भक्तको दु:ख नहीं होता
नदियाके पण्डित श्रीवास श्रीगौरांगके बड़े भक्त थे, गौरांग महाप्रभु बीच-बीचमें श्रीवासके घरपर कीर्तन करने जाते। इसी तरह एक दिन कीर्तनके लिये गौरांग उनके घर गये। श्रीवासके आँगनमें सैकड़ों भक्त आनन्द-मत्त होकर कीर्तन कर रहे थे। गौरांगको देखकर भक्तोंके आनन्दकी मात्रा सीमाको पहुँच गयी, उनका बाह्यज्ञान जाता रहा। श्रीवासके आनन्दकी तो कोई सीमा नहीं है; क्योंकि उसीके आँगनमें हरिसंकीर्तन हो रहा है। इतनेमें ही भीतरसे एक दासी घबराती हुई आयी और श्रीवासको बुलाकर अंदर ले गयी।
श्रीवासका इकलौता बालक पुत्र बीमार है, बीमारी बढ़ गयी है, घरमें बालककी माता और अन्यान्य स्त्रियाँ बालककी सेवामें लगी हुई थीं और श्रीवास निश्चिन्त मनसे बाहर नाच रहे थे। उनको मरणासन्न पुत्रकी कोई चिन्ता नहीं है, वे जानते हैं कि प्रभु जो कुछ करते हैं हमारे मंगलके लिये करते हैं। जो सब जीवोंकी एकमात्र गति हैं, उन्हींका नाम-संकीर्तन हो रहा है और भक्तगण आनन्दमें डूबे हुए नृत्य कर रहे हैं, इस आनन्दमें चिन्ता कैसी?
दासीके साथ श्रीवासने अंदर पहुँचकर देखा बालकका अन्तसमय उपस्थित है। पिताने बड़े प्रेमसे भगवान्का तारकब्रह्म* मन्त्र उसे सुनाया।
पुत्रको मृत्युमुखमें जाते देखकर उसकी माता तथा दूसरी स्त्रियोंकी आँखोंसे आँसू बहने लगे। श्रीवासने कहा—‘जिसके नाम-श्रवणमात्रसे महापापी भी परम धामको चला जाता है, वही स्वयं भगवान् आज तुम्हारे आँगनमें नाच रहे हैं, तुम्हारे इस पुत्रके सौभाग्यके लिये ब्रह्मातक तरसते हैं, यदि पुत्रपर तुम्हारा वास्तविक स्नेह है तो उसकी ऐसी दुर्लभ मृत्युके लिये आनन्द मनाओ। यह बड़ी ही शुभ घड़ीमें जन्मा था, तभी तो आज भगवान्के सामने उनका नामकीर्तन सुनते-सुनते इसने प्राण त्याग किये हैं। मेरा मन तो आज आनन्दसे उछल रहा है। यदि तुमलोग किसी तरह भी अपने मनको शान्त कर सकती तो बड़ा लाभ होता। अब कम-से-कम जबतक कीर्तन होता है, तबतक तो चुपचाप रहो। कहीं बीचमें रो उठोगी तो कीर्तन भंग हो जायगा।’
ब्राह्मणीने पतिके वचन मानकर दु:सह पुत्रशोकके आँसुओंको किसी तरह रोक लिया और दूसरी स्त्रियोंके साथ वह पुत्रकी लाशके पास बैठकर हरिनाम-चिन्तन करने लगी। धन्य!
श्रीवास पुत्रशवको जमीनपर लिटाकर प्रफुल्लित मन और खिले हुए मुखकमलसे बाहर लौट आये और दोनों भुजा उठाकर ‘हरि बोल, हरि बोल’ की तुमुल ध्वनि करके नाचने लगे। किसीको भी इस घटनाका पता नहीं लगा। इस समय रातके आठ बजे थे।
नृत्य-कीर्तनमें ढाई पहर रात बीत गयी। किसी तरह एक भक्तको यह बात मालूम हो गयी, उसने दूसरेसे कहा, क्रमश: बात फैल गयी, जो सुनता वही नाचना छोड़कर श्रीवासकी ओर देखने लगता। श्रीवास उसी महानन्दमें नाच रहे हैं। श्रीवासने दिखला दिया कि भक्तको सांसारिक पदार्थोंके वियोगमें कोई दु:ख नहीं होता। वह जिस आनन्द-सिन्धुमें निमग्न रहता है, उसके सामने जगत्का बड़े-से-बड़ा दु:ख भी तुच्छ—नगण्य प्रतीत होता है ‘यस्मिन् स्थितो न दु:खेन गुरुणापि विचाल्यते।’
भक्तोंकी दृष्टिमें जगत् भगवान्की लीलामात्र है, बाजीगरके नित्य साथी—उसकी प्रत्येक क्रीड़ाका मर्म समझनेवाले टहलुएकी भाँति वे भगवान्की सभी लीलाओंमें हर्षित होते हैं, मृत्यु उनकी दृष्टिमें कोई पदार्थ ही नहीं रहता। इसी सुखमें आज श्रीवासका नृत्य भी बंद नहीं हुआ। परंतु भक्तोंमें इस बातके फैल जानेसे उन्होंने कीर्तन रोक दिया, मृदंग और करतालकी ध्वनि बंद हो गयी। महाप्रभु गौरांगदेवको भी बाह्यज्ञान हो गया, वे भक्तोंकी ओर देखकर कहने लगे—‘भाइयो! क्या हुआ? मेरे हृदयमें रोना क्यों आता है?’ फिर श्रीवासकी ओर मुख फिराकर प्रभु बोले—‘पण्डित! तुम्हारे घरमें कोई दुर्घटना तो नहीं हो गयी? मेरे प्राण क्यों रो रहे हैं?’ श्रीवासने मुसकराते हुए कहा, ‘प्रभो! जहाँ तुम उपस्थित हो, वहाँ दुर्घटना क्यों होने लगी?’ प्रभुने इस बातपर विश्वास नहीं किया। वे भक्तोंसे पूछने लगे। पर किसीसे भी सहजमें यह दु:खद संवाद कहते नहीं बना। अन्तमें एक भक्तने कहा—‘प्रभो! श्रीवासका पुत्र जाता रहा।’ प्रभुने कहा—‘कब? कितनी देर हुई?’ भक्तोंने कहा—‘रातको आठ बजे यह घटना हुई थी। इस समय करीब दो बज गये हैं।’ यह सुनकर श्रीगौरांग श्रीवासकी ओर देखने लगे, श्रीवासका मुख महान् आनन्दसे उल्लसित हो रहा है। महाप्रभु श्रीवासका यह भाव देखकर बहुत प्रसन्न हुए, उन्होंने कहा—
‘धन्य, धन्य श्रीवास! आज तुमने श्रीकृष्णको खरीद लिया।’
महाप्रभुका हृदय द्रवित हो गया, नेत्रोंसे अश्रुधारा बहने लगी। प्रभुकी आँखोंमें आँसू देखकर श्रीवासने कहा—‘प्रभो! मैं पुत्रशोक सहन कर सकता हूँ; परंतु तुम्हारे नेत्रोंमें जल नहीं देख सकता, तुम शान्त होओ, मुझे कोई दु:ख नहीं है—दु:खकी सम्भावना भी नहीं है।’
भक्तोंने मृत बालककी लाशको बाहर लाकर आँगनमें सुला दिया, महाप्रभु उसके पास जाकर उसे जीवितकी तरह पूछने लगे, प्रभुके प्रश्न करते ही मृतदेहमें प्राणोंका संचार हो गया। बालक बोलने लगा। इस आश्चर्य-घटनासे सभी लोग चकित हो गये। बालकने कहा—‘प्रभो! इस जगत्में मेरा काम पूरा हो गया, अब मैं इससे बहुत अच्छी जगह जा रहा हूँ, आप कृपा करें, जिससे भगवत्-चरणोंमें मेरी मति हो।’ इसके बाद ही शरीर पुन: निर्जीव हो गया। पुत्रकी बोली सुनकर माताका शोक कुछ कम हुआ, महाप्रभुके समझानेसे सभी शोक भूल गये। प्रभु कहने लगे—‘श्रीवास! जब संसारमें आये हो, तब तुम्हें भी सांसारिक नियमोंके अधीन ही रहना होगा। परंतु दूसरे लोग इसके कठिन नियमोंको क्लेशसे सहते हैं, तुम क्लेशसे मुक्त हो। पर यह न समझो कि तुम्हारा पुत्र जाता रहा है, उस एकके बदलेमें श्रीनित्यानन्द और मुझको—दोनोंको तुम अपने पुत्र समझो!’
प्रभुके इन वचनोंसे श्रीवास और उनकी पत्नीका हृदय आनन्दसे भर गया। वे गद्गद होकर हरिध्वनि करने लगे। भक्तगण मृतदेहको संस्कारके लिये ले गये। सबका शोक-दु:ख जाता रहा।