गीता और श्रीभगवन्नाम

वाच्यं वाचकमित्युदेति भवतो

नामस्वरूपद्वयं

पूर्वस्मात्परमेव हन्त करुणं

तत्रापि जानीमहे।

यस्तस्मिन् विहितापराधनिवह:

प्राणी समन्ताद् भवे-

दास्येनेदमुपास्य सोऽपि हि सदा-

नन्दाम्बुधौ मज्जति॥

श्रीहरिनाम! तुम्हारे दो स्वरूप हैं, एक वाच्य और दूसरा वाचक, तुम वाचक हो और श्रीहरि तुम्हारे वाच्य हैं। श्रीहरि और श्रीहरिनाम दोनों ही अभिन्न चिन्मय वस्तु होनेसे एक तत्त्व हैं, परंतु वाच्य श्रीहरिसे उनका वाचक श्रीहरिनाम अधिक दयालु है। जो जीव भगवान‍्के अनेक अपराध किये हुए होते हैं, वे भी केवल मुखसे श्रीहरिनामकी उपासना (नाम-कीर्तन) द्वारा निरपराध होकर भगवान‍्के आनन्दरूपमें निमग्न हो जाते हैं।

श्रीमद्भगवद‍्गीताने भी इस हरिनामकी बड़ी महिमा गायी है। भगवान् कहते हैं कि मूर्ख लोग, जो राक्षसी, आसुरी और मोहिनी* प्रकृतिका आश्रय लिये हुए होते हैं—मनुष्यरूपमें लीला करते हुए मुझ महेश्वरको साधारण मनुष्य मान लेते हैं, उन अज्ञानियोंकी सारी आशाएँ, उनके सारे कर्म और उनका सारा ज्ञान व्यर्थ होता है।

परंतु दैवी प्रकृतिका आश्रय लिये हुए महात्मागण तो सर्वभूतोंके सनातन कारण और नाशरहित मुझ भगवान‍्को अनन्य मनसे निरन्तर भजते हैं। (गीता ९। ११—१३) ऐसे दृढ़निश्चयी भक्तजन निरन्तर मेरा कीर्तन करते हैं—

सततं कीर्तयन्तो मां यतन्तश्च दृढव्रता:।

इस कीर्तनसे नामगुण-कीर्तनका ही लक्ष्य है। प्रसिद्ध टीकाकार गोस्वामी श्रीविश्वनाथ चक्रवर्ती अपनी ‘सारार्थ-वर्षिणी’ टीकामें लिखते हैं—‘सततं सदेति नात्र कर्मयोग इव कालदेशपात्रशुद्धाद्यपेक्षा कर्तव्येत्यर्थ:।’

भगवान‍्का नामकीर्तन सदैव ही किया जा सकता है, इसमें कर्मयोगकी भाँति शुद्ध देश-काल-पात्रकी अपेक्षा नहीं है; क्योंकि—

न देशनियमस्तत्र न कालनियमस्तथा।

नोच्छिष्टादौ निषेधोऽस्ति श्रीहरेर्नाम्नि लुब्धके॥

श्रीहरिनाम-प्रेमीके लिये देश, काल या अन्य किसी प्रकारका निषेध नहीं है। भगवन्नाम सभी अवस्थामें लिया जा सकता है। श्रीधर स्वामी इस श्लोककी टीकामें लिखते हैं—‘सर्वदा स्तोत्रमन्त्रादिभि: कीर्तयन्त:’ यहाँ मन्त्रसे श्रीभगवन्नाम ही अभिप्रेत है, क्योंकि यही मन्त्रराज है। श्रीबलदेव विद्याभूषण अपने गीताभाष्यमें लिखते हैं—

‘सततं सर्वदा देशकालादिविशुद्धिनैरपेक्ष्येण मां कीर्तयन्त: सुधामधुराणि मम कल्याणगुणकर्मानुबन्धीनि गोविन्दगोवर्द्धनोद्धरणादीनि नामान्युच्चैरुच्चारयन्तो मामुपासते।’

देश-कालादिके शुद्ध होनेकी कोई अपेक्षा न रख करके सदा-सर्वदा भगवान‍्के गुण-कर्मानुसार गोविन्द-गोवर्धनधारी आदि विविध अमृतमय मधुर कल्याणकारी नामोंका उच्चस्वरसे उच्चारण करके उनकी उपासना करनी चाहिये।

इसके अतिरिक्त और भी स्पष्ट शब्दोंमें भगवान‍्ने कहा है—

ओमित्येकाक्षरं ब्रह्म व्याहरन्मामनुस्मरन्।

य: प्रयाति त्यजन् देहं स याति परमां गतिम्॥

(गीता ८। १३)

‘जो मनुष्य ‘ॐ’ इस एकाक्षर ब्रह्मका उच्चारण करता हुआ और उसके अर्थस्वरूप मुझ नामीका मनमें चिन्तन करता हुआ शरीर त्यागकर जाता है वह परम गतिको प्राप्त होता है।’

‘ॐ’ परमात्माका नाम प्रसिद्ध ही है।

‘सर्वे वेदा यत्पदमामनन्ति

तपांसि सर्वाणि च यद् वदन्ति।

यदिच्छन्तो ब्रह्मचर्यं चरन्ति

तत्ते पदं संग्रहेण ब्रवीमि ॐ इति एतत्॥’

इस श्रुति और ‘तस्य वाचक: प्रणव:’ इस योगसूत्रके अनुसार ‘ॐ’ परमात्माका नाम है। आगे चलकर भगवान‍्ने जपयज्ञको तो ‘यज्ञानां जपयज्ञोऽस्मि’ कहकर अपना स्वरूप ही बतला दिया है। जपसे उसी परमात्माके परम पावन नाममन्त्रका ही जप समझना चाहिये; क्योंकि नाम और नामीमें सदा ही अभेद हुआ करता है। अतएव सबको सभी समय भगवन्नामका ही आश्रय ग्रहण करना चाहिये। कलियुगमें तो जीवोंके उद्धारके लिये नामके समान दूसरा कोई साधन ही नहीं है।

कलेर्दोषनिधे राजन्नस्ति ह्येको महान् गुण:।

कीर्तनादेव कृष्णस्य मुक्तसंग: परं व्रजेत्॥

(श्रीमद्भा० १२। ३। ५१)

‘दोषपूर्ण कलियुगमें यह एक महान् गुण है कि केवल श्रीकृष्णनाम-संकीर्तनसे ही जीव आसक्तिसे छूटकर परम पदको प्राप्त कर सकता है।’ श्रीचैतन्यमहाप्रभु कहते हैं—

नयने गलदश्रुधारया

वदनं गद‍्गदरुद्धया गिरा।

पुलकैर्निचितं वपु: कदा

तव नामग्रहणे भविष्यति॥

‘श्रीकृष्ण! वह सुअवसर कब प्राप्त होगा जब तुम्हारा नाम लेते ही नेत्रोंसे आनन्दके आँसुओंकी धारा बह निकलेगी और वाणी गद‍्गद तथा समस्त शरीर रोमांचित हो जायगा।’