कुछ पारमार्थिक शब्दोंके अर्थ
त्रियोग—कर्मयोग, ज्ञानयोग और भक्तियोग।
योगचतुष्टय—हठयोग, लययोग, मन्त्रयोग और राजयोग।
द्विविध निष्ठा—सांख्ययोग और कर्मयोग।
द्विविध प्रकृति—परा और अपरा।
त्रिविध पुरुष—क्षर, अक्षर और पुरुषोत्तम (जगत्, जीव और भगवान्)।
वेदान्तके चार महावाक्य—अहं ब्रह्मास्मि, तत्त्वमसि, प्रज्ञानं ब्रह्म, अयमात्मा ब्रह्म।
सप्तज्ञानभूमिका—शुभेच्छा, विचारणा, तनुमानसा, सत्त्वापत्ति, असंसक्ति, पदार्थाभाविनी, तुर्यगा।
साधनचतुष्टय—नित्यानित्यवस्तुविवेक, वैराग्य, षट्-सम्पत्ति (शम, दम, तितिक्षा, उपरति, श्रद्धा, समाधान), मुमुक्षुत्व।
त्रिविध नरकद्वार—काम, क्रोध, लोभ।
त्रिविध ज्ञानद्वार—श्रद्धा, तत्परता, इन्द्रियसंयम।
भक्तिके चार महावाक्य—कृष्णस्तु भगवान् स्वयम्, मत्त: परतरं नान्यत्, ब्रह्मणो हि प्रतिष्ठाहम्, मामेकं शरणं व्रज।
द्विविधा भक्ति—अपरा या गौणी, परा या प्रेमा।
नवधा भक्ति—श्रवण, कीर्तन, स्मरण, पादसेवन, अर्चन, वन्दन, दास्य, सख्य, आत्मनिवेदन।
पंचभाव—शान्त, दास्य, सख्य, वात्सल्य, मधुर।
अष्ट सात्त्विक भाव—स्तम्भ, स्वेद, रोमांच, स्वरभंग, कम्प, वैवर्ण्य, अश्रु और प्रलय।
प्रेमकी तीन अवस्थाएँ—पूर्वराग, मिलन और वियोग।
त्रिविध विरह—भूत, वर्तमान और भावी।
विरहकी दस दशाएँ—चिन्ता, जागरण, उद्वेग, कृशता, मलिनता, प्रलाप, उन्माद, व्याधि, मोह और मृत्यु।
चतुर्विधभाव—भावोदय, भावसन्धि, भावशाबल्य और भावशान्ति।
द्विविध महाभाव—रूढ और अधिरूढ।
द्विविध अधिरूढ महाभाव—मोदन और मादन (या मोहन)।
आसन—चौरासी या एक सौ आठ। प्रधान दो—पद्मासन और स्वस्तिकासन।
मुद्रा और बन्ध—अनेक हैं। परंतु पचीस मुख्य हैं। उनके नाम हैं—महामुद्रा, नभोमुद्रा, उड्डीयानबन्ध, जालन्धरबन्ध, मूलबन्ध, महाबन्ध, महावेध, खेचरी, विपरीतकरणी, योनि, वज्रोली, शक्ति-चालनी, तडागी, माण्डवी, शाम्भवी, अश्विनी, पाशिनी, काकी, मातंगी, भुजंगिनी और पाँच धारणाएँ (पार्थिव, आम्भसी, वैश्वानरी, वायवी और आकाशी)।
षट्कर्म—धौति, गजकरणी, वस्ति, नौलि, नेति और कपालभाति। कोई-कोई त्राटकसमेत सात मानते हैं।
प्राणायाम—पूरक, कुम्भक और रेचक।
चतुर्विध पातंजलोक्त प्राणायाम—आभ्यन्तर, बाह्य और दो प्रकारके केवल प्राणायाम।
अष्टविध प्राणायाम—सूर्यभेदन, उज्जायी, सीत्कारी, शीतली, भस्त्रिका, भ्रामरी, मूर्छा और प्लाविनी। कुछ लोग अनुलोम-विलोमको जोड़कर नौ प्रकार मानते हैं।
दैनिक श्वास-संख्या—२१,६००।
योगसाधनमें तीन प्रधान नाडियाँ—इडा, पिंगला, सुषुम्णा।
दस वायु—प्राण, अपान, व्यान, उदान, समान, नाग, कूर्म, कृकल, देवदत्त और धनंजय।
योगके षट्चक्र—मूलाधार, स्वाधिष्ठान, मणिपूर, अनाहत, विशुद्ध और आज्ञा।
योगके सप्तचक्र—उपर्युक्त छ: और सातवाँ सहस्रार।
योगके नौ चक्र—उपर्युक्त सात और आठवाँ तालुमें ललना-चक्र और नवाँ ब्रह्मरन्ध्रमें गुरुचक्र।
षोडश आधार—१-दाहिने पैरका अँगूठा, २-गुल्फ, ३-गुदा, ४-लिंग, ५-नाभि, ६-हृदय, ७-कण्ठकूप, ८-तालुमूल, ९-जिह्वामूल, १०-दन्तमूल, ११-नासिकाग्र, १२-भ्रूमध्य, १३-नेत्रमण्डल, १४-ललाट, १५-मस्तक और १६-सहस्रार।
तीन ग्रन्थि—ब्रह्मग्रन्थि, विष्णुग्रन्थि और रुद्रग्रन्थि।
त्रिमार्ग—पिपीलिका-मार्ग, दार्दुर-मार्ग और विहंगम-मार्ग।
त्रिशक्ति—ऊर्ध्वशक्ति (कण्ठमें), अध:शक्ति (गुदामें) और मध्यशक्ति (नाभिमें)।
पंचभूत—पृथ्वी, जल, तेज, वायु और आकाश।
पंचाकाश—आकाश, महाकाश, पराकाश, तत्त्वाकाश और सूर्याकाश।
वर्ण—पचास (‘अ’ से ‘ह’ तक)।
त्रिविध मन्त्र—पुं, स्त्री, क्लीब।
चतुर्विध वाणी—परा, पश्यन्ती, मध्यमा, वैखरी।
योगके आठ अंग—यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि।
यम—अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह।
नियम—शौच, संतोष, तप, स्वाध्याय और ईश्वर-प्रणिधान।
संयम—धारणा, ध्यान और समाधि।
क्रियायोग—तप, स्वाध्याय और ईश्वर-प्रणिधान।
द्विविध ध्यान—भेदभावसे और अभेदभावसे।
द्विविध समाधि—सम्प्रज्ञात या सबीज और असम्प्रज्ञात या निर्बीज।
सम्प्रज्ञात समाधिके चार भेद—वितर्कानुगम, विचारानुगम, आनन्दानुगम और अस्मितानुगम।
असम्प्रज्ञातके दो भेद—भवप्रत्यय, उपायप्रत्यय।
पंचवृत्ति—मूढ़, क्षिप्त, विक्षिप्त, एकाग्र और निरुद्ध।
पंचक्लेश—अविद्या, अस्मिता, राग, द्वेष और अभिनिवेश।
सप्तसाधन—शोधन, दृढ़ता, स्थैर्य, लाघव, धैर्य, प्रत्यक्ष और निर्लिप्तता।
योगके विघ्न—व्याधि, स्त्यान, संशय, प्रमाद, आलस्य, विषय-तृष्णा, भ्रान्ति, फलमें संदेह, चित्तकी अस्थिरता, दु:ख, मनकी खराबी, देहकी चंचलता, अनियमित श्वास-प्रश्वास, अनियमित और उत्तेजक आहार, अनियमित निद्रा, ब्रह्मचर्यका नाश, नकली गुरुका शिष्यत्व, सच्चे गुरुका अपमान, भगवान्में अविश्वास, सिद्धियोंकी चाह, अल्प सिद्धिमें ही पूर्ण सफलता मानना, विषयानन्द, पूजा करवाना, गुरु बनना, दम्भ करना।
अष्ट महासिद्धि—अणिमा, महिमा, लघिमा, प्राप्ति, प्राकाम्य, ईशित्व, वशित्व और यत्रकामावसायित्व। कुछ लोग इनमें ‘गरिमा’ जोड़कर इनकी संख्या ९ कर देते हैं।
चतुर्विध साधक—मृदु, मध्य, अधिमात्र और अधिमात्रतम।
चार अवस्थाएँ—जाग्रत् , स्वप्न, सुषुप्ति और तुरीया।