गीतामें विश्वरूप-दर्शन

श्रीमद्भगवद‍्गीताके एकादश अध्यायमें भगवान‍्के विश्वरूपदर्शनका प्रसंग है। प्रसंग बड़ा ही मधुर और हृदयग्राही है। जितना भी मन लगाकर पढ़ा जाता है उतना ही अधिक आनन्द आता है। परंतु यह समझमें आना बहुत ही कठिन हो जाता है कि भगवान‍्का यह विश्वरूप वस्तुत: था कैसा? अनेक महानुभावोंने इस प्रसंगपर विभिन्न मत प्रकट किये हैं। किन्हींका कहना है कि ‘यह भक्तिपूर्ण मनोहर काव्यमात्र है।’ किन्हींका कथन है कि ‘यह रूपक है, इसमें अर्जुनकी उस समयकी मानस-स्थितिका चित्रण किया गया है।’ कोई कहते हैं ‘अर्जुनको दिव्यचक्षु देनेका अर्थ है उसे सम्यक्-ज्ञान प्रदान करना और विश्वरूप दिखानेका तात्पर्य है उस ज्ञानको सुदृढ़ करना कि एक ब्रह्मसत्ताके अतिरिक्त और कुछ है ही नहीं, जो कुछ भी भासता है सब मायामात्र है।’ इसी प्रकार अन्यान्य बहुत-से महानुभावोंने और भी अनेकों प्रकारसे इसकी व्याख्या की है। गीताके इस विश्वरूप-दर्शनका वास्तविक रहस्य क्या है और विश्वरूपका यथार्थ स्वरूप कैसा है, इसको तो वे ही बतला सकते हैं जिनको इस विश्वरूप-दर्शनका सौभाग्य प्राप्त हुआ था। ऐसे सौभाग्यवान् एक अर्जुन ही हैं अथवा गौणरूपसे व्यासजीके द्वारा दिव्यदृष्टिप्राप्त संजय हैं। परंतु इस समय ये दोनों ही हमारे सामने नहीं हैं। ऐसी अवस्थामें विश्वरूपका रहस्य समझनेमें शास्त्र, संत, महात्मा और विद्वानोंके विचार तथा अपने अनुमानके सिवा और कोई उपाय नहीं है। यहाँ इन्हीं उपायोंके सहारे भगवान‍्के इस विश्वरूप-प्रसंगपर कुछ विचार किया जा रहा है। वस्तुत: लेखकको न तो यथार्थ रहस्यका ज्ञान है, न उनका रहस्योद्घाटनका दावा है और न रहस्योद्घाटनके विचारसे यह प्रयास ही किया जाता है। यह तो केवल ‘स्वान्त:सुखाय’ है। आशा है, अनुभवी विज्ञ विद्वान् इस बाल-चपलताके लिये कृपापूर्वक क्षमा करेंगे।

भगवान‍्का स्वरूप क्या और कैसा है, इसको वस्तुत: भगवान् ही जानते हैं। वे निर्गुण, सगुण, निराकार, साकार सभी कुछ हैं और सभीसे परे हैं। वे क्या हैं और क्या नहीं हैं, इसका विवेचन पूर्णरूपसे न तो आजतक कोई कर सके हैं, न आगे कर ही सकते हैं। भगवान‍्का जितना भी वर्णन है, सभी आंशिक है, परंतु आंशिक होनेपर भी है उन्हींका, इसीलिये सभी ठीक है। अनन्तका अन्त तो कौन पा सकता है। यथार्थमें भगवान‍्के स्वरूप, तत्त्व, रहस्य, प्रभाव और लीला-गुणादिका वर्णन उनके स्वरूपकी यथार्थ व्याख्याके लिये नहीं, वरं अपने कल्याणके लिये ही किया जाता है और इसी दृष्टिसे लेखकका भी यह क्षुद्र प्रयास है।

भगवान‍्की सृष्टि अनन्त है। हम जिस भूमण्डलमें हैं, यह तो एक सृष्टिका एक अत्यन्त क्षुद्र अंशमात्र है। नक्षत्रविज्ञानी तत्त्ववेत्ताओंका कहना है कि यह सूर्य हमारी पृथ्वीसे नौ करोड़ मीलकी दूरीपर स्थित है। परंतु ऐसे-ऐसे अति विशाल नक्षत्र भी हैं, जहाँकी आलोक-रश्मिको पृथ्वीतक पहुँचते चौदह करोड़ वर्ष लग जाते हैं। जान रखना चाहिये कि वैज्ञानिकोंकी गणनाके अनुसार आलोक-रश्मिकी गति (Speed) प्रति सेकेण्ड एक लाख छियासी हजार मील है। अब हिसाब लगाइये कि इतनी तेज चालसे चलनेवाली आलोक-रश्मिको जिस नक्षत्रसे यहाँतक आते-आते चौदह करोड़ वर्ष लग जाते हैं, वह यहाँसे कितनी दूरीपर होगा। ऐसे अगणित नक्षत्र हमारे विश्वमें हैं, ये सब नक्षत्र चौदह* प्रधान लोकोंके अन्तर्गत विभिन्न लोकमात्र हैं और ऐसे विश्वोंकी गणना असंख्य है।

देवीभागवतमें कहा है—

संख्या चेद् रजसामस्ति विश्वानां न कदाचन।

ब्रह्मविष्णुशिवादीनां तथा संख्या न विद्यते।

प्रतिविश्वेषु सन्त्येवं ब्रह्मविष्णुशिवादय:॥

‘धूलके कणोंकी गिनती हो सकती है, परंतु विश्व-ब्रह्माण्डोंकी नहीं हो सकती। इन ब्रह्माण्डोंमेंसे प्रत्येक ब्रह्माण्डमें पृथक्-पृथक् ब्रह्मा, विष्णु और शिव हैं। अतएव जिस प्रकार ब्रह्माण्डोंकी संख्या नहीं है, इसी प्रकार ये ब्रह्मा, विष्णु और शिवादि भी असंख्य हैं।’

ये सब ब्रह्मा, विष्णु और शिव जिनके अंशावतार हैं, वे अवतारी एक महेश्वर हैं। उन्हींको पुरुषोत्तम, महाविष्णु, महाशिव, श्रीकृष्ण, श्रीराम, महाशक्ति आदि कहते हैं।

असंख्याताश्च रुद्राख्या असंख्याता: पितामहा:।

हरयश्च ह्यसंख्याता एक एव महेश्वर:॥

(लिंगपुराण)

‘असंख्य रुद्र हैं, असंख्य ब्रह्मा हैं, असंख्य विष्णु हैं, परंतु महेश्वर एक ही हैं।’ सृष्टिके प्रकाशके समय ये सब ब्रह्मा, विष्णु, शिव अपने-अपने ब्रह्माण्डमें प्रकट हो जाते हैं और लयके समय पुन: उन सृष्टियोंके साथ ही महेश्वरमें प्रवेश कर जाते हैं। ऐसी सृष्टियाँ असंख्य हैं—

यथा तरंगा जलधौ तथेमा: सृष्टय: परे।

उत्पत्योत्पत्य लीयन्ते रजांसीव महानिले॥

‘जैसे समुद्रमें अपार तरंगें उठती हैं वैसे ही परमेश्वरमें ये सृष्टियाँ महान् वायुमें रज:कणोंकी भाँति उत्पन्न और विलीन होती रहती हैं।’

ब्रह्माण्डों और सृष्टियोंका यह हाल है। ऐसे-ऐसे अनन्त कोटि ब्रह्माण्ड परम महिमामय महेश्वरके उस विराट् देहके क्षुद्रातिक्षुद्र अंगोंमें सुशोभित हैं। महेश्वरका वह विराट् देह ऐसा विलक्षण है कि अनन्त सृष्टिकी समस्त दशाओंका उसके अंदर साक्षात् समावेश है। उसमें समस्त कालोंके, समस्त सृष्टियोंके, सृष्टियोंके अंदर होनेवाली समस्त भूत, वर्तमान और भविष्यकी घटनाओंके प्रत्यक्ष दृश्य उपस्थित हैं। कालभेद और देशभेद हमारी दृष्टिमें हैं। भगवान‍्में भूत या भविष्यत् नहीं है, वहाँ सभी कुछ वर्तमान है और इसी प्रकार सम्पूर्ण देश उनके अन्तर्गत एक ही साथ निहित हैं। जहाँ जो कुछ हो चुका है, हो रहा है, होगा और जहाँ जो कुछ था, वर्तमान है और आगे होगा, वह—क्रिया और वस्तु—सब एक ही साथ महेश्वरके विराट् स्वरूपमें स्थित हैं। समस्त सृष्टियोंके साथ महेश्वरका अच्छेद्य सम्बन्ध है; क्योंकि सारी सृष्टियाँ महेश्वरके ही ऐश्वर योगकी लीला या खेल हैं। महेश्वरका सम्पूर्ण ऐश्वर योग अपनी सम्पूर्ण शक्तियों और क्रियाओंसमेत जिस एक ही महान् दिव्य स्वरूपमें नित्य विराजित है वही महेश्वरका ऐश्वर रूप है। उसीको विराट् या विश्वरूप कहते हैं। यह स्वरूप रूपक या केवल ज्ञानका विषय नहीं है। अंशत: चक्षुओंका विषय ही है। हम रात-दिन जो कुछ देखते-सुनते हैं—करते-कराते हैं, यह भी उस महान् विराट् स्वरूपका ही एक अत्यन्त क्षुद्रतम अंश है। परंतु यह मायाकी आँखोंसे मायाके राज्यमें देखा जाता है, इसलिये अदिव्य है। जिनको भगवान् अपने उस दिव्य तेजोमय, आद्य (सनातन) अनन्त, मन-बुद्धि-वचनके अगोचर लोकोत्तर महान् चमत्कारपूर्ण विराट् स्वरूपकी किंचित् झाँकी कराना चाहते हैं उन्हें वे अपनी दिव्यदृष्टि दे देते हैं। बिना दिव्यदृष्टिके उस महान् तेजोमय स्वरूपको कोई देख ही नहीं सकता। देखनेपर भी यह तो सम्भव ही नहीं है कि उसके समस्त अंग-प्रत्यंगोंके समस्त अवयवोंको और उनमें संलग्न सामग्रीको सम्पूर्णरूपसे कोई देख सके। जिन-जिनको भगवान‍्ने वह स्वरूप दिखलाया है, सबने उसके विभिन्न अंश ही देखे हैं। यहाँ एक बात और स्पष्ट कर देनी है कि ‘ईश्वराणां परमं महेश्वरम्’, ‘सर्वलोकमहेश्वरम्’, ‘ब्रह्मणो हि प्रतिष्ठाहम्’ आदि रहस्यमय वाक्योंसे जिन ईश्वरोंके महान् ईश्वर, पुरुषोत्तम भगवान‍्का निर्देश किया गया है, उन पूर्ण पुरुषोत्तम समग्र ब्रह्म स्वयं भगवान‍्के अतिरिक्त दूसरे कोई भी इस विश्वरूपको नहीं दिखला सकते। पूर्णावतार भगवान‍्ने श्रीरामरूपसे माता कौसल्याजीको तथा भक्तराज काकभुशुण्डिजीको इस स्वरूपकी किंचित् झाँकी करायी थी और श्रीकृष्णरूपमें गोकुलमें यशोदा मैयाको, कुरुक्षेत्रके रणांगणमें भक्तराज अर्जुनको, कौरवोंकी राजसभामें भीष्म, द्रोणाचार्य आदि और तपोधन मुनिगणोंको एवं ऋषियोंके आश्रमोंमें गुरुभक्त मुनिश्रेष्ठ श्रीउत्तंकजीको इस स्वरूपके दर्शन कराये गये थे। रामचरितमानसका वर्णन देखिये—बालकाण्डकी कथा है। माता कौसल्याजी शिशुरूप श्रीरामजीको नहलाकर शृंगार करके पालनेमें पौढ़ा देती हैं और स्वयं इष्टदेवकी पूजाके लिये स्नान करके उनकी पूजा करती हैं और भोग चढ़ाती हैं। फिर किसी कार्यसे चौकेमें जाकर लौटकर देखती हैं तो रामजी भोग लगाते दिखायी देते हैं। कौसल्याजी घबराकर पालनेके समीप जाती हैं तो वहाँ भी श्रीरामजीको उसमें सोये पाती हैं, फिर यहाँ आती हैं तो यहाँ प्रसाद पाते देखती हैं। एक ही साथ दो स्थानोंमें श्रीरामजीको देखकर माता घबरा उठती हैं। इतनेमें प्रभु हँस देते हैं और माताको अपना अद‍्भुत अखण्ड विश्वरूप दिखलाते हैं। विश्वरूप देखकर माता पुलकित हो जाती हैं। वे अपनी आँखें मूँद लेती हैं और सिर नवाने लगती हैं। बस, विश्वरूपका उपसंहार हो जाता है और भगवान् पुन: शिशुरूप बन जाते हैं—

तन पुलकित मुख बचन न आवा।

नयन मूदि चरननि सिरु नावा॥

बिसमयवंत देखि महतारी।

भए बहुरि सिसु रूप खरारी॥

श्रीअवधपुरीमें बालरूप श्रीरामजीके साथ काकभुशुण्डिजी खेल रहे हैं। श्रीरामजीने काकजीको पकड़नेके लिये हाथ फैलाया। वे उड़े, हाथ पीछे-पीछे चला। लोक-लोकान्तरोंमें, जहाँतक गति थी, काकभुशुण्डि गये; परंतु दो अंगुलके बीचसे सर्वत्र श्रीरामजीके हाथको अपने पीछे देखा। उन्होंने डरकर आँखें मूँद लीं। फिर जब नेत्र खोले तो अपनेको अयोध्याजीमें पाया। इतनेमें भगवान‍्ने हँस दिया, भुशुण्डिजी खिंचकर उनके मुखमें प्रवेश कर गये और अंदर भगवान‍्के विराट्‍रूपके भिन्न-भिन्न स्तरोंमें घूमने लगे। अन्तमें घबरा उठे, व्याकुल हो गये, पूरा न देख सके, तब श्रीरामजी हँसे और उनके हँसते ही वे बाहर आ गये।

देखि कृपाल बिकल मोहि बिहँसे तब रघुबीर।

बिहँसतहीं मुख बाहेर आयउँ सुनु मतिधीर॥

श्रीकृष्णरूपमें सबसे पहले यशोदा मैयाको मुखमें दर्शन कराये। यशोदाजीने श्यामसुन्दरके छोटे-से मुखमें विराट्स्वरूप देखा। यहाँतक कि उसके एक कोनेमें गोकुल गाँवके श्रीनन्दरायजीके घरमें अपनेको भी देखा। वे मोहित हो गयीं। आगे न देख सकीं। तब भगवान‍्ने अपना वह रूप संवरण कर लिया। यह कथा श्रीमद्भागवतके दशम स्कन्धमें है।

कौरवोंकी राजसभामें जब दुर्योधनने दूतरूपसे पधारे हुए भगवान् श्रीकृष्णको कैद करनेकी दुरभिसन्धि की, तब आप खिलखिलाकर हँस पड़े। हँसते ही विराट्स्वरूपका प्राकट्य हो गया। उस महान् रूपको देखते ही सब राजाओंने मारे डरके घबराकर आँखें मूँद लीं। वे कुछ भी न देख सके। गुरु द्रोण, भीष्म, विदुर, संजय और तपोमूर्ति ऋषि-मुनियोंने भगवान‍्के उस स्वरूपको देखा; क्योंकि भगवान‍्ने उनको दिव्य दृष्टि दे दी थी—

प्रादात्तेषां स भगवान् दिव्यचक्षुर्जनार्दन:।

धृतराष्ट्रने भी दिव्य दृष्टिके लिये प्रार्थना की, तब भगवान‍्ने कृपा करके उनको भी दिव्य दृष्टि देकर अपना स्वरूप दिखलाया। तदनन्तर पृथ्वी हिल उठी, समुद्र खलबला उठे, तब भगवान‍्ने अपना वह विराट्स्वरूप संवरण कर लिया। यह कथा महाभारतके उद्योगपर्वमें है।

इसके बाद भीष्मपर्वमें श्रीमद्भगवद‍्गीताका विश्वरूप-प्रदर्शन-प्रसंग है। इसपर आगे चलकर विचार करना है। इसके अनन्तर अश्वमेधपर्वमें उत्तंक ऋषिको विराट्स्वरूप-दर्शन करानेकी कथा मिलती है। महाभारतयुद्धमें भगवान् श्रीकृष्णको कारण मानकर उत्तंक ऋषि भगवान‍्को शाप देनेको तैयार हो गये। भगवान‍्ने कहा—‘मुनिवर! आप तपस्वी हैं, परंतु मुझे शाप देनेसे आपका तप नष्ट हो जायगा। आपके शापका मुझपर कुछ भी प्रभाव न होगा।’ इसके बाद मुनिके पूछनेपर भगवान‍्ने उनको अपना स्वरूप-तत्त्व समझाया और फिर मुनिकी प्रार्थनापर उनको अपना दिव्य विश्वरूप दिखलाया। वैशम्पायनजी कहते हैं—

तत: स तस्मै प्रीतात्मा दर्शयामास तद्वपु:।

शाश्वतं वैष्णवं धीमान् ददृशे यद्धनंजय:॥

(५५। ४)

‘तब उनपर प्रसन्न होकर भगवान् श्रीकृष्णने उनको उसी सनातन वैष्णव स्वरूपके दर्शन कराये; जिसके बुद्धिमान् अर्जुनने दर्शन किये थे।’

भगवान‍्का विराट्‍रूप देखकर मुनि सहम गये और बोले—

संहरस्व पुनर्देव रूपमक्षय्यमुत्तमम्।

पुनस्त्वां स्वेन रूपेण द्रष्टुमिच्छामि शाश्वतम्॥

(५५। ९)

‘देव! आप अपने इस अक्षय, उत्तम स्वरूपको समेट लीजिये। मैं आपको फिर उसी अपने सनातन श्रीकृष्णरूपमें देखना चाहता हूँ।’ तब भगवान‍्ने अपना विराट्‍रूप संवरण करके उन्हें फिर श्रीकृष्णरूपमें दर्शन दिये।

यहाँ कई प्रकारकी शंकाएँ होती हैं, उनमें प्रधान ये हैं—

१—यदि विराट् या विश्वरूप एक ही है तो सबको अलग-अलग रूपोंके दर्शन क्यों हुए? कौसल्याजी और काकभुशुण्डिजीने रामजीको देखा, यशोदा मैयाने गोकुलसमेत अपनेको देखा, अर्जुनने भीष्म-द्रोणका चूर्ण होना देखा, कौरव-सभामें भीष्मादिने सात्यकि और पाण्डवोंको भी भगवान‍्के शरीरमें देखा। एक ही स्वरूपमें इतने भेद क्यों?

२—यदि विराट्‍रूप एक नहीं है और समय-समयपर प्रकट होनेवाले अनेक हैं, तो क्या वे सभी नित्य हैं। यदि नित्य नहीं हैं और उन्हींमें गीतोक्त विश्वरूप भी है तो फिर भगवान‍्ने उसको ‘आद्य’ (सनातन) और ‘अनन्त’ तथा उत्तंक मुनिने ‘अक्षय’ (अविनाशी) कैसे बतलाया?

३—यदि सब एक ही है तो भगवान् श्रीकृष्ण अर्जुनसे स्पष्ट ऐसा क्यों कह रहे हैं कि यह रूप तेरे सिवा न किसीने आजतक देखा और न आगे कोई देख सकता है—‘त्वदन्येन न दृष्टपूर्वम्’, ‘त्वदन्येन न द्रष्टुं शक्य:’। यदि ऐसी बात है तो दूसरोंने उसे कैसे देखा? यदि कहें कि दूसरे किसीने नहीं देखा तो फिर वैशम्पायनजी यह कैसे कह सकते हैं कि उत्तंकने वही रूप देखा जो अर्जुनने देखा था? विचार करनेपर पता लग जायगा कि इन प्रश्नोंका उत्तर पहले ही दिया जा चुका है। समझनेके लिये यहाँ फिरसे उसीको दोहराया जाता है। भगवान् महेश्वरका एक नित्य अनन्त विराट्‍रूप है। जिसमें भूत, वर्तमान, भविष्य—सभी कालोंकी सभी सृष्टियोंके तथा सभी ब्रह्माण्डोंके पूरे कार्य साक्षात् रूपसे रहते हैं। वह विराट्‍रूप स्वरूपत: एक होनेपर भी जब किन्हींको दिखाया जाता है, तब उस स्वरूपके अपरिमित तेज, प्रभाव, असीम और अनन्त विस्तार आदि ऐश्वर्यका स्तर तो न्यूनाधिकरूपसे अवश्य ही दिखलाया जाता है; परंतु सृष्टिचक्रकी प्राय: उन्हीं घटनाओंके स्तर दिखलाये जाते हैं, जिनका देखनेवालेसे सम्बन्ध होता है और जिसके दिखलानेकी आवश्यकता समझी जाती है। पूर्णरूप तो अनन्त और अप्रमेय है—उसे तो कोई देख ही नहीं सकता। जैसे सिनेमाकी कोई बड़ी भारी फिल्म हो और उसमें बहुत ही लम्बी घटनावलियोंके चित्र अंकित हों और उसमेंसे जैसे एकके बाद दूसरे दृश्य देखनेवालोंके सामने आते हों। इसी प्रकार महेश्वरके विराट्स्वरूपके अनन्त स्तर हैं और भगवान् उनमेंसे जिसको जिस स्तरसे जिस स्तरके दर्शन कराना चाहते हैं उसीके कराते हैं। फिर या तो स्वयं ही उसे समेट लेते हैं या देखनेवाला ही नहीं देखना चाहता। इससे वह वहींतक देख पाता है। इससे यह पता लगता है कि मूलत: स्वरूप एक ही है; परंतु वह अनन्त है, वह सब नहीं देखा जा सकता। कौसल्याजी, काकभुशुण्डिजी, यशोदा मैया, भीष्मादि, अर्जुन और उत्तंक—इन सबने देखा उस एक ही विराट्स्वरूपको; परंतु अप्रमेय होनेसे तथा आवश्यकता न होनेके कारण पूरा कोई न देख सके और इसीके साथ-साथ सबने देखा अपनेसे सम्बन्ध रखनेवाले दृश्योंके स्तरोंको ही। इसलिये वस्तुत: एकको देखनेपर भी उनके दर्शनोंमें भेद रहना उचित ही है और इसीलिये अर्जुनसे भगवान‍्का यह कहना भी सत्य है कि यह रूप—अर्थात् तुमने लीलाका जो दृश्य देखा उस दृश्यसे युक्त ऐसा विश्वरूप—तुम्हारे सिवा पहले किसीने नहीं देखा और आगे भी कोई नहीं देख सकता। और चूँकि स्वरूप तत्त्वत: एक ही है, इससे वैशम्पायनजीका यह कथन भी ठीक ही है कि अर्जुनको जो रूप दिखलाया था वही उत्तंकजीको दिखलाया। भगवान‍्का यह विराट्स्वरूप जिस अनादि और अचिन्त्यकालसे सृष्टिचक्र चला, तबसे है और जबतक यह चक्र रहेगा, तबतक रहेगा। इससे उसको ‘आद्य’ (सनातन), ‘अनन्त’ और ‘अक्षय’ (अविनाशी) कहना भी उचित ही है; क्योंकि सम्पूर्ण सृष्टिचक्रोंका आधार यही स्वरूप है। सब इसीसे उत्पन्न होते हैं, इसीमें निवास करते हैं और इसीमें लय हो जाते हैं।

अब गीताजीके प्रसंगपर ध्यान दीजिये—

दसवें अध्यायमें संक्षेपसे विभूतियोंका वर्णन करके जब भगवान‍्ने अन्तमें यह कहा कि ‘अर्जुन! बहुत जाननेमें क्या है, तुम यही समझ लो कि इस सारे जगत‍्को मैंने अपने एक अंशमात्रमें धारण कर रखा है।’ बस, तभी अर्जुनके मनमें यह आकांक्षा जाग उठी कि जिस भगवान‍्के एक अंशमें यह उत्पत्ति विनाशमय सारा ‘जगत्’ स्थित है, उन भगवान‍्का पूर्णरूप अवश्य देखना चाहिये। यहाँपर यह ध्यान रखना चाहिये कि जन्मना, रहना, बढ़ना, घटना, रूपान्तर होना और नाश होना—ये छ: अवस्थाएँ जैसे व्यष्टि शरीरकी हैं, वैसे ही समष्टि शरीरकी भी हैं। इन छहों अवस्थावाले पदार्थोंसे युक्त छहों अवस्थावाली जो सृष्टि है उसीको जगत् कहते हैं। इसलिये ‘जगत्’ शब्दसे जगत‍्में होनेवाले सृजन, पालन और संहार, जगत‍्के भूत, वर्तमान और भविष्य आदि सभी कुछ आ जाते हैं। ऐसे जगत‍्को एक अंशमें धारण करनेवाले भगवान‍्को सर्वांश पूर्णस्वरूपमें देखनेकी इच्छा होनेसे ग्यारहवें अध्यायके आरम्भमें ही अर्जुन कहते हैं—‘भगवन्! मुझपर कृपा करके आपने परम गोपनीय ऐसा उपदेश दिया कि मेरा मोह नष्ट हो गया। मैंने भूतोंकी उत्पत्ति और प्रलयका विस्तार और आपके अविनाशी माहात्म्यको भी सुना। परमेश्वर! पुरुषोत्तम! (यहाँ परमेश्वर और पुरुषोत्तम—ये दोनों ही सम्बोधन ध्यान देनेयोग्य हैं) अब मैं आपका वह ‘ऐश्वर रूप’ प्रत्यक्ष देखना चाहता हूँ। यदि मैं उसके दर्शन करनेयोग्य समझा जाऊँ तो मुझे योगेश्वर! आप अपने उस अव्यय (अविनाशी) स्वरूपके दर्शन कराइये।’

इसके बाद भगवान् अपने विश्वरूपका संक्षेपमें वर्णन करते हुए अर्जुनको दिव्य दृष्टि प्रदान करते हैं और अपना ऐश्वर योग (इसकी आंशिक सूचना नवें अध्यायमें दी जा चुकी थी) प्रत्यक्ष पूर्णरूपसे देखनेकी आज्ञा करके स्वरूप प्रकट करते हैं। संजय यहाँ कहते हैं कि ‘महायोगेश्वर भगवान‍्ने तब अर्जुनको वह श्रेष्ठ ऐश्वर रूप दिखलाया। इसके बाद श्लोक १० से १३ तक संजयने भगवान‍्के उस दिव्य विश्वरूपका जो वर्णन किया है उससे पता लगता है कि आरम्भमें भगवान‍्ने अर्जुनको वही स्तर दिखलाया जो ऐश्वर्य और सौन्दर्यमें पूर्ण था, उसे देखकर अर्जुन आश्चर्य और हर्षमें डूब गये (डरे नहीं) और पुलकित होकर तथा प्रणाम करके मुग्ध होकर उनके स्वरूपका वर्णन करने लगे। सिनेमाके फिल्मकी भाँति विराट्स्वरूपके स्तर-के-स्तर एकके बाद एक उनके दिव्य नेत्रोंके सामने आ रहे हैं, सिनेमाके जड, विनाशी, क्षुद्र फिल्मके साथ भगवान‍्के उस दिव्य असीम अनन्त रूपकी तुलना किसी प्रकार भी नहीं हो सकती। (समझनेके लिये यह संकेतमात्र किया गया है। वस्तुत: इससे उसकी किसी अंशमें भी उपमा नहीं दी जा सकती।) अर्जुन देखते हैं और वैसा ही वर्णन करते जाते हैं। विश्वरूपका कहीं ओर-छोर न देखकर १६ वें श्लोकमें अर्जुनके नेत्र और मन-बुद्धि थकित हो जाते हैं। हार मान बैठते हैं और वे कहते हैं—‘मैं सब ओर आपके अनन्तरूपको देखता हूँ। आपका न कहीं आदि है, न मध्य है और न अन्त है।’ फिर १७ वें श्लोकमें कहते हैं, आप अप्रमेय-स्वरूप हैं, आपके विस्तारका कहीं पार ही नहीं है। इसके बाद १८ वेंमें प्रभावका वर्णन करके १९ वेंमें अर्जुन भगवान‍्के उस चन्द्र-सूर्यके नेत्रवाले, प्रज्वलित अग्निरूप मुखवाले और अपने तेजसे जगत‍्को तपानेवाले रूपको और श्लोक २० से २२ तक भगवान‍्के स्वरूपकी अत्यन्त उग्रतासे तीनों लोकोंको व्यथित, देवताओंको भयभीत, ऋषियोंका स्तवनपरायण और रुद्र, आदित्य आदिको विस्मित देखते हैं। ज्यों-ज्यों विश्वरूपके उग्र स्तर नेत्रोंके सामने आते हैं, त्यों-ही-त्यों अर्जुन डरते जाते हैं और २३वें श्लोकमें स्पष्ट कह देते हैं कि आपके महान् उग्र रूपको देखकर सब लोकोंके साथ-साथ मैं भी व्याकुल हो रहा हूँ। इससे पता लगता है कि अर्जुन अब पहलेकी भाँति हर्षितचित्त नहीं हैं, वरं डर रहे हैं और २४ वेंमें तो यहाँतक कह डालते हैं कि डरके मारे मैं अपनेमें ‘धीरज और शान्ति नहीं देख पाता हूँ’—‘धृतिं न विन्दामि शमं च।’ फिर २५से ३० तक वे और भी उग्र रूप देखते हैं और ३१वें श्लोकमें अत्यन्त डरकर नमस्कार करते हुए भगवान‍्से प्रसन्न होनेके लिये प्रार्थना करते हैं और पूछते हैं कि ‘महाराज! बतलाइये, आप कौन हैं और क्या करना चाहते हैं?’

बस, यहीं विश्वरूपके अगले स्तरोंके दर्शन बंद हो जाते हैं। अर्जुनने विश्वरूपके जिस भयंकर स्तरको देखकर घबराकर उनसे प्रार्थना की, उसी रूपमें स्थित रहकर भगवान् कहने लगे कि ‘मैं काल हूँ, सबका संहार करनेमें प्रवृत्त हुआ हूँ। ये सब मेरे द्वारा मारे हुए हैं, तू निमित्तमात्र बन जा’ इत्यादि। इसके बाद भी अर्जुनके सामने वही उग्र रूप बना रहता है। डरे हुए अर्जुन भगवान‍्की स्तुति आरम्भ करते हैं, नमस्कार करते हैं और पहले की हुई अवज्ञाओंके लिये पश्चात्ताप करते हुए क्षमा चाहते हैं। एवं अन्तमें विश्वरूपका संवरण करके अपना चिरपरिचित सौन्दर्य-माधुर्यसे युक्त गदा-चक्रधारी चतुर्भुजरूप दिखानेके लिये विनय करते हैं। अर्जुनके इस स्तवनमें पहले ३६ वें श्लोकके बाद ४६ वें श्लोकतक कहीं विश्वरूपके स्वरूपका वर्णन नहीं है। इसका यही तात्पर्य है कि अब विश्वरूपके अन्य स्तरोंके दर्शन रुक गये हैं, केवल वही भयंकर उग्र रूप अर्जुनके सामने है। भगवान‍्का यहींतक अर्जुनको दर्शन करानेका प्रयोजन था और अर्जुन भी इससे आगे देखना नहीं चाहते थे। बिना चाहे भगवान् दिखाते भी क्यों?

इसके बाद भगवान् अपने इस विश्वरूपको परम तेजोमय, आद्य (आदिरूप-सनातन) और अनन्त कहकर इसकी प्रशंसा करते हैं और अर्जुनको आश्वासन देते हुए कहते हैं कि मैंने प्रसन्न होकर ही तुमको ऐसा (वर्तमान महाभारतके वीरोंके संहारके दृश्यसे युक्त) प्रभावशाली महान् महिमामय स्वरूप दिखलाया है, जो अबतक किसीने नहीं देखा तथा आगे कोई देख नहीं सकता। तू मेरे इस घोर रूपको देखकर व्याकुल मत हो। मूढ़ता छोड़ दे। अब तेरे इच्छानुसार इस रूपका संवरण करके मैं तुझे वही चतुर्भुज रूप दिखलाता हूँ। तू उसे देख!

इस प्रकार यह प्रसंग समाप्त होता है। यहाँ दो-तीन शंकाएँ और की जाती हैं—

१-इतना बड़ा भगवान‍्का अप्रमेय स्वरूप जरासे रथपर भगवान‍्ने अर्जुनको कैसे दिखलाया?

२-भगवान‍्का विश्वरूप यदि नित्य, अविनाशी और सनातन है तो उसमें ये विनाशी शरीर आदि प्राकृतिक पदार्थ कैसे रहते हैं?

३-सृष्टिका भविष्य पहलेसे ही निश्चित है और भगवान् उसे जानते हैं, तो फिर अमुक कर्म करो, अमुकका अमुक फल होगा, यह क्यों कहा जाता है?

इन शंकाओंका समाधान क्रमश: यह है कि १-भगवान् सर्वशक्तिमान् हैं, वे अवकाशमें अनवकाश, अनवकाशमें अवकाश कर सकते हैं, सूईके छेदसे सृष्टिको निकाल सकते हैं। उनके लिये कुछ भी अशक्य नहीं है, उनके लिये जरा-से स्थानमें अपना विराट्स्वरूप दिखलाना कौन बड़ी बात है?

२-यह सारा जगत् भगवान‍्का खेल है, खेलकी समस्त वस्तुएँ भगवान‍्के विराट् शरीरमें ही तो रहती हैं। क्षर, अक्षर सब उस खेलकी वस्तुएँ हैं, इसलिये उनका विश्वरूपमें दीखना उचित ही है। इससे उनके अविनाशीपनमें कोई बाधा नहीं आती।

३-हमारे लिये तो भविष्य निश्चित नहीं है; हमें तो अपने कर्मका ही फल मिलता है। परंतु भगवान‍्के लिये भविष्य कोई वस्तु ही नहीं है। जहाँ जो कुछ है सब भगवान‍्की दृष्टिमें है। वे त्रिकालज्ञ हैं, सर्वज्ञ हैं। अनिश्चित और निश्चित दोनोंको ही वे जानते हैं। कैसे जानते हैं इस बातका उत्तर उनके सिवा और कौन दे सकता है?

अन्तमें यह निवेदन है कि जो महानुभाव इस प्रसंगको काव्य, रूपक, ज्ञान-प्रदान या माया कहते हैं, वे भी अपनी-अपनी दृष्टिसे सत्य ही कहते हैं; क्योंकि यह महान् सुन्दर काव्य है ही। रूपक बन ही सकता है। ज्ञान-प्रदान तो निस्सन्देह था ही; और सब कुछ भगवान‍्की लीला है, तब उसे भगवान‍्की माया बतावें तो क्या अनुचित है। लीला और भगवान‍्की स्व-माया एक ही चीज तो है।

किसी भी बहाने भगवान‍्के गुणोंकी चर्चा करना परम कल्याणकारक है, इसी उद्देश्यसे यह सब लिखा गया है। अज्ञताके लिये पुन: क्षमा-प्रार्थना है।