मृत्यु: सर्वहरश्चाहम्

प्राण प्रियतम! वैराग्यका उपदेश देनेवाले लोग कहते हैं मृत्युको याद रखो, मृत्युका भय करो। मुझे उनका यह कथन नहीं जँचता। मृत्युको मृत्यु समझकर स्मरण रखनेकी आवश्यकता ही क्या है? और उससे भय भी क्यों करना चाहिये? जब सभी रूपोंमें तुम भरे हो तब किसी खास समयमें आनेवाले रूपसे ही तुम्हें स्मरण क्यों किया जाय? अभी जिस रूपमें सामने हो उसीको स्मरण रखनेमें क्या हानि है? भयकी तो कोई बात ही नहीं। तुम-जैसे जीवनसंगी प्रियतम सखासे भय करनेकी कल्पना ही कैसी? फिर मृत्युके लिये तो तुम स्वयं पुकारकर कहते हो—

‘मृत्यु: सर्वहरश्चाहम्’ ‘सर्वहर मृत्यु मैं हूँ।’ जब तुम्हीं हो तब तुमसे भय कैसा? जो भय करते हैं उन्हें या तो तुम्हारे ये शब्द ही नहीं सुन पड़े हैं और सुने हैं तो इन शब्दोंपर विश्वास नहीं है। जब हम तुम्हारे शब्दोंपर ही विश्वास न करें तब हमारा कैसा वैराग्य और कैसी भक्ति? अतएव नाथ! मुझे ऐसा वैराग्य तो मत दो, जिससे तुम्हारे किसी भी रूपको भयजनक मानकर उसका स्मरण करना पड़े। प्रेमके अगाध उदधिमें भयकी बात सुनकर भी भय लगता है। मुझे तो नाथ! दया करके इसी भयसे बचाओ और ऐसा बना दो जिससे सर्वदा, सर्वथा और सर्वत्र केवल तुम्हारे ‘प्रेममय’ स्वरूपके ही दर्शन कर अथाह आनन्दकी रसमय लहरियाँ ही बना रहूँ।