कुछ प्रश्नोंका उत्तर

एक सज्जनने निम्नलिखित प्रश्न किये हैं—

(१) रोग-संकटादिसे ग्रस्त हरिनाम जपनेवाले असफल संसारी मनुष्यके मनमें ‘हरि भगवान् मुझे सुख-शान्ति प्रदान करें।’ ऐसी भावना स्वाभाविक ही उत्पन्न हुए बिना नहीं रह सकती। परंतु ऐसी भावनासे हरिनामकी महिमा घट क्यों जाती है?

(२) जब हरि सभी शरणागत मनुष्योंका कल्याण करेंगे, तब एक कठिन-तपधारी तपस्वी महात्मा और एक-खुदापरस्त मुसलमान कसाईमें क्या अन्तर रहा?

(३) ‘कल्याण’ तथा अन्यान्य ग्रन्थोंमें मैंने बहुत बार पढ़ा कि जबतक कोई भी कामना मनमें रहती है या जबतक भगवान‍्की प्राप्तिके लिये ही भगवान‍्को नहीं खोजा जाता तबतक भगवान् नहीं मिलते। परंतु महाभारतादि ग्रन्थोंमें सकामभावसे आराधना करनेवालोंके सामने भी भगवान‍्का प्रकट होकर उन्हें वरदान देना सिद्ध है। इसका क्या रहस्य है?

(४) भगवान‍्ने श्रीगीताजीमें कहा है कि मैं हृदयमें बैठकर सब कुछ करवाता हूँ, फिर जीव पाप-पुण्यका भोक्ता क्यों होता है? तथा बुरे-भले कर्म या किसी जीवका सुधार-बिगाड़ होना क्या अर्थ रखता है?

(५) हम हिंदू जिस गोमाताके एक रोमपतनसे अपनेको भ्रष्ट हुआ मानते हैं, उसी गोमाताको दूसरे श्रद्धाभक्तिसे ईश्वरके नामपर तड़पा-तड़पाकर वध करते हैं। इसमें पुण्य-पापका क्या निर्णय है?

(६) जो पूर्णरूपेण आस्तिकताके साथ अचल होकर परमात्माके शरण हो चुका है उसे आसन, माला या जपकी गिनती करनेकी क्या आवश्यकता रह जाती है?

(७) यह सिद्धान्त है कि शुद्ध अन्त:करण हुए बिना सिद्धि नहीं मिलती, फिर बुरे भावसे किये हुए मन्त्र-जप या भूत-प्रेतकी उपासनाका सिद्ध होना क्या झूठी कहानियाँ हैं?

(८) ‘भगवन्नामांक’ में लिखा है कि सांसारिक क्लेशकी निवृत्ति या सांसारिक सुख-शान्तिके लिये भगवान‍्का नाम लेना मूढ़ता है। कौड़ीके बदले हीरा फेंकनेवाले या चींटी मारनेके लिये तोप दागनेके समान है। भगवान् तो सबसे उच्च हैं। उनकी महिमा तो अपारसे भी अपार और अवर्णनीय है। परंतु जिस शुद्ध आस्तिकका भगवान‍्की प्रतीक्षामें सारा जीवन बीत जाय और जो असाधारण जप, तप, व्रत आदि करके हार गया हो तथा महारोगों और आपदाओंमें पड़ गया हो उसका क्या कारण समझना चाहिये। उसकी आस्तिकता, निष्कपटता और श्रद्धा-भक्तिपर जरा भी संदेह नहीं करना चाहिये।

इन आठों प्रश्नोंका उत्तर क्रमश: इस प्रकार है—

(१) श्रीहरिनामकी महिमा नहीं घटती। इस प्रकारकी भावना करनेवालेने भजनके मूल्यको कम समझा। जैसे कोई बहुमूल्य हीरेको दो-चार पैसोंकी चीजके बदलेमें किसीको बेच देता है वैसे ही हरिनामके बदलेमें रोग-संकटादिसे निवृत्ति चाहना है।

(२) ईश्वरकी यथार्थ शरण होनेके बाद कसाईपनका कार्य जीविकाका साधन नहीं बन सकता। शरणागत मनुष्य स्वामीके प्रतिकूल कोई कार्य नहीं कर सकता। परम पिता ईश्वरको अपनी संतानकी हत्या अभीष्ट नहीं होती। इसलिये जहाँ ऐसा कार्य होता है वहाँ शरणागतिमें ही कुछ गड़बड़ है। प्रभुके अनुकूल होना ही सच्ची शरणागति है। शरण होनेपर ईश्वर तपस्वी और कसाई दोनोंका उद्धार करते हैं।

(३) यह सत्य है। यद्यपि भगवान् श्रीकृष्ण कई लोगोंसे मिले थे; परंतु उनका वह मिलना सामान्य रूपमें था। सकामभाववालेको भी भगवान् मिल सकते हैं, परंतु तत्त्वको बिना जाने वह तत्काल मुक्तिदायक नहीं हो सकता। वह मिलना जिस कामके लिये होता है उसकी सिद्धि तत्काल हो जाती है। परंतु जो पुरुष भगवान‍्के लिये ही भगवान‍्को भजता है उसे जब भगवान् मिलते हैं उसका तभी उद्धार हो जाता है। यही असली मिलना है। परंतु भगवान‍्का मिलना किसी तरह भी हो, वह उत्तम है। जिससे भगवान‍्को पहचाननेकी योग्यता हो जाती है, तत्त्व जाना जाता है और तत्त्व जानते ही वह मिलन मुक्तिदायक हो जाता है। भगवान् आतुरको भी उसकी आर्त प्रार्थनाके भावसे मिल सकते हैं।

(४) इसका यह मतलब नहीं है कि भगवान् पाप-पुण्य या भले-बुरे कर्म करवाते हैं। भगवान् तो जीवोंके स्वभावानुसार कर्म करनेके लिये प्रेरणा करते हैं। दिनके समस्त कार्य सूर्यके प्रकाशमें होते हैं। परंतु सूर्य किसीके पाप-पुण्यमें हेतु नहीं है। कर्ताके बन्धनमें कर्म प्रधान नहीं है, उसमें प्रधान भाव है। अपने-अपने स्वभावानुसार न्याययुक्त शास्त्रनियत कर्म करता हुआ कोई भी पुरुष पापसे नहीं बँधता। ईश्वरकी प्रेरणा न्यायानुकूल कर्म करनेके लिये ही होती है, पाप करानेके लिये नहीं। स्वार्थवश राग-द्वेषसे की हुई चेष्टा पुण्य-पापवाली होती है। इसीसे भगवान् आज्ञा देते हैं—

इन्द्रियस्येन्द्रियस्यार्थे रागद्वेषौ व्यवस्थितौ।

तयोर्न वशमागच्छेत्तौ ह्यस्य परिपन्थिनौ॥

(गीता ३।३४)

प्रत्येक इन्द्रियके भोगोंमें राग-द्वेष स्थित हैं, अतएव उन दोनोंके वशमें नहीं होना चाहिये। वे दोनों ही कल्याणमार्गमें विघ्न करनेवाले महान् शत्रु हैं। इससे यह सिद्ध होता है कि भगवान् तो राग-द्वेषरहित होकर स्वभावके अनुसार कर्म करनेके लिये प्रेरणा करते हैं। उनकी आज्ञाके अनुकूल या प्रतिकूल कर्म करनेमें मनुष्य स्वतन्त्र है। इसीलिये वह सुख-दु:खका भोक्ता होता है और इसी कारण उसके राग-द्वेषयुक्त कर्म भले-बुरे माने जाते हैं।

(५) जो किसीकी आत्माको कष्ट पहुँचानेमें सर्वव्यापी समदृष्टि ईश्वरका प्रसन्न होना मानते हैं, उनकी यह मान्यता भूल मालूम होती है। ईश्वरके नामपर किसीको मारनेसे ईश्वरकी प्रसन्नता मानना न्यायसंगत नहीं है। जो न्याययुक्त नहीं, सो भूल है।

(६) परमात्माके शरणागतके लिये आसनोंकी कोई आवश्यकता नहीं। सिद्धको लोकसंग्रहके लिये और साधकको आलस्य-नाशके लिये आसनकी, संख्यामें भूल न होनेके लिये मालाकी और धोखा न होनेके लिये गिनतीकी आवश्यकता है।

(७) भूत-प्रेतादिकी उपासनासे प्राप्त सिद्धि तामसी सिद्धि है। अन्त:करणकी शुद्धि होनेके बाद तो अनिष्टरूप भूत-प्रेतादिकी उपासनाको ही स्थान नहीं रह जाता।

(८) पूर्वप्रारब्धका सम्बन्ध समझना चाहिये। अचल डटे रहकर श्रद्धा-भक्तिसे परमात्माका भजन करते रहना चाहिये। कर्मोंका भोग हो रहा है सो अच्छा ही हो रहा है। कष्ट-सहन और भजनसे बुरे संचितका नाश और अच्छे संचितकी वृद्धि हो रही है।