही मिलता है। जितेन्द्रिय और दृढ़ भक्तिमान् पुरुष कुलाचारहीन होनेपर भी प्रशंसाके योग्य है; परन्तु अष्टादश विद्याओंका ज्ञाता कुलीन धार्मिक पुरुष भी भक्तिहीन होनेपर प्रशंसनीय नहीं है। भक्तिसम्पन्न पुरुष ही भाग्यवान् है, भक्तिसे ही मानव-जीवन सफल होता है। विद्या वही है जिससे भगवान् जगन्नाथ जाने जाते हैं और शुभ कर्म वही है जिससे भगवान‍्में प्रेम होता है।

भक्तकी महिमा

राजन्! ऐसा भक्ति और विद्यासम्पन्न दृढ़व्रतपुरुष ही भगवान‍्का भक्त है। ऐसे भक्तके चरण-रज-स्पर्शसे चराचर जगत् पवित्र हो जाता है,—‘पूयेत सचराचरं विश्वम्।’ ऐसे भक्तके लिये पृथ्वीके आधिपत्य और स्वर्गादिकी कामना अत्यन्त तुच्छ है; क्योंकि वह (अपने-आपको भगवान‍्में मिला देनेके कारण) स्वेच्छासे ही सृष्टि, स्थिति और नाश करनेमें समर्थ है। इस प्रकारके भक्त और भगवान‍्में कोई भेद नहीं समझना चाहिये।

भक्तोंके लक्षण

अब मैं उन भक्तोंके लक्षण बतलाता हूँ—

भक्तोंका चित्त सदा ही शान्त रहता है। वे सौम्य और जितेन्द्रिय होते हैं। मन, वाणी और कर्मसे कभी किसीका बुरा नहीं करते, उनका हृदय दयासे भरा रहता है, वे चोरी और हिंसा कभी नहीं करते। दूसरेके गुणोंका खण्डन नहीं करते। सदाचारसे रहते हैं और दूसरेके सुखको अपना ही सुख मानते हैं, निर्मत्सर होकर समस्त प्राणियोंमें परमात्माको ही देखते हैं, सदा दीनोंपर दया और परहित करते हैं। देवताओंका कुमारवत् पोषण करते हैं और विषयोंको कालसर्प समझकर उनसे डरते हैं। विषयी पुरुषोंका भोगोंमें जितना प्रेम होता है, उससे करोड़ों गुना अधिक प्रेम भक्तोंका भगवान‍्में होता है। भक्तगण शिव और पितृगणोंको भगवान‍्का स्वरूप समझकर ही नित्य उनकी पूजा करते हैं। वे समस्त जगत‍्को ही विष्णुमय देखते हैं, परंतु अपनेको सेवक और भगवान‍्को अपना स्वामी समझते हैं। सर्वगत सर्वरूप मानकर ब्रह्माजी जिनके चरणकमलोंमें प्रणाम करते हैं, भक्तगण उन्हीं हरिको नित्य प्रणाम करते हैं और उन्हींमें चित्त लगाकर उनका नामकीर्तन करते हैं। ऐसे भक्तोंकी दृष्टिमें समस्त लोक तृणवत् तुच्छ होते हैं।

‘सदा परोपकारमें लगे हुए, दूसरोंके कुशलमें ही अपना कुशल समझनेवाले, पराये दु:खोंसे दु:खी, सदाशय, दयालु, दूसरोंकी सम्पत्तिको पत्थर या मिट्टी समझनेवाले, परस्त्री और काँटोंसे पूर्ण शाल्मलीको समान देखनेवाले, कुटुम्बी, मित्र और शत्रुओंमें एक ही आत्मा माननेवाले, चित्तको निरन्तर परमात्मामें एकाग्रतासे लगाये रखनेवाले, गुणवानोंका आदर करनेवाले, दूसरोंकी गुप्त बातोंको ढकनेवाले, सदा सबसे प्रिय बोलनेवाले, कंसहन्ता भगवान् श्रीकृष्णका मधुर और पापनाशकारी शुभनाम भक्तिभावसे कीर्तन करनेवाले, ऊँचे स्वरोंसे सर्वदा उनकी जय बोलनेवाले, शरीर-मन-वाणीसे हरिमें आत्मसमर्पण करनेवाले, दिन-रात हरि-चिन्तनमें ही निमग्न रहकर सुख-दु:खको समान समझनेवाले, नम्र वाणीसे श्रीहरिकी स्तुति करनेवाले और उनकी पूजामें ही लगे रहनेवाले पुरुष भगवान‍्के भक्त हैं।

‘जो भक्त उपर्युक्त लक्षणोंसे सम्पन्न होकर भगवान‍्के रथ, चक्र, गदा, पद्म, शंख, मुद्रा आदि चिह्नोंको धारण करते तथा मस्तकपर तिलक लगाते हैं, मुरारिके अंगस्पर्शसे सुगन्धित तुलसीपत्रोंको, भगवान‍्के प्रसादरूप माला-चन्दनादिको धारण करते हुए भक्तिभावसे केवल मुक्तिके लिये भगवान‍्की पूजा करते हैं, उनकी जय होती है। जिनका दर्प, अभिमान और अहंकार नष्ट हो गया है, देवबन्धु भगवान् नरहरिकी पूजासे जिनका चित्त शुद्ध हो गया है, हरि-चरण-सेवासे जिनका शोक नष्ट हो गया है, ऐसे वैष्णव भक्तोंकी सर्वतोभावसे विजय होती है।’

भगवान् और भक्तोंकी महिमा कहते-कहते नारदजीका चित्त भगवत्-प्रेमसे विह्वल हो गया और वे भगवान‍्को सम्बोधन करके कहने लगे कि ‘भगवन्! आपके भक्तोंको कभी धनकी इच्छा नहीं होती, उन्हें कभी शारीरिक क्लेश नहीं होता, वे सदा शान्तभाव और मृदुवाणीसे आपका नामकीर्तन, भजनोत्सव तथा आपके दास और दास्यभावका ही चिन्तन किया करते हैं।’

अभक्तोंके लक्षण और उनकी संगति छोड़नेके लिये आदेश

नारदजी फिर कहने लगे—‘अभक्त मनुष्य स्वयं दुराचारमें लगे रहनेपर भी दूसरोंके उत्तम चरित्रपर दोष लगाया करते हैं। वे अच्छी या बुरी किसी भी अवस्थामें भगवान‍्का स्मरण नहीं करते, उन्हें विषयोंमें ही सुख दीखता है, इससे वे क्षणमात्रके लिये भी अपने हृदयमें परम सुखास्पद भगवच्चरणोंका चिन्तन नहीं करते, बल्कि मतवाले होकर श्रीहरिनामको मिथ्या जालोंसे ढकनेकी ही चेष्टा किया करते हैं। ऐसे भक्तिहीन मनुष्य परधन और परस्त्रियोंके बड़े लोभी होते हैं, उनकी बुद्धि अत्यन्त नीच होती है और वे दिन-रात केवल अपने उदर-पोषणके कार्यमें ही लगे रहते हैं। भाग्य और भयके फेरमें पड़े हुए ही वे जीवन बिताते हैं, ऐसे मनुष्योंको नर-पशुओंके सिवा और क्या कहा जा सकता है? जो उस नरहरि भगवान‍्के चरणोंका स्मरण नहीं करते, आठों पहर कुसंगतिमें फँसे रहते हैं, दूसरोंकी बुराईमें लगे रहना और हिंसा करना ही जिनको अच्छा लगता है, ऐसे नराधमोंका संग दूरसे ही त्याग देना चाहिये—‘नरमलिना: खलु दूरतो हि वर्ज्या:।’ (स्कन्दपुराण)