गीतोक्त कर्मयोग और आधुनिक कर्मवाद
जिस कर्मयोगको भगवान् ने, ‘कर्मसंन्यासात्कर्मयोगो विशिष्यते’ (गीता ५।२) कर्मसंन्याससे श्रेष्ठ बतलाया, जिसके आचरण करनेवालोंके लिये ‘जन्मबन्धविनिर्मुक्ता: पदं गच्छन्त्यनामयम्॥’ (गीता २।५१) जन्म-बन्धनसे छूटकर अनामय (अमृतमय) परम पदकी प्राप्ति बतलायी, वह गीतोक्त कर्मयोग क्या आधुनिक कर्मवाद ही है? आजकल जगत्के विशिष्ट शिक्षित पुरुष जिस कर्मवादके पीछे पागल हैं, जीवनभरमें कभी जिन्हें इन प्रश्नोंपर विचार करनेके लिये फुरसत ही नहीं मिलती, या जो विचार करना आवश्यक ही नहीं समझते कि ‘ईश्वर क्या है, प्रकृति क्या है, जगत्का क्या स्वरूप है, हम कौन हैं, कहाँसे आये हैं?’ ऐसी बातोंकी कल्पना करना जिनके मन समयका दुरुपयोग करना है और जो रात-दिन केवल भौतिक उन्नतिका आदर्श सामने रखकर ही अपनी-अपनी जातिकी, अपने देशकी और संसारकी भौतिक उन्नतिके लिये, पार्थिव भोग-पदार्थोंकी प्राप्ति और सम्भोगके लिये कर्ममें लग रहे हैं। एक मिनटके लिये भी जिनको कर्मसे अवकाश नहीं है, उनका वह कर्म क्या गीतोक्त कर्मयोग है? आजकल कुछ लोग ऐसा ही समझते हैं, या सिद्ध करना चाहते हैं कि गीतामें इसी कर्मयोगकी शिक्षा दी गयी है। इसीलिये वे अपनी या परायी ऐहिक उन्नतिके लिये कामासक्तिपूर्वक अनवरत कर्म-प्रवाहमें बहते हुए मनुष्योंको ‘कर्मयोगी’ की पदवी देते हैं और गीताके श्लोकोंसे इसका समर्थन करना चाहते हैं। अतएव इस विषयपर कुछ विचार करना आवश्यक हो गया है।
आधुनिक कर्मवादका स्वरूप
इस कर्मवादके स्वरूपके सम्बन्धमें नाना मतभेद हैं और इसमें अनेकों प्रकारके परिवर्तन भी हो रहे हैं। इसका उत्तम स्वरूप यह है—
कर्म मनुष्यकी उन्नतिका मूल है, कर्मसे ही मनुष्य अपना, देशका और दीनोंका दु:ख दूर कर सबको सुखी बना सकता है। अतएव किसी भी दूसरेपर कुछ भी भरोसा नहीं करके मनुष्यको निरन्तर कर्ममें ही लगे रहना चाहिये। जगत्का सारा दु:ख केवल कर्मसे ही दूर हो सकता है। अतएव सबको सुख मिले, सबको समानरूपसे भोग-पदार्थोंकी प्राप्ति हो, ऐश्वर्य, बल, विद्या, कला, विज्ञान आदिकी वृद्धि हो, सबकी आवश्यकताएँ पूरी हों। इसके लिये सबको सब प्रकारसे आलस्य छोड़कर दु:ख-कष्टकी परवा न कर सदा उत्साह और उल्लासपूर्वक कर्म करते रहना चाहिये। यही मनुष्यका कर्तव्य या धर्म है।
इस कर्तव्यके पालनमें विविध कर्मोंके नानाविध स्वरूप बन गये हैं। कोई कहता है केवल विज्ञानसे ही सबकी उन्नति हो सकती है। रेल, जहाज, तार, टेलीफोन, बेतारका तार, वायुयान आदि अनेक प्रकारके परम अद्भुत यन्त्र और अन्य आवश्यक चीजें, जिनसे संसारमें सभी क्षेत्रोंमें बहुत कुछ सुभीता हो गया है, विज्ञानका ही फल है; इसके अतिरिक्त रक्षक, संहारक अनेक प्रकारकी चीजें विज्ञानने आविष्कार की हैं, जिनसे हम अपनी रक्षा एवं विपक्षका संहार सहज ही कर सकते हैं और नाना प्रकारसे सुखोपभोग करते हुए जीवन बिता सकते हैं, अतएव विज्ञानकी उन्नतिके कर्ममें लगे रहना चाहिये।
कोई कहता है, विज्ञानने मनुष्यको आलसी, विलासी, हिंसक और पक्षपाती बना दिया है। विज्ञानके फलसे ही यन्त्र बने और यन्त्रोंके कारण ही पूँजीवाद और मजदूरवादकी सृष्टि हुई। कुछ लोगोंके पास धन आ गया और शेष जनताका बहुत बड़ा भाग भूखों मरने लगा। अतएव विज्ञानकी ओरसे मन हटाकर यन्त्र-सभ्यताका नाश कर ग्राम्य-जीवनको सुधरे हुए आदर्शपर प्रतिष्ठित करना चाहिये। इसीमें सबका कल्याण है।
कोई कहता है कि देशकी रक्षाके लिये कानून, शस्त्रास्त्र और सेनाकी बड़ी आवश्यकता है, इसलिये इनकी वृद्धिमें लगना चाहिये और कोई इनसे संसारका अमंगल समझकर अधिकाधिक कानून, शस्त्रास्त्र और सेनाका विरोध करते हैं। कोई साम्राज्यवादी हैं तो कोई प्रजाराज्यवादी। कोई विषमतासे भलाई मानते हैं तो कोई व्यवहारमें पूर्ण समता चाहते हैं।
इस प्रकार नाना रूपोंमें कर्मका आश्रय लेकर आधुनिक जगत् कर्म और कर्मीकी पूजामें लगा है। इन सबके कर्मका स्वरूप कुछ भी हो, परंतु ईश्वर और धर्मकी आवश्यकता इनमेंसे किसीको नहीं है। कहीं अत्यन्त क्षीणरूपमें ईश्वर और धर्मकी बात सुनायी पड़ती है तो वह भी इस ऐहिक उन्नतिके लिये ही; वरं पाश्चात्यशिक्षाप्राप्त लोगोंमें तो अधिकांश प्राय: यही मानते हैं कि ईश्वर या धर्मकी बात करना या सुनना केवल व्यर्थ ही नहीं है, पतनका कारण है। इन पुराने विश्वासोंको—वहमोंको सर्वथा नष्टकर नवीन युगकी नवीन कल्पनाओंपर ही विश्वास करना चाहिये। इसीलिये आज चारों ओर क्रान्ति और अशान्ति है एवं इसी क्रान्ति एवं अशान्तिके कार्योंको ‘कर्मयोग’ और दिन-रात इनमें लगे हुए लोगोंको ‘कर्मयोगी’ कहा जाता है। यह संक्षेपमें वर्तमान कर्मवादका स्वरूप है।
गीतोक्त कर्मयोगसे आधुनिक कर्मवादकी तुलना
अब गीताके कर्मयोगपर कुछ विचार कीजिये—अवश्य ही, गीतामें किसी व्यक्ति, जाति, देश या विश्वके हितके लिये कर्मकरनेका कहीं भी निषेध नहीं किया है, वरं स्वधर्मपालन और सर्वभूतहितमें रत रहनेकी ही आज्ञा दी गयी है; परंतु गीताकी दृष्टिमें कर्मके बाह्य स्वरूपका उतना महत्त्व नहीं है, जितना कर्ताकी बुद्धिका है। कर्म बाहरसे मृदु हो या कठोर, लोकदृष्टिमें अनुकूल हो या प्रतिकूल, प्रेम हो या युद्ध, भोग हो या त्याग, यदि उसमें ज्ञान, भक्ति और समत्व है तो वही कर्मयोग है। श्रीभगवान्ने कहा है—
यत: प्रवृत्तिर्भूतानां येन सर्वमिदं ततम्।
स्वकर्मणा तमभ्यर्च्य सिद्धिं विन्दति मानव:॥
(गीता १८।४६)
‘जिससे समस्त भूतोंकी उत्पत्ति हुई है और जिससे यह समस्त विश्व-ब्रह्माण्ड व्याप्त है अर्थात् जो स्वयं विश्वरूपमें प्रकाशित है, उस (परमेश्वर)-की अपने कर्मद्वारा पूजा करके मनुष्य परम सिद्धिको प्राप्त होता है।’
इसमें ज्ञान और भक्तिसे युक्त कर्मकी व्याख्या है। यह जान लेना होगा कि श्रीभगवान् ही जगत् भरमें व्याप्त हैं और मनुष्यको उन्हींकी पूजा करनी है, समस्त कर्म उन्हींकी पूजाके लिये हैं। कर्म कौन-से? केवल जप, तप, पूजा, पाठ ही नहीं, जिसका जो स्वकर्म हो, जिसके लिये जो कर्तव्य हो, उन्हींसे भगवान्की पूजा होगी। अर्जुन क्षत्रियके लिये धर्मयुद्ध ही कर्तव्य है, वहाँ रणांगणमें आततायी प्रतिपक्षियोंका वध करके उनके रक्तसे ही ‘काल’ रूपसे प्रसिद्ध भगवान्की पूजा करनी होगी। तुलाधार वैश्य क्रय-विक्रयरूप व्यापारसे भगवान्की पूजा करता है। धर्मव्याध सेवाद्वारा भगवान्को पूजता है, याज्ञवल्क्य और शंकराचार्य संन्यास और ज्ञानद्वारा उनकी पूजा करते हैं। जनकने राज्य-पालन करके उन्हें पूजा। ब्रह्मचारी गुरुसेवा और विद्याध्ययनद्वारा भगवान्की पूजा करें। यह आवश्यक नहीं कि पूजाकी सामग्री एक-सी हो, आवश्यकता है पुजारीके हृदयके भावकी। यदि वह भगवान्के स्वरूपको समझकर भगवान्की पूजाके लिये—किसी फलके लिये नहीं—किसी कर्ममें आसक्त होकर नहीं, केवल यज्ञार्थ—भगवदर्थ—किसी भी कर्तव्यकर्मको करता है तो वही कर्मयोग है। यह याद रखना चाहिये कि ऐसे कर्म करनेवाले कर्मयोगीसे वास्तविक लोकहितसे विपरीत कर्म या पाप-कर्म कदापि नहीं बन सकते। अमृतसे कोई मरे तो गीतोक्त कर्मयोगीसे किसीका अहित हो।
इसी कर्मयोगकी व्याख्या भगवान्ने दूसरे अध्यायके निम्नलिखित श्लोकोंमें की है—
कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।
मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते संगोऽस्त्वकर्मणि॥ ४७॥
योगस्थ: कुरु कर्माणि संगं त्यक्त्वा धनंजय।
सिद्ध्यसिद्ध्यो: समो भूत्वा समत्वं योग उच्यते॥ ४८॥
‘अर्जुन! तेरा कर्म करनेमें अधिकार है, फलमें कदापि नहीं, कर्मफलके हेतुसे कर्म न कर, (परंतु) कर्म न करनेमें भी मन न लगा। आसक्तिको त्यागकर सिद्धि-असिद्धिमें सम होकर, योगमें स्थित होकर (भगवान्के साथ चित्तको जोड़े हुए ही) कर्म कर (फल श्रीभगवान्के हाथमें है, उनकी इच्छासे जो कुछ भी फल होगा, बस वही होना चाहिये, मुझे तो उनके चिन्तनमें चित्त लगाये हुए उनके इच्छानुसार कर्म करने चाहिये) यह समत्व ही योग कहा जाता है।’
असलमें कर्म करनेमें ही मनुष्यका अधिकार है, कर्मफलमें अधिकार नहीं है। कोई भी मनुष्य यह दावा नहीं कर सकता कि मैं केवल कर्म करके ही अमुक फल प्राप्त कर लूँगा। किसान खेत जोतकर उसमें बीज डाल सकता है, परंतु उसमें अनाज उत्पन्न होना उसके हाथमें नहीं है। अनावृष्टि, अतिवृष्टि, टिड्डी, चूहे, पाला आदिसे पकी-पकाई फसल भी नष्ट हो सकती है। तथापि खेत जोतकर बीज तो डालना ही चाहिये, क्योंकि यह उसके हाथकी बात है और यही उसका कर्तव्य है। इसपर भी यह प्रश्न हो सकता है कि ‘जब फल अपने हाथमें नहीं है, तब कर्म ही क्यों किया जाय? चुपचाप बैठे रहनेसे भी जो होता होगा सो हो ही जायगा।’ इसीलिये भगवान्ने पहलेसे सावधान कर दिया कि ‘कर्म-त्यागकी ओर तेरा मन नहीं लगना चाहिये’, क्योंकि कर्ममें तेरा अधिकार है। यद्यपि जगत्में सब कुछ भगवान्की इच्छासे ही होता है, उन लीलामयकी ही सारी लीला है, परंतु वे मनुष्यको निमित्त बनाते हैं—इसीलिये उसे कर्मका अधिकार दिया गया है। कौरवोंको भगवान्ने पहलेसे ही मार रखा था, विराट् स्वरूपमें अपनी विकराल दाढ़ोंमें सबको चूर्ण अवस्थामें दिखला भी दिया; अर्जुन निमित्त न बनते, तब भी उनका संहार होता ही, परंतु अर्जुनको निमित्त बनाकर ही भगवान्ने उनका संहार करवाया। अतएव मनुष्यको अपने अधिकारके अनुसार कर्म करना चाहिये, परंतु फलकी आशासे नहीं। अवश्य ही कर्म बिना उद्देश्यके नहीं होता, इसलिये मनुष्यके कर्ममें भी कोई उद्देश्य या लक्ष्य रहेगा। व्यापारमें धन मिले, युद्धमें जय हो, दवासे रोग नष्ट हो, यह उद्देश्य व्यापार, युद्ध और औषध-सेवनमें है, कर्मकी सफलताकी ओर दृष्टि है, परंतु वास्तवमें फल कुछ भी हो, धन मिले या न मिले; जय हो या पराजय हो, रोग दूर हो जाय या बढ़ जाय, उसका उसमें समान भाव है; क्योंकि वह आसक्ति और कामनाके वश होकर कर्म नहीं करता, उसके कर्ममें इन कामनाओंकी प्रेरणा नहीं है, उसके कर्मप्रेरक भगवान् हैं, वह भगवान्की पूजाके लिये ही स्वकर्म या स्वधर्मका पालन करता है। उसका राज्य-ग्रहण या संन्यास दोनों भगवान्के लिये ही होते हैं। सब प्रकारकी आसक्ति, सुख-दु:ख, लाभ-हानि, जय-पराजयको समान समझकर भगवान्के साथ योगयुक्त होकर कर्म करना ही गीतोक्त कर्मयोग है। इसमें भगवान्का ज्ञान है, भगवान्की भक्ति है और फलमें सर्वथा समत्व है। इसीलिये भगवान्ने आरम्भमें ही कहा है—
सुखदु:खे समे कृत्वा लाभालाभौ जयाजयौ।
ततो युद्धाय युज्यस्व नैवं पापमवाप्स्यसि॥
(गीता २। ३८)
‘सुख-दु:ख, लाभ-हानि, जय-पराजयको समान समझकर तदनन्तर युद्धमें प्रवृत्त हो; ऐसा करनेसे तुझे पाप नहीं लगेगा।’
ऐसा न करनेसे पापकी सम्भावना है; क्योंकि कामना और आसक्तिके वश होकर केवल फलानुसंधानमें लगे रहकर कर्म करनेसे धर्म और ईश्वरका ध्यान छूट जाता है। जिससे मनुष्य आरम्भमें विश्वहित या देशहित आदि उत्तम उद्देश्य होनेपर भी काम, क्रोध, द्वेष, हिंसा आदिके अधीन होकर लक्ष्यभ्रष्ट हो जाता है और आसुरीभावके साम्राज्यमें पहुँचकर दु:खोत्पादक अशुभ कार्य करता हुआ नरकका भागी होता है।
भगवान्ने आसुरी भावका वर्णन करते हुए कहा—आसुरी भाववाले लोग कहते हैं कि—‘जगत् आश्रयरहित है, इसके मूलमें कोई सत्य नहीं है, ईश्वर भी नहीं है, परस्परके काम-सम्बन्धसे ही सृष्टि हुई है’ (प्रकृतिसे ही सब आप ही बन गया है), इस प्रकारकी नास्तिक दृष्टिको आधार बनाकर वे नष्टात्मा, अल्पबुद्धि, अत्याचारी मनुष्य जगत्का ध्वंस करनेके लिये ही उत्पन्न होते हैं। उनकी कामना किसी प्रकारसे पूरी नहीं होती। वे दम्भ, मान और मदसे पूर्ण हुए मोहवश असत् सिद्धान्तोंका ग्रहण कर हीन, अपवित्र निश्चयों और कार्योंको लेकर ही जगत्में बुरे आदर्शोंका प्रचार करते हुए विचरते हैं। उनकी भोग-चिन्ताओंका कोई पार नहीं, अशेष विषय-चिन्ताओंमें डूबे हुए ही वे मरते हैं। कामोपभोगके सिवा और कुछ नहीं है, यही उनका निश्चित मत है। वे सैकड़ों आशारूपी फाँसियोंमें बँधे हुए, काम-क्रोधपरायण, केवल विषयभोगोंकी प्राप्ति और सम्भोगके लिये अन्यायपूर्वक भोगपदार्थोंके संचय करनेमें लगे रहते हैं। आज यह मिला, अब वह मिलेगा; अभी मेरे पास इतना धन है, आगे और भी धन होगा; आज उस शत्रुको मारा है, अब उन शत्रुओंका काम तमाम करूँगा; मैं ऐश्वर्यवान् हूँ, मैं भोगी हूँ, मैं बलवान् हूँ, मैं सिद्ध हूँ, मैं सुखी हूँ, मैं धनी हूँ, मैं कुलवान् हूँ, मेरे समान दूसरा कौन है? मैं यज्ञ करूँगा, मैं दान दूँगा, मैं मौज करूँगा—इस प्रकारके अज्ञान-विमोहित, अनेक प्रकारकी चिन्ताओंसे सदा भ्रमित चित्तवाले, मोहजालमें फँसे और कामोपभोगमें आसक्त मनुष्य महान् क्लेशमय अपवित्र नरकोंमें गिरते हैं।’
आजके कर्मवादके पीछे पागल जगत्के लोगोंमें प्राय: इन्हीं लक्षणोंकी प्रधानता मिलेगी। ईश्वर और धर्मके बहिष्कार या विनाशकी दर्पपूर्ण कर्म-चेष्टा, ईश्वर और धर्मके नामपर भोगसुख प्राप्त करनेका दम्भपूर्ण प्रयत्न, व्यक्तियों, जातियों, राष्ट्रोंमें परस्पर विनाश करनेकी हिंसामयी नीति, यूरोपके द्वेष-लोभपूर्ण गत दो भीषण महायुद्ध और आगामी विश्वव्यापी महायुद्धका अणु तथा हाइड्रोजन बम आदिके निर्माणरूपमें वर्तमान उद्योगपर्व, अंदरसे द्वेषपरवश हो बल बढ़ानेकी चेष्टामें लगे रहनेपर भी ऊपरसे मैत्री और शस्त्रसंन्यासकी पाखण्डभरी बातें, दबे हुएको दबाने और उठते हुएको गिरानेकी अभिमानपूर्ण क्रिया, प्राकृतिक अमिट भेदमें अभेद-स्थापनकी और नित्य अचल अभेदमें भेद-स्थापनकी अज्ञानमयी चेष्टा, पुरातनको सर्वथा मिटाकर नवीन शृंखलाविहीन जीवनकी प्रतिष्ठाका प्रयत्न, अपनेसे भिन्न मत रखनेवालोंको गिराने तथा नष्ट करनेकी कोशिश, परलोक, प्रारब्ध, ईश्वर और सदाचारकी कुछ भी परवा न कर केवल भोग-पदार्थोंकी प्राप्तिके लिये मर्यादारहित मनमाना आचरण आदि कार्योंसे इसका पूरा परिचय मिल जाता है। इसमें उनकी नीयतका दोष नहीं है, वस्तुत: ईश्वरको भुलाकर केवल इहलौकिक सुखकी प्राप्तिके हेतुसे, भोग-पदार्थोंके संग्रहके हेतुसे किये जानेवाले कर्मोंमें ऐसा होना स्वाभाविक है। इसीलिये यह समझ लेना चाहिये कि गीताका कर्मयोग ईश्वररहित और आसक्ति तथा कामनायुक्त कर्मवाद नहीं है। गीताका कर्मयोग इससे बिलकुल अलग है। वहाँ तो अर्जुनको भगवान्ने (गीता ३। ३० में) स्पष्ट आज्ञा दी है—
मयि सर्वाणि कर्माणि संन्यस्याध्यात्मचेतसा।
निराशीर्निर्ममो भूत्वा युध्यस्व विगतज्वर:॥
‘अर्जुन! तू मुझमें संलग्न किये हुए चित्तसे समस्त कर्म मुझमें अर्पण करके आशारहित और ममतारहित होकर एवं मनस्तापसे मुक्त होकर युद्ध कर।’
युद्ध करनेकी आज्ञा है, परंतु न राज्यमें ममत्व रहे, न विजयकी आशा रहे और न अभावजनित संतापसे चित्त जले। चित्त भगवान्में लगा है और उन्हींके आज्ञानुसार उन्हींकी प्रेरणासे निष्कामभावसे युद्ध हो रहा है। इस गीतोक्त कर्मयोगसे आधुनिक कर्मवादकी तुलना कैसे की जा सकती है?
यह सत्य है कि गीता जिस प्रकार ज्ञानकी अवहेलना नहीं करती, इसी प्रकार संसारकी और सांसारिक कर्तव्यकर्म, जीविका, कुटुम्ब-पालन, माता-पिताकी सेवा, जाति-सेवा, देश-सेवा, आर्त-सेवा, मानवीय अधिकार और धर्मके लिये युद्ध, दुर्बल-रक्षा, अत्याचारीका दमन, अन्यायका विरोध, परोपकार अथवा वर्णाश्रम-धर्मका यथाविधि पालन आदि किसी भी नैतिक धर्मका किंचित् भी विरोध नहीं करती, प्रत्युत इनके लिये उत्साहित करती है और स्वधर्म-पालनके लिये क्षत्रिय अर्जुनको हँसते-हँसते जीवनकी बलि चढ़ा देनेतकके लिये आज्ञा करती है। भगवान् अर्जुनसे कहते हैं—‘तुम आत्माके अमरत्व और सिद्धि-असिद्धिमें समत्वभावको मनमें रखकर, भगवान्को समझकर, भगवान्के लिये वीरकी भाँति युद्ध करो, रणक्षेत्रमें वीर-गतिको प्राप्त करो या वीरकी तरह विजय-लाभ करो, परंतु मनमें आसक्ति, कामना, ईर्ष्या, द्वेष, ममता, आशा आदि न रखो।’ कर्तव्य कर्मके लिये मर-मिटनेका कितना ऊँचा मार्मिक उपदेश है! आधुनिक कर्मवादसे यह क्षत्रिय-धर्म भी कितना ऊँचा है!
जगत् त्रिगुणात्मक है, इसमें निरन्तर तीनों गुणोंके ही कार्य हो रहे हैं। इनमेंसे जब जिस गुणकी प्रधानता होती है, तब उसके कार्यका रूप भी वैसा ही होता है। यह सिद्धान्त है कि प्रकृति स्वभावत: अधोगामिनी है, निरन्तर ऊपर उठनेकी चेष्टा न की जाय तो स्वभावसे पतन ही होता है। सत्त्वगुणसे भी यदि ऊपर चढ़नेकी, गुणातीत होनेकी चेष्टा न होगी तो सत्त्व रजोमुखी होकर रजोगुणप्रधान और क्रमश: तमोमुखी होकर तमोगुणकी प्रधानताके रूपमें परिणत हो जायगा, सत्त्व और रज दबकर तम विकसित हो उठेगा। अतएव यह सिद्धान्त मान लेना चाहिये कि जिस कर्ममें भगवान्की ओर दृष्टि और भगवान्का आश्रय नहीं है, जो केवल इहलौकिक विषय-लाभकी दृष्टिसे किया जाता है, वह सत्त्वप्रधान होनेपर भी क्रमश: रजोगुणकी ओर बढ़कर रज:प्रधान हो जाता है। रजोगुणकी वृद्धि होनेपर किन-किन लक्षणोंका उदय होता है? श्रीभगवान् कहते हैं—
लोभ: प्रवृत्तिरारम्भ: कर्मणामशम: स्पृहा।
रजस्येतानि जायन्ते विवृद्धे भरतर्षभ॥
(गीता १४। १२)
‘अर्जुन! रजोगुणके बढ़नेपर लोभ, कर्ममें प्रवृत्ति, कर्मोंका (अनेकमुखी) आरम्भ, चित्तकी चंचलता, विषय-भोगोंके प्राप्तकरनेकी स्पृहा—ये लक्षण उत्पन्न होते हैं।’ इस प्रकारके लक्षणोंसे युक्त रजोगुणी कर्मोंके कर्ताका स्वरूप बतलाते हुए श्रीभगवान् कहते हैं—
रागी कर्मफलप्रेप्सुर्लुब्धो हिंसात्मकोऽशुचि:।
हर्षशोकान्वित: कर्ता राजस: परिकीर्तित:॥
(गीता १८। २७)
‘वह कर्म और फलमें आसक्तिवाला, फल चाहनेवाला, लोभी, हिंसक, अपवित्र आचरण करनेवाला और हर्ष-शोकमें डूबा रहनेवाला होता है।’
आधुनिक कर्मवाद और कर्मवादियोंमें ये लक्षण प्राय: पूर्णरूपसे चरितार्थ होते हैं। अवश्य ही मोह, अप्रवृत्ति, आलस्य और प्रमादमय तामसिक जीवनसे यह जीवन कहीं श्रेष्ठ है, परंतु यह आदर्श नहीं है। रजोगुण सत्त्वमुखी न होगा तो तमोमुखी हो जायगा और अन्तमें तमोगुणकी प्रधानताका रूप धारण कर लेगा। किसी समय भारतवर्षमें भी जन्म, कर्मफलप्रद भोगैश्वर्य गतिकी प्राप्तिके लिये कर्मकाण्डकी प्रचुरता थी, यद्यपि भारतका वह कर्मकाण्ड आधुनिक नास्तिकतापूर्ण कर्मवादसे बहुत ही ऊँचा था, तथापि उसमें लौकिक कामना और आसक्ति होनेके कारण वह कर्मप्रवृत्ति भी अन्तमें तमोमुखी हो गयी। भारतकी आजकी तामसिकता, उसका मोह और आलस्यमय जीवन इसीका परिणाम है, इसीलिये भगवान्ने घोषणा की थी कि भोगैश्वर्यमें आसक्तिवाले पुरुषोंकी बुद्धि निश्चयात्मिका नहीं होती।’ परंतु गीतोक्त कर्मयोगी भोगैश्वर्यमें आसक्त नहीं होते—वे न तो भोग-सुखकी स्पृहा करते हैं और न वैध भोगका अकारण विरोध ही करते हैं।
भगवान्ने उनके विषयभोगकी व्याख्या करते हुए कहा है—
रागद्वेषवियुक्तैस्तु विषयानिन्द्रियैश्चरन्।
आत्मवश्यैर्विधेयात्मा प्रसादमधिगच्छति॥
प्रसादे सर्वदु:खानां हानिरस्योपजायते।
प्रसन्नचेतसो ह्याशु बुद्धि: पर्यवतिष्ठते॥
(गीता २। ६४-६५)
‘जिसका अन्त:करण अपने वशमें है, जिसमें राग और द्वेष नहीं हैं, वह पुरुष अपने वशमें की हुई इन्द्रियोंके द्वारा विषयोंको भोगता हुआ प्रसाद (प्रसन्नता) प्राप्त करता है। उस (विमल) प्रसादसे समस्त दु:खोंका अभाव हो जाता है और उस प्रसन्नचित्तवाले पुरुषकी बुद्धि (एक परमात्मामें) शीघ्र ही स्थिर हो जाती है।’
मन और इन्द्रियोंका गुलाम होकर विषयोंकी आसक्तिसे नहीं, प्रत्युत मन और इन्द्रियोंको गुलाम बनाकर यथावश्यक ऊपर उठानेवाले विषयोंका सेवन करनेवाला पुरुष प्रसन्नता प्राप्त करता है। इसीलिये गीताके कर्मयोगकी शिक्षामें कामोपभोगकी अनित्यता, सुख-दु:खकी क्षणभंगुरताका बार-बार वर्णन आता है और विषयोंसे मन हटाकर इन्द्रिय-संयमपूर्वक कामना और फलासक्तिशून्य हृदयसे कर्म करनेकी आज्ञा दी जाती है। भगवान् कहते हैं—
यततो ह्यपि कौन्तेय पुरुषस्य विपश्चित:।
इन्द्रियाणि प्रमाथीनि हरन्ति प्रसभं मन:॥
तानि सर्वाणि संयम्य युक्त आसीत मत्पर:।
वशे हि यस्येन्द्रियाणि तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता॥
(गीता २। ६०-६१)
ये हि संस्पर्शजा भोगा दु:खयोनय एव ते।
आद्यन्तवन्त: कौन्तेय न तेषु रमते बुध:॥
(गीता ५। २२)
कायेन मनसा बुद्ध्या केवलैरिन्द्रियैरपि।
योगिन: कर्म कुर्वन्ति संगं त्यक्त्वात्मशुद्धये॥
युक्त: कर्मफलं त्यक्त्वा शान्तिमाप्नोति नैष्ठिकीम्।
अयुक्त: कामकारेण फले सक्तो निबध्यते॥
(गीता ५। ११-१२)
‘अर्जुन! प्रयत्न करते हुए बुद्धिमान् पुरुषके मनको भी ये प्रमथन स्वभाववाली इन्द्रियाँ बलात् हर लेती हैं। अतएव इन इन्द्रियोंको वशमें करके मनको मुझमें लगाकर मेरे परायण हो जाना चाहिये। जिस पुरुषकी इन्द्रियाँ वशमें होती हैं उसीकी बुद्धि स्थिर होती है। इन्द्रियों और विषयोंके संयोगसे उत्पन्न होनेवाले ये जो सब भोग हैं, वे (मोहवश सुखरूप भासनेपर भी वस्तुत:) नि:सन्देह दु:ख ही उत्पन्न करते हैं और सदा एक-से नहीं रहकर—कभी उत्पन्न होने और कभी नाश होनेवाले आदि-अन्तरूप हैं, अतएव बुद्धिमान् पुरुष उनमें नहीं रमता। इसलिये (ममत्वबुद्धिरहित) निष्काम कर्मयोगी पुरुष इन्द्रिय, मन, बुद्धि और शरीरद्वारा आसक्तिको त्यागकर केवल अन्त:करणकी शुद्धिके लिये कर्म करते हैं, इसीसे वे परमात्मामें चित्त लगाये हुए कर्मयोगी पुरुष कर्मफलको त्यागकर भगवत्प्राप्तिरूप शान्तिको प्राप्त होते हैं। विषयचिन्तनमें लगा हुआ सकामी पुरुष फलासक्तिके कारण कामनाके द्वारा बन्धनको प्राप्त होता है।’
अन्त:करणकी शुद्धि हुए बिना भगवत्-भाव नहीं होता। भगवत्-भावकी प्राप्ति बिना शुद्ध भगवत्-प्रेरित कर्म नहीं हो सकते। इसलिये कर्मयोगी पहले भगवत्-भावकी प्राप्तिके लिये और भगवत्-भावकी प्राप्ति होनेपर केवल भगवान्की प्रेरणावश यन्त्रकी भाँति कर्म करता है। उस समय वह कर्मके बाह्य स्वरूपको न देखकर—अर्जुनकी भाँति गुरु-वध, स्वजन-वध, भीषण हिंसा आदिकी बात न सोचकर—केवल भगवान्की प्रेरणाको देखता है। भगवान् ही उसकी गति, नीति, उद्देश्य, जीवन और धर्म होते हैं। भगवान्के साथ युक्त होकर भगवदीय कर्म करना ही उसका स्वभाव होता है। यही गीताकी अन्तिम शिक्षा है।
सर्वधर्मान् परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज।
इसका यह अर्थ नहीं है कि इन्द्रियोंके वशमें होकर, भोग-प्रवृत्तिकी प्रेरणासे मनमाना करते हुए मनुष्य उसे ईश्वरकी प्रेरणा समझने या कहने लगे। श्रद्धापूर्वक भगवान्का नित्य-निरन्तर चिन्तन करते हुए मनुष्यके अन्त:करणमें जो शुद्ध स्फुरणा हो और जिससे इन्द्रियभोग-लालसा और कामनाका क्रमश: दमन होता हो, जो शास्त्रोक्त कर्म हो—पहले-पहल ऐसे ही शुभकर्मोंकी प्रेरणाको भगवत्-प्रेरणा समझे। साधना करते-करते भगवत्प्रेरणाकी स्पष्ट अनुभूति होने लगेगी। इसीलिये गीताकी शिक्षा वस्तुत: अर्जुन-जैसे योग्य अधिकारीके लिये है। परंतु वह अधिकार भी गीताकी शरण, गीताका अध्ययन और मनन एवं गीताके उपदेशानुसार जीवन बनानेकी चेष्टा करनेसे ही प्राप्त होगा। इसलिये गीताकी शिक्षा वस्तुत: इन्द्रियसंयमी, तपस्वी भक्त अधिकारीके लिये होते हुए भी साधारणत: सभीके लिये है। अनधिकारके कारण ही गीताका दुरुपयोग होता है और इसीसे आधुनिक कर्मवादकी सिद्धि या उसका समर्थन गीताके द्वारा करनेकी व्यर्थ चेष्टा की जाती है।
गीताका कर्मयोग शुद्ध भगवदभिमुखी है और आधुनिक कर्मवाद केवल भोगाभिमुखी, यही इनमें सबसे बड़ा अन्तर है। भोगाभिमुखी होनेके कारण ही इसमें राग, द्वेष, घृणा, काम, क्रोध और पाप, ताप आदिका प्राबल्य है और इसीलिये ऐसे कर्मवादियोंकी यह समझ है कि बिना कामनाके कर्म कैसे हो सकता है? बिना राग-द्वेषके कर्ममें प्रवृत्ति ही क्यों होने लगी? यदि फलकी ही इच्छा नहीं है तो कर्ममें बेगारके भावको छोड़कर उत्साह होगा ही क्यों? भोगाभिमुखी रजोगुणी कर्मप्रवृत्तिमें आसक्ति, कामना, क्रोध, द्वेष, राग, घृणा आदि दोष रहते हैं, इसीसे ऐसी समझ बन गयी है। परंतु जिनमें सत्त्वगुणका प्रकाश हो गया है, जिनकी बुद्धि परमात्माभिमुखी है—वे भगवान्के लिये कठोर-से-कठोर कर्म करनेमें भी सात्त्विक उत्साह पाते हैं। मजा यह कि फलकी आसक्ति या राग-द्वेषपूर्वक होनेवाले कर्ममें कर्म करते समय कामना, आशंका, भय, उद्वेग, चंचलता आदिके कारण मार्गच्युत होनेका जो डर रहता है और फलके अनुकूल न होनेपर जो विषाद होता है, वह गीतोक्त कर्मयोगीको नहीं होता। वह तो अनुकूल-प्रतिकूल फलको भगवान्के चरणोंमें अर्पण कर यन्त्रीके यन्त्रकी भाँति नित्य नये उत्साह और आनन्दके साथ स्वामी या प्रियतम प्रभुका कार्य करते-करते कभी थकता ही नहीं; क्योंकि सर्वशक्तिमान् प्रभु उसे अनवरत शक्तिदान करते रहते हैं, वह चलता ही प्रभुकी शक्तिसे है, अपना अहंकार उसे कभी नहीं होता। वह कभी मार्ग नहीं भूलता; क्योंकि उसे निरन्तर प्रभुसे प्रकाश मिलता रहता है। प्रभुके नित्य चिन्तनसे उसके हृदयमें भगवान्की दिव्य ज्योति सदा जगमगाया करती है। वह कभी मनमानी वस्तु पाकर या सफलतासे प्रमत्त होकर कर्तव्यच्युत नहीं होता; क्योंकि कोई नयी वस्तु पानेके लिये उसके मनमें अभिलाषा ही नहीं रहती। वह तो प्रभुका सेवक है, व्यापारी नहीं! भगवान्की शक्तिसे उसकी शक्ति, भगवान्के ज्ञानसे उसका ज्ञान, भगवान्के प्रेमसे उसका प्रेम, भगवान्की दिव्य बुद्धिसे उसकी बुद्धि सदा शक्ति, ज्ञान, प्रेम और विवेक पाती रहती है। अतएव वह कर्मयोगी अत्यन्त कुशलता, अदम्य उत्साह, अतुल तेज, अमल विवेक, अपार शान्ति, अमित आनन्द और अलौकिक प्रेमका मूर्तिमान् स्वरूप बना हुआ भगवान्के लिये सदा उल्लाससहित कर्म किया करता है। वह कर्म, अकर्म और विकर्मके तत्त्वको समझकर ही कर्म करता है, इससे उसके कर्ममें ज्ञान, भक्ति और समता—तीनोंका संयोग रहता है, जो आसक्ति, कामना, राग-द्वेषादि वैरियोंके वशमें होकर बिना जीते हुए मन-इन्द्रियोंसे कर्म करनेवाले कर्मवादीके लिये कभी सम्भव नहीं है। सात्त्विक कर्ताका लक्षण भगवान् बतलाते हैं—
मुक्तसंगोऽनहंवादी धृत्युत्साहसमन्वित:।
सिद्ध्यसिद्ध्योर्निर्विकार: कर्ता सात्त्विक उच्यते॥
(गीता १८। २६)
‘आसक्तिसे रहित, अनहंवादी, धैर्य और उत्साहसे युक्त सिद्धि और असिद्धिमें हर्ष-शोकादि विकारोंसे रहित कर्ता सात्त्विक कहा जाता है।’
गीताने तो इस सात्त्विकतासे भी ऊपर उठनेका आदेश किया है; क्योंकि सत्त्वगुण भी जीवको बाँधता है। (यद्यपि सत्त्वगुणका बन्धन जाग्रत् और प्रयत्नशील रहनेपर बन्धन काटनेवाला ही होता है।) इसीसे भगवान्ने कहा है—‘निस्त्रैगुण्यो भवार्जुन!’ अर्जुन! तू तीनों गुणोंसे रहित हो जा। गीताके कर्मयोगीके द्वारा फलाभिसन्धि न होनेपर भी लोकसंग्रहार्थ कर्म होते हैं। इस बातको भगवान्ने तीसरे अध्यायमें स्वयं अपना उदाहरण देकर बहुत अच्छी तरह समझाया है और निरन्तर निष्कामभावसे भगवदर्थ कर्म करनेकी आज्ञा दी है एवं अन्तमें उस निष्काम कर्मसे ही शाश्वतपदकी प्राप्ति बतलायी है। भगवान् कहते हैं—
सर्वकर्माण्यपि सदा कुर्वाणो मद्व्यपाश्रय:।
मत्प्रसादादवाप्नोति शाश्वतं पदमव्ययम्॥
चेतसा सर्वकर्माणि मयि संन्यस्य मत्पर:।
बुद्धियोगमुपाश्रित्य मच्चित्त: सततं भव॥
(गीता १८। ५६-५७)
‘मेरा आश्रयी होकर निष्काम कर्मयोगी पुरुष समस्त कर्मोंको करता हुआ ही मेरी कृपासे सनातन अव्यय पदको प्राप्त करता है। अतएव सब कर्मोंको मनसे मुझमें अर्पण करके मेरे परायण हो समत्व बुद्धिरूप कर्मयोगका अवलम्बन करके (अर्जुन!) तू निरन्तर मुझमें चित्त लगानेवाला हो।’
जो लोग वास्तवमें कर्मयोगका आश्रय लेकर भगवान्को प्राप्त करना चाहते हैं, उन्हें उचित है कि वे भगवान्का निरन्तर चिन्तन करते हुए ही भगवान्के आज्ञानुसार कर्तव्यकर्मका—स्वधर्मका आचरण करें। भगवान्ने गारंटी देते हुए कहा है—
तस्मात्सर्वेषु कालेषु मामनुस्मर युध्य च।
मय्यर्पितमनोबुद्धिर्मामेवैष्यस्यसंशयम्॥
(गीता ८। ७)
‘अर्जुन! इसलिये सब समय निरन्तर मेरा स्मरण करता हुआ ही युद्ध (स्वधर्म-पालन) कर। इस प्रकार युद्धमें मन-बुद्धि अर्पण करनेसे तू नि:संदेह मुझको प्राप्त होगा।’
ऐसे ही मनसे भजन करते हुए भगवदर्थ कर्म करनेवाले योगियोंको भगवान्ने सबमें श्रेष्ठ बतलाया है—
योगिनामपि सर्वेषां मद्गतेनान्तरात्मना।
श्रद्धावान् भजते यो मां स मे युक्ततमो मत:॥
(गीता ६। ४७)
‘समस्त योगियोंमें जो श्रद्धावान् पुरुष मुझमें अन्तरात्माको लगाकर निरन्तर मुझे भजता है, वही योगी मेरे मतमें परम श्रेष्ठ है।’
गीताके इस निष्काम कर्मयोगसे, आधुनिक राग-द्वेषपूर्ण और कामनामय कर्मवादमें कितना महान् अन्तर है, ऊपरके संक्षिप्त विवेचनसे पाठक इसको समझ गये हैं।