गीता और वैराग्य

सम्प्रति कुछ लोग कहने लगे हैं कि ‘श्रीमद्भगवद‍्गीतामें वैराग्यका उपदेश नहीं है। भगवद‍्गीता तो केवल कर्म ही करनेका उपदेश देती है। वैराग्यकी हमें आवश्यकता नहीं। इस वैराग्यके भावने देशकी उन्नतिमें बड़ी बाधा डाल रखी है। संसारसे वैराग्य हो जानेके कारण मनुष्य सांसारिक उन्नति-अवनतिकी कोई परवा नहीं करता। वैराग्य संसारसे उपरत बनाकर मनुष्यको निकम्मा और आलसी बना देता है। हमें तो जीवनभर कर्म करते रहकर ही परमात्माको प्राप्त करना है। यही गीताकी शिक्षा है।’ परंतु वास्तवमें न तो गीताकी शिक्षा ही ऐसी है और न यथार्थ वैराग्य मनुष्यको निकम्मा और आलसी बनाता है। अवश्य ही वैराग्यवान् पुरुष संसारके भोगोंमें अनासक्त होनेके कारण सभी कर्तव्यकर्म धीर, गम्भीर और शान्त भावसे करता है, जिससे उसकी स्थितिको न समझनेवाले लोगोंकी दृष्टिमें वह उत्साहशून्य-सा प्रतीत होता है, परंतु सच पूछा जाय तो सत्कर्म करनेका सच्चा उत्साह वैराग्यवान् पुरुषके हृदयमें ही होता है। सांसारिक भोग-सुखोंकी आसक्तिमें नहीं फँसे हुए पुरुष ही देशकी या विश्वकी यथार्थ सेवा कर सकते हैं। जिनका मन भोगोंकी लालसामें लगा है, जो पद-पदपर भोग-सुखोंका अनुसंधान करते हैं, वे स्वार्थी मनुष्य कभी यथार्थ भावसे कर्तव्य-पालन नहीं कर सकते। देशकी उन्नति सच्चे त्यागी व्यक्तिगत स्वार्थशून्य पुरुषोंके द्वारा होती है, ऐसे पुरुष वैराग्यकी भावनाके बिना बन ही नहीं सकते। सच्ची बात तो यह है कि वैराग्यवान् पुरुषोंके अभावसे ही देशकी दुर्दशा हो रही है।

गीतामें तो स्पष्ट शब्दोंमें वैराग्यका उपदेश है। गीताके प्रधान साधन तीन हैं—कर्मयोग, ज्ञानयोग और भक्तियोग। इन तीनोंमें ही वैराग्य पहले आवश्यक है। जबतक मनमें इस लोक या परलोकके भोगोंकी कामना बनी रहती है, तबतक कर्मोंमें निष्कामता नहीं आ सकती। जो कुछ भी कर्म किया जाय, उसके पूर्ण होने या न होनेमें अथवा उसके अनुकूल या प्रतिकूल फलमें समभाव रहनेका नाम ‘समत्व’ है। इस समत्वभावरूप योगमें स्थित होकर कर्म करना ही निष्काम कर्मयोग है; क्योंकि यह समत्वबुद्धिरूप योग ही कर्मोंमें कुशलता है, इस प्रकारकी समत्वबुद्धिसे निष्काम कर्म करनेवाले पुरुष जन्म-बन्धनसे छूटकर अनामय परम पदको प्राप्त होते हैं। (गीता २। ४८ से ५१) परंतु बुद्धिकी यह समता वैराग्य बिना नहीं होती, अतएव निष्काम कर्मके लिये सबसे पहले वैराग्यकी परम आवश्यकता है। भगवान् (श्रीमद्भगवद‍्गीता २। ५२-५३ में) कहते हैं—

यदा ते मोहकलिलं बुद्धिर्व्यतितरिष्यति।

तदा गन्तासि निर्वेदं श्रोतव्यस्य श्रुतस्य च॥

श्रुतिविप्रतिपन्ना ते यदा स्थास्यति निश्चला।

समाधावचला बुद्धिस्तदा योगमवाप्स्यसि॥

‘अर्जुन! जब तेरी बुद्धि मोहरूपी कीचड़से सर्वथा निकल जायगी, तब तुझे सुने हुए और सुननेके विषयोंमें वैराग्य होगा। एवं वैराग्यके द्वारा जब वह अनेक प्रकारकी बातोंके सुननेसे विचलित हुई बुद्धि परमात्माके स्वरूपमें निश्चल होकर ठहर जायगी, तब तुझे ‘समत्वरूप योग’ की प्राप्ति होगी।’

धन-कीर्ति, मान-बड़ाई, पद-गौरवकी सैकड़ों प्रकारकी आशा-आकांक्षाकी फाँसियोंमें बँधे हुए विषयासक्त मनुष्य नश्वर जगत‍्के प्रापंचिक कार्योंमें संलग्न रहकर गीतासे उसका समर्थन करते हुए गीताको वैराग्यकी शिक्षासे शून्य बतलाते हैं, यही आश्चर्य है।

इसी प्रकार ज्ञानके साधनमें भी गीता वैराग्यकी आवश्यकता बतलाती है। ‘इन्द्रियार्थेषु वैराग्यम्’ (१३। ८) और ‘वैराग्यं समुपाश्रित:’ (१८। ५२) से यह सिद्ध है। अवश्य ही गीता किसी आश्रम-विशेषपर जोर नहीं देती। सब कर्मोंका स्वरूपसे त्याग करनेपर ही वैराग्यकी सिद्धि होती है, गीता ऐसा नहीं कहती। परंतु वैराग्य हुए बिना ज्ञानकी प्राप्ति नहीं हो सकती, इस बातको गीता डंकेकी चोट कहती है। छठे अध्यायमें गीता कहती है कि जिनका मन वशमें नहीं है, उनके लिये योगकी प्राप्ति यानी परमात्माका मिलन अत्यन्त कठिन है और मन वशमें होता है अभ्यास तथा वैराग्यसे। ‘अभ्यासेन तु कौन्तेय वैराग्येण च गृह्यते।’ इस लोक और परलोकके भोगोंमें वैराग्य हुए बिना उनसे हटकर निश्चलरूपसे मन परमात्मामें नहीं लगेगा और परमात्मामें लगे बिना परमात्माकी प्राप्ति नहीं होगी।

भक्तिके साधनमें तो भोगोंका त्याग सबसे पहले आवश्यक है, वहाँ तो सब ओरसे मन हटाकर सबकी आशा छोड़कर, ‘मामेकं शरणं व्रज’ के लक्ष्यपर चलना है, अपना सारा मन प्रियतमके प्रति अर्पण कर देना है, समूचा हृदय-मन्दिर प्यारेके लिये खाली करके उसमें उसकी प्रतिष्ठा करनी है और वह भी ऐसी कि रोम-रोममें उसे रमा लेना है। गोपियाँ कहती हैं—

नाहिन रह्यो मन महँ ठौर।

नंदनंदन अछत उर बिच आनिये कत और॥

‘कहीं जगह नहीं रही, सब ओर मनमोहन समा रहा है।’ जब ज्ञान-विज्ञानको ही स्थान नहीं है तब भोगोंकी तो बात ही कौन-सी है?—प्रेमी भक्त तो प्यारेके लिये सिर हाथमें लिये फिरता है—

‘जो सिर साटे हरि मिले, तो तेहि लीजै दौर’।

भोगोंकी तो वहाँ स्मृति ही नहीं है—

रमा बिलासु राम अनुरागी।

तजत बमन जिमि जन बड़ भागी॥

इसीसे गीतामें भगवान् कहते हैं—

यो न हृष्यति न द्वेष्टि न शोचति न काङ्क्षति।

शुभाशुभपरित्यागी भक्तिमान्य: स मे प्रिय:॥

(१२। १७)

‘जो भोगोंकी प्राप्तिमें हर्षित नहीं होता, उनके नाशसे द्वेष नहीं करता, नाश हो जानेपर शोक नहीं करता और पुन: प्राप्तिके लिये कामना नहीं करता एवं जो शुभाशुभ किसी भी कर्मका फल नहीं चाहता वह भक्तियुक्त पुरुष मुझे बड़ा प्यारा है।’ क्यों न हो, यह तो वैराग्यका मूर्तिमान् स्वरूप है। ‘सब तज हरि भज’ का ज्वलन्त उदाहरण है। अतएव गीता वैराग्यकी शिक्षासे पूर्ण है। जो लोग वैराग्यकी आवश्यकता नहीं समझते, बिना ही वैराग्यके गीताका सार अर्थ समझना चाहते हैं और भोगोंमें पूरी आसक्ति बनाये रखनेकी इच्छा रखते हुए भी भगवान‍्में प्रेम होना चाहते हैं, वे न तो गीताका अर्थ ही समझ सकते हैं और न उन्हें भगवत्-प्रेमकी प्राप्ति ही होती है; क्योंकि भोग और भगवान् दोनोंका प्रेम एक साथ नहीं रह सकता। हाँ, भोग उनकी पूजाकी सामग्रीके रूपमें उन्हें अर्पित होकर रह सकते हैं।

जहाँ राम तहँ काम नहिं, जहाँ काम नहिं राम।

तुलसी कबहुँ कि रहि सकै, रबि रजनी इक ठाम॥