गीताके विभिन्न अर्थोंकी सार्थकता
एक बार देवता, मनुष्य और असुर पितामह प्रजापति ब्रह्माजीके पास शिष्य-भावसे शिक्षा प्राप्त करनेको गये और नियमपूर्वक ब्रह्मचर्यका पालन करने लगे। ब्रह्मचर्यव्रत पूरा होनेपर सबसे पहले देवताओंने जाकर प्रजापतिसे कहा—‘भगवन्! हमें उपदेश कीजिये।’ प्रजापतिने उत्तर एक ही अक्षर कह दिया ‘द’। फिर उनसे पूछा कि ‘क्यों, तुमने मेरे उपदेश किये हुए अक्षरका अर्थ समझा कि नहीं?’ उन्होंने कहा—‘भगवन्! हम समझ गये। (हम देवताओंके लोकोंमें भोगोंकी भरमार है। भोग ही देवलोकका प्रधान सुख माना गया है। कभी वृद्ध न होकर हम देवगण सदा इन्द्रियोंके भोगोंमें ही लगे रहते हैं। हमारे विलासमय जीवनपर ध्यान देकर हमें सन्मार्ग-प्रवृत्त करनेके लिये) आपने कहा है—तुमलोग इन्द्रियोंका दमन करो।’ प्रजापतिने कहा—‘तुमने ठीक समझा। तुमसे मैंने यही कहा था।’
फिर मनुष्योंने प्रजापतिके पास जाकर कहा—‘भगवन्! हमें उपदेश दीजिये।’ प्रजापतिने उनको भी वही ‘द’ अक्षर सुना दिया। तदनन्तर पूछा कि ‘तुमलोग मेरे उपदेशको समझ गये न?’ संग्रहप्रिय मनुष्योंने कहा—‘भगवन्! हम समझ गये। (हमलोग कर्मयोनि होनेके कारण लोभवश नित्य-निरन्तर कर्म करने और अर्थसंग्रह करनेमें ही लगे रहते हैं। हमारी स्थितिपर सम्यक् विचार करके हमलोगोंके कल्याणके लिये) आपने हम लोभियोंको यही उपदेश दिया है कि तुम दान करो।’ यह सुनकर प्रजापति प्रसन्न होकर बोले—‘हाँ, मेरे कहनेका यही भाव था, तुमलोग ठीक समझे।’
इसके पश्चात् असुरोंने प्रजापतिके पास जाकर प्रार्थना की—‘भगवन्! हमें उपदेश दीजिये।’ प्रजापतिने उनसे भी कह दिया ‘द’। फिर पूछा कि ‘मेरे उपदेशका अर्थ समझे या नहीं?’ असुरोंने कहा—‘भगवन्! हम समझ गये। (हमलोग स्वभावसे ही अत्यन्त क्रूर और हिंसापरायण हैं। क्रोध और मार-काट हमारा नित्यका काम है। हमें इस पापसे छुड़ाकर सन्मार्गपर लानेके लिये) आपने कहा है—‘तुम प्राणिमात्रपर दया करो।’ प्रजापतिने कहा—‘तुमने ठीक समझा। मैंने तुमलोगोंको यही उपदेश दिया है।’
‘द’ अक्षर एक ही है, परंतु अधिकारिभेदसे ब्रह्माजीने इसका उपदेश विभिन्न तीन अर्थोंको मनमें रखकर किया और ऐसा करना ही सर्वथा उपयुक्त था। यही तो भगवद्वाणीकी महिमा है। वह एक ही प्रकारकी होनेपर भी सर्वतोमुखी और विश्वके समस्त विभिन्न अधिकारियोंको उनके अपने-अपने अधिकारके अनुसार विभिन्न मार्ग दिखलाती है। सबका लक्ष्य एक ही है—परमधाममें पहुँचा देना अथवा भगवत्-प्राप्ति करवा देना।
श्रीमद्भगवद्गीता साक्षात् भगवान्के श्रीमुखकी वाणी है। इसीलिये वह सर्वशास्त्रमयी है और किसी भी दिशा और दशामें पड़े हुए प्राणीको ठीक उपयुक्त मार्गपर लाकर अच्छी स्थितिमें परिवर्तितकर कल्याणकी ओर लगा देती है। भिन्न-भिन्न रुचि और अधिकार रखनेवाले मनुष्योंको उनकी रुचि और अधिकारके अनुसार ही कर्तव्य-कर्ममें प्रवृत्त कर भगवान्की ओर गति करा देती है। यही कारण है कि शुद्ध अन्त:करणवाले महापुरुषोंने भी गीताको भिन्न-भिन्न रूपोंमें देखा है और उसके अर्थको भी विभिन्न रूपोंमें समझा है। यह भगवान्की वाणीका महत्त्व और विशेषत्व है कि वह ‘जिन्ह कें रही भावना जैसी। प्रभु मूरति तिन्ह देखी तैसी॥’ के अनुसार विभिन्न अर्थोंमें आत्मप्रकाश कर सबको कल्याणके दर्शन करा देती है। अतएव गीताके अर्थोंमें विभिन्नता देखकर किसीको आश्चर्य नहीं करना चाहिये।
गीताके अनुभवी प्रात:स्मरणीय आचार्यों और महात्माओंने भी इसी दृष्टिसे लोकोपकारार्थ गीतापर भाष्य और टीकाओंकी रचना की है। उनमें परस्पर विरोध देखकर एक-दूसरेको नीचा समझनेकी या किसीकी निन्दा करनेकी जरा भी रुचि और प्रवृत्ति नहीं होनी चाहिये। उन महापुरुषोंने जो कुछ भी कहा है, अपने-अपने अनुभवके अनुसार हमलोगोंके कल्याणार्थ सर्वथा सत्य और समीचीन ही कहा है। जिसकी जिसमें रुचि और श्रद्धा हो, उसको आदर और विश्वासके साथ उसीका अनुसरण करना चाहिये। प्राप्तव्य सत्य वस्तु या भगवान् एक ही हैं, मार्ग भिन्न-भिन्न हैं और उनका भिन्न-भिन्न होना सर्वथा सार्थक और आवश्यक है। पुष्पदन्ताचार्यने ठीक ही कहा है—
रुचीनां वैचित्र्यादृजुकुटिलनानापथजुषां।
नृणामेको गम्यस्त्वमसि पयसामर्णव इव॥
‘जिस प्रकार सभी नदियोंका जल अन्तत: समुद्रमें ही जाता है; उसी प्रकार रुचिकी विभिन्नताके कारण सीधे और टेढ़े—नाना मार्गोंपर चलनेवाले सभी मनुष्योंके ध्येय गन्तव्य-स्थान आप ही हैं।’
गीतापर विभिन्न भाषाओंमें सैकड़ों भाष्य, टीका, अनुवाद, निबन्ध और प्रवचन लिखे जा चुके और लिखे जा रहे हैं। इनमें जो दैवी सम्पत्तियुक्त भगवत्परायण शुद्धान्त:करण तथा विवेक-वैराग्य-सम्पन्न साधकों और भगवत्प्राप्त महापुरुषोंद्वारा लिखे गये हैं, वे चाहे किसी भी भाषामें हों, सभी परस्पर मतभेद रखते हुए भी भगवद्वाणीकी दृष्टिसे सर्वथा यथार्थ और सम्मान्य तथा मनन करनेयोग्य हैं। इन महानुभाव भाष्य और टीका लेखकोंका ही अनुग्रह है, जिससे आज लोग गीताको किसी-न-किसी अंशमें समझनेमें समर्थ हो रहे हैं। इनमें सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण भाष्य और टीकाएँ संस्कृत भाषामें हैं। भगवान् शंकराचार्यसे पूर्ववर्ती आचार्यों और विद्वानोंके भाष्य इस समय उपलब्ध नहीं हैं, परंतु मालूम होता है कि गीतापर आचार्य शंकरसे पूर्व भी बहुत कुछ लिखा गया था। इस समय प्राप्त भाष्यों और टीकाओंमें कुछ तो खास आचार्योंके स्वयं लिखे हुए हैं और कुछ उनके अनुयायी विद्वानोंके। यों तो अनेकों सम्मान्य मतवाद हैं, परंतु उनमें जिनके अनुसार गीतापर भाष्य और टीकाएँ लिखी गयी हैं, वे प्रधानतया निम्नलिखित छ: ही हैं।
१-श्रीशंकराचार्यका अद्वैतवाद। २-श्रीरामानुजाचार्यका विशिष्टाद्वैतवाद। ३-श्रीमध्वाचार्यका द्वैतवाद। ४-श्रीनिम्बार्काचार्यका द्वैताद्वैतवाद। ५-श्रीवल्लभाचार्यका शुद्धाद्वैतवाद और ६-श्रीचैतन्य-महाप्रभुका अचिन्त्य भेदाभेदवाद।
उपर्युक्त वादोंका संक्षिप्त विवरण इस प्रकार है—
१—अद्वैतवाद
सिद्धान्त—इसमें सम्पूर्ण प्रपंचको दो प्रधान भागोंमें विभक्त किया गया है—द्रष्टा और दृश्य। एक वह नित्य और चेतन तत्त्व जो सम्पूर्ण प्रतीतियोंका अनुभव करता है और दूसरा वह जो अनुभवका विषय है। इनमें समस्त प्रतीतियोंके द्रष्टाका नाम ‘आत्मा’ है और उसका जो कुछ विषय है वह सब ‘अनात्मा’ है। यह आत्म-तत्त्व सत् , नित्य, निरंजन, निश्चल, निर्गुण, निर्विकार, निराकार, असंग, कूटस्थ, एक और सनातन है। बुद्धिसे लेकर स्थूल भूतपर्यन्त जितना भी प्रपंच है उसका वस्तुत: आत्मासे कुछ भी सम्बन्ध नहीं है। वास्तवमें वह असत् है, अविद्याके कारण ही जीव असत् देह और इन्द्रियादिके साथ अपना तादात्म्य स्वीकार करके अपनेको देव-मनुष्य, ब्राह्मण-शूद्र, मूर्ख-विद्वान्, सुखी-दु:खी और कर्ता-भोक्ता आदि मानता है। बुद्धिके साथ जो आत्माका यह तादात्म्य है, इसीका नाम अध्यास है। अविद्याजनित इस अध्यासके कारण ही सम्पूर्ण प्रपंचमें सत्यत्वकी प्रतीति हो रही है। मायाके कारण ही इस दृश्यवर्गकी सत्ता और विभिन्नता है, वस्तुत: तो एक, अखण्ड, शुद्ध-बुद्ध, नित्यनिरंजन, विज्ञानानन्दघन, चिन्मात्र आत्मतत्त्व ही है। इसीको ‘अध्यासवाद,’ ‘विवर्तवाद’ या ‘मायावाद’ भी कहते हैं।
मुक्ति—सम्पूर्ण पृथक्-पृथक् प्रतीतियोंमें एक अखण्ड, नित्य शुद्ध-बुद्ध, सच्चिदानन्दघन आत्मतत्त्वका अनुभव करना ही ज्ञान है और सबके अधिष्ठान तथा सबको सत्ता देनेवाले इस एक अखण्ड आत्मतत्त्वपर दृष्टि न रखकर भेदमें सत्यत्व-बुद्धि करना ही अज्ञान है। जैसे भाँति-भाँतिके मिट्टीके बर्तन वस्तुत: केवल मिट्टी ही हैं, सोनेके विविध प्रकारके गहने सब सोना ही हैं, स्वप्नका विचित्र संसार सब स्वप्नद्रष्टा ही है और जलमें दिखायी पड़नेवाले भँवर और तरंगें सब जल ही हैं; वैसे ही विभिन्न रूपोंमें दीखनेवाला यह जगत् केवल शुद्ध, बुद्ध एकमात्र ब्रह्म ही है और वही अपना आत्मा है। इस प्रकारका यथार्थ बोध ही ज्ञान है। इस बोधके होते ही जगत्का अत्यन्ताभाव हो जाता है और सम्यक् बोधके कारण अविद्याके अध्यासका सर्वथा अभाव होनेसे जीव जीव-भावसे मुक्त होकर दूसरोंकी दृष्टिमें शरीरके बने रहनेपर भी जीवन्मुक्त हो जाता है। यही ज्ञान है। जबतक जीव इस ज्ञानको प्राप्त नहीं होता तबतक उसकी अविद्याकी गाँठें नहीं खुलतीं और वह आवागमनमय मिथ्या प्रपंचजालसे मुक्त नहीं होता।
साधन—श्रवण, मनन, निदिध्यासन—इस ज्ञानके साक्षात् साधन हैं। आत्मतत्त्वको जाननेकी दृढ़ जिज्ञासा उत्पन्न होनेपर ही ये साधन किये जा सकते हैं और ऐसी जिज्ञासा अन्त:करणकी सम्यक् शुद्धि हुए बिना उदय नहीं होती। अन्त:करणकी शुद्धिके लिये वर्णाश्रमानुकूल कर्मोंका निष्कामभावसे आचरण करना और भगवान्की भक्ति करना आवश्यक है। ऐसा करनेपर मनुष्य विवेक, वैराग्य, शमादि षट्सम्पत्ति और मुमुक्षुत्व प्राप्त करता है। तब उसमें जिज्ञासाकी उत्पत्ति होती है। सच्चे जिज्ञासु और बोधसम्पन्न ज्ञानी दोनोंके लिये ही स्वरूपत: ‘सर्वकर्मसंन्यास’ की आवश्यकता है। चित्तशुद्धिके अनन्तर कर्मसंन्यासपूर्वक श्रवण, मनन और निदिध्यासन करनेसे ही आत्मतत्त्वका सम्यक् बोध और जीवन्मुक्तिकी प्राप्ति हो सकती है।
२—विशिष्टाद्वैत
सिद्धान्त—ब्रह्म एक है और उसमें तीन वस्तुएँ हैं। अचित् अर्थात् जड प्रकृति, चित् अर्थात् चेतन आत्मा और ईश्वर। स्थूल, सूक्ष्म, चेतनाचेतनविशिष्ट ब्रह्म ही ईश्वर हैं। ये सगुण और सविशेष हैं। ब्रह्मकी शक्ति माया है। सर्वेश्वरत्व, सर्वशेषित्व, सर्वकर्माराध्यत्व, सर्वफलप्रदत्व, सर्वाधारत्व, सर्वकार्योत्पादकत्व, चिदचिच्छरीरत्व और समस्त द्रव्यशरीरत्व आदि इनके लक्षण हैं। ईश्वर सृष्टिकर्ता, नियन्ता और सर्वान्तर्यामी हैं और अशेष कल्याणमय गुणोंके धाम हैं। अपार कारुण्य, सौन्दर्य, सौशील्य, वात्सल्य, औदार्य और ऐश्वर्यके महान् समुद्र हैं। पर, व्यूह, विभव, अन्तर्यामी और अर्चावतारके भेदसे वे पाँच प्रकारके हैं। शंख-चक्र-गदा-पद्मधारी चतुर्भुज हैं। श्री, भू और लीलासमन्वित हैं।
जगत् और जीव ब्रह्मके शरीर हैं। जगत् जड है। ब्रह्म ही जगत्के उपादान और निमित्त कारण हैं और वे ही जगत्रूपमें परिणत हुए हैं। फिर भी वे विकाररहित हैं। जीव चेतन और अणु है। ब्रह्म और जीवमें सजातीय-विजातीय भेद नहीं है, स्वगत भेद है। ब्रह्म पूर्ण है, जीव अपूर्ण है। ब्रह्म ईश्वर हैं, जीव दास है। ईश्वर कारण हैं, जीव कार्य है। ईश्वर और जीव दोनों स्वयंप्रकाश हैं, ज्ञानाश्रय और आत्मस्वरूप हैं। जीव नित्य है और उसका स्वरूप भी नित्य है। प्रत्येक शरीरमें भिन्न-भिन्न जीव है। जीव स्वभावत: दु:खरहित है। उपाधिवश संसारके भोगोंको प्राप्त होता है। जीवके कई भेद हैं। इसीको ‘परिणामवाद’ भी कहते हैं।
मुक्ति—भगवान्के दासत्वकी प्राप्ति ही मुक्ति है। परम धाम वैकुण्ठमें श्री, भू, लीला महादेवियोंके साथ नारायणकी सेवाको प्राप्त कर लेना ही परम पुरुषार्थ है। पांचभौतिक देहसे छूटकर अप्राकृत शरीरसे नारायणका सान्निध्य प्राप्त करना ही मुक्ति है। भगवान्के साथ जीवका अभिन्नत्व कभी नहीं हो सकता। क्योंकि जीव स्वरूपत: नित्य है; और नित्य दास तथा नित्य अणु है। वह कभी विभु नहीं हो सकता। मुक्तजीव वैकुण्ठ-धाममें अशेष-कल्याण-गुणनिधि भगवान्के नित्य दासत्वको प्राप्त होकर दिव्य आनन्दका अनुभव करते हैं।
साधन—मुक्तिका साधन ज्ञान नहीं, किंतु भक्ति है। ब्रह्मात्मैक्य-ज्ञानसे मुक्ति नहीं हो सकती। भक्तिके द्वारा प्रसन्न होकर जब भगवान् मुक्ति प्रदान करते हैं तभी मुक्ति होती है। भक्तिका सर्वोत्तम स्वरूप प्रपत्ति या आत्मसमर्पण है। वैकुण्ठनाथ, विभु, श्रीमन्नारायणके चरणोंमें आत्मसमर्पण कर देनेपर ही जीवको परम शान्तिकी प्राप्ति होती है।
३—द्वैतवाद
सिद्धान्त—भगवान् श्रीविष्णु ही सर्वोच्च तत्त्व हैं। वे सगुण और सविशेष हैं। वे ही स्रष्टा, पालक और संहारक हैं। जीव और ईश्वर दोनों ही सच्चिदानन्दात्मक हैं। ईश्वर सर्वज्ञ हैं और अनन्त दिव्य कल्याणगुणोंके आश्रय हैं। वे देश और कालसे परिच्छिन्न नहीं हैं; असीम अनन्त हैं और स्वतन्त्र हैं। जीव अणु है, भगवान्का दास है और अनादिकालसे मायामोहित, बद्ध तथा सर्वथा अस्वतन्त्र है। वह अज्ञत्वादि नाना धर्मोंका आश्रय है। जगत् सत्य है और भेद वास्तविक है। इस भेदके भी पाँच अवान्तर भेद हैं। १-जीव-ईश्वरका भेद, २-जीव-जडका भेद, ३-ईश्वर-जडका भेद, ४-जीवोंका परस्पर भेद और ५-जडोंका परस्पर भेद। ये सभी भेद वास्तविक हैं, इनमें कोई औपचारिक नहीं है। सब जीव ईश्वरके अधीन हैं। जीवोंमें भी तारतम्य है। जगत् सत्, जड और अस्वतन्त्र है, भगवान् जगत्के नियामक हैं। इसको ‘स्वतन्त्रास्वतन्त्रवाद’ भी कहते हैं।
मुक्ति—जीवनमुक्ति या निर्वाणमुक्ति मुक्ति नहीं है। स्थूल, सूक्ष्म सब वस्तुओंका यथार्थ ज्ञान होनेपर अर्थात् ईश्वरसे जीव पूर्णरूपसे पृथक् है, इसे यथार्थरूपसे जानकर ईश्वरके गुणोंकी उपलब्धि, उनके अनन्त असीम सामर्थ्य, शक्ति और गुणोंका बोध होनेपर ही भगवान्के दिव्य लोक और स्वरूपकी प्राप्ति होती है। यही मुक्ति है, मुक्त जीव भी ईश्वरका नित्य सेवक ही रहता है।
साधन—भक्ति ही मुक्तिका प्रधान साधन है। वेदाध्ययन, इन्द्रियसंयम, विलासिताका त्याग, आशा और भयका अभाव, भगवान्के प्रति आत्मसमर्पण, सत्य-हित-प्रियवचन बोलना और स्वाध्याय करना, दान देना, विपत्तिमें पड़े हुए जीवकी रक्षा करना, शरणागतको बचाना, दया, भगवान्का दासत्व प्राप्त करनेकी इच्छा और हरि, गुरु तथा शास्त्रमें श्रद्धा, इन सबको भगवान्के समर्पण करके करते रहना ही भक्ति है।
४—द्वैताद्वैतवाद
सिद्धान्त—ब्रह्म सर्वशक्तिमान् हैं, निर्विकार और निर्गुण हैं। अनन्तकोटि ब्रह्माण्डोंका सृजन, पालन और संहार ब्रह्मसे ही होता है। ब्रह्म ही इस ब्रह्माण्डके निमित्त और उपादान कारण हैं। ब्रह्म-सत्ताकी चार अवस्थाएँ हैं—१-मूल अवस्था अव्यक्त, निर्विकार, देश-कालादिसे अनवच्छिन्न और अचिन्त्यानन्त स्वगत-सौख्यसिन्धुमय है। २-दूसरी अवस्था जगदीश्वरकी है। इसमें ईश्वरत्वके साथ सम्पूर्ण विश्वका भान है। ३-तीसरी अवस्था रूप, रस, गन्ध, शब्द और स्पर्शकी यथाक्रम व्यष्टिगत अनुभूतिकी है। इसीका नाम जीव है। जीव दो प्रकारके होते हैं—एक जो इन व्यष्टिगत रूपादिको ब्रह्मसे अपृथक् अनुभव करते हैं और जो अविद्यासे मुक्त हैं। दूसरे जो इन व्यष्टिगत रूपादिका अनुभव करते हैं, परंतु इनके आश्रयस्वरूप विभु आत्माको नहीं जानते इस कारण जो बद्ध हैं। ४-चौथी अवस्था वह है जिसमें ब्रह्म विश्वके रूपमें व्यक्त होता है। ब्रह्मको छोड़कर इस विश्वकी कोई सत्ता नहीं है। ब्रह्म दृश्य-अदृश्य, अणु-विभु, सगुण, निर्गुण सभी कुछ हैं, परंतु उनकी पूर्ण आनन्दसुधा-सिन्धुमयी, सनातनस्वरूप सत्ता सदा-सर्वदा और सर्वत्र एकरस है।
जीव ब्रह्मका अंश है, ब्रह्म अंशी है। ब्रह्म ही जगत्-रूपमें परिणत हुए हैं। जगत्-रूपमें परिणत होने तथा जगत्के ब्रह्ममें लीन होनेपर भी उनमें कोई विकार नहीं होता। जीव अणु और अल्पज्ञ है। मुक्त जीव भी अणु ही है। मुक्त और बद्धमें यही भेद है कि मुक्त जीव ब्रह्मके साथ अपने और जगत्के अभिन्नत्वका अनुभव करता है और बद्ध जीव ऐसा नहीं करता।
मुक्ति—भगवान् वासुदेव ही वे ब्रह्म हैं और उनकी प्रसन्नता तथा उनके दर्शन प्राप्त करके परमानन्दको प्राप्त हो जाना ही मुक्ति है।
साधन—भक्ति ही मुक्तिकी प्राप्तिका प्रधान साधन है। भगवान्के नाम-गुणोंका चिन्तन, उनके स्वरूपका ध्यान और भगवान्की युगलमूर्तिकी उपासना करना भक्ति है।
५—शुद्धाद्वैतवाद
सिद्धान्त—ब्रह्म सर्वशक्तिमान्, सर्वज्ञ और सच्चिदानन्दस्वरूप हैं। वे परम शुद्ध हैं। उनमें माया आदि नहीं है। वे निर्गुण और प्राकृतिक गुणोंसे अतीत हैं। उनकी शक्ति अनन्त और अचिन्त्य है। वे सब कुछ बन सकते हैं। अतएव उनमें विरुद्ध धर्मों और विरुद्ध वाक्योंका युगपत् समावेश है और गोलोकाधिपति श्रीकृष्ण ही वे ब्रह्म हैं। वे ही जीवके सेव्य हैं। जीव ब्रह्मका अंश और अणु है, वह भी शुद्ध है। चैतन्य जीवका गुण है। जगत्का आविर्भाव भगवान्की इच्छासे हुआ है और उनकी इच्छासे इसका तिरोधान होता है। वे लीलासे ही जगत्के रूपमें परिणत हुए हैं। वे ही जगत्के निमित्त और उपादान कारण हैं। जगत् मायिक नहीं है, परंतु भगवान्का अविकृत परिणाम है, भगवान्से अभिन्न है। आविर्भाव और तिरोभाव होनेपर भी जगत् सत्य है। तिरोभावकालमें वह कारणरूपसे और आविर्भावकालमें कार्यरूपसे स्थित रहता है।
मुक्ति—भगवान् श्रीकृष्णकी प्राप्ति ही मुक्ति है। शुद्ध जीव समस्त जगत्को कृष्णमय देखकर श्रीकृष्णके प्रेममें जैसे पत्नी पतिकी सेवा करके आनन्दको प्राप्त होती है, वैसे ही स्वामीरूपमें श्रीकृष्णकी सेवा करके वह परमानन्दरसमें तन्मय रहता है।
साधन—भगवत्कृपासे प्राप्त भक्ति ही मुक्तिका साधन है। भगवान्का अनुग्रह ही पुष्टि है और पुष्टिसे जिस भक्तिका उदय होता है वही पुष्टिभक्ति है। यह पुष्टिभक्ति मर्यादाभक्तिसे अत्यन्त विलक्षण है। इस भक्तिके साथ भगवान्की सर्वात्मभावसे सेवा करना ही भगवत्प्राप्तिका प्रधान साधन है।
६—अचिन्त्यभेदाभेदवाद
सिद्धान्त—ब्रह्म निर्गुण हैं अर्थात् अप्राकृत गुणसम्पन्न हैं। उनकी शक्ति संवित्, संधिनी और ह्लादिनी हैं। वे स्वतन्त्र, सर्वज्ञ, मुक्तिदाता और विज्ञानस्वरूप हैं। जीव अणु और चेतन है। ईश्वरकी विमुखता ही उसके बन्धनका कारण है। ईश्वरके सम्मुख होनेपर उसके बन्धन कट जाते हैं। ईश्वर, जीव, प्रकृति और काल—ये चार पदार्थ नित्य हैं तथा जीव, प्रकृति और काल ईश्वरके अधीन हैं। जीव ईश्वरकी शक्ति है। जीव और ब्रह्म, गुण तथा गुणीभावसे अभिन्न और भिन्न दोनों ही हैं। जगत् ब्रह्मसे उत्पन्न है, वे इसके निमित्त और उपादान कारण हैं। वे ही अपनी अचिन्त्य शक्तिसे जगत्के रूपमें परिणत होते हैं। जगत् सत् है, परंतु अनित्य है।
मुक्ति—भगवान्का सान्निध्य प्राप्त करना ही मुक्ति है, भगवद्धामको प्राप्त हुए जीवका पुनरागमन नहीं होता। न तो भगवान् ही मुक्त जीवको अपने लोकसे गिराना चाहते हैं और न मुक्त पुरुष ही कभी भगवान्को छोड़ना चाहते हैं। वे नित्य उनकी सेवाका परमानन्द प्राप्त करते रहते हैं।
साधन—भक्ति ही प्रधान साधन है। ज्ञान, वैराग्य उसके सहकारी साधन हैं। ज्ञान, वैराग्य और भक्तिके बिना भगवत्प्राप्ति नहीं होती। भक्ति ह्लादिनी और संवित् शक्तिकी सारभूता है। भक्तिकी तीन अवस्थाएँ हैं—साधन, भाव और प्रेम। सामान्य भक्तिका नाम साधन-भक्ति है, यह जीवके हृदयस्थ प्रेमको उद्बुद्ध करती है, इसीसे उसका नाम साधन-भक्ति है। शुद्ध सत्त्वरूप चित्तमें प्रेम-सूर्यका उदय करानेवाली विशेष भक्तिका नाम ‘भाव’ है। भाव प्रेमकी प्रथमावस्था है। जब भाव घनीभूत होता है तब उसे प्रेम कहते हैं। मधुर भक्तिकी पराकाष्ठा ही इस प्रेमका सार है। यह प्रेम ही परम पुरुषार्थ है।
गीताके संस्कृत भाष्य और टीकाओंमें अधिकांश इन्हीं छ: मतोंमेंसे किसी मतका आश्रय लेकर उसीके समर्थनमें रचे गये हैं। ये छहों मत ऐसे महान् पुरुषोंके द्वारा प्रवर्तित हैं कि उनमेंसे किसीको भी भ्रान्त नहीं कहा जा सकता। सभी भगवत्तत्त्वके ज्ञाता महान् पुरुष माने जाते हैं। अतएव इनमें दीखनेवाले मतभेदको भगवद्वाणीका चमत्कार मानकर सभीको शुद्ध हृदयसे उन्हें नमस्कार करना चाहिये और अपने-अपने अधिकारके अनुसार यथारुचि अपने लाभकी बात सभीमेंसे ले लेनी चाहिये।