हमारा पुराण-साहित्य

हमारा पुराण-साहित्य बड़े महत्त्वका है। यह सम्भव है कि उसमें समय-समयपर यत्किंचित् परिवर्तन-परिवर्द्धन किया गया हो, परंतु मूलत: तो वह वेदकी भाँति भगवान‍्का नि:श्वासरूप ही है। शतपथ ब्राह्मणमें आया है—

स यथार्द्रैधाग्नेरभ्याहितात्पृथग्धूमा विनिश्चरन्त्येवं वा अरेऽस्य महतो भूतस्य नि:श्वसितमेतद्यदृग्वेदो यजुर्वेद: सामवेदोऽथर्वांगिरस इतिहास: पुराणं विद्या उपनिषद: श्लोका: सूत्राण्यनुव्याख्यानानि व्याख्यानान्यस्यैवैतानि सर्वाणि नि:श्वसितानि।*

(१४। २। ४। १०)

‘गीले काठमें उत्पन्न अग्निसे जिस प्रकार पृथक् धूआँ निकलता है, उसी प्रकार ये जो ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद, अथर्वांगिरस (अथर्ववेद), इतिहास, पुराण, विद्याएँ, उपनिषद्, श्लोक, सूत्र, मन्त्रविवरण और अर्थवाद हैं, वे सब महान् परमात्माके ही नि:श्वास हैं।’ अर्थात् बिना ही प्रयत्नके परमात्मासे उत्पन्न हुए हैं—

‘... अप्रयत्नेनैव पुरुषनि:श्वासो भवत्येवम् ...’ (शांकरभाष्य) वेदोंके संहिता, ब्राह्मण, आरण्यक और उपनिषदोंमें भगवान् विष्णु, शिव आदिके, भगवान‍्के विभिन्न अवतारोंके तथा पुराणवर्णित अनेकों कथाओंके प्रसंग आये हैं।

अथर्ववेदमें आया है—

ऋच: सामानि छन्दांसि पुराणं यजुषा सह।

उच्छिष्टाज्जज्ञिरे सर्वं दिवि देवा दिवश्चिता:॥

(११। ७। २४)

‘यज्ञसे यजुर्वेदके साथ ऋक्, साम, छन्द और पुराण उत्पन्न हुए।’ छान्दोग्योपनिषद्‍‍में नारदजीने सनत्कुमारसे कहा है—

‘स होवाच ऋग्वेदं भगवोऽध्येमि यजुर्वेदं सामवेदमाथर्वणं चतुर्थमितिहासपुराणं पंचमं वेदानां वेदम्—’ (७। ११)

‘मैं ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद, चौथे अथर्ववेद और पाँचवें वेद इतिहास-पुराणको जानता हूँ।’

मनु महाराजने तो पुराणकी मंगलमयताको जानकर आज्ञा ही दी है—

स्वाध्यायं श्रावयेत् पित्र्ये धर्मशास्त्राणि चैव हि।

आख्यानानीतिहासांश्च पुराणान्यखिलानि च॥

(३। २३२)

‘श्राद्धादि पितृकार्योंमें वेद, धर्मशास्त्र, आख्यान, इतिहास, पुराण और उनके परिशिष्ट भाग सुनाने चाहिये।’

ब्रह्माण्डपुराणके प्रक्रियापादमें ‘पुराण’ शब्दकी निरुक्ति इस प्रकार की गयी है—

यो विद्याच्चतुरो वेदान् सांगोपनिषदान् द्विज:।

न चेत् पुराणं संविद्यान्नैव स स्याद्विचक्षण:॥

इतिहासपुराणाभ्यां वेदं समुपबृंहयेत्।

बिभेत्यल्पश्रुताद् वेदो मामयं प्रहरिष्यति॥

यस्मात् पुरा ह्यनक्तीदं पुराणं तेन तत्स्मृतम्।

निरुक्तमस्य यो वेद सर्वपापै: प्रमुच्यते॥

(अध्याय १। १७०-१७१,१७३)

‘अंग और उपनिषद्के सहित चारों वेदोंका अध्ययन करके भी यदि पुराणको नहीं जाना गया तो ब्राह्मण विचक्षण नहीं हो सकता; क्योंकि इतिहास-पुराणके द्वारा ही वेदकी पुष्टि करनी चाहिये। यही नहीं, पुराणज्ञानसे रहित अल्पज्ञसे वेद डरते रहते हैं; क्योंकि ऐसे व्यक्तिके द्वारा ही वेदका अपमान हुआ करता है। अत्यन्त प्राचीन तथा वेदको स्पष्ट करनेवाला होनेसे ही इसका नाम ‘पुराण’ हुआ है। पुराणकी इस व्युत्पत्तिको जो जानता है, वह समस्त पापोंसे मुक्त हो जाता है।’

इस प्रकार पुराणोंकी अनादिता, प्रामाणिकता तथा मंगलमयताका स्थल-स्थलपर उल्लेख है और वह सर्वथा सिद्ध एवं यथार्थ है। भगवान् व्यासदेवने प्राचीनतम पुराणका प्रकाश और प्रचार किया है। वस्तुत: पुराण अनादि और नित्य हैं।

पुराणोंकी कथाओंमें असम्भव-सी दीखनेवाली बातें, परस्पर विरोधी-सी बातें और भगवान् तथा देवताओंके साक्षात् मिलने आदिके प्रसंगोंको देखकर स्वल्प श्रद्धावाले पुरुष उन्हें काल्पनिक मानने लगते हैं; परंतु यथार्थमें ऐसी बात नहीं है। इनमें प्रत्येकपर संक्षेपसे विचार कीजिये।

जबतक वायुयानका निर्माण नहीं हुआ था, तबतक पुराण-इतिहासोंमें वर्णित विमानोंके वर्णनको बहुत-से लोग असम्भव मानते थे। पर अब जब हमारी आँखोंके सामने आकाशमें विमान उड़ रहे हैं, तब वैसी बात नहीं रही। मान लीजिये आजके ये रेडियो, टेलीविजन, टेलीफोन आदि यन्त्र नष्ट हो जायँ और कुछ शताब्दियोंके बाद ग्रन्थोंमें इनका वर्णन पढ़नेको मिले तो उस समयके लोग यही कहेंगे कि यह सारी कपोलकल्पना है; भला, हजारों कोसोंकी बात उसी क्षण वैसी-की-वैसी सुनायी देना, आवाजका पहचाना जाना और उसमें आकृति भी दीख जाना कैसे सम्भव है।’ हमारे ब्रह्मास्त्र, आग्नेयास्त्र आदिको लोग असम्भव मानते थे, पर अब अणुबमकी शक्ति देखकर कुछ-कुछ विश्वास करने लगे हैं। पुराणवर्णित सभी असम्भव बातें ऐसी ही हैं, जो हमारे सामने न होनेके कारण असम्भव-सी दीखती हैं।

परस्पर विरोधी प्रसंग तो कल्पभेदको लेकर हैं। पुराणोंके सृष्टितत्त्वको जाननेवाले लोग इस बातको सहज ही समझ सकते हैं।

रही देवताओंके मिलनेकी बात, सो यह भी असम्भव नहीं है। प्राचीन कालके उन भक्तिपूत योगी, तपस्वी, ऋषि-मुनियोंमें ऐसी सात्त्विकी महान् शक्ति थी कि उनमेंसे कई तो समस्त लोकोंमें निर्बाध यातायात करते थे। दिव्यलोक, देवलोक, असुरलोक और पितृलोककी व्यवस्था और घटनाओंको वहाँ जाकर प्रत्यक्ष देखते थे। देवताओंसे मिलते थे और अपने तपोमय प्रेमाकर्षणसे देवताओंको—यहाँतक कि भगवान‍्को भी अपने यहाँ बुलाकर प्रकट कर लेते थे। पुराणोंकी ऐसी बातें उन ऋषि-मुनियोंकी स्वयं प्रत्यक्ष की हुई ही हैं। अद्वैत-वेदान्तके महान् आचार्य भगवान् शंकरने शारीरकभाष्यमें लिखा है—

इतिहासपुराणमपि व्याख्यातेन मार्गेण सम्भवन्मन्त्रार्थवादमूलत्वात् प्रभवति देवताविग्रहादि साधयितुम्। प्रत्यक्षादिमूलमपि सम्भवति। भवति ह्यस्माकमप्रत्यक्षमपि चिरन्तनानां प्रत्यक्षम्। तथा च व्यासादयो देवादिभि: प्रत्यक्षं व्यवहरन्तीति स्मर्यते। यस्तु ब्रूयादिदानीन्तनानामिव पूर्वेषामपि नास्ति देवादिभिर्व्यवहर्तुं सामर्थ्यमिति, स जगद्वैचित्र्यं प्रतिषेधेत्, इदानीमिव च नान्यदापि सार्वभौम: क्षत्रियोऽस्तीति ब्रूयात्। ततश्च राजसूयादिचोदनोपरुन्ध्यात्। इदानीमिव च कालान्तरेऽप्यव्यवस्थितप्रायान् वर्णाश्रमधर्मान् प्रतिजानीत, ततश्च व्यवस्थाविधायि शास्त्रमनर्थकं स्यात्। तस्माद् धर्मोत्कर्षवशाच्चिरन्तना देवादिभि: प्रत्यक्षं व्यवजह्रुरिति श्लिष्यते............।

(देखिये १। ३। ३३ का भाष्य)

‘इतिहास और पुराण भी मन्त्रमूलक तथा अर्थवादमूलक होनेके कारण प्रमाण हैं, अत: उपर्युक्त रीतिसे वे देवताविग्रह आदिके सिद्ध करनेमें समर्थ होते हैं। देवताओंका प्रत्यक्ष आदि भी सम्भव है। इस समय हमें जो प्रत्यक्ष नहीं होते, प्राचीन लोगोंके वे प्रत्यक्ष होते थे, जैसे कि व्यासादिके देवताओंके साथ प्रत्यक्ष व्यवहारकी बात स्मृतिमें है।’ ‘आजकलकी भाँति प्राचीन पुरुष भी देवताओंके साथ प्रत्यक्ष व्यवहार करनेमें असमर्थ थे, यह कहनेवाला तो जगत‍्की विचित्रताका ही निषेध करेगा।’ ‘आजकलके समान अन्य समयमें भी सार्वभौम क्षत्रियोंकी सत्ता नहीं थी’ यों कहनेपर तो राजसूय आदि विधिका बाध हो जायगा और ऐसी प्रतिज्ञा करनी पड़ेगी कि आजकलके समान अन्य समयमें भी वर्णाश्रम-धर्म अव्यवस्थित ही था। तब तो इसकी व्यवस्था करनेवाला शास्त्र ही व्यर्थ हो जायगा। अतएव यह सिद्ध है कि धर्मके उत्कर्षके कारण प्राचीन लोग देवताओं आदिके साथ प्रत्यक्ष व्यवहार करते थे।

इससे सिद्ध है कि पुराणवर्णित प्रसंग काल्पनिक नहीं हैं, वे सर्वथा सत्य हैं। अवश्य ही यह बात है कि हमारे ऋषिप्रणीत ग्रन्थोंमें वर्णित प्रसंग ऐसे चमत्कारपूर्ण हैं कि जिनके आध्यात्मिक, आधिदैविक और आधिभौतिक—तीनों ही अर्थ होते हैं। इसलिये जो लोग इनका आध्यात्मिक अर्थ करते हैं, वे भी अपनी दृष्टिसे ठीक ही करते हैं। पुराणोंमें कहीं-कहीं ऐसी बातें भी हैं, जो घृणित मालूम देती हैं। इसका कारण यह है कि उनमें कुछ प्रसंग तो ऐसे हैं, जिनमें किसी निगूढ़ तत्त्वका विवेचन करनेके लिये आलंकारिक भाषाका प्रयोग किया गया है। उन्हें समझनेके लिये भगवत्कृपा, सात्त्विकी श्रद्धा और गुरु-परम्पराके अध्ययनकी आवश्यकता है। कुछ ऐसी बातें हैं, जो सच्चा इतिहास है। बुरी बात होनेपर भी सत्यके प्रकाश करनेकी दृष्टिसे उन्हें ज्यों-का-त्यों लिख दिया गया है। इसका कारण यह है कि हमारे वे पुराणवक्ता ऋषि-मुनि आजकलके इतिहासलेखकोंकी भाँति राजनीतिक; दलगत, देशगत और जातिगत आग्रहके मोहसे मिथ्याको सत्य बनाकर लिखना पाप समझते थे। वे सत्यवादी, सत्याग्रही और सत्यके प्रकाशक थे।

अब एक बात और है, जो बुद्धिवादी लोगोंकी दृष्टिमें प्राय: खटकती है—वह यह कि पुराणोंमें जहाँ जिस देवता, तीर्थ या व्रत आदिका महत्त्व बतलाया गया है, वहाँ उसीको सर्वोपरि माना है और अन्य सबके द्वारा उसकी स्तुति करायी गयी है। गहराईसे न देखनेपर यह बात अवश्य बेतुकी-सी प्रतीत होती है; परंतु इसका तात्पर्य यह है कि भगवान‍्का यह लीलाभिनय ऐसा आश्चर्यमय है कि इसमें एक ही परिपूर्ण भगवान् विभिन्न-विचित्र लीलाव्यापारके लिये और विभिन्न रुचि, स्वभाव तथा अधिकारसम्पन्न साधकोंके कल्याणके लिये अनन्त विचित्र रूपोंमें नित्य प्रकट हैं। भगवान‍्के ये सभी रूप नित्य, पूर्णतम और सच्चिदानन्दस्वरूप हैं। अपनी-अपनी रुचि और निष्ठाके अनुसार जो जिस रूप और नामको इष्ट बनाकर भजता है, वह उसी दिव्य नाम और रूपमेंसे समस्त रूपमय एकमात्र भगवान‍्को प्राप्त कर लेता है; क्योंकि भगवान‍्के सभी रूप परिपूर्णतम हैं और उन समस्त रूपोंमें एक ही भगवान् लीला करते हैं। व्रतोंके सम्बन्धमें भी यही बात है। अतएव श्रद्धा और निष्ठाकी दृष्टिसे साधकके कल्याणार्थ जहाँ जिसका वर्णन है; वहाँ उसको सर्वोपरि बताना युक्तियुक्त ही है और परिपूर्णतम भगवत्सत्ताकी दृष्टिसे सत्य तो है ही। तीर्थोंकी बात यह है कि भगवान‍्के विभिन्न नाम-रूपोंकी उपासना करनेवाले संतों, महात्माओं और भक्तोंने अपनी कल्याणमयी सत्साधनाके प्रतापसे विभिन्न रूपमय भगवान‍्को अपनी-अपनी रुचिके अनुसार नाम-रूपमें अपने ही साधन-स्थानमें प्राप्त कर लिया और वहीं उनकी प्रतिष्ठा की। एक ही भगवान् अपनी पूर्णतम स्वरूप-शक्तिके साथ अनन्त स्थानोंमें, अनन्त नाम-रूपोंमें प्रतिष्ठित हुए। भगवान‍्के ऐसे प्रतिष्ठास्थान ही तीर्थ हैं जो श्रद्धा, निष्ठा और रुचिके अनुसार सेवन करनेवालेको यथायोग्य फल देते हैं। यही तीर्थ-रहस्य है, इस दृष्टिसे प्रत्येक तीर्थको सर्वोपरि बतलाना सर्वथा उचित ही है।

सब एक हैं; इसकी पुष्टि तो इसीसे भलीभाँति हो जाती है कि शैव कहे जानेवाले पुराणोंमें विष्णुकी और वैष्णव-पुराणोंमें शिवकी महिमा गायी गयी है और दोनोंको एक बताया गया है तथा उक्त पुराण-विशेषके विशिष्ट प्रधान देवने अपने ही श्रीमुखसे अन्य पुराणोंके प्रधान देवताको अपना ही स्वरूप बतलाया है। स्कन्दपुराण एक शैवपुराण माना जाता है; परंतु इसमें स्थान-स्थानपर विष्णुकी अनन्त महिमा गायी गयी है, उनकी स्तुति की गयी है और भगवान् शिवने उनको अपना अभिन्न स्वरूप बतलाया है तथा दोनोंकी एकताके सम्बन्धमें निरूपण किया गया है—

यथा शिवस्तथा विष्णुर्यथा विष्णुस्तथा शिव:।

अन्तरं शिवविष्ण्वोश्च मनागपि न विद्यते॥

(काशीखण्ड २३। ४१)

‘जैसे शिव हैं, वैसे ही विष्णु हैं तथा जैसे विष्णु हैं, वैसे ही शिव हैं। शिव और विष्णुमें तनिक भी अन्तर नहीं है।’

पवित्राणां पवित्रं यो ह्यगतीनां परा गति:।

दैवतं देवतानां च श्रेयसां श्रेय उत्तमम्॥

(वैष्णवखण्ड वे० मा० ३५। ३८)

‘भगवान् विष्णु पवित्रोंको पवित्र करनेवाले हैं, अगतियोंकी परम गति हैं, देवताओंके भी आराध्य हैं और कल्याणोंके उत्तम कल्याण हैं।’

यो विष्णु: स शिवो ज्ञेयो य: शिवो विष्णुरेव स:।

(माहेश्वरखण्ड के० ख० ८। २०)

‘जो विष्णु हैं, उन्हींको शिव जानना चाहिये और जो शिव हैं, वही विष्णु हैं।’

भगवान् शिव स्वयं कहते हैं—‘विष्णु! जैसे मैं हूँ, वैसे ही तुम हो।’

‘यथाहं त्वं तथा विष्णो’ (काशी० २७। १८३)

श्रीशंकरजी गरुड़से कहते हैं—‘हम ही वे विष्णु हैं और वे विष्णु ही हम हैं, हम दोनोंमें तुम्हारी भेदबुद्धि नहीं होनी चाहिये’—

असावहं स वै विष्णुर्मास्तु ते भेददृक् च नौ।

(काशी० ५०। १४४)

ऐसे असंख्य वचन विभिन्न पुराणोंमें पाये जाते हैं।

लोग कहते हैं कि तीर्थोंकी इतनी महत्ता बता दी गयी है कि सदाचार तथा ज्ञानके साधनोंका तिरस्कार हो गया है। तीर्थसेवनके कुछ अनुचित पक्षपाती लोग भी ऐसा कह देते हैं कि ‘बस, अमुक तीर्थका सेवन करो; फिर चाहे जो पापाचार-अनाचार करो, कोई डरकी बात नहीं है।’ पर वस्तुत: ऐसी बात नहीं है। इस भूलमें कोई न रहे, इसीसे पुराणोंमें जहाँ तीर्थादिका माहात्म्य प्रचुर मात्रामें लिखा गया है, वहीं ऐसी बात लिख दी गयी है, जो सारे भ्रमोंको दूर कर देती है। स्कन्दपुराणमें काशीका बड़ा माहात्म्य है। पर साथ ही कहा गया है कि पाप करनेवाले लोग काशीमें न रहें—

पापमेव हि कर्तव्यं मतिरस्ति यथेदृशी।

सुखे नान्यत्र कर्तव्यं मही ह्यस्ति महीयसी॥

अपि कामातुरो जन्तुरेकां रक्षति मातरम्।

अपि पापकृता काशी रक्ष्या मोक्षार्थिनैकिका॥

परापवादशीलेन परदाराभिलाषिणा।

तेन काशी न संसेव्या क्व काशी निरय: क्व स:॥

अभिलष्यन्ति ये नित्यं धनं चात्र प्रतिग्रहै:।

परत्वं कपटैर्वापि काशी सेव्या न तैर्नरै:॥

परपीडाकरं कर्म काश्यां नित्यं विवर्जयेत् ।

तदेव चेत् किमत्र स्यात् काशीवासो दुरात्मनाम्॥

(काशी० २२। ९५—९९)

अर्थार्थिनस्तु ये विप्र ये च कामार्थिनो नरा:।

अविमुक्तं न तै: सेव्यं मोक्षक्षेममिदं यत:॥

शिवनिन्दापरा ये च वेदनिन्दापराश्च ये।

वेदाचारप्रतीपा ये सेव्या वाराणसी न तै:॥

परद्रोहधियो ये च परेर्ष्याकारिणश्च ये।

परोपतापिनो ये वै तेषां काशी न सिद्धये॥

(काशी० १२२। १०१—१०३)

मैं तो पाप करूँगा ही—ऐसी जिसकी बुद्धि है, उसके लिये पृथ्वी बहुत बड़ी पड़ी है। वह काशीसे बाहर कहीं भी जाकर सुखसे पाप कर सकता है। कामातुर होनेपर भी मनुष्य एक अपनी माताको तो बचाता ही है। ऐसे ही पापी मनुष्यको भी मोक्षार्थी होनेपर एक काशीको तो बचाना ही चाहिये। दूसरोंकी निन्दा करना जिनका स्वभाव है और जो परस्त्रीकी इच्छा करते हैं, उनके लिये काशीमें रहना उचित नहीं। कहाँ मोक्ष देनेवाली काशी और कहाँ ऐसे नारकी मनुष्य! जो प्रतिग्रहके द्वारा धनकी इच्छा करते हैं और जो कपट-जाल फैलाकर दूसरोंका धन हरण करना चाहते हैं, उन मनुष्योंको काशीमें नहीं रहना चाहिये। काशीमें रहकर ऐसा कोई काम कभी नहीं करना चाहिये, जिससे दूसरेको पीड़ा हो। जिनको यही करना हो, उन दुरात्माओंको काशीवाससे क्या प्रयोजन है!

‘विप्रवर! जो अर्थार्थी या कामार्थी हैं, उनको इस मुक्तिदायी काशीक्षेत्रमें नहीं रहना चाहिये। जो शिवनिन्दामें और वेदकी निन्दामें लगे रहते हैं तथा वेदाचारके विपरीत आचरण करते हैं, उनको वाराणसीमें नहीं रहना चाहिये। जो दूसरोंसे द्रोह करते हैं, दूसरोंसे डाह करते हैं और दूसरोंको कष्ट पहुँचाते हैं, काशीमें उनको सिद्धि नहीं मिलती।’

पापात्मा तीर्थफलसे वंचित रहता है—यह स्पष्ट कहा गया है—

अश्रद्दधान: पापात्मा नास्तिकोऽछिन्नसंशय:।

हेतुनिष्ठश्च पंचैते न तीर्थफलभागिन:॥

(काशी० ६। ४५)

‘श्रद्धाहीन, पापात्मा (तीर्थमें पातकी—पाप करनेवालेकी शुद्धि होती है, पर जिसका स्वभाव ही पापमय है, उस ‘पापात्मा’ की नहीं होती), नास्तिक, संदेहशील और हेतुवादी—इन पाँचोंको तीर्थफलकी प्राप्ति नहीं होती।’

वस्तुत: तीर्थका फल किसको मिलता है?—

प्रतिग्रहादुपावृत्त: संतुष्टो येन केनचित्।

अहंकारविमुक्तश्च स तीर्थफलमश्नुते॥

अदम्भको निरारम्भो लघ्वाहारो जितेन्द्रिय:।

विमुक्त: सर्वसंगैर्य: स तीर्थफलमश्नुते॥

अकोपनोऽमलमति: सत्यवादी दृढव्रत:।

आत्मोपमश्च भूतेषु स तीर्थफलमश्नुते॥

(काशी० ६। ४९—५१)

‘जो प्रतिग्रहसे निवृत्त है, जिस किसी स्थितिमें ही संतुष्ट है और अहंकारसे भलीभाँति छूटा हुआ है, वह तीर्थफलका भोग करता है। जो दम्भ नहीं करता, सकाम कर्मका आरम्भ नहीं करता, स्वल्पाहार करता है, इन्द्रियोंको जीत चुका है और समस्त आसक्तियोंसे भलीभाँति मुक्त है, वह तीर्थफलका भोग करता है। जो क्रोधरहित है, जिसकी बुद्धि निर्मल है, जो सत्यभाषण करता है, दृढ़निश्चयी है और समस्त प्राणियोंको अपने आत्माके समान ही जानता है, वह तीर्थफलका भोग करता है।’ क्योंकि—

ये तत्र चपलास्तथ्यं न वदन्ति च लोलुपा:।

परिहासपरद्रव्यपरस्त्रीकपटाग्रहा:॥

मलचैलावृताशान्ताशुचयस्त्यक्तसत्क्रिया:।

तेषां मलिनचित्तानां फलमत्र न जायते॥

(वैष्णव० बदरि० ६। ६९-७०)

भगवान् शंकर स्कन्दजीसे कहते हैं—

‘जो चंचलबुद्धि हैं, लोभी हैं और तथ्यकी बात नहीं कहते, जिनके मनमें परिहास, पर-धन और पर-स्त्रीकी इच्छा है तथा जिनका कपटपूर्ण आग्रह है, जो दूषित वस्त्र पहनते हैं, जो अशान्त, अपवित्र और सत्कर्मोंके त्यागी हैं, उन मलिनचित्त मनुष्योंको इस तीर्थमें कोई फल नहीं मिलता।’

तीर्थोंमें किस प्रकार रहना चाहिये, इसपर कहा गया है—

निर्ममा निरहंकारा नि:संगा निष्परिग्रहा:।

बन्धुवर्गेण नि:स्नेहा: समलोष्टाश्मकांचना:॥

भूतानां कर्मभिर्नित्यं त्रिविधैरभयप्रदा:।

सांख्ययोगविधिज्ञाश्च धर्मज्ञाश्छिन्नसंशया:॥

(अवन्तिकाखण्ड ७। ३२-३३)

‘(इस क्षेत्रमें वास करनेवाले) ममतारहित, अहंकाररहित, आसक्तिरहित, परिग्रहसे शून्य, बन्धु-बान्धवोंमें स्नेह न रखनेवाले, मिट्टी, पत्थर और सोनेमें समान बुद्धि रखनेवाले, मन-वाणी और शरीरके द्वारा किये जानेवाले त्रिविध कर्मोंसे सदा सब प्राणियोंको अभय देनेवाले, सांख्य और योगकी विधिको जाननेवाले, धर्मके स्वरूपको समझनेवाले और संशय-संदेहोंसे रहित हों।’

मानस-तीर्थोंका वर्णन करते हुए यहाँतक कह दिया गया है—

शृणु तीर्थानि गदतो मानसानि ममानघे।

येषु सम्यङ्नर: स्नात्वा प्रयाति परमां गतिम्॥

सत्यं तीर्थं क्षमा तीर्थं तीर्थमिन्द्रियनिग्रह:।

सर्वभूतदया तीर्थं तीर्थमार्जवमेव च॥

दानं तीर्थं दमस्तीर्थं संतोषस्तीर्थमुच्यते।

ब्रह्मचर्यं परं तीर्थं तीर्थं च प्रियवादिता॥

ज्ञानं तीर्थं धृतिस्तीर्थं तपस्तीर्थमुदाहृतम्।

तीर्थानामपि तत्तीर्थं विशुद्धिर्मनस: परा॥

न जलाप्लुतदेहस्य स्नानमित्यभिधीयते।

स स्नातो यो दमस्नात: शुचि: शुद्धमनोमल:॥

यो लुब्ध: पिशुन: क्रूरो दाम्भिको विषयात्मक:।

सर्वतीर्थेष्वपि स्नात: पापो मलिन एव स:॥

न शरीरमलत्यागान्नरो भवति निर्मल:।

मानसे तु मले त्यक्ते भवत्यन्त: सुनिर्मल:॥

जायन्ते च म्रियन्ते च जलेष्वेव जलौकस:।

न च गच्छन्ति ते स्वर्गमविशुद्धमनोमला:॥

विषयेष्वतिसंरागो मानसो मल उच्यते।

तेष्वेव हि विरागोऽस्य नैर्मल्यं समुदाहृतम्॥

चित्तमन्तर्गतं दुष्टं तीर्थस्नानान्न शुध्यति।

शतशोऽपि जलैर्धौैतं सुराभाण्डमिवाशुचि:॥

दानमिज्या तप: शौचं तीर्थसेवा श्रुतं यथा।

सर्वाण्येतान्यतीर्थानि यदि भावो न निर्मल:॥

निगृहीतेन्द्रियग्रामो यत्रैव च वसेन्नर:।

तत्र तस्य कुरुक्षेत्रं नैमिषं पुष्कराणि च॥

ध्यानपूते ज्ञानजले रागद्वेषमलापहे।

य: स्नाति मानसे तीर्थे स याति परमां गतिम्॥

(काशीखण्ड ६। २९—४१)

अगस्त्यजीने लोपामुद्रासे कहा—‘निष्पापे! मैं मानसतीर्थोंका वर्णन करता हूँ, सुनो। इन तीर्थोंमें स्नान करके मनुष्य परम गतिको प्राप्त होता है। सत्य, क्षमा, इन्द्रियसंयम, सब प्राणियोंके प्रति दया, सरलता, दान, मनका दमन, संतोष, ब्रह्मचर्य, प्रियभाषण, ज्ञान, धृति और तपस्या—ये प्रत्येक एक-एक तीर्थ हैं। इनमें ब्रह्मचर्य परम तीर्थ है। मनकी परम विशुद्धि तीर्थोंका भी तीर्थ है। जलमें डुबकी मारनेका नाम ही स्नान नहीं है; जिसने इन्द्रिय संयमरूप-स्नान किया है, वही स्नान है और जिसका चित्त शुद्ध हो गया है, वही पवित्र है।

‘जो लोभी है, चुगलखोर है, निर्दय है, दम्भी है और विषयोंमें फँसा है, वह सारे तीर्थोंमें भलीभाँति स्नान कर लेनेपर भी पापी और मलिन ही है। शरीरका मैल उतारनेसे ही मनुष्य निर्मल नहीं होता; मनके मलको निकाल देनेपर ही भीतरसे सुनिर्मल होता है। जलजन्तु जलमें ही पैदा होते हैं और जलमें ही मरते हैं, परंतु वे स्वर्गमें नहीं जाते; क्योंकि उनके मनका मैल नहीं धुलता। विषयोंमें अत्यन्त राग ही मनका मैल है और विषयोंसे वैराग्यको ही निर्मलता कहते हैं। चित्त अन्तरकी वस्तु है, उसके दूषित रहनेपर केवल तीर्थ-स्नानसे शुद्धि नहीं होती। शराबके भाण्डको चाहे सौ बार जलसे धोया जाय, वह अपवित्र ही रहता है; वैसे ही जबतक मनका भाव शुद्ध नहीं है, तबतक उसके लिये दान, यज्ञ, तप, शौच, तीर्थसेवन और स्वाध्याय—सभी अतीर्थ हैं। जिसकी इन्द्रियाँ संयममें हैं, वह मनुष्य जहाँ रहता है, वहीं उसके लिये कुरुक्षेत्र, नैमिषारण्य और पुष्करादि तीर्थ विद्यमान हैं; ध्यानसे विशुद्ध हुए राग-द्वेषरूपी मलका नाश करनेवाले ज्ञान-जलमें जो स्नान करता है, वही परम गतिको प्राप्त करता है।’ ऐसे प्रसंग और भी आये हैं।

इससे यह सिद्ध है कि तीर्थ-व्रत करनेवालोंके लिये भी पापोंके त्याग, इन्द्रियसंयम और तप आदिकी बड़ी आवश्यकता है। इसका यह अर्थ भी नहीं समझना चाहिये कि भौमतीर्थ कोई महत्त्व ही नहीं रखते। उनका बड़ा महत्त्व है और वह भी सच्चा है। वस्तुत: पुराण सर्वसाधारणकी सर्वांगीण उन्नति और परम कल्याणकी साधन-सम्पत्तिके अटूट भंडार हैं। अपनी-अपनी श्रद्धा, रुचि, निष्ठा तथा अधिकारके अनुसार साधारण अपढ़ मनुष्यसे लेकर बड़े-से-बड़े विचारशील बुद्धिवादी पुरुषोंके लिये भी इनमें उपयोगी साधन-सामग्री भरी है। ज्ञान, विज्ञान, वैराग्य, भक्ति, प्रेम, श्रद्धा, विश्वास, यज्ञ, दान, तप, संयम, नियम, सेवा, भूतदया, वर्णधर्म, आश्रमधर्म, व्यक्तिधर्म, नारीधर्म, मानवधर्म, राजधर्म, सदाचार और व्यक्ति-व्यक्तिके विभिन्न कर्तव्योंके सम्बन्धमें बड़ा ही विचारपूर्ण और अत्यन्त कल्याणकारी अनुभूत उपदेश बड़ी रोचक भाषामें इन पुराणोंमें भरा गया है। साथ ही पुरुष, प्रकृति, प्रकृति-विकृति, प्राकृतिक दृश्य, ऋषि-मुनियों तथा राजाओंकी वंशावली तथा सृष्टिक्रम आदिका भी निगूढ़ वर्णन है। इनमें इतने अमूल्य रत्न छिपे हैं, जिनका पता लगाकर प्राप्त करनेवाला पुरुष लोक तथा परमार्थकी परम सम्पत्ति पा करके कृतकृत्य हो जाता है।

ऐसे अठारह महापुराण हैं तथा अठारह ही उपपुराण माने जाते हैं। इधर चार प्रकारके पुराणोंका पता लगा है—महापुराण, उपपुराण, अतिपुराण और पुराण। चारोंकी अठारह-अठारह संख्या बतायी जाती है, उनकी नामावलि इस प्रकार मिलती है—

महापुराण—ब्रह्म, पद्म, विष्णु, शिव, श्रीमद्भागवत, नारद, मार्कण्डेय, अग्नि, भविष्य, ब्रह्मवैवर्त, लिंग, वाराह, स्कन्द, वामन, कूर्म, मत्स्य, गरुड और ब्रह्माण्ड।

उपपुराण—भागवत, माहेश्वर, ब्रह्माण्ड, आदित्य, पराशर, सौर, नन्दिकेश्वर, साम्ब, कालिका, वारुण, औशनस, मानव, कापिल, दुर्वासस, शिवधर्म, बृहन्नारदीय, नरसिंह और सनत्कुमार।

अतिपुराण—कार्तव, ऋजु, आदि, मुद‍्गल, पशुपति, गणेश, सौर, परानन्द, बृहद्धर्म, महाभागवत, देवी, कल्कि, भार्गव, वासिष्ठ, कौर्म, गर्ग, चण्डी और लक्ष्मी।

पुराण—बृहद्विष्णु, शिव उत्तरखण्ड, लघु बृहन्नारदीय, मार्कण्डेय, वह्नि, भविष्योत्तर, वराह, स्कन्द, वामन, बृहद्वामन, बृहन्मत्स्य, स्वल्पमत्स्य, लघुवैवर्त और ५ प्रकारके भविष्य।

इन नामोंमें नामावलिके विभागमें और क्रममें अन्तर भी हो सकता है। यहाँ तो जैसी सूची मिली है, वैसी ही दे दी गयी है। यह भी सम्भव है कि इनमेंसे कई ग्रन्थ आधुनिक भी हों। यह अन्वेषण और गवेषणाका विषय है।

पुराण अमूल्य रत्नोंके अगाध समुद्र हैं। इनमें जो श्रद्धाके साथ जितना ही गहरा गोता लगायेंगे, वे उतनी ही विशाल रत्नराशिको प्राप्त कर धन्य हो सकेंगे।