गीताके दो प्रधान पात्र
(भगवान् श्रीकृष्ण और भक्त अर्जुन)
गीतामें सर्वप्रधान पात्र दो हैं—भगवान् श्रीकृष्ण और भक्तवर अर्जुन। अतएव यहाँ इन दोनोंके जीवनकी कुछ घटनाओंका उल्लेख किया जाता है। भगवान् श्रीकृष्णकी लीला-कथाएँ तो जीवोंको भवसागरसे तारनेवाली हैं ही; उनके भक्त अर्जुनकी जीवन-कथा भी भगवान्के सम्बन्धसे बहुत ही उपकारिणी हो गयी है।
भगवान् श्रीकृष्ण
भगवान् श्रीकृष्ण साक्षात् भगवान् हैं। गीतामें उन्होंने अपने श्रीमुखसे तो बार-बार अपनेको साक्षात् भगवान् कहा ही है। अर्जुन और संजयने भी ऐसे शब्दोंका प्रयोग किया है जो भगवान्के सिवा किसी भी बड़े-से-बड़े मनुष्यके लिये प्रयोग नहीं किये जा सकते।
द्वापरके अन्तमें देवताओंकी प्रार्थनापर भगवान् श्रीकृष्ण मथुरामें वसुदेवजीके यहाँ कंसके कारागारमें भाद्रपद कृष्णाष्टमी, बुधवारको आधी रातके समय रोहिणी नक्षत्र और वृष लग्नमें चतुर्भुजरूपसे प्रकट हुए। तदनन्तर वसुदेव-देवकीके प्रार्थनानुसार शिशुरूप धारण करनेपर इन्हें श्रीवसुदेवजी इन्हींके संकेतानुसार गोकुल पहुँचा आये और वहीं नन्द-यशोदाके यहाँ—ये पुत्ररूपमें पालित हुए। वहाँ रहकर इन्होंने बालकपनमें ही अनेक अलौकिक चरित्र किये। मारनेके लिये स्तनोंमें विष लगाकर आयी हुई पूतनाके प्राणोंको भी दूधके साथ खींच लिया। पालनेमें झूलते हुए दूध और दहीके बर्तनोंसे भरे एक बहुत बड़े छकड़ेको पैरोंके ठोकरसे उलट दिया और बवंडरके रूपमें आकर इन्हें आकाशमें उड़ाकर ले जाते हुए तृणावर्त नामक दैत्यको गला घोंटकर मार डाला और उसका उद्धार कर दिया।
जब बालक श्रीकृष्ण चलने-फिरने लगे तो गोपियोंके घरोंमें घुस जाते और उनकी प्रसन्नताके लिये उनका दूध, दही और माखन ले-लेकर खा जाते, सखाओं तथा बंदरोंको लुटा देते तथा अन्य कई प्रकारका बालचापल्य करके उन्हें रिझाते तथा खिझाते। जब वे शिकायत लेकर यशोदा मैयाके पास आतीं तो अनेक प्रकारकी चातुर्यपूर्ण बातें कहकर उन्हें निरुत्तर कर देते।
एक दिन गोपबालकोंने आकर यशोदा मैयासे कहा कि ‘कन्हैयाने मिट्टी खायी है।’ मैयाने डाँटकर कहा, ‘क्यों रे? तूने मिट्टी क्यों खायी?’ भगवान् बोले—‘मैया! मैंने मिट्टी नहीं खायी है, विश्वास न हो तो मेरा मुख देख ले।’ फिर उन्होंने माताको अपने मुखके अंदर त्रिलोकीका दर्शन कराया, किंतु मातापर इनके इस अलौकिक प्रभावका संस्कार अधिक देरतक न ठहरा। एक दिन माताने इनकी चपलताके कारण इन्हें ऊखलसे बाँध दिया और इन्होंने ऊखलसे बँधे-बँधे ही यमलार्जुन वृक्षोंको उखाड़ डाला और कुबेरपुत्र नलकूबर तथा मणिग्रीवका उद्धार किया। जब श्रीकृष्ण-बलराम कुछ बड़े हुए तब वे बछड़ोंको चराने वनमें जाने और वहाँ गोपबालकोंके साथ नाना प्रकारकी क्रीडा करने लगे। वहाँ इन्होंने क्रमश: बछड़े और बगुलेका रूप बनाकर आये हुए वत्सासुर और बकासुर नामक दैत्योंका तथा अजगरका वेष बनाकर आये हुए अघासुरका उद्धार किया।
एक बार भगवान् जब वनमें बछड़े चरा रहे थे तो ब्रह्माजीने भगवान्की महिमा देखनेके लिये बछड़ों और गोपबालकोंको ले जाकर कहीं छिपा दिया। श्रीकृष्णने यह देखकर स्वयं उन सारे बछड़ों और गोपबालकोंका रूप धारण कर लिया और सालभर इस प्रकार अनेकरूप होकर रहे। ब्रह्माजी इस लीलाको देखकर बहुत ही चकित हुए और उन्होंने क्षमा-याचना करके सब बछड़ों तथा गोपबालकोंको लौटा दिया।
जब श्रीकृष्ण छ:-सात वर्षके हुए तो ये नन्दजीके आज्ञानुसार गौओंको चराने वनमें जाने लगे। इन्हीं दिनों धेनुकासुर नामक दैत्य गदहेका रूप बनाकर श्रीकृष्णको मारने आया। उसकी भी वही दशा हुई जो इसके पूर्व अन्य दैत्योंकी हुई थी। उन दिनों कालिय नामक महान् विषधर सर्प यमुनाजीमें रहता था, जिसके कारण यमुनाजीका जल विषैला हो गया था। भगवान् श्रीकृष्णने यमुनाजीमें प्रवेशकर उस सर्पके साथ युद्ध किया और उसका शासन करके उसको वहाँसे निकाल दिया। रातको जब समस्त गोकुलवासी यमुनाके तटपर सोये हुए थे, वनमें सहसा भयानक आग लगी, जिसने उन सोये हुए व्रजवासियोंको चारों ओरसे घेर लिया। भगवान्ने उनका यह कष्ट देखकर उस अग्निको पी लिया और इस प्रकार अपने आश्रितजनोंकी रक्षा की।
एक बार सब गोपगण गायोंको चरानेके लिये एक मूजके वनमें घुस गये। वहाँ भी दैवयोगसे आग लग गयी, जिसके कारण समस्त गोपगण तथा गायें व्याकुल हो गयीं। भगवान्ने पुन: उस अग्निको पीकर गौओं तथा गोपोंकी रक्षा की।
एक बार कुछ गोपकन्याओंने भगवान् श्रीकृष्णको पतिरूपमें प्राप्त करनेके उद्देश्यसे अगहनके महीनेमें कात्यायनी देवीका व्रत किया। एक दिन जब वे वस्त्रोंको तटपर रखकर यमुनाजीमें नग्न होकर स्नान कर रही थीं तो भगवान् उन्हें शिक्षा देनेके लिये उनके वस्त्रोंको लेकर कदम्बपर जा बैठे। बड़े अनुनय-विनयके बाद उनके वस्त्रोंको लौटाया और उनके मनोरथ पूर्ण करनेका उन्हें वरदान दिया।
भगवान् श्रीकृष्ण ऐसी मधुर मुरली बजाते कि गोपबालाएँ तथा व्रजके सभी प्राणी उसे सुनकर मुग्ध हो जाते। एक बार जब गोपगण भगवान् श्रीकृष्णके साथ वनमें गौएँ चरा रहे थे तो उन्हें बड़ी भूख लगी। पास ही कुछ ब्राह्मण यज्ञ कर रहे थे। भगवान्ने गोपोंसे कहा कि तुम उन ब्राह्मणोंके पास चले जाओ और उनसे हमारा नाम लेकर अन्न माँगो। गोपोंने वैसा ही किया, किंतु ब्राह्मणोंने उनकी प्रार्थनापर ध्यान नहीं दिया। तब भगवान्ने गोपोंको उन ब्राह्मणोंकी पत्नियोंके पास भेजा और वे भगवान्का नाम सुनते ही अधीर होकर वहाँ दौड़ी आयीं और साथमें बहुत-सा भोजनका सामान लेती आयीं। पीछेसे जब उनके पतियोंको यह बात मालूम हुई तो वे मन-ही-मन अपनी पत्नियोंकी भक्तिकी सराहना करने और अपनेको धिक्कारने लगे!
गोपगण प्रतिवर्ष इन्द्रको प्रसन्न करनेके लिये एक बड़ा भारी यज्ञ किया करते थे। भगवान्ने इसके बदलेमें गोपोंसे गौओं, ब्राह्मणों और गोवर्द्धन पर्वतकी पूजा करनेके लिये प्रेरणा की और स्वयं एक दूसरा रूप धारणकर गोवर्द्धन पर्वतके अभिमानी देवताके रूपमें पूजाको स्वीकार किया। जब इन्द्रने यह देखा तो वे अत्यन्त कुपित हुए और गोपोंको दण्ड देनेके लिये उन्होंने प्रलयकालकी-सी वर्षा बरसानेका आयोजन किया। भगवान्ने उस प्रलयकारी वर्षासे गोपोंकी रक्षा करनेके लिये लीलासे ही गोवर्द्धन पर्वतको उठा लिया और सात दिनतक उसे उसी प्रकार उठाये रखा तथा इस प्रकार इन्द्रके दर्पको चूर्ण किया।
गोवर्द्धन धारण करनेके बाद स्वर्गसे इन्द्र और गोलोकसे कामधेनु—श्रीकृष्णके पास आये। इन्द्रने क्षमा-प्रार्थना की। कामधेनुने अपने दूधसे और इन्द्रने ऐरावत हाथीकी सूँडसे निकले हुए आकाशगंगाके जलसे श्रीकृष्णका अभिषेक किया और उनका नाम ‘गोविन्द’ रखा।
एक बार नन्दजी रात्रिके समय यमुनाजीमें स्नान कर रहे थे, उस समय एक वरुणका अनुचर उन्हें उठाकर वरुणलोकमें ले गया। जब भगवान्को यह मालूम हुआ तो वे स्वयं वरुणलोकमें जाकर नन्दजीको वहाँसे ले आये। नन्दजीने जब वहाँके वैभव और श्रीकृष्णकी महिमाका वर्णन अपने साथियोंसे किया तो उन लोगोंको भगवान्के वैकुण्ठ-धामका दर्शन करनेकी बड़ी उत्कट अभिलाषा हुई। उनकी अभिलाषाको जानकर भगवान्ने उन्हें अपने प्रकृतिसे परब्रह्मस्वरूपका और वैकुण्ठलोकका दर्शन कराया।
इसके बाद भगवान्ने कान्तभावसे भजनेवाली गोपियोंका मनोरथ पूर्ण करनेके लिये तथा कामदेवका मद चूर्ण करनेके लिये अलौकिक रासक्रीडा की। भगवान्की मुरली सुनकर गोपियाँ शारदीय पूर्णिमाकी रात्रिको रासमण्डलमें भगवान्के पास पहुँचीं, बीचमें भगवान् अन्तर्धान हो गये। फिर प्रकट हुए। तदनन्तर एक-एक गोपीके बीचमें एक-एक स्वरूप धारण करके भगवान्ने दिव्य रासलीला की।
एक बार नन्दादि गोपगण देवाधिदेव महादेवकी पूजाके लिये अम्बिकावनको गये हुए थे। वहाँ रात्रिको एक अजगर सोये हुए नन्दबाबाको निगलने लगा। उनके रोनेकी आवाज सुनकर भगवान् जागे और उन्होंने उस अजगरको पैरोंसे ठुकराया। भगवान्के चरणोंका स्पर्श पाते ही वह विद्याधरके रूपमें परिवर्तित हो गया और भगवान्की स्तुति करता हुआ अपने लोकको चला गया। ऋषियोंका अपराध करनेसे उसे सर्पकी योनि प्राप्त हुई थी और भगवान्की कृपासे वह उस योनिसे छूटकर अपने असली स्वरूपको प्राप्त हो गया।
एक बार भगवान् वनमें गोपियोंके साथ विहार कर रहे थे, उस समय शंखचूड नामक कुबेरका अनुचर गोपियोंके एक टोलेको उठाकर ले गया। भगवान्ने उसका पीछा किया और उसे मारकर उसके मस्तकपरसे उसकी मणिको निकाल लिया।
इस बीचमें अरिष्टासुर नामक दैत्य बैलका रूप धारण कर व्रजमें आया। भगवान्ने उसे बात-की-बातमें मारकर अपने धामको पहुँचा दिया। तब कंसने केशी नामक दैत्यको भेजा, जो घोड़ेका रूप धरकर आया; किंतु उसकी भी वही गति हुई।
एक बार भगवान् ग्वालबालोंके साथ चोरोंका खेल खेल रहे थे। कुछ ग्वाल चोर बन गये, कुछ मेढ़े बन गये और कुछ रखवाले बनकर उनकी चोरोंसे रक्षा करने लगे। इतनेमें व्योमासुर नामक दैत्य आया और वह भी गोपवेषमें चोर बनकर मेढ़े बने हुए गोपबालकोंको चुरा-चुराकर एक पर्वतकी गुफामें ले जाकर रखने लगा। भगवान्को जब यह पता लगा तो उन्होंने मायासे गोप बने हुए उस दैत्यको खूब मारा और उसके प्राणोंको हर लिया तथा छिपाकर रखे हुए गोपबालकोंको गुफामेंसे बाहर निकाला।
इधर कंसने मथुरामें श्रीकृष्ण-बलरामको मारनेके उद्देश्यसे धनुषयज्ञका आयोजन किया और उन्हें बुलानेके लिये अक्रूरजीको भेजा। अक्रूरजी जब श्रीकृष्ण-बलरामको लेकर मथुरा जाने लगे तो गोपियाँ विरह-दु:खसे अत्यन्त कातर होकर रोने लगीं और उनके रथके पीछे-पीछे चलने लगीं। भगवान्ने किसी प्रकार समाश्वासन देकर उन्हें लौटाया। वे भी भगवान्के लौटनेकी आशासे प्राण धारण करती हुई व्रजमें रहने लगीं। मथुरा पहुँचनेके पूर्व भगवान्ने यमुनातटपर विश्राम किया। अक्रूरजीने रथसे उतरकर स्नानके लिये यमुनाजीके अंदर डुबकी लगायी तो उन्होंने जलके भीतर श्रीकृष्णको देखा; उन्होंने जलसे बाहर निकलकर रथकी ओर देखा तो वहाँ भी श्रीकृष्ण-बलरामको पूर्ववत् बैठे पाया। यह लीला देखकर उन्हें महान् आश्चर्य हुआ और वे गद्गद होकर भगवान्की ‘स्तुति’ करने लगे।
मथुरा पहुँचनेपर भगवान्ने अक्रूरजीको पहले भेज दिया और स्वयं पीछेसे गोपोंके साथ नगरीमें प्रवेश किया। नगरीमें उनका बड़ा स्वागत हुआ। रास्तेमें भगवान्ने सुदामा मालीकी पूजा स्वीकार की, त्रिवक्रा (कुब्जा) नामक कंसकी दासीका कूबड़ दूर किया और उसके घर आनेका वचन दिया। यज्ञमण्डपमें पहुँचकर भगवान्ने उस धनुषको देखा जिसके निमित्तसे उस यज्ञका आयोजन किया गया था और सब लोगोंके देखते-देखते उसे लीलासे ही तोड़ डाला। रक्षकोंने जब भगवान्को ललकारा तो उनको भी मार डाला। दूसरे दिन भगवान् फिर रंग-मण्डपमें मल्लयुद्ध देखनेके लिये गये। द्वारके सामने कुबलयापीड नामका मतवाला हाथी खड़ा था, उसने महावतके इशारेसे श्रीकृष्णपर आक्रमण किया। श्रीकृष्णने लीलासे ही उसके दोनों दाँतोंको उखाड़ लिया और उन्हींके प्रहारसे हाथी तथा महावत दोनोंको मार डाला। फिर मण्डपमें प्रवेश करके चाणूर, मुष्टिक आदि मल्लोंको पछाड़ा और अन्तमें सबके देखते-देखते छलाँग मारकर कंसके मंचपर जा कूदे और उसे केश पकड़कर सिंहासनके नीचे ढकेल दिया और बात-की-बातमें उस महाबलीका काम तमाम कर डाला। इसके बाद विधिपूर्वक उसकी अन्त्येष्टि क्रिया करवायी और उसके पिता उग्रसेनको कारागारसे मुक्त करके उनका राज्याभिषेक किया और स्वयं कारागारमें अपने माता-पिता वसुदेव-देवकीसे मिलकर उनका बन्धन छुड़ाया और उन्हींके पास सुखपूर्वक रहने लगे।
वसुदेवजीने भगवान्का विधिवत् यज्ञोपवीत-संस्कार करवाया और फिर उन्होंने उज्जयिनीमें गुरु सान्दीपनिके यहाँ वेद-वेदांगकी शिक्षा प्राप्त करनेके लिये भेज दिया। वहीं उनकी सुदामा ब्राह्मणसे मित्रता हुई। बहुत थोड़े समयमें गुरुकुलकी शिक्षा समाप्त कर, चौदह विद्या और चौंसठ कलाओंमें निपुण होकर भगवान् जब वापस आने लगे तो उन्होंने गुरुसे इच्छानुसार गुरुदक्षिणा माँगनेके लिये प्रार्थना की। गुरुने अपने पत्नीसे सलाह करके यह कहा कि ‘हमारा एक पुत्र प्रभासक्षेत्रमें समुद्रमें डूबकर मर गया था, उसीको वापस ला दो।’ भगवान्ने यमपुरीमें जाकर वहाँसे गुरुपुत्रको ला दिया और गुरुकी आज्ञा तथा आशीर्वाद पाकर वे घर लौट आये।
इसके बाद भगवान्ने गोपियोंकी सुधि लेने तथा अपने प्रिय सखा उद्धवका ज्ञानाभिमान दूर करके उन्हें प्रेम-मार्गमें दीक्षित करने और गोपी-प्रेमका माहात्म्य बतलानेके लिये व्रजमें भेजा। वहाँ उन्होंने प्रेममूर्ति विरहिणी व्रजांगनाओंकी जो दशा देखी, उससे उनके ज्ञानका गर्व गल गया और वे गोपियोंको प्रबोध करनेका हौसला भूलकर उलटे गोपियोंके दास बन गये तथा उनकी चरणधूलिमें लोटकर अपनेको कृतार्थ मानने लगे। इसके अनन्तर भगवान् अपने वचनको पूरा करनेके लिये कुब्जाके घर गये और उसके प्रेमका सम्मान किया। फिर वे अक्रूरजीके घर गये और उन्हें पाण्डवोंका संवाद लानेके लिये हस्तिनापुर भेजा।
इधर कंसकी मृत्युका बदला लेनेके लिये उसके श्वसुर मगधराज जरासन्धने सत्रह बार तेईस-तेईस अक्षौहिणी सेना लेकर मथुरा नगरीपर चढ़ाई की, किंतु प्रत्येक बार उसे मुँहकी खाकर लौट जाना पड़ा। अठारहवीं बार वह फिर सेना बटोरकर चढ़ाई करनेहीवाला था कि इस बीचमें कालयवन नामक यवनदेशके राजाने तीन करोड़ सेना लेकर मथुरा नगरीपर धावा बोल दिया। इस प्रकार दोहरा आक्रमण देखकर व्यर्थके नरसंहारको रोकनेके लिये भगवान्ने समुद्रतटपर जाकर एक नयी नगरी बसाने और मथुरावासियोंको वहाँ पहुँचाकर फिर यवनोंके साथ युद्ध करनेका निश्चय किया। भगवान्की आज्ञासे विश्वकर्माने समुद्रके अंदर द्वारका नामकी एक विशाल नगरीका निर्माण किया। समस्त नगरवासियोंको युक्तिसे वहाँ पहुँचाकर भगवान् स्वयं बिना कोई आयुध लिये ही नगरसे बाहर निकल पड़े। उन्हें इस प्रकार पैदल ही नगरसे बाहर जाते देखकर कालयवनने भी पैदल ही उनका पीछा किया। भगवान् दौड़ते-दौड़ते एक गुफामें घुस गये और वहाँ सोये हुए मान्धाताके पुत्र मुचुकुन्दके द्वारा बिना ही परिश्रम उसे मरवा डाला। फिर मुचुकुन्दको अपने दिव्य दर्शन देकर उसे कृतार्थ किया। श्रीकृष्णने वहाँसे लौटकर अकेले ही यवनोंकी उस विपुल सेनाका संहार किया और वहाँसे द्वारकाको जानेके तैयारीमें ही थे कि इतनेमें ही जरासन्धने पुन: तेईस अक्षौहिणी सेना लेकर मथुरापर चढ़ाई की। अब तो भगवान्ने वहाँसे भागना ही उचित समझा और भयभीत होकर भागनेका-सा नाट्य करके द्वारका चले आये। तभीसे भक्तलोग उन्हें ‘रणछोड़’ नामसे पुकारने लगे। जरासन्ध अपनी सेनाको लेकर वापस अपनी राजधानीको चला गया।
इसके बाद भगवान्ने साक्षात् भगवती लक्ष्मीजीकी कलारूपा देवी रुक्मिणीके साथ विवाह किया और विरोधी सेनाका संहार किया। रुक्मिणीका भाई रुक्मी भी रुक्मिणीके अपहरणको न सहकर एक अक्षौहिणी सेना लेकर भगवान्के पीछे दौड़ा; किंतु भगवान्ने उसकी सेनाका बात-की-बातमें विध्वंस कर डाला और रुक्मीको भी पकड़कर केशहीन एवं कुरूप करके छोड़ दिया। देवी रुक्मिणीके गर्भसे प्रद्युम्न नामक पुत्र हुआ, जो साक्षात् कामदेवका अवतार था और रूप-गुणोंमें भगवान् श्रीकृष्णकी ही प्रतिमूर्ति था।
एक बार स्यमन्तक मणिको ढूँढ़ते हुए भगवान् श्रीकृष्ण ऋक्षराज जाम्बवान्के पास पहुँचे और उस मणिके लिये उनसे युद्ध किया। जाम्बवान् उनके बलको देखकर यह समझ गये कि मेरे इष्टदेव राम ही इस रूपमें मेरे सामने उपस्थित हुए हैं और अत्यन्त भक्तिभावसे अपनी कन्या जाम्बवतीके साथ उस मणिको भगवान्के भेंट कर दिया। भगवान्ने उस मणिको ले जाकर उसके मालिक सत्राजित् यादवको दे दिया और सत्राजित् यादवने इस उपकारके बदलेमें अपनी कन्या सत्यभामाके साथ भगवान्का विवाह कर दिया और उस मणिको भी दहेजमें दे दिया। भगवान्ने सत्यभामाको तो स्वीकार कर लिया; किंतु मणि लौटा दी। ये सत्यभामा भगवान्की अत्यन्त कृपापात्र महिषी थीं।
रुक्मिणी, सत्यभामा और जाम्बवतीके अतिरिक्त भगवान्की पाँच पटरानियाँ और थीं जिनके नाम थे—कालिन्दी, मित्रविन्दा, नाग्नजिती, लक्ष्मणा और भद्रा। इनमेंसे कालिन्दीने तपस्या करके भगवान्को प्राप्त किया, मित्रविन्दाको भगवान् रुक्मिणीकी भाँति हरण करके लाये, नग्नजित् की कन्या सत्याको शुल्करूपमें सात उद्दण्ड बैलोंको एक साथ नाथकर लाये, भद्रासे उसके बान्धवोंके आग्रह करनेपर विवाह किया और मद्रदेशकी राजकन्या लक्ष्मणाको भगवान् अकेले ही स्वयंवरमें सब राजाओंका तिरस्कार करके हर ले आये।
इसके बाद भगवान्ने इन्द्रकी प्रार्थनापर भौमासुर अथवा नरकासुर नामक दैत्यकी राजधानी प्राग्योतिषपुरपर चढ़ाई की और उसका वध करके उसके स्थानपर उसके पुत्र भगदत्तको अभिषिक्त किया। उस भौमासुरके यहाँ नाना देशके राजाओंसे हरण करके लायी हुई सोलह हजार एक सौ कन्याएँ थीं। उन्होंने भगवान्के दर्शन कर मन-ही-मन उन्हें पतिरूपमें वरण कर लिया और भगवान्ने भी उनका मनोरथ पूर्ण करनेके लिये उन्हें द्वारिका भेज दिया। भौमासुर इन्द्रकी माता अदितिके कुण्डल हरण कर लाया था, उन्हें भगवान् श्रीकृष्ण इन्द्रलोकमें जाकर इन्द्रकी माताको वापस दे आये और वहाँसे लौटते समय इन्द्रादि देवताओंको जीतकर सत्यभामाकी इच्छा पूर्ण करनेके लिये पारिजातका वृक्ष अपने साथ लेते आये और उसे सत्यभामाके महलोंके पास लगा दिया।
द्वारिकामें लौटकर भगवान्ने उन सोलह हजार एक सौ कन्याओंके साथ एक ही समय उतने ही रूप धारण कर अलग-अलग विवाह किया और उसी प्रकार लक्ष्मीकी अंशरूपा उन स्त्रियोंके साथ अलग-अलग रहने लगे और वे सब भी सेवाके द्वारा उन्हें संतुष्ट करने लगीं।
शोणितपुरके राजा, महाभागवत बलिके पुत्र बाणासुरकी कन्या ऊषाने एक बार स्वप्नमें प्रद्युम्नके पुत्र अनिरुद्धको देखा और उसी समयसे वह उन्हें पतिरूपमें मानने लगी। उसने युक्तिसे एक बार उन्हें अपने महलोंमें बुलाया और उन्हें बड़े ही सुखपूर्वक वहीं अपने पास महलोंमें ही रख लिया। जब उसके पिताको इस बातकी खबर लगी तो वह बहुत रुष्ट हुआ और उसने अनिरुद्धको कैद कर लिया। जब यह संवाद श्रीकृष्णके पास पहुँचा तो वे बड़ी भारी सेना लेकर शोणितपुर पहुँचे। वहाँ उनका बाणासुरके साथ घमासान युद्ध हुआ। बाणासुर भगवान् शंकरका बड़ा भक्त था, अत: साक्षात् शंकर भी उसकी सहायताके लिये आये और उनका भगवान् श्रीकृष्णके साथ कई दिनतक संग्राम चला। अन्तमें भगवान् शंकरके अनुरोधसे श्रीकृष्णने उसकी भुजाओंको छेदन कर उसे अभय दे दिया और ऊषा तथा अनिरुद्धको साथ लेकर भगवान् अपनी राजधानीको लौट आये।
एक समय एक बगीचेमें खेलते हुए कुछ यादव-बालकोंको एक अन्धे कुएँमें एक पर्वताकार गिरगिट दिखायी दिया। उसे कुएँमेंसे निकालनेकी उन बालकोंने बहुत चेष्टा की, परंतु वे उस कार्यमें असफल रहे। तब वे श्रीकृष्णको वहाँ बुला लाये और उनके स्पर्शमात्रसे ही वह गिरगिटके रूपको त्यागकर देवरूप हो गया। वह राजा नृग था, जो भूलसे एक दान की हुई गौको दुबारा दान देनेके कारण उस नीच योनिको प्राप्त हुआ था।
एक बार करूषदेशके राजा पौण्ड्रकने ‘असली वासुदेव मैं हूँ’ ऐसा मानकर भगवान् श्रीकृष्णके पास दूत भेजा और उनको युद्धके लिये ललकारा। उसने यह चुनौती अपने मित्र काशिराजके यहाँसे भेजी थी, अत: भगवान् श्रीकृष्णने उसकी चुनौतीको स्वीकारकर काशीनगरीपर चढ़ाई कर दी और मित्रसहित उस मिथ्या वासुदेवको मारकर वे द्वारिकाको लौट आये। इधर काशिराजका पुत्र सुदक्षिण अपने पिताके वधका बदला लेनेके लिये अभिचारविधिका प्रयोग करता हुआ अग्निकी आराधना करने लगा। विधिके पूर्ण होनेपर हवनकुण्डमेंसे एक अति भयानक अग्नि उत्पन्न हुई, जो दसों दिशाओंको जलाती हुई द्वारिकापर चढ़ दौड़ी। भगवान्ने उसे माहेश्वरी कृत्या जानकर उसका शमन करनेके लिये सुदर्शन चक्रको आज्ञा दी। चक्रसे पीडित होकर वह कृत्या काशीको लौट गयी और उसने ऋत्विजोंसहित स्वयं सुदक्षिणको ही जला दिया। सुदर्शन चक्र भी उसके पीछे-पीछे काशी गया और सारी नगरीको जलाकर वापस लौटा।
एक बार देवर्षि नारदजी ‘भगवान् गृहस्थाश्रममें रहकर किस प्रकार रहते हैं?’ यह देखनेकी इच्छासे द्वारिकामें गये। वे अलग-अलग सब रानियोंके महलोंमें गये और सब जगह उन्होंने श्रीकृष्णको गृहस्थका यथायोग्य बर्ताव करते हुए पाया। वे प्रात:काल उठनेके समयसे लेकर रात्रिको सोनेके समयतकका समस्त दैनिक कृत्य भिन्न-भिन्न रूपोंमें विधिवत् करते थे। सभामें जानेके समय वे घरोंसे निकलते हुए अलग-अलग रूपमें दिखायी देते थे और फिर एक रूप होकर सभामें प्रवेश करते थे। यह सब देखकर नारदजी दंग रह गये और भगवान्की स्तुति करते हुए अपने लोकको चले गये।
भगवान् श्रीकृष्णकी दैनिकचर्या आदर्श थी। आप ब्राह्ममुहूर्तमें उठते, तदनन्तर ध्यान करते, फिर स्नान-संध्यादिसे निवृत्त होकर हवन करते और गायत्रीका जाप करते। फिर तर्पण करके गुरुजनोंकी और ब्राह्मणोंकी पूजा करते। तत्पश्चात् सुन्दर सींगवाली तथा चाँदीसे मढ़े हुए खुरों तथा मोतीकी मालाएँ पहनी हुई, एक बारकी ब्यायी, दूधवाली बछड़ेसहित १३,०८४ गौएँ प्रतिदिन दान करते।
महाराज युधिष्ठिरने राजसूय-यज्ञका उपक्रम किया। इसके लिये देशभरके राजाओंको जीतना आवश्यक था। उनमें सबसे बलवान् जरासन्ध था। उसे द्वन्द्वयुद्धके द्वारा जीतनेके अभिप्रायसे भीमसेन, अर्जुन और श्रीकृष्ण तीनों ब्राह्मणका वेष बनाकर उसकी राजधानी गिरिव्रजमें गये। वहाँ भीमसेनके द्वारा जरासन्धको मरवाकर भगवान्ने पाण्डवोंकी विजयका एक बड़ा भारी कण्टक दूर कर दिया और साथ ही उसके यहाँ जो बीस हजार आठ सौ राजा कैद थे, उन्हें मुक्ति दिलवाकर अपने-अपने राज्यमें भेज दिया।
इसके बाद राजसूय-यज्ञकी तैयारी हुई। भगवान्ने यज्ञमें आये हुए ब्राह्मणोंके चरण धोनेका काम स्वीकार किया। वहाँ सबसे पहले सभापतिका पूजन आवश्यक था। सभापतिके आसनके लिये सर्वसम्मतिसे भगवान् श्रीकृष्ण चुने गये और तदनुसार धर्मराजने सर्वप्रथम उन्हींकी पूजा की और उनके त्रिलोकपावन चरणामृतको मस्तकपर चढ़ाया। उपस्थित सभी सदस्योंने जय-जयकार किया और देवताओंने पुष्पवृष्टि की। भगवान्के इस उत्कर्षको शिशुपाल नहीं सह सका और वह आवेशमें आकर उन्हें अनेक प्रकारके दुर्वचन कहने लगा। भगवान्ने चक्रसे उसके सिरको धड़से अलग कर दिया और सबके देखते-देखते उसकी देहमेंसे निकला हुआ जीवरूपी तेज भगवान्के अंदर प्रविष्ट हो गया।
शिशुपालका एक मित्र शाल्व नामका राजा था। वह अपने मित्रके वधका बदला लेनेके लिये अपना सौभ नामक विमान तथा बड़ी भारी सेना लेकर द्वारिका नगरीपर चढ़ दौड़ा। भगवान् उन दिनों हस्तिनापुर थे। वे अनिष्टकी शंकासे तुरंत द्वारिका चले आये। वहाँ आते ही उन्होंने शाल्वको युद्धके लिये ललकारा और गदासे उसके विमानको चूर-चूरकर चक्रसे उसके मस्तकका छेदन कर दिया।
शाल्वके मारे जानेपर शिशुपालका बड़ा भाई दन्तवक्त्र अकेला गदा हाथमें लेकर पैदल ही श्रीकृष्णसे युद्ध करनेके लिये आगे बढ़ा। श्रीकृष्णने उसका भी गदाके प्रहारसे बात-की-बातमें काम तमाम कर दिया। शिशुपालकी भाँति उसके शरीरसे भी एक सूक्ष्म तेज निकलकर भगवान्के अंदर प्रवेश कर गया। उसके बाद उसका भाई विदूरथ युद्ध करने आया और भगवान्ने उसका भी मस्तक चक्रके द्वारा धड़से अलग कर दिया।
ऊपर कहा जा चुका है कि सुदामा भगवान्के गुरुभाई थे। ये अत्यन्त दरिद्र थे। आये दिन उपवास होता था। परंतु ये इतने नि:स्पृह थे कि किसीसे कुछ कहते-सुनते न थे। एक दिन लगातार कई उपवास होनेके कारण तंग आकर इनकी स्त्रीने इन्हें अपने बालसखा श्रीकृष्णके पास जानेकी प्रेरणा की। किसीसे कुछ माँगनेकी इच्छा न होनेपर भी भगवान्के दर्शनके लोभसे ये द्वारिका पहुँचे। वहाँ भगवान्ने बड़े प्रेमसे इनका आदर-सत्कार किया और आते समय इनके बिना ही जाने इन्हें मालामाल कर दिया।
एक बार सूर्यग्रहणके अवसरपर भगवान् श्रीकृष्ण समस्त यादव-परिवारके साथ पर्व-स्नानके लिये कुरुक्षेत्र गये। वहाँ नन्दादि गोपगण भी आये थे। सब लोग चिरकालके बाद एक-दूसरेसे मिलकर बड़े ही प्रसन्न हुए। नन्द-यशोदा तथा गोपीजन तो श्रीकृष्ण-बलरामको देखकर इतने प्रसन्न हुए मानो सूखे धानपर जल गिर गया हो।
वहीं सब ऋषि-महर्षि भी पधारे थे। भगवान्ने उनकी महिमा गायी। ऋषियोंने भगवान्का महत्त्व कहा। फिर वसुदेवजीने यज्ञ किया। तदनन्तर भगवान्ने अपने पिता वसुदेवजीको ज्ञान प्रदान किया।
एक बार गुरु सान्दीपनिकी गुरुदक्षिणाका वृत्तान्त स्मरण कर माता देवकीने अपने दोनों पुत्रोंके सामने यह इच्छा प्रकट की कि जिस प्रकार तुमने मरे हुए गुरुपुत्रको लाकर अपने गुरुको दिया था, उसी प्रकार मैं भी कंसके द्वारा मारे हुए तुम्हारे छ: भाइयोंको देखना चाहती हूँ। इसपर श्रीकृष्ण-बलराम दोनों सुतल-लोकमें जाकर वहाँसे अपने छहों भाइयोंको ले आये और माताको सौंप दिया। माताने बड़े प्रेमसे उनका आलिंगन किया और उन्हें स्तनपान कराया और फिर उनको विदा कर दिया।
मिथिलापुरीमें श्रुतदेव नामका एक ब्राह्मण रहता था। वह श्रीकृष्णका परम भक्त था। उस देशका राजा बहुलाश्व भी भगवान्की बड़ी भक्ति करता था। उन दोनोंपर ही कृपा करनेके लिये भगवान् एक बार मिथिलापुरी गये। श्रुतदेव और बहुलाश्व दोनों ही भगवान्के चरणोंपर गिरे और दोनोंने ही एक साथ अपने-अपने घर पधारनेके लिये भगवान्से प्रार्थना की। भगवान्ने दोनोंकी प्रार्थना स्वीकार की और उनको न जनाते हुए ही दो स्वरूप धारण करके एक ही साथ दोनोंके घर जाकर उनको कृतार्थ किया।
पाण्डवोंके साथ भगवान्का बड़ा ही स्नेहका सम्बन्ध था। ये सदा उनके हितचिन्तनमें लगे रहते थे।
द्रौपदीके स्वयंवरमें ब्राह्मणवेषमें छिपे हुए पाण्डवोंको भगवान्ने पहचान लिया और फिर वहीं पाण्डवोंको मणि, रत्न, गहने, स्वर्ण, वस्त्र, गृहसामग्री, दास-दासी, असंख्य रथ और हाथी-घोड़े देकर अतुलित ऐश्वर्यशाली बना दिया।
पाण्डव जब वनमें थे तो भगवान् उनसे मिलने गये। द्रौपदीने रो-रोकर अपनी दु:ख-कथा सुनायी। भगवान्ने वहीं कौरवकुलके नाशकी घोषणा कर दी और द्रौपदीको आश्वासन देकर वे वहाँसे विदा हो गये।
एक बार दुर्योधनने छलपूर्वक दुर्वासाजीको पाण्डवोंके पास भेजा। भगवान्ने वहाँ जाकर द्रौपदीकी बटलोईमेंसे एक पत्ता ढूँढ़ निकाला और उसे खाकर सारे विश्वको तृप्त कर दिया और इस तरह दुर्वासाके शापसे पाण्डवोंकी रक्षा की।
कौरवोंको समझानेके लिये भगवान् जब दूत बनकर हस्तिनापुर जाने लगे, तब एकान्तमें द्रौपदीने आकर उन्हें अपने खुले केश दिखलाये और दु:शासनके अत्याचारकी बात याद दिलायी। भगवान्ने आश्वासन देकर उसे संतुष्ट किया। हस्तिनापुरकी राहमें ऋषियोंका एक समूह मिला और सब ऋषियोंने हस्तिनापुर जाकर भगवान्का भाषण सुननेकी इच्छा प्रकट की और भगवान्की अनुमतिसे सबने वहाँ जाकर भगवान्का भाषण सुना।
कौरव-सभामें भगवान्ने नाना प्रकारकी युक्ति-प्रयुक्तियोंसे दुर्योधनको समझानेकी बहुत चेष्टा की; परंतु उसने भगवान्की एक न सुनी और छलसे भगवान्को कैद करना चाहा। तब भगवान्ने उसे डाँटकर अपना दिव्य तेजोमय विराट्रूप दिखलाया। भगवान्के प्रत्येक रोम-कूपसे सूर्यकी किरणें निकल रही थीं और उनके नेत्रों, नासिकाओं और कर्णोंसे आगकी लपटें! भगवान्के इस रूपको देखकर सब चौंधिया गये। द्रोण, भीष्म, विदुर, संजय और तपोधन ऋषियोंने भगवान्का यह स्वरूप देखा। फिर भगवान्ने विदुरके घर जाकर भोजन किया और वहाँसे लौट गये।
महाभारत-युद्धके लिये अर्जुन और दुर्योधन दोनों ही भगवान्के पास पहुँचे। उनके इच्छानुसार भगवान्ने दुर्योधनको अपनी सेना और अर्जुनको अपनेको सौंपकर समदर्शिता और भक्तवत्सलताका प्रत्यक्ष परिचय दिया। महाभारत-युद्धमें भगवान्ने अर्जुनके सारथिका काम किया और पाण्डवोंकी ओरसे प्राय: सारे ही काम भगवान्ने अपनी सलाहसे करवाये। नाना प्रकारकी विपत्तियोंसे, ऐन मौकोंपर मौतके मुँहसे अर्जुनको बचाया और अन्तमें कौरवोंका संहार करवाकर पाण्डवोंको विजयी बनाया। इसी महाभारत-युद्धके आरम्भमें भगवान्ने अर्जुनको दिव्य गीताका उपदेश दिया और विराट्रूप दिखलाया तथा अपने सर्वगुह्यतम पुरुषोत्तमतत्त्वका निरूपण किया।
उत्तराके गर्भमें अश्वत्थामाके ब्रह्मास्त्रसे परीक्षित् को बचाया। सबको ज्ञानका उपदेश करवाया। अश्वमेध-यज्ञमें पाण्डवोंकी सहायता की और अर्जुनको अनुगीताका उपदेश दिया।
तदनन्तर द्वारिकाको लौटते हुए रास्तेमें महर्षि उत्तंकपर कृपा की और उन्हें अपना विराट्रूप दिखलाकर कृतार्थ किया। द्वारिकामें अनेकों लीलाएँ कीं। गान्धारीके और ऋषियोंके शापसे यदुकुलका संहार हुआ। तदनन्तर व्याधके बाणको निमित्त बनाकर भगवान्ने अपनी इच्छासे परम धामको प्रयाण किया। उस समय वहाँ ब्रह्माजी, भवानीसहित श्रीशंकरजी, इन्द्रादि तमाम देवता, प्रजापति, समस्त मुनि, पितर, सिद्ध, गन्धर्व, विद्याधर आदि आये और गान करते हुए भगवान्की लीलाका वर्णन करने लगे। पुष्पोंकी वर्षा होने लगी और आकाश विमानोंकी कतारोंसे भर गया। भगवान् अपने दिव्य देहसे ऊपर उठते हुए सबके देखते-ही-देखते अपने परम धाममें प्रविष्ट हो गये। उन्हींके साथ-साथ सत्य, धर्म, धृति और कीर्ति भी चली गयीं। ब्रह्मा, शिव आदि समस्त देवता भगवान्की कीर्तिका बखान करते हुए अपने-अपने लोकोंको चले गये।
भक्तवर अर्जुन
गीताके पात्रोंमें दूसरा नंबर अर्जुनका है। अर्जुन ‘नर’ ऋषिके अवतार और भगवान् श्रीकृष्णके अनन्यप्रेमी थे। ये कुन्तीदेवीके सबसे छोटे पुत्र थे। अर्जुनमें स्वाभाविक ही इतने गुण थे, जिनके कारण वे भगवान्के इतने प्रिय पात्र हो सके। उनका बल, रूप और लावण्य अपार था। शूरता, वीरता, सत्यवादिता, क्षमा, सरलता, प्रेम, गुरुभक्ति, मातृभक्ति, बड़े भाईकी भक्ति, बुद्धि, विद्या, इन्द्रिय-संयम, ब्रह्मचर्य, मनोनिग्रह, आलस्यहीनता, कर्मप्रवणता, शस्त्रज्ञान, शास्त्रज्ञान, दया, प्रेम, निश्चय, व्रतपरायणता, निर्मत्सरता और बहुमुखी अभिज्ञता आदि गुण इनके जीवनमें ओत-प्रोत थे। इन्होंने द्रोणाचार्यसे धनुर्वेदकी शिक्षा प्राप्त की थी। अपनी गुरुभक्तिसे द्रोणाचार्यको इन्होंने इतना प्रसन्न कर लिया था कि वे अपने पुत्र अश्वत्थामाको भी न सिखाकर गुप्त-से-गुप्त अस्त्रोंका प्रयोग इन्हें सिखाते थे।
शिक्षा समाप्त होनेपर एक दिन गुरुने सबकी परीक्षा लेनी चाही। पेड़पर एक नकली पक्षीको बैठाकर उसीके सिरको निशाना बनाया गया। युधिष्ठिर आदि सबसे द्रोणाचार्यने पूछा कि तुमको क्या दीख रहा है। सबने कई चीजें बतलायीं। आखिर अर्जुनने कहा कि ‘मुझको तो केवल पक्षीका सिर दीख रहा है।’ द्रोणने आनन्दमें भरकर कहा—‘बस, तुम बाण चलाओ। लक्ष्यका ध्यान इसी प्रकार करना चाहिये।’
एक बार द्रोणाचार्य अपने शिष्योंके साथ गंगाजी नहाने गये। जलमें उतरते ही एक मगरने उनकी जाँघ पकड़ ली। आचार्यने समर्थ होते हुए भी शिष्योंकी परीक्षाके लिये पुकारकर कहा—‘इस मगरको मारकर कोई मेरी रक्षा करो।’ द्रोणाचार्यकी बात पूरी होनेके पहले ही अर्जुनने पाँच बाण मारकर जलमें डूबे हुए मगरका काम तमाम कर दिया।
आचार्यकी प्रसन्नताके लिये ही उनके आज्ञानुसार अर्जुनने द्रुपदको जीतकर बंदीके रूपमें उनके सामने लाकर खड़ा कर दिया था।
स्वयंवरमें द्रौपदीको अर्जुनने जीता था, परंतु माता कुन्तीके कथनानुसार पाँचों भाइयोंसे उनका विवाह हुआ। द्रौपदीको पूर्वजन्मका वरदान था, इसीसे ऐसा हुआ। द्रौपदीके सम्बन्धमें पाँचों भाइयोंने यह नियम बना रखा था कि जिस समय एक भाई उनके पास रहे उस समय चारों भाइयोंमेंसे कोई भी उस कमरेमें न जाय और यदि कोई जाय तो उसे बारह वर्षका निर्वासन हो। एक बार द्रौपदीके महलमें महाराज युधिष्ठिर थे। उस समय एक दिन ब्राह्मणकी गायोंको चोरोंसे छुड़ानेके लिये अर्जुनको अस्त्र लेनेको अंदर जाना पड़ा और युधिष्ठिरके समझानेपर भी अर्जुनने नियमानुसार बारह वर्षका निर्वासन स्वीकार किया।
अर्जुन तीर्थोंमें घूमते रहे। इसी बीच नागकन्या उलूपी उन्हें मिली और मणिपुरमें राजकुमारी चित्रांगदासे उनका विवाह हुआ। एक बार अर्जुन ऐसे स्थानमें गये जहाँ पाँच तीर्थ थे, पर उनमें पाँच बड़े भारी ग्राह रहनेके कारण कोई वहाँ नहाता नहीं था। अर्जुन उन सरोवरोंमें नहाये और शापसे ग्राह बनी हुई पाँच अप्सराओंको शाप-मुक्त किया।
भगवान् श्रीकृष्णके साथ इनका बड़ा प्रेम था। वे इनके साथ घूमते और जल-विहार किया करते थे। अग्निको तृप्त करनेके लिये इन्होंने खाण्डव-वनका दाह किया। वहीं अग्निके द्वारा इन्हें दिव्य रथ और गाण्डीव धनुषकी प्राप्ति हुई। वहीं इन्द्रने आकर इनसे वरदान माँगनेको कहा। अर्जुनने दिव्य अस्त्र माँगे और परम प्रेमी भगवान्ने इन्द्रसे यह वर माँगा कि ‘अर्जुनके साथ मेरा प्रेम सदा बना रहे।’
वनमें महादेवजीको प्रसन्न करके उनसे अर्जुनने पाशुपतास्त्र प्राप्त किया। फिर इन्द्रके द्वारा बुलाये जानेपर ये स्वर्गमें गये। वहाँ इन्द्रने अपने आधे आसनपर बैठाकर इनका बड़ा सम्मान किया। वहीं इन्होंने गन्धर्वोंके द्वारा गान और नृत्यकी शिक्षा प्राप्त की।
स्वर्गमें उर्वशीने एकान्तमें अर्जुनके पास जाकर उनसे कामभिक्षाकी प्रार्थना की। अर्जुनने स्पष्ट कह दिया कि ‘मैं दिक्पालोंको साक्षी करके कहता हूँ कि जैसे कुन्ती, माद्री और देवी इन्द्राणी मेरी पूजनीया माताएँ हैं, वैसे ही आप भी हैं। मैं तो आपका पुत्र हूँ।’ इसपर उर्वशीने कुपित होकर इन्हें एक सालतक नपुंसक होनेका शाप दे दिया। वही शाप अर्जुनके लिये वर हो गया और उसीके प्रभावसे वे सालभरतक कौरवोंसे छिपकर विराट-नगरमें बृहन्नलाके नामसे राजकुमारी उत्तराके नृत्य-गीत-शिक्षक बनकर विराटके महलोंमें रह सके।
निवात-कवचोंको मारकर अर्जुन स्वर्गसे लौटे और अपनी चिन्तामें व्याकुल धर्मराज, भीम आदि भाइयोंसे मिले। इन्द्रके सारथि मातलिके लौट जानेपर स्वर्गसे लाये हुए दिव्य रत्नाभूषणोंको अर्जुनने द्रौपदीको दिया।
अर्जुनने समस्त लोकपालोंको प्रसन्न करके उन सबसे नाना प्रकारके शस्त्रास्त्र प्राप्त किये थे।
वनमें पाण्डवोंको अपना वैभव दिखलाकर उन्हें ईर्ष्यासे जलानेके लिये दुर्योधन रानियोंको साथ लेकर वनमें गये। वहाँ गन्धर्वोंने दुर्योधनको परास्त करके कैद कर लिया। कर्ण इत्यादि सब भाग गये। बचे हुए मन्त्रियोंने युधिष्ठिरके पास जाकर सबको छुड़ानेकी प्रार्थना की। दुर्योधनादिके कैद होनेकी बात सुनकर भीम बड़े प्रसन्न हुए। परंतु धर्मराजने कहा कि ‘भाई! आपसमें हम सौ और पाँच हैं, पर दूसरोंके लिये हम एक सौ पाँच हैं। फिर कौरवकुलकी स्त्रियोंका अपमान तो हम किसी तरह नहीं सह सकते। तुम चारों भाई जाओ और सबको छुड़ा लाओ।’ आज्ञा पाकर अर्जुन गये। गन्धर्वोंसे घोर युद्ध किया। अन्तमें चित्रसेनने अर्जुनको अपनी मित्रताका स्मरण दिलाकर उनसे प्रेम कर लिया और दुर्योधन आदि सबको छोड़ दिया।
अज्ञातवासके समय विराट-नगरमें अर्जुन हिंजड़ेके रूपमें रहे और राजकुमारी उत्तराको नृत्य-गीतकी शिक्षा देने लगे। अन्तमें कौरवोंके आक्रमण करनेपर अर्जुनने बृहन्नलाके रूपमें ही उनको जीता और वीरोंके वस्त्राभूषण लाकर उत्तराको दिये। तदनन्तर महाभारत-युद्धकी तैयारी हुई और सब लोग युद्ध करनेके लिये कुरुक्षेत्रके मैदानमें इकट्ठे हुए। वहाँ भगवान्की आज्ञासे भगवती परमशक्तिरूपिणी दुर्गाजीको प्रसन्न करके अर्जुनने उनसे विजयका वरदान प्राप्त किया। ठीक युद्धकी तैयारीके समय गुरुजनों, स्वजनों और सम्बन्धियोंको देखकर अर्जुनको सात्त्विक मोह हो गया और भगवान्ने उन्हें महान् अधिकारी समझकर गीताका उपदेश दिया और उसमें अपने सर्वगुह्यतम पुरुषोत्तमयोगका रहस्य बतलाया तथा सब धर्मोंका आश्रय छोड़कर अपनी शरणमें आनेके लिये आज्ञा दी। अर्जुनका मोह नष्ट हो गया। उन्होंने आज्ञा स्वीकार की और युद्ध आरम्भ हुआ। युद्धमें भगवान्ने अर्जुनके रथके घोड़े ही नहीं हाँके, बल्कि एक प्रकारसे समस्त युद्धका संचालन किया और हर तरहसे पाण्डवोंकी, खास करके अर्जुनकी रक्षा की।
जिस दिन अर्जुनने सूर्यास्तसे पहले-पहले जयद्रथका वध करनेकी प्रतिज्ञा की, उस रातको भगवान् सोये नहीं और चिन्ता करते-करते उन्होंने अपने सारथि दारुकसे यहाँतक कह डाला कि ‘मैं अर्जुनके बिना एक मुहूर्त भी नहीं जी सकता। कल लोग देखेंगे कि मैं सब कौरवोंका विनाश कर दूँगा।’ इसीसे पता चलता है कि अर्जुनका भगवान्में कितना प्रेम था और उस प्रेम-लीलामें भगवान् कहाँतक क्या-क्या करनेको तुल जाते थे।
दूसरे दिनके भयंकर युद्धमें भगवान्ने बड़े ही कौशलसे काम किया। थके हुए घोड़ोंको युद्धक्षेत्रमें ही भगवान्ने धोया और उनके घावोंको साफ किया और अन्तमें अपनी मायासे सूर्यास्तका अभिनय दिखलाकर अर्जुनकी प्रतिज्ञा पूरी करवायी और अर्जुनसे कहकर जयद्रथके सिरको बाणोंके द्वारा ऊपर-ही-ऊपर चलाकर जयद्रथके पिताकी गोदमें गिरवाया और इस तरह एक ही साथ उसका भी संहार करवा दिया।
एक बार कर्णने एक बड़ा तीक्ष्ण बाण चलाया, उसकी नोकपर भयानक सर्प बैठा हुआ था। बाण छूटनेकी देर थी कि भगवान्ने घोड़ोंके घुटने टिकाकर रथके पहियोंको धरतीमें धँसा दिया। रथ नीचा हो गया और बाण निशानेपर न लगकर अर्जुनके मुकुटको गिराकर पार हो गया। इस तरह भगवान्ने अर्जुनकी रक्षा की।
महाभारत-युद्धके समाप्त होनेपर पाण्डवोंके अश्वमेधयज्ञमें भगवान्ने अर्जुनकी बड़ी सहायता की और उसके बाद उन्होंने अनुगीताका उपदेश दिया।
महाभारत-युद्धके पश्चात् छत्तीस वर्षतक पाण्डवोंके राज्य करनेपर भगवान्ने परमधामको प्रयाण किया। अर्जुन विलाप करते हुए धर्मराजके पास आये। तदनन्तर पाण्डवोंने भी हिमालयमें जाकर महाप्रस्थान किया।