मातर्गीते!
माता श्रीभगवद्गीते! अनन्त असीम गुणातीत विश्वातीत विशुद्ध स्वतन्त्र सत्-चित्-आनन्दरूप परब्रह्मकी अभिन्न ज्योति! विश्वलीलामें प्रवृत्त सृजन-संहार-मूर्ति, नियन्त्रणकलानिपुण, सर्वशक्तिमान्, सर्वसंचालकगुणविशिष्ट भगवान्की चिरसंगिनी! अपनी विश्वातीत सत्तामें नित्य अनन्त रूपसे स्थित रहते हुए भी विश्वलीलामें अपनी लीलासे ही नयनाभिराम त्रिभुवनकमनीय पूर्णसत्त्व दिव्य नरदेहधारी भगवान्की दैवी वाणी! विश्वलीलामें असंख्य प्राणियोंके अन्तर्गत भिन्न-भिन्न भावोंसे अंशरूपमें प्रतिभासित, अपनी ही मायासे लीलाहेतु-स्वरूपविस्मृत निद्रित-से प्रतीत होनेवाले सनातन चेतन आत्माको लीलाके लिये ही प्रबुद्ध करनेवाली दिव्य-दुन्दुभि! सम्पूर्ण विश्वके समस्त चेतनाचेतन पदार्थोंमें—ग्रीष्म-वर्षा, शरत्-वसन्त, शीत-उष्ण, पर्वत-सागर, स्वर्ण-लोष्ट, शिशु-वृद्ध, स्त्री-पुरुष, देव-दानव, सुन्दर-भयानक, करुण-रौद्र, हास्य-क्रन्दन, जन्म-मृत्यु और सृष्टि-प्रलय आदि समस्त भावोंमें, सभीके अंदरसे अपने नित्य सत्य केन्द्रीभूत सौन्दर्य और अखण्ड पूर्ण अस्तित्वको अभिव्यक्त करनेवाले विश्वव्यापी भगवान्की प्रकृत मूर्तिका उद्घाटन करनेवाली माँ! तुझे बार-बार नमस्कार है।
माता! तुझ दयामयीके विश्वमें विद्यमान रहते हम विश्ववासियोंकी यह दुर्दशा क्यों हो रही है? स्वयं भगवान् श्रीकृष्णकी वाङ्मयी मूर्ति! तू भगवान्का हृदय है, तू मार्गभ्रष्टोंकी पथ-प्रदर्शिका है, तू घन अन्धकारमें दिव्य प्रखर प्रकाश है, तू गिरे हुएको उठाती है, चलनेवालेको विशेष गतिशील बनाती है, शरणागतका हाथ पकड़कर उसे परमात्माके अभय चरणकमलोंमें पहुँचा देती है। ऐसी अद्भुत लीलामयी शान्तिदायिनी माताके रहते हम असहाय और अनाथकी भाँति क्यों दु:खी हो रहे हैं? अमृतसमुद्रके शीतल सुखद तटपर निवास करके भी त्रितापसे संतप्त क्यों हो रहे हैं?
देवि! हमारा ही अपराध है। हमने तेरे स्वरूपको यथार्थ नहीं पहचाना। तेरी स्नेहपूरित मुखच्छविको श्रद्धासमन्वित तर्कशून्य सरल दृष्टिसे नहीं देखा। इसीसे भूलभुलैयामें पड़े हैं, इसीसे तेरे अगाध आनन्दाम्बुधिमें मतवालेकी तरह कूदकर जोरसे डुबकी लगानेमें प्राण हिचकिचाते हैं; इसीसे तेरे नित्य प्रज्वलित प्रचण्ड ज्ञानानलमें अविद्या-राशिको फेंककर फूँक डालनेमें संकोच होता है। इसीसे घर-घरमें तेरी प्रतिमाकी प्रतिष्ठा होनेपर भी विधिसंगत पूजा नहीं की जाती, इसीसे निराधार अबोध मातृपरायण शिशुकी भाँति तेरे चरण-प्रान्तमें हम अपनेको लुटा नहीं देते, इसीसे तेरी प्रमत्तकारी प्रेममदिराका पान कर तेरे मोहन-मन्त्रसे मुग्ध होकर दिव्यानन्दके दीवाने नहीं बन रहे हैं। अरे! इसीसे आज अमूल्य रत्न-राशिके हाथमें रहते भी हम शान्तिधनसे शून्य दीन-हीन राहके भिखारी बने दारुण दाहसे दग्ध हो रहे हैं।
विश्व-ज्ञान-प्रदायिनि अनन्तशक्ति माँ! आज हम सूर्यको दीपककी क्षुद्र ज्योतिसे प्रकाशित करनेकी बालकोचित हास्यास्पद चेष्टाके सदृश तेरे विश्वव्यापी प्रकाशके किसी क्षुद्रातिक्षुद्र ज्योति:कणसे प्रकाशित मनुष्य-विशेषोंके विनाशी उद्गारोंद्वारा तेरी महिमा बढ़ाना चाहते हैं। तेरे अनन्त ज्ञानको अपने सीमाबद्ध स्वल्प ज्ञान और मन:प्रसूत अनित्य मतके रूपमें परिणत कर प्रसिद्ध करनेका प्रयत्न कर रहे हैं। तेरी विश्वातीत और विश्वव्याप्त अद्भुत अनन्त राशिको संकुचितकर पर-मत-असहिष्णुताके कारण हम अपने सिद्धान्तकी पुष्टिमें ही उसका प्रयोग करना चाहते हैं। तुझे सर्वशास्त्रमयी कहकर ही तेरा गौरव बढ़ाना चाहते हैं। कुछ दिनोंके लिये प्राप्त कल्पित देश-जाति-नामरूपके अभिमानमें मत्त होकर सारे विश्वसे इसीलिये अपनेको भिन्न और श्रेष्ठ समझकर लोक-समुदायमें और भी मानास्पद बननेके निमित्त तुझे केवल अपने ही घरकी वस्तु बतलाकर, तुझ असीमको ससीम बनाकर अपने गौरवकी वृद्धिके लिये किसी भी तरह श्रद्धा-अश्रद्धासे तेरी प्रतिमा घर-घर पहुँचाना चाहते हैं। माता! यह हमारे बालोचित कार्य हैं। हम बालक हैं, इसीसे ऐसा करते हैं एवं दयामयी! इसीसे हमारी इन चेष्टाओंको देख-सुनकर भी तू नाराज नहीं होती। तू समझती है कि ये अबोध हैं, इसीलिये मेरे वास्तविक स्वरूपको न पहचानकर—मुझ नित्यानन्दमयी स्नेहार्द्रहृदया जननीकी शरण न लेकर मुझ मधुरातिमधुर शान्ति सुधा-सागरके अगाध अन्तस्तलमें निमग्न न होकर केवल बाह्य लहरियोंकी ओर निहार रहे हैं। इसीसे तू अपनी इन लहरियोंकी मधुर तान सुना-सुनाकर हमारे मनको मोहती और अपनी सुखमयी गोदमें बैठाकर अमृत स्तन्यपानके लिये आवाहन करती है।
माता! वास्तवमें तेरी इन लहरियोंका दृश्य बड़ा मनोहर है, तेरी यह तान बड़ी श्रुति-मधुर है, इसीसे आज तेरे तटपर विश्वके सभी प्राणी दौड़-दौड़कर आ रहे हैं। यद्यपि अभी सबमें कूद पड़नेकी श्रद्धा और साहस नहीं है, पर तेरी मधुर लहरी-ध्वनि हृदयोंमें एक अद्भुत मतवालापन पैदा कर रही है, इसीलिये कुछ लोगोंमें तेरे प्रति पवित्र आकर्षण देखनेमें आ रहा है। वह देखो, कुछ तो कूद ही गये, गहरे जलमें निमग्न हो गये और भी कूद रहे हैं, कूदेंगे।
भाई विश्वनिवासियो! दयामयी ज्ञानदायिनी जननीका मधुर आवाहन सुनो और तुरंत आकर सदाके लिये उसकी सुखद क्रोडमें बैठकर निर्भय और निश्चिन्त हो जाओ।