गीतोक्त समग्र ब्रह्म या पुरुषोत्तम
गीताका ‘समग्र ब्रह्म’ या ‘पुरुषोत्तम’ कौन है, इसका यथार्थ तत्त्व तो गीतावक्ता भगवान् श्रीकृष्ण ही जानते हैं तथापि हमारी दृष्टिमें इसका सीधा-सा उत्तर यह है कि श्रीकृष्ण ही वह ‘समग्र ब्रह्म’ या ‘पुरुषोत्तम’ हैं; क्योंकि भगवान् श्रीकृष्णने अपने श्रीमुखसे ही अपनेको ‘समग्र’ (गीता ७। १)१ और ‘पुरुषोत्तम’ (गीता १५।१८)२ घोषित किया है।
परंतु अब प्रश्न यह रह जाता है, उन श्रीकृष्णका स्वरूप क्या है? ब्रह्मवादी महात्मा कहते हैं कि श्रीकृष्णने ब्रह्मको लक्ष्य करके ही अपनेको पुरुषोत्तम बतलाया है। पर द्वैतवादी महापुरुष कहते हैं कि अर्जुनके सामने रथपर विराजित साकारविग्रह भगवान् श्रीकृष्ण केवल अपने लिये ही ऐसा कहते हैं। अब गीताके द्वारा ही हमें यह देखना है कि भगवान् श्रीकृष्णका स्वरूप गीतामें क्या है। श्रीकृष्णके स्वरूपका विचार ही ‘समग्र ब्रह्म और पुरुषोत्तम’ का विचार है और श्रीकृष्णके स्वरूपकी उपलब्धि ही समग्र ब्रह्म और पुरुषोत्तमकी प्राप्ति है। इसमें कोई सन्देह नहीं कि गीतामें भगवान्ने ‘अहम्, मम, माम्, मे, मयि’ आदि पदोंसे सर्वत्र अपनेको ही परमतत्त्व बतलाया है और अन्तमें खुले शब्दोंमें यह आज्ञा दी है कि ‘अर्जुन! तू सब धर्मोंको छोड़कर केवल एक मेरी ही शरणमें आ जा। मैं तुझे सब पापोंसे मुक्त कर दूँगा, तू शोक न कर।’ (गीता १८।६६)१ परंतु विचार यह करना है कि अर्जुनके सामने मनुष्यरूपमें भासनेवाले दिव्यमंगलविग्रह भगवान् उतने ही मानवरूपमें अपनी शरण ग्रहण करनेको कहते हैं या अपनेको कुछ और भी बतलाते हैं। यदि यह मानें कि उतने ही मानवरूपके लिये भगवान्का कथन है तब तो भगवान्के इस कथनका क्या तात्पर्य है कि ‘मानुषी तनु’ धारण किये हुए मेरे भूत-महेश्वररूपके परम भावको मूढ लोग नहीं जानते। (गीता ९। ११)२ इससे यह सिद्ध होता है कि उनका भूत-महेश्वररूप परम भाव इस योगमायासमावृत३ ‘मानुषी तनु’ से ही प्रकट नहीं है; वह पृथक् है और उसे देखनेके लिये ‘मानुषी तनु’ से परे दृष्टिको ले जाना पड़ेगा।
साथ ही इस मानुषी तनुको तो भगवान्ने अपनी विभूति बतलाया है—‘वृष्णीनां वासुदेवोऽस्मि’ (१०। ३७) और यदि यह मान लें कि ब्रह्मके लिये ही भगवान्का यह कथन है तो ‘मैं ब्रह्मकी प्रतिष्ठा हूँ’ (गीता १४। २७)* इस कथनकी व्यर्थता सिद्ध होती है, अतएव यह देखना है कि भगवान् श्रीकृष्ण वास्तवमें क्या हैं? आनन्दकी बात है कि महान् भक्त अर्जुनकी कृपासे हमें भगवान्का वह रहस्य उन्हींके श्रीमुखकी दिव्य वाणीसे उपलब्ध हो जाता है।
अर्जुन-सा बछड़ा न होता तो कभी हमें यह भगवत्-रहस्यरूपी गीतामृत न मिलता। भगवान् जहाँ भी कुछ रहस्य बतलाना चाहते हैं, वहीं अर्जुनके प्रेमको कारण बतलाते हैं। अब हमें यह देखना है, वह भगवत्-रहस्य क्या है, जिससे हम भगवान् श्रीकृष्णके स्वरूपको जान सकें। इसके लिये सरसरी निगाहसे हमें गीताके प्रारम्भसे ही विचार करना है।
पहले अध्यायमें भगवान् केवल सारथिरूपमें अपना दर्शन देते हैं। अर्जुनके आज्ञानुसार वे रथको दोनों सेनाओंके बीचमें ले जाकर खड़ा कर देते हैं। अर्जुन सेनाको देखकर मोहमें डूब जाते हैं और धनुष-बाण रथके एक किनारे रखकर बैठ जाते हैं। भगवान् कुछ भी नहीं बोलते। दूसरे अध्यायके आरम्भमें भगवान् अर्जुनको एक बुद्धिमान् प्रतिभाशाली महापुरुषके रूपमें उत्साह दिलाते हैं और समझाते हैं। तदनन्तर अर्जुनके द्वारा यह कहनेपर कि ‘मैं आपके शरण हूँ, आपका शिष्य हूँ, मुझे उपदेश दीजिये (गीता २। ७)।’*
भगवान् पहले सांख्ययोग कहते हैं, फिर क्षात्रधर्मका महत्त्व बतलाकर निष्काम कर्मयोगका वर्णन करते हैं और अन्तमें स्थितप्रज्ञ पुरुषके लक्षण कहते हैं। इस सारे अध्यायमें एक जगह भगवान् ‘मत्पर’ शब्दका प्रयोग कर इन्द्रियसंयमपूर्वक युक्तचित्तसे अपने परायण होनेकी आज्ञा देते हैं। यहाँ अपने स्वरूपमहिमाका यह साधारण संकेत है। तीसरे अध्यायमें वे यज्ञ और कर्मकी व्याख्या करते हुए अपनेको लोकसंग्रही आदर्श पुरुष या लोकशिक्षक प्रधान नेताके रूपमें प्रकट करते हैं और अपने लिये कुछ भी प्राप्तव्य या कोई भी कर्तव्य न बतलाकर अपने ज्ञानस्वरूप या नित्य पूर्ण प्रयोजनरहित ईश्वरस्वरूपको व्यक्त करते हैं, परंतु खुलकर कुछ भी नहीं कहते। चौथे अध्यायके आरम्भमें भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं कि मैं ही अविनाशी योगका सर्वप्रथम उपदेशक हूँ, मैंने ही कल्पके आदिमें विवस्वान् या सूर्यको इसका उपदेश किया था। मेरा ही बतलाया हुआ यह सनातन योग परम्पराक्रमसे राजर्षियोंने जाना था, परंतु बहुत कालसे वह योग लुप्तप्राय हो गया था (गीता ४। १-२)।*
इससे आपने अपने सनातन जगद्गुरु-पदको व्यक्त किया और अर्जुनको अपना भक्त एवं प्रिय सखा समझकर उस पुरातन योगके व्यक्त करनेकी बात करते हुए अवताररहस्य बतलाया। यहाँ भगवान् श्रीकृष्ण कुछ खुले। कुछ रहस्य बतलाया। कहा कि ‘मैं अविनाशी, अजन्मा और सबका ईश्वर रहते हुए ही अपनी योगमायाके निमित्तसे अवतार धारण करता हूँ। मेरे जन्म-कर्म दिव्य हैं (गीता ४। ६—९)।’*
अन्य जीवोंकी भाँति ही मेरे जन्म-कर्मोंको देखनेवाला मुझको नहीं जान सकता। मेरे जन्म-कर्मको तत्त्वत: जानना होगा। फिर कर्म-रहस्य, यज्ञ और ज्ञानकी महिमा आपने बतलायी। पाँचवें अध्यायमें कर्मयोग और संन्यासका निर्णय, सांख्ययोगी और निष्काम कर्मयोगी मुक्तपुरुषोंके लक्षण आदि बतलाकर अन्तमें अपने रहस्यके पर्देको जरा हटाकर कहा कि ‘सारे यज्ञ और तपोंका भोक्ता मैं ही हूँ, कोई किसी देवताके नामसे यज्ञ-तप करे, सब मुझको ही पहुँचता है। मैं समस्त लोकोंका महान् ईश्वर हूँ और ऐसा होते हुए ही मैं जीवमात्रका सुहृद् हूँ। मेरे इस स्वरूपको जान लेनेसे ही शान्ति प्राप्त हो जाती है।’ (गीता ५।२९)* यहाँ भगवान् श्रीकृष्णने यह दिखलाया कि तुम मुझे अपना सखा समझते हो फिर भी चिन्ता क्यों करते हो?
समस्त कर्मोंका नियन्ता, सबका महेश्वर जिसका सुहृद्-सखा हो, यह बात जो जान ले वह दु:ख, शोक और संतापको कैसे प्राप्त हो सकता है? वह आसक्ति, अहंकारका शिकार कैसे हो सकता है? फिर छठे अध्यायमें आपने योगके साधन और स्वरूपकी भलीभाँति व्याख्या करके, सिद्ध योगियोंके लक्षण बतलाकर कहा कि ‘जो मुझको सबमें और सबको मुझमें देखता है, जो सब भूतोंमें स्थित मुझ एकको भजता है वह सब कुछ करता हुआ मुझमें ही बरतता है।’ (गीता ६। ३०-३१)१ यहाँ भगवान् श्रीकृष्णने अपने ‘अहम्’ का तात्त्विक स्वरूप दिखलाया और अन्तमें कहा कि तपस्वी, ज्ञानी और कर्मी सबकी अपेक्षा इस प्रकार मुझको जाननेवाला योगी श्रेष्ठ है और योगियोंमें भी सर्वश्रेष्ठ वह श्रद्धावान् योगी है जो अन्तरात्मासे मुझको ही भजता है (गीता ६। ४६-४७)२ यहाँपर भगवान् श्रीकृष्णने अपने भजनीय स्वरूपका निर्देश किया।
यहाँतक भगवान्ने यह बतलाया कि ‘मैं ही लोकशिक्षक आदर्श पुरुष हूँ, मैं ही आदि उपदेष्टा जगद्गुरु हूँ, मैं ही धर्म-संस्थापक, दिव्य अवतारी और दिव्य कर्मी हूँ। मैं ही सब यज्ञ-तपोंका भोक्ता हूँ, मैं ही सबका परमेश्वर हूँ; जो मुझे अपना सुहृद् समझ लेता है वह उसी क्षण परम शान्तिको प्राप्त हो जाता है। मैं ही सबमें हूँ और सब मेरेमें ही हैं। मैं ही ज्ञानी, तपस्वी, कर्मी सबका आराध्य हूँ।’ यद्यपि इस प्रसंगमें संकेतसे कई बार भगवान्ने अपना रहस्य बतलाया, पर इसके आगे अब स्पष्टरूपसे अपना रहस्य खोलकर बतलाने लगे। सातवें अध्यायके आरम्भमें ही आप कहते हैं—
मय्यासक्तमना: पार्थ योगं युंजन् मदाश्रय:।
असंशयं समग्रं मां यथा ज्ञास्यसि तच्छृणु॥
ज्ञानं तेऽहं सविज्ञानमिदं वक्ष्याम्यशेषत:।
यज्ज्ञात्वा नेह भूयोऽन्यज्ज्ञातव्यमवशिष्यते॥
(गीता ७। १-२)
‘अर्जुन! मुझमें मनको आसक्त करके और मेरे शरणागत होकर योगयुक्त होनेपर मुझे ‘समग्र’ रूपमें संशयरहित होकर किस प्रकार जाना जाता है, सो सुनो! मैं तुम्हें विज्ञानसहित उस ज्ञानको (रहस्यसहित मेरे तत्त्वको) पूरे तौरसे खोलकर कहता हूँ। इस रहस्यको जान लेनेपर फिर कुछ भी जानना शेष नहीं रहेगा।’ ‘समग्र’ को जाननेपर शेष रहेगा भी क्या? यहाँ भगवान् यह भी कह देते हैं कि हजारों-लाखोंमेंसे कोई बिरला ही मुझे जाननेके लिये प्रयत्न करता है और उन प्रयत्न करनेवालोंमेंसे भी कोई बिरला ही मुझे समग्ररूपसे तत्त्वत: जानता है (गीता ७। ३)।
इसके बाद भगवान् श्रीकृष्ण जीव और जगत्, चेतन और जड दोनोंको अपनी प्रकृति बतलाते हुए कहते हैं—
भूमिरापोऽनलो वायु: खं मनो बुद्धिरेव च।
अहंकार इतीयं मे भिन्ना प्रकृतिरष्टधा॥
अपरेयमितस्त्वन्यां प्रकृतिं विद्धि मे पराम्।
जीवभूतां महाबाहो ययेदं धार्यते जगत्॥
(गीता ७। ४-५)
‘पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश, मन, बुद्धि और अहंकार—यह आठ प्रकारसे विभक्त बहिर्जगत् और अन्तर्जगत्के समस्त उपादान मेरी ही प्रकृति हैं। यह अपरा प्रकृति है। इससे विलक्षण जीव या चैतन्यरूप मेरी दूसरी परा प्रकृति है, जिससे यह सारा जगत् विधृत है।’
वस्तुत: इस द्विविध प्रकृतिके द्वारा ही भगवान्ने अपनेको विश्वरूपमें प्रकट किया है। प्रकृति प्रकृतिमान्से भिन्न नहीं है, इसलिये यह जो कुछ है सब प्रकृतिमान् भगवान्का ही स्वरूप है। भगवान् ही इस रूपमें प्रकट हो रहे हैं, इसीसे आगे चलकर वे कहते हैं कि मेरे अतिरिक्त और कुछ है ही नहीं। जैसे सूतकी मालामें सूतकी मणियाँ गुँथी होती हैं, वैसे ही मेरी प्रकृतिसे बना हुआ सारा जगत् मेरी प्रकृतिके द्वारा मुझमें गुँथा है। मैं ही जलमें रस हूँ, चन्द्र और सूर्यमें प्रभा हूँ, समस्त वेदोंमें प्रणव हूँ, आकाशमें शब्द हूँ, पुरुषोंमें पुरुषत्व हूँ। पृथ्वीमें पवित्र गन्ध, अग्निमें तेज, जीवोंमें जीवन, तपस्वियोंमें तप, बुद्धिमानोंमें बुद्धि, तेजस्वियोंमें तेज, बलवानोंमें कामरागविवर्जित बल, मैथुनोत्पन्न प्राणियोंमें धर्माविरुद्ध काम हूँ (गीता ७। ७—११)। फिर अपने भक्तोंकी श्रेणी और महिमा बतलाकर कहा कि जो दूसरे देवताओंको पूजते हैं, उनकी उन देवताओंके रूपोंमें मैं ही श्रद्धा करवा देता हूँ, देवताओंकी पूजा भी मेरी ही पूजा है। देवताओंके द्वारा मिलनेवाला फल भी मेरा ही विधान किया हुआ होता है। मूढ लोग योगमायासे समावृत मुझको पहचानते नहीं (गीता ७।२५)। यहाँ भगवान्ने अपने रहस्यका कुछ अंश भलीभाँति खोल दिया। इसके बाद सातवें अध्यायके अन्तमें आप कहते हैं—
जरामरणमोक्षाय मामाश्रित्य यतन्ति ये।
ते ब्रह्म तद्विदु: कृत्स्नमध्यात्मं कर्म चाखिलम्॥
साधिभूताधिदैवं मां साधियज्ञं च ये विदु:।
प्रयाणकालेऽपि च मां ते विदुर्युक्तचेतस:॥
(गीता ७। २९-३०)
‘जो पुरुष मेरे शरण होकर जरा-मरणसे सर्वथा मुक्त होनेके लिये यत्न (मेरा भजन) करते हैं, वे उस ब्रह्म, सम्पूर्ण अध्यात्म, निखिल कर्म, अधिभूत, अधिदैव और अधियज्ञके सहित मुझको सम्यक्-रूपसे जानते हैं, वे ही युक्तचित्त पुरुष अन्तकालमें भी मुझको ही जानते (पाते) हैं।’ वे जानते हैं कि सम्पूर्ण विभिन्नभाव एकमात्र उन्हीं पूर्णतम परात्पर भगवान्के ही प्रकाश हैं। इसीसे तद्भाव-भावित होनेके कारण उन्हें अन्तमें भगवान्की ही प्राप्ति होती है।
आठवें अध्यायके आरम्भमें अर्जुन उत्सुकताके साथ भगवान्से ब्रह्म, अध्यात्म, कर्म, अधिभूत, अधिदैव और अधियज्ञका स्वरूप पूछते हैं एवं प्रयाणकालमें भगवान्को जाननेका—पानेका साधन जानना चाहते हैं। इसके उत्तरमें भगवान् कहते हैं—
अक्षरं ब्रह्म परमं स्वभावोऽध्यात्ममुच्यते।
भूतभावोद्भवकरो विसर्ग: कर्मसंज्ञित:॥
अधिभूतं क्षरो भाव: पुरुषश्चाधिदैवतम्।
अधियज्ञोऽहमेवात्र देहे देहभृतां वर॥
अन्तकाले च मामेव स्मरन् मुक्त्वा कलेवरम्।
य: प्रयाति स मद्भावं याति नास्त्यत्र संशय:॥
(गीता ८। ३—५)
जिस समग्र रूपको बतलानेकी भगवान्ने सातवें अध्यायके प्रारम्भमें प्रतिज्ञा की थी; जिसका उल्लेख अध्यायके अन्तिम श्लोकमें कर दिया था, अब अर्जुनके पूछनेपर उसीका स्पष्टीकरण करते हैं। पूर्णतम भगवान्के अनेकों भाव हैं और भगवान्का भाव होनेके कारण स्वरूपत: उनमेंसे कोई भी अपूर्ण या न्यूनाधिक नहीं है तथापि उनके कार्य और बाह्य रूपके प्रकाशमें भेद होनेके कारण न्यूनाधिकता प्रतीत होती है। उनमेंसे किसी एक भावको पूजनेवाला भी भगवान्को ही पूजता है, परंतु विधिपूर्वक नहीं। समग्रको जानकर ही किसी एक भाव या रूपको पूजना यथार्थ विधिवत् भगवत्पूजन है। ऐसा न होनेके कारण ही अनेकों मतवाद हो रहे हैं। ब्रह्मवादी कहते हैं कि ‘समस्त कारणोंके परमकारण, उपाधिरहित, नित्यशुद्धबुद्ध-मुक्तस्वभाव, सच्चिदानन्दस्वरूप, बोधानन्दघन, ब्रह्म ही एकमात्र परम सत्-तत्त्व है और सब मिथ्या है, उस ब्रह्मके स्वरूपको जानना ही पुरुषार्थ है।’ अध्यात्मवादी मानते हैं कि ‘आत्मानात्मविचारके द्वारा उपलब्ध स्थूल-सूक्ष्म-कारण शरीरविहीन अक्षर आत्मा ही एकमात्र परम तत्त्व है। इस आत्माके अतिरिक्त अन्य कोई ईश्वर या ब्रह्म नहीं है।’ कर्मवादियोंका कहना है कि ‘कर्म ही सृष्टिका मूल कारण-तत्त्व है, कर्मके द्वारा ही सबका नियन्त्रण होता है, कर्मसे ही जीवनकी सार्थकता और अभीष्टकी प्राप्ति होती है। अतएव एकमात्र कर्म ही सेवनीय है।’ आधिभौतिक लोगोंका मत है कि ‘चेतन भी जडका ही एक धर्म है, जड ही वस्तुतत्त्व है, जडको छोड़कर चित्सत्ताका अन्य कोई प्रमाण नहीं है, अतएव जड-जगत्की उन्नति करना, शरीर और शरीरसम्बन्धी पदार्थोंकी उन्नति करना और आरामके लिये धन-दौलतको इकट्ठा करना ही मनुष्यका कर्तव्य है।’ आधिदैविक मानते हैं कि ‘देवता ही सब कुछ करते हैं, वे ही जगत्के तमाम विभिन्न भोगोंके नियन्ता और अधिष्ठाता हैं; वे ही मन, बुद्धि, अहंकार और इन्द्रियोंके संचालक, भर्ता, पोषक और भोगविधाता हैं, यज्ञ-यागादि उपासनाके द्वारा उन्हींको संतुष्ट करनेसे कार्यसिद्धि हो सकती है। उन देवताओंमें भी सबसे प्रधान परमदेव समग्र ब्रह्माण्डके अभिमानी देवता या सबके स्वामी एक ही हैं, जिनको विभिन्न सम्प्रदायोंके लोग हिरण्यगर्भ, ब्रह्मा, शिव, शक्ति, नारायण, सूर्य आदि विभिन्न नामोंसे पुकारते हैं।’ यह सूक्ष्मदर्शी आधिदैविक पुरुषोंकी मान्यता है। याज्ञिक लोग यज्ञको ही प्रधान धर्म मानते हैं और उनके अधिष्ठातृ-देवताओंकी आराधना भाँति-भाँतिके यज्ञोंद्वारा करते हैं। इस प्रकार अनेकों मत-मतान्तर प्रचलित हैं और अपनी-अपनी दृष्टिसे सभी ठीक हैं। तात्त्विक दृष्टिसे भी सब मत अपनी-अपनी पद्धति और भावसे एक ही भगवान्की पूजा करनेवाले होनेसे भगवान्के ही उपासक हैं, परंतु ‘समग्र’ को न जाननेके कारण उनकी पूजा पूर्णांग नहीं होती। भगवान् श्रीकृष्ण अपने ‘समग्र स्वरूपकी व्याख्या करनेके अभिप्रायसे यहाँ इन सबका समन्वय करते हुए सबको अपनी ही अभिव्यक्ति बतलाते हैं। इसीसे वे उपर्युक्त गीताके श्लोक (८। ३—५) में कहते हैं—
परम अक्षर ‘ब्रह्म’ है; मेरी अपरा प्रकृतिके साथ संलग्न होनेवाला जो निर्विकार परा प्रकृतिरूप मेरा (भगवान् का) अपना भाव (अंशरूप) है, वही जीवात्मारूपसे जडके अंदर अनुस्यूत ब्रह्म ही ‘अध्यात्म’ है। अपरा प्रकृति और उसके परिणामसे उत्पन्न समस्त भूतरूप जो मेरा क्षरभाव है वही ‘अधिभूत’ है। भूतोंका उद्भव और अभ्युदय जिस विसर्ग—त्याग अथवा यज्ञसे होता है, जो सृष्टि-स्थितिका आधार है, वह विसर्ग ही ‘कर्म’ है। यह भगवान्का ही एक विशेष विकास है। ‘यज्ञो वै विष्णु:’। पुरुषसूक्तोक्त विराट् ब्रह्माण्डाभिमानी हिरण्यमय पुरुष ही ‘अधिदैव’ है। इसीको सूत्रात्मा, हिरण्यगर्भ, प्रजापति या ब्रह्मा कहते हैं। प्रत्येक देवता इसका एक-एक अंग है, चेतनाचेतनात्मक सम्पूर्ण ब्रह्माण्डका यही प्राणपुरुष है। भगवान्के इस पुरुषभावका विकास ही ‘अधिदैव’ है। भगवान् ही सब यज्ञोंके भोक्ता हैं और प्रभु हैं। अतएव वे कहते हैं कि मैं ही ‘अधियज्ञ’ हूँ और इस शरीरमें ही अन्तर्यामीरूपसे स्थित हूँ। अन्तकालमें जो पुरुष इस प्रकारके मुझ ‘समग्र’ को स्मरण करता हुआ शरीरको त्याग कर जाता है वह नि:संदेह मेरे ही भावको—मेरे ही साक्षात् स्वरूपको प्राप्त होता है।
यहाँ भगवान्ने प्रधान-प्रधान भावोंका समन्वय करके अपने स्वरूपका निर्देश किया। इसके बाद अपने महत्त्वका दिग्दर्शन कराते हुए भगवान्ने यह बतलाया कि मेरे भावविशेषकी अभिव्यक्तिरूप जो कुछ भी और पदार्थ हैं, वे सब कालाधीन हैं, उन सबकी प्राप्ति पुनरावर्तिनी है। ब्रह्मलोकतकके सभी लोक पुनरावर्तनशील हैं। एकमात्र मैं ही कालातीत हूँ, जो मुझको प्राप्त हो जाता है, उसका पुनर्जन्म नहीं होता। ‘मामुपेत्य तु कौन्तेय पुनर्जन्म न विद्यते।’ हाँ, अव्यक्त अक्षर ब्रह्म कालाधीन नहीं है, वह भगवान्का परम भाव है, उसीको परम धाम कहा है, यह परम धाम अव्यक्तरूप मूलप्रकृतिसे भी विलक्षण सनातन अव्यक्त भाव है, यह किसी भी हालतमें सबके नष्ट हो जानेपर भी नष्ट नहीं होता, अतएव इसको प्राप्त होकर भी जीव वापस नहीं आता। परंतु यही ‘समग्र’ नहीं है, यह समग्र भगवान्का एक सनातन अव्यक्त परम भाव है। आठवें अध्यायके अन्तमें श्रीभगवान् छठे अध्यायके अन्तिम श्लोककी भाँति ही ऐसे भगवान्के उपासक योगीकी प्रशंसा करते हुए कहते हैं—
वेदेषु यज्ञेषु तप:सु चैव
दानेषु यत्पुण्यफलं प्रदिष्टम्।
अत्येति तत्सर्वमिदं विदित्वा
योगी परं स्थानमुपैति चाद्यम्॥
(गीता ८। २८)
इस रहस्यको तत्त्वत: जानकर वह योगी वेद, यज्ञ, तप और दानसे जो पुण्यफल होते हैं, जो गतियाँ प्राप्त होती हैं, उन सबको लाँघकर, उन सबसे आगे बढ़कर सर्वोच्च आद्य परम स्थानको प्राप्त होता है। यहाँ अपने स्वरूपका और उसके जाननेवाले योगीका महत्त्व बतलाकर नवम अध्यायके आरम्भमें गुह्यतम रहस्यको ज्ञान-विज्ञानसहित बतलानेकी प्रतिज्ञा करते हैं और इसे राजविद्या-राजगुह्य, परमपवित्र, प्रत्यक्ष फलरूप, परमधर्म, सुगम और अविनाशी बतलाते हैं (गीता ९।१-२)। फिर कहते हैं—समस्त जगत्में मैं ही अव्यक्त मूर्तिके रूपमें परिपूर्ण हूँ, सब भूत मुझमें हैं, मैं उनमें नहीं हूँ, वे भी मुझमें नहीं हैं, यह मेरे ऐश्वरयोगका प्रभाव है कि सब प्राणियोंका धारण-पोषण करनेवाला और सबका उद्भव करनेवाला भी मैं उनमें नहीं हूँ (गीता ९।४-५)। इसका तात्पर्य यह है कि जगत्में साकार मूर्तिसे व्याप्ति नहीं हो सकती। उसमें तो अव्यक्त मूर्तिसे ही व्याप्ति होती है, परंतु वह अव्यक्त मूर्ति, भगवान् कहते हैं कि मेरी ही है, मुझसे भिन्न अव्यक्त कोई दूसरा नहीं है। यह बहिर्जगत् और अन्तर्जगत् मेरी ही अष्टधा अपरा प्रकृति है और इस प्रकृतिका निवासस्थान—अधिष्ठान स्वामी मैं हूँ, अतएव ये सब मुझमें हैं, मैं इनमें नहीं हूँ; परंतु प्रकृति मुझ प्रकृतिमान्से अभिन्न है, इसलिये ये सब भी मुझमें नहीं हैं। वस्तुत: यह सारा जड-चेतन विश्वभुवन मेरी ही अभिव्यक्ति है और स्वरूपत: मुझसे अभिन्न है। यह मेरी लीला है, ऐश्वरयोग है। कल्पके अन्तमें सब भूत मेरी प्रकृतिमें चले जाते हैं और कल्पके आदिमें मैं पुन: अपनी प्रकृतिसे उन्हें प्रकट कर देता हूँ। इतना होते हुए भी मैं नित्य अपनी महिमामें, अपने स्वरूपमें स्थित हूँ, मैं उदासीनवत् आसीन किसी भी कर्मसे नहीं बँधता (गीता ९। ७९)। तदनन्तर अपनी महिमा और सकाम देवोपासकोंकी पुनरावर्तिनी स्वर्गगतिका वर्णन करते हुए कहते हैं कि जो दूसरे देवताओंको पूजते हैं वे भी मुझको ही पूजते हैं, परंतु ‘समग्र’ को जानकर नहीं पूजते, इसलिये उनकी पूजा अज्ञानकृत है। मैं ही सबका स्वामी, भोक्ता और सर्वरूप हूँ। इस रहस्यको तत्त्वसे न जाननेके कारण वे लोग पुनरावर्तिनी गतिको पाते हैं, यानी प्राप्त की हुई स्थितिसे गिर जाते हैं (गीता ९।२३-२४)। फिर अपने भजनकी—शरणागतिकी महिमा बतलाकर अन्तमें आप खुले शब्दोंमें परम रहस्यकी घोषणा करते हैं—
मन्मना भव मद्भक्तो मद्याजी मां नमस्कुरु।
मामेवैष्यसि युक्त्वैवमात्मानं मत्परायण:॥
(९। ३४)
‘इस प्रकार मुझ समग्रको जानकर तुम मुझमें ही मन लगाओ, मेरे ही भक्त बनो, मेरी ही पूजा करो, मुझको ही नमस्कार करो; इस तरह आत्माको लगाकर मेरे परायण—मेरे अनन्यशरण होनेसे तुम मुझको ही प्राप्त होओगे।’
यहाँ भगवान्के द्वारा गुह्यतम रहस्य बतलाया गया; परंतु अर्जुन कुछ नहीं बोले। तब दशम अध्यायके आरम्भमें भगवान्ने कहा कि अच्छी बात है, मैं अब फिर (भूय:) तुमसे तुम्हारे हितार्थ अपना परम रहस्ययुक्त सिद्धान्त सुनाता हूँ; क्योंकि तुम मेरे अत्यन्त प्रिय हो। देखो, मेरे प्रभावको देवता-महर्षि कोई भी नहीं जानते; क्योंकि मैं ही सबका आदि हूँ, जो मुझको अज, अनादि और लोकमहेश्वर तत्त्वत: जान लेते हैं वे असंमूढ पुरुष सब पापोंसे छूट जाते हैं। (गीता १०। १—३) इसके बाद अर्जुनके पूछनेपर भगवान्ने अपनी प्रधान-प्रधान विभूतियोंका वर्णन किया। इस विभूतिवर्णनमें भगवान्ने विष्णु, शंकर, सूर्य, चन्द्र, इन्द्र, वरुण, कुबेर, अग्नि, वायु प्रभृति समस्त देवताओंको भी अपनी विभूति ही बतलाया है। यह कहा कि ‘मैं ही सबका मूल हूँ, अधिक क्या समस्त जगत् मेरे एक अंशमात्रमें स्थित है।’ (गीता १०। ४२) इसके बाद एकादश अध्यायमें भगवान्ने अर्जुनको दिव्य दृष्टि देकर अपना महामहिम विराट् रूप प्रत्यक्ष दिखलाया, अपनेको काल बतलाया और अन्तमें अपने साकार दिव्य मंगल विग्रहकी महिमा गाकर अनन्य भक्तिके द्वारा उसे तत्त्वत: जानने, देखने और प्राप्त करनेकी बात कही। बारहवें अध्यायमें सगुण साकाररूपमें अवतीर्ण दिव्यमूर्ति अपने श्रीकृष्णरूपकी परम श्रद्धापूर्वक उपासना करनेवाले योगियोंको श्रेष्ठ योगी बतलाया और अन्तमें भक्त महात्माओंके लक्षणोंका प्रतिपादन किया। यहाँ यह ध्यान रखनेकी बात है कि नवमसे लेकर द्वादश अध्यायतकके वर्णनमें बहुत थोड़े श्लोक ऐसे हैं जिनमें ‘अहम्’ ‘मम’ ‘माम्’ ‘मे’ ‘मयि’ आदि अस्मद् शब्दवाचक पदोंका प्रयोग न हुआ हो।
तेरहवें अध्यायमें प्रकृति-पुरुषका विवेचन है। सातवें अध्यायकी द्विविधा अपरा और परा प्रकृतिका ही यहाँ क्षेत्र-क्षेत्रज्ञके नामसे वर्णन है। इन्हींको आगे चलकर सूक्ष्म और व्यापकरूपमें ‘प्रकृति’ और ‘पुरुष’ कहा है। इस प्रसंगमें सांख्यदर्शनके दोनों मूल तत्त्व ‘पुरुष और प्रकृति’ को भगवान्ने स्वीकार किया और खुले शब्दोंमें यह मान लिया कि समस्त जगत्के मूलमें प्रकृति-पुरुष-तत्त्व ही हैं; परंतु इनके अतिरिक्त और कुछ नहीं है, इस बातको स्वीकार नहीं किया। न यही माना कि ये दोनों तत्त्व मूलत: पूर्णरूपसे पृथक् हैं और इनके अविवेककृत संयोगके परिणाम-स्वरूप अनन्त विचित्र गुण-क्रियादियुक्त व्यक्त जगत्की सृष्टि हुई है। सांख्यदर्शनका सिद्धान्त है कि पुरुष निर्विकार, निष्क्रिय, गुणातीत और चित्स्वरूप है। प्रकृति विकारशीला, परिणामिनी, सक्रिय और त्रिगुणमयी है। पुरुष और प्रकृति सर्वथा विपरीत धर्मवाली दो पृथक्-पृथक् वस्तुएँ हैं। इनके संयोगसे जगत्की उत्पत्ति हुई है। इनमें गुणात्मिका प्रकृति मूल उपादानकारण है। उसीके परिणामसे जगत्के समस्त पदार्थोंकी अभिव्यक्ति हुई है। परंतु पुरुषके संयोग बिना प्रकृतिका परिणाम नहीं होता और परिणाम हुए बिना जगत्का सर्जन नहीं होता। व्यक्त जगत्में प्रकृतिका धर्म पुरुषपर आरोपित होता है और पुरुषका धर्म प्रकृतिपर आरोपित होता है, मूलत: दोनों पूर्णरूपेण पृथक् हैं। इनका संयोग अविवेकमूलक है और अनादिकालसे है। तत्त्वविचारके द्वारा इनके पार्थक्यका विवेक होनेपर संयोग टूट जाता है; परंतु उससे जगत् नहीं मिट जाता। जिस पुरुष-विशेषकी बुद्धिमें इस पार्थक्यकी यथार्थ अनुभूति होती है, उसके लिये जगत् नहीं रहता, वह पुरुष प्रकृतिके साथ सम्बन्धरहित होनेके कारण अपने नित्य शुद्ध स्वरूपमें स्थित हो जाता है।
कृतार्थं प्रति नष्टमप्यनष्टं तदन्यसाधारणत्वात्।
(योग० २। २२)
इसीलिये पुरुष अनेक हैं। यही सांख्यका सिद्धान्त है। भगवान् कहते हैं, पुरुष-प्रकृतिसे संसारकी उत्पत्ति हुई है, यह ठीक है; परंतु यही परम तत्त्व नहीं है, इन दोनोंसे परे एक मूल तत्त्व और भी है और ये दोनों उसी तत्त्वके द्विविध विकास हैं। वह मूल तत्त्व ही प्रकृति और पुरुषके रूपमें अपनेको अनेकों प्रकारसे व्यक्त करता है। पुरुष और प्रकृति दोनों ही उसकी (परा और अपरा) द्विविध प्रकृति हैं। नित्य परिवर्तनशील असंख्य पदार्थों और शक्तियोंसे तथा उनके संयोग-वियोग एवं प्रकाश-तिरोधानसे युक्त यह प्राकृत जगत् उसीकी (उन भगवान्की ही) अभिव्यक्ति है। जड अपरा प्रकृतिमें भगवान्का अक्षर भाव चित्स्वभाव पूर्णत: आवृत है और परा चेतन प्रकृतिमें वह निर्विकार अक्षर, असंग और प्रकाशशील चित्स्वभाव पूर्णतया सुरक्षित है और इसी भगवदंशरूप चेतनकी सत्ता और शक्तिद्वारा यह जगत् विधृत है। भगवान् इस बातको बतलाते हैं कि क्षेत्र-क्षेत्रज्ञका तत्त्वज्ञान भी मुझ परमेश्वरमें अनन्ययोगसे अव्यभिचारिणी भक्ति करनेसे होता है। (गीता १३। १०) देहमें स्थित पुरुष उस महेश्वरका ही प्रकाश है, वही परपुरुष उपद्रष्टा, अनुमन्ता, भर्ता, भोक्ता, परमात्मा और महेश्वर कहलाता है।
चौदहवें अध्यायमें फिर परम ज्ञान कहनेकी प्रतिज्ञा करके भगवान् यही बतलाते हैं कि ‘मैं ही बीजप्रद पिता हूँ, सब भूतोंकी उत्पत्ति मुझसे ही होती है। गुणोंके स्वरूपको जानकर पुरुष गुणातीत होता है। परंतु उसका साधन भी मेरी अव्यभिचारिणी भक्ति ही है। क्योंकि अविनाशी सनातन ब्रह्म, अमृत, सनातन धर्म और अखण्ड एकरस सुखकी प्रतिष्ठा मैं ही हूँ। ये सब मेरी ही अभिव्यक्तियाँ हैं। मैं ही इन सब स्वरूपोंमें प्रकट हूँ।’ पंद्रहवें अध्यायमें संसारवृक्ष और उसके रहस्यका वर्णन करनेके बाद कहते हैं—‘जो सूर्यगत तेज जगत्को प्रकाशित करता है, अग्नि और चन्द्रमामें जो तेज है वह सब मेरा ही है। मैं ही पृथ्वीमें प्रवेश करके अपनी ओजशक्तिसे सब भूतोंको धारण करता हूँ, मैं ही रसात्मक सोम होकर समस्त ओषधि-समूहको पुष्ट करता हूँ, मैं ही प्राणिमात्रके शरीरमें स्थित वैश्वानर अग्नि बनकर प्राणापानयुक्त हो उनके खाये हुए चतुर्विध अन्नको पचाता हूँ। अधिक क्या, मैं ही सब प्राणियोंके हृदयमें संनिविष्ट हूँ। मुझसे ही स्मृति, ज्ञान और अपोहन होता है। मैं ही समस्त वेदोंद्वारा जाननेयोग्य हूँ, मैं ही वेदान्तका कर्ता हूँ और मैं ही वेदोंको जाननेवाला भी हूँ। इस संसारमें क्षर और अक्षर ये दो प्रकारके पुरुष हैं, जिनमें समस्त अचेतन भूत-प्राणियोंके शरीररूप जगत् क्षर और कूटस्थ जीवात्मा अक्षर है। इन दोनोंसे उत्तम पुरुष तो अविनाशी, परमात्मा, महेश्वर दूसरा ही है जो तीनों लोकोंमें प्रवेश करके सबका भरण-पोषण करता है वह पुरुषोत्तम मैं हूँ, क्योंकि मैं क्षरसे तो अतीत हूँ और अक्षरसे उत्तम हूँ, इसलिये लोक और वेद मुझको ही ‘पुरुषोत्तम’ कहते हैं।’ (गीता १५। १२—१८)
सातवें अध्यायमें कथित अपरा प्रकृतिको ही यहाँ क्षर पुरुष बतलाया गया है और परा प्रकृति जीवात्माको ही अक्षर पुरुष। ‘पुरुषोत्तम’ वही समग्र ब्रह्म है जिसका यह द्विविध प्रकाश है। भगवान्का यह ‘समग्र’ रूप ही गीतोक्त पुरुषोत्तमरूप है। इस ‘पुरुषोत्तम’ स्वरूपका ही मूर्तिमान् नित्य सत्य मायातीत सौन्दर्य-माधुर्यसमुद्र परम दिव्यातिदिव्य मंगलविग्रह भगवान् श्रीकृष्ण हैं। भगवान् कहते हैं—
यो मामेवमसंमूढो जानाति पुरुषोत्तमम्।
स सर्वविद्भजति मां सर्वभावेन भारत॥
‘अर्जुन! जो पुरुष इस प्रकार तत्त्वत: मुझे ‘पुरुषोत्तम’ जान लेता है वही असंमूढ है और वही सब कुछ जान गया है। ऐसा ज्ञानी पुरुष सर्वभावसे मुझ (श्रीकृष्ण)-को ही भजता है।’ यही गुह्यतम शास्त्र है, इसको जानकर बुद्धिमान् पुरुष कृतकृत्य हो जाता है।
जो भगवान्को इस प्रकार नहीं जानते वही संमूढ हैं। उन्हींके लिये भगवान्ने कहा है, ‘अवजानन्ति मां मूढा:।’
इस विवेचनसे हम भगवान् श्रीकृष्णके स्वरूपका किंचित् अनुमान कर सकते हैं। भगवान् श्रीकृष्ण ही सच्चिदानन्द नित्य-शुद्धबुद्धमुक्त स्वभाव विज्ञानानन्दघन ब्रह्म हैं, भगवान् ही अक्षर अविनाशी आत्मा हैं, भगवान् ही हिरण्यगर्भ हैं, भगवान् ही सर्व देवता हैं, भगवान् ही जीवात्मा हैं, भगवान् ही प्रकृति हैं, भगवान् ही जगत् हैं, भगवान् ही जगद्व्यापी विभु अक्षर अव्यक्त सगुण निराकार ब्रह्म हैं, भगवान् ही यज्ञ हैं, भगवान् ही कर्म हैं, भगवान् ही जगत्के कर्ता, भर्ता, संहर्ता हैं, भगवान् ही साक्षी और भगवान् ही भोक्ता हैं, भगवान् ही शिव, विष्णु, ब्रह्मा, शक्ति, सूर्य आदिके अंशी हैं, भगवान् ही शिव, विष्णु, ब्रह्म, शक्ति, सूर्य आदि हैं। भगवान् ही श्रीराम, श्रीकृष्ण, श्रीनृसिंह आदि अवतार हैं, भगवान् ही समस्त सृष्टिके द्वारा विभिन्न रूपोंमें पूजित विभिन्न नामरूपधारी ईश्वरीय नियमविशेष हैं। भगवान् ही विश्वगुरु हैं और भगवान् ही वसुदेवपुत्र, देवकीनन्दन, नन्दनन्दन यशोदालाल, गोपीवल्लभ, मुरलीमनोहर, श्यामसुन्दर, राधारमण, रुक्मिणीपति, व्रजनवयुवराज, व्रजेश्वर, द्वारिकाधीश और व्यास-भीष्मादिके द्वारा पूज्य परमेश्वर हैं और वही भगवान् श्रीकृष्ण यहाँ इतिहासप्रसिद्ध ‘पार्थसखा’ या ‘तोत्त्रवेत्रैकपाणि पार्थसारथि’ हैं। इस प्रकार श्रीकृष्णके सर्वातीत और सर्वमय ‘समग्र’ स्वरूपको सम्यक्-रूपसे जानकर उनकी जो उपासना होती है, वही श्रीकृष्णकी यथार्थ उपासना है। (जाननेका अर्थ केवल बुद्धिद्वारा समझ लेना ही नहीं है उसकी प्रत्यक्ष अनुभूति होनी चाहिये।) यह श्रीकृष्ण न तो केवल एकदेशीय व्यक्त स्वरूपविशेष ‘वृष्णिवंशी’ वसुदेवसुत ‘वासुदेव’ हैं और न केवल शुद्ध-बुद्धमुक्त-स्वभाव ‘ब्रह्म’ ही हैं। ये दोनों ही उनकी अभिव्यक्तियाँ हैं। उनको एकदेशीय माननेमें भी उनके स्वरूपको अल्प और परिच्छिन्न करना पड़ता है। और केवल शुद्ध ब्रह्म माननेसे भी शुद्ध ब्रह्मके अतिरिक्त और सब कुछका कोई स्वरूप निश्चय नहीं होता। माया या मिथ्या कहकर टालनेसे भी काम नहीं चलता। इसीसे कहा जाता है कि सब कुछ नहीं है सो नहीं है, पर वह सब (ब्रह्मसमेत) भगवान्की ही अभिव्यक्ति है। सबको लेकर ही भगवान् हैं और वही पुरुषोत्तम हैं। भगवान् स्वयं ही कहते हैं—
मत्त: परतरं नान्यत् किंचिदस्ति धनंजय।
मयि सर्वमिदं प्रोतं सूत्रे मणिगणा इव॥
(गीता ७। ७)
ब्रह्मणो हि प्रतिष्ठाहममृतस्याव्ययस्य च।
शाश्वतस्य च धर्मस्य सुखस्यैकान्तिकस्य च॥
(गीता १४। २७)
‘धनंजय! मेरे सिवा और कुछ भी नहीं है, यह समस्त जगत् सूतमें सूतकी मणियोंकी भाँति मुझमें ही गुँथा है। जगत् ही क्यों; अव्यय परब्रह्म, अमृत, शाश्वत धर्म और ऐकान्तिक आनन्दका आधार भी मैं ही हूँ।’ सबका समन्वयात्मक यही गीतोक्त समग्र ब्रह्म या ‘पुरुषोत्तम’ का स्वरूप है और वे श्रीकृष्ण हैं। इसीलिये वेदान्तज्ञानके उपदेष्टा और ज्ञाता श्रीमधुसूदन सरस्वती कहते हैं—
वंशीविभूषितकरान्नवनीरदाभात्
पीताम्बरादरुणबिम्बफलाधरोष्ठात् ।
पूर्णेन्दुसुन्दरमुखादरविन्दनेत्रात्
कृष्णात्परं किमपि तत्त्वमहं न जाने॥