नारी-निन्दाकी सार्थकता
हिंदूशास्त्रोंमें—श्रुति-स्मृति-पुराण-इतिहास आदिसे लेकर वर्तमान समयतकके संत-महात्माओंकी वाणीमें भी—जहाँ विविध सद्गुणोंकी प्रतिमा, ब्रह्मवादिनी, विदुषी, माता, पत्नी, सती, पतिव्रता, गृहिणी आदिके रूपमें नारीकी प्रचुर प्रशंसा की गयी है, उसकी महिमाके अमित गुण गाये गये हैं, वहाँ उन्हीं ग्रन्थोंमें नारीकी निन्दा भी की गयी है और नारीसे बचे रहनेका स्पष्ट आदेश दिया गया है, यद्यपि शास्त्रोंमें नारी-निन्दाकी अपेक्षा नारी-स्तुतिके प्रसंग कहीं अधिक हैं। संतोंकी वाणियोंमें भी ‘कांचन’ के साथ गिनी जानेवाली विषयरूपा ‘कामिनी’ की जितनी निन्दा की गयी है, उससे कहीं अधिक पतिव्रताकी प्रशंसाके पुल बाँधे गये हैं। तथापि शास्त्रके इस नारी-निन्दाके प्रसंगको लेकर आजतक ऐसा कहा जा रहा है कि ‘शास्त्रोंकी रचना पुरुषोंके द्वारा हुई है, अतएव उन्होंने जान-बूझकर नारीके प्रति यह अन्याय किया है।’ पर यदि ध्यानसे देखा जाय तो पता लगेगा कि शास्त्रकारोंने निष्पक्ष बुद्धिसे जहाँ प्रशंसाकी आवश्यकता समझी, वहाँ बड़ी प्रशंसा की है और जहाँ निन्दा की, वहाँ निन्दा की है। साथ ही, नारी-निन्दा किस हेतुसे की गयी है, इसपर शुद्ध भावके साथ सूक्ष्म विचार करनेपर तथा दीर्घदृष्टिसे उसका परिणाम देखनेपर यह स्पष्ट दिखायी देता है कि शास्त्रोंने जो नारी-निन्दा की है, उसमें जरा भी अतिशयोक्ति या दूषित भाव नहीं है, बल्कि वह सर्वथा सार्थक, सत्य और परम आवश्यक भी है।
मानव-जीवनका मुख्य ध्येय है—भगवत्प्राप्ति। भगवत्प्राप्तिके लिये जीवनका संयमित, पवित्र तथा साधन-सम्पन्न होना अत्यन्त आवश्यक है। इस परमार्थ-साधनमें सर्वप्रधान विघ्न है—विषयसंग। मनुष्यका पूर्ण पतन—उसका सर्वनाश किस क्रमसे होता है, इस सम्बन्धमें श्रीभगवान् कहते हैं—
ध्यायतो विषयान् पुंस: संगस्तेषूपजायते।
संगात्संजायते काम: कामात्क्रोधोऽभिजायते॥
क्रोधाद्भवति सम्मोह: सम्मोहात्स्मृतिविभ्रम:।
स्मृतिभ्रंशाद् बुद्धिनाशो बुद्धिनाशात्प्रणश्यति॥
(गीता २। ६२-६३)
‘विषयोंका चिन्तन करनेवाले पुरुषकी उन विषयोंमें आसक्ति होती है, आसक्तिसे कामना उत्पन्न होती है, कामनासे क्रोध उत्पन्न होता है। क्रोधसे सम्मोह—विवेकशून्यता होती है; अविवेकसे स्मृतिभ्रंश और स्मृतिभ्रंशसे बुद्धिका नाश होता है एवं बुद्धिके नाशसे वह आप नष्ट हो जाता है।’
विषयोंमें सर्वप्रधान आकर्षक विषय है—‘पुरुषके लिये नारी और नारीके लिये पुरुष। कहना नहीं होगा कि इसमें नारीकी अपेक्षा पुरुष-प्राणीका चित्त अधिक दुर्बल है, अत: उसका पतन बहुत शीघ्र हो जाता है (और उसके पतनमें नारीका पतन तो है ही; क्योंकि उसीके आधारसे पुरुष गिरता है)। नारीका दर्शन-स्पर्श तो दूर रहा, उसका श्रवण-कथन भी पुरुषको गिरानेके लिये काफी है। इसलिये विवाह-बन्धनके द्वारा एक स्त्रीके साथ एक पुरुषका संसर्ग सीमित करके ऋषि-प्रणीत शास्त्रोंमें उसे ऐसा नियमबद्ध कर दिया गया है कि जिससे उसके जीवनमें कभी असंयम आ ही न सके; क्योंकि किसी एकके प्रति सतत आकर्षण दीर्घकालतक नहीं रहता। उसमें स्वाभाविकता आ जाती है और हिंदू-शास्त्रविधिके अनुसार एकके अतिरिक्त दूसरेका चिन्तन करना भी स्त्री-पुरुष दोनोंके लिये व्यभिचार है। इसीलिये आठ प्रकारके मैथुन* बतलाकर उनका निषेध किया गया है।
हिंदू-विवाह-बन्धन इसीलिये संयमका सहायक और संवर्धक है, क्योंकि वह ‘लौकिक अभ्युदय और नि:श्रेयस’ की सिद्धिके लिये सम्पन्न होनेवाला एक पवित्र धार्मिक संस्कार है। रूप-गुणके आकर्षणसे प्रभावित तथा प्रमत्त होकर विषय-वासनाकी चरितार्थताके लिये किया जानेवाला सौदा नहीं, जो रूप-गुणका अभाव दिखलायी देते ही तोड़ दिया जा सकता है। हिंदू-विवाहका उद्देश्य क्रमश: विषयासक्तिसे मुक्त होकर भगवान्की ओर बढ़ना ही है। पत्नीके लिये पति तथा पतिके लिये पत्नी परस्पर अच्छेद्य धर्मसूत्रमें आबद्ध होकर—एक-दूसरेके सुख-दु:खमें अभिन्न रहकर एक-दूसरेकी धार्मिक—आध्यात्मिक प्रगतिमें सहायक हैं, अत: दोनों परमार्थपथके पथिक हैं। इनमें विषय-विलास नहीं होता। वे संतानोत्पादनरूपी धर्मके लिये ही धर्मसंगत कामका* सेवन करते हैं।
अत: स्वाभाविक ही वे विलास-सामग्रीके रूपमें एक-दूसरेका चिन्तन नहीं करते। पर-पुरुष तथा पर-नारीका चिन्तन सर्वथा निषिद्ध है और इस ‘पर-निषेध’ का विशदीकरण करनेके लिये ही नारी-निन्दा है।
प्रश्न हो सकता है कि ‘फिर इस रूपमें ‘नारी-निन्दा’ ही क्यों? ‘पुरुष-निन्दा’ क्यों नहीं? इसका उत्तर यह है कि नारी धर्मानुसार एकमात्र अपने स्वामीमें परमात्मबुद्धि रखती है और जीवनके समस्त कार्य स्वामीके प्रीत्यर्थ ही करती है। उसके लिये पर-पुरुषका कोई प्रश्न ही नहीं, जिसकी निन्दा करके उसके मनको उधरसे हटाना आवश्यक हो, क्योंकि उसके मन तो स्वामीके अतिरिक्त दूसरे पुरुषका अस्तित्व ही नहीं है—‘सपनेहुँ आन पुरुष जग नाहीं।’ परंतु पुरुषके लिये यह बात नहीं है। पुरुष अपनी पत्नीमें व्यवहारत: परमात्मभाव नहीं रखता। व्यवहारमें पत्नी उसके लिये पूजनीया नहीं है; उसे जगत्में सब प्रकारके यज्ञोंको यथाधिकार सम्पन्न करते हुए ही भगवान्को प्राप्त करना है, बहुतोंको पूजना है। (अवश्य ही उसे भी इस बहुपूजनमें पतिव्रताके आदर्शको सामने रखकर एक परमात्माकी पूजाके लिये ही सबकी पूजा करनी चाहिये। अपने मनमें एक स्त्री ही क्या, कीट-पतंगमात्रको ही भगवान्का स्वरूप समझकर मन-ही-मन सभीको पूजना और प्रणाम करना चाहिये।*)
इसीलिये वह व्यवहारमें नारीको नारी-भावसे देखता है, परंतु भगवत्प्राप्ति तो उसको भी होनी ही चाहिये। इसी कारण उसके लिये विविध साधनोंका विधान है; परंतु नारीको पतिसेवाके अतिरिक्त अन्य यम, नियम, जप, तप, व्रत, योग, यज्ञ, स्वाध्याय और तीर्थ-सेवनादि साधनोंकी कोई आवश्यकता नहीं होती। वह परमात्मभावसे किये हुए एकमात्र पतिसेवनरूपी महायज्ञके द्वारा ही अनायास भगवत्प्राप्ति लाभ करती है—परम गतिको प्राप्त होती है—‘बिनु श्रम नारि परम गति लहई।’ (इतना ही नहीं, वह अपने पातिव्रत्यके प्रतापसे पापी पतिका भी परित्राण कर देती है।) विष्णुपुराणमें मुनियोंकी शंकाका समाधान करते हुए भगवान् वेदव्यासजीने स्त्रियोंको ‘साधु’ और ‘धन्य’ बतलाया तथा फिर इस उक्तिका रहस्योद्घाटन करते हुए कहा—
स्वधर्मस्याविरोधेन नरैर्लब्धं धनं सदा।
प्रतिपादनीयं पात्रेषु यष्टव्यं च यथाविधि॥
तस्यार्जने महाक्लेश: पालने च द्विजोत्तमा:।
तथासद्विनियोगेन विज्ञातं गहनं नृणाम्॥
एवमन्यैस्तथा क्लेशै: पुरुषा द्विजसत्तमा:।
निजान् जयन्ति वै लोकान् प्राजापत्यादिकान् क्रमात्॥
योषिच्छुश्रूषणाद् भर्तु: कर्मणा मनसा गिरा।
तद्धिता शुभमाप्नोति तत्सालोक्यं यतो द्विजा:॥
नातिक्लेशेन महता तानेव पुरुषो यथा।
तृतीयं व्याहृतं तेन मया साध्विति योषित:॥
(६।२।२५—२९)
‘पुरुषोंको अपने धर्मानुकूल (वर्णाश्रमानुमोदित तथा सत्य एवं न्यायपूर्वक) प्राप्त किये हुए धनसे ही सर्वदा सुपात्रको दान और विधिपूर्वक यज्ञ करना चाहिये। द्विजश्रेष्ठगण! ऐसे द्रव्यके उपार्जनमें तथा रक्षणमें बड़ा क्लेश होता है और कहीं वह धन अनुचित काममें लगा दिया गया तो उससे मनुष्योंको जो कष्ट भोगना पड़ता है, वह विदित ही है। इस प्रकार द्विजसत्तमो! पुरुषगण इन तथा ऐसे ही अन्य कष्टसाध्य उपायोंके द्वारा प्राजापत्य आदि शुभ लोकोंको क्रमश: प्राप्त करते हैं। परंतु स्त्रियाँ तो कर्म-मन-वचनद्वारा पतिकी सेवा करनेसे उनकी हितकारिणी बनकर पतिके समान शुभ लोकोंको अनायास ही प्राप्त कर लेती हैं, जो कि पुरुषोंको अत्यन्त परिश्रमसे मिलते हैं। इसीलिये मैंने तीसरी बार यह कहा था कि स्त्रियाँ साधु हैं।’
परंतु यह ऊपर कहा ही गया है कि पुरुषके विविध परमार्थ-साधनोंमें प्रधान विघ्न है विषय-वासना और उसमें प्रधान है—नारी। नारीके प्रति आसक्त चित्तवाला पुरुष परमार्थ-साधनमें कभी अग्रसर नहीं हो सकता। नारीमें इतना आकर्षण है कि साधनसंलग्न तपस्वी, वनवासी ऋषि, महर्षि, राजर्षि तथा देवर्षि भी नारी-संसर्गमें आकर अपनी साधनाकी रक्षा नहीं कर पाये हैं। विश्वामित्र, दुर्वासा, सौभरि, नारद आदि इसके उदाहरण हैं। इसीलिये विषयोंमें दु:खरूप दोषोंको देखकर या उनमें दु:ख-दोष-बुद्धि करके वैराग्य प्राप्त करनेकी बात भगवान्ने गीतामें कही है—‘दु:खदोषानुदर्शनम्’ (१३।८)। नारीमें दु:ख-दोष दिखलाकर उससे आसक्ति हटाने और चित्तवृत्तिको भगवान्की ओर लगानेके लिये ही शास्त्रकी नारी-निन्दामें प्रवृत्ति हुई है। ‘नारी नरककी खानि है; अग्नि, साँप, विष, क्षुरधार आदिसे भी भयानक है; साक्षात् सिंहिनी और सर्पिणी है’ इत्यादि वर्णन उसके प्रति पुरुषके हृदयमें जो रमणीयताका भाव है, उसे हटानेके लिये ही है। स्त्रीमें भोग्य-बुद्धिका नाश हो जाय, इसीलिये ये सारी बातें कही गयी हैं। वेदोंमें जहाँ स्त्रीकी बड़ी प्रशंसा है, वहाँ भी उसे निन्दनीय कहा है।
ऋग्वेदमें कहा है—
इन्द्रश्चिद् घा स्त्रिया अशास्यं मन: उतो अह क्रतुं रघुम्।
(८।३३।१७)
इन्द्रने कहा—‘नारीके मनका दमन नहीं किया जा सकता; क्योंकि उसकी बुद्धि स्वल्प है।’
न वै स्त्रैणानि सख्यानि सन्ति सालावृकाणां हृदयान्येता।
(१०।१५।१५)
‘स्त्रियोंसे मित्रता करना व्यर्थ है, क्योंकि उनका हृदय भेड़ियेके समान है।’
मनु महाराज कहते हैं—
स्वभाव एष नारीणां नराणामिह दूषणम्।
अतोऽर्थान्न प्रमाद्यन्ति प्रमदासु विपश्चित:॥
अविद्वांसमलं लोके विद्वांसमपि वा पुन:।
प्रमदा ह्युत्पथं नेतुं कामक्रोधवशानुगम्॥
मात्रा स्वस्रा दुहित्रा वा न विविक्तासनो भवेत्।
बलवानिन्द्रियग्रामो विद्वांसमपि कर्षति॥
(२।२१३—२१५)
‘इस लोकमें पुरुषोंको विकारग्रस्त कर देना—यह नारियोंका स्वभाव है। अतएव बुद्धिमान् पुरुष नारियोंकी ओरसे कभी प्रमाद नहीं करते—असावधान नहीं रहते। संसारमें कोई मूर्ख हो चाहे विद्वान्, काम-क्रोधके वशीभूत हुए पुरुषको स्त्रियाँ अनायास ही कुमार्गमें ले जा सकती हैं। (इसलिये) पुरुषको चाहिये कि वह माता, बहिन या पुत्रीके पास भी एकान्तमें न बैठे, क्योंकि इन्द्रिय-समूह इतना बलवान् है कि विद्वान्के चित्तको भी खींच लेता है।’
श्रीमद्भागवतमें कहा है—
महत्सेवां द्वारमाहुर्विमुक्ते-
स्तमो द्वारं योषितां संगिसंगम्।
(५।५।२)
‘महापुरुषोंकी सेवा मुक्तिका और स्त्री-संगियोंका संग नरकका द्वार है।’
न तथास्य भवेत् क्लेशो बन्धश्चान्यप्रसंगत:।
योषित्संगाद् यथा पुंसो यथा तत्संगिसंगत:॥
(११।१४।३०)
‘स्त्रियोंके संगसे और स्त्री-संगी—कामी पुरुषोंके संगसे पुरुषको जैसे क्लेश और बन्धनमें पड़ना होता है, वैसा क्लेश और बन्धन किसी भी दूसरे संगसे नहीं होता।’
ब्रह्मवैवर्तपुराणमें कहा गया है—
यत्रेमे दोषनिवहा: काऽऽस्था तत्र पितामह।
का क्रीडा किं सुखं पुंसो विण्मूत्रमलवेश्मनि॥
तेज: प्रणष्टं सम्भोगे दिवालापे यश:क्षय:।
धनक्षयोऽतिप्रीतौ च अत्यासक्तौ वपु:क्षय:॥
साहित्ये पौरुषं नष्टं कलहे माननाशनम्।
सर्वनाशश्च विश्वासे ब्रह्मन्नारीषु किं सुखम्॥
(२३।३३—३५)
देवर्षि नारदजी पितामह ब्रह्माजीसे कहते हैं—
‘जिस नारी-शरीरमें इतने दोषसमूह हैं, पितामह! उसपर कैसा भरोसा। इस मूत्र-पुरीष एवं मैलके कोठारमें पुरुषकी कैसी क्रीड़ा और कौन सुख है? स्त्रीके साथ सम्भोगमें तेजका नाश होता है, दिनमें बात करनेसे यशका नाश, अधिक प्रीति करनेसे धनका क्षय और अधिक आसक्तिसे शरीरका क्षय होता है। ब्रह्मन्! स्त्रियोंका संग करनेसे पौरुषका नाश, कलह करनेसे मानका नाश और विश्वास करनेसे सर्वनाश होता है। अत: स्त्रियोंमें कौन सुख है?’
महाभारतमें आया है—
अन्तक: पवनो मृत्यु: पातालं वडवामुखम्।
क्षुरधारा विषं सर्पो बह्निरित्येकत: स्त्रिय:॥
(अनुशा० ३८।२९)
‘यम, वायु, मृत्यु, पाताल, वडवानल, छूरेकी धार, विष, साँप और अग्निके साथ नारीकी तुलना दी जा सकती है।’
महात्मा कबीरजीने कहा है—
नारी की झाँई परत अंधा होत भुजंग।
कबीर तिन की कौन गति नित नारी के संग॥
कामिनि सुन्दर सर्पिणी, जो छेड़े तेहि खाय।
जे गुरु चरनन राचिया, तिनके निकट न जाय॥
पर नारी पैनी छुरी, मति कोइ लावो अंग।
रावन के दस सिर गए पर नारी के संग॥
नारी निरखि न देखिये, निरखि न कीजै दौर।
देखे ही ते विष चढ़ै, मन आवै कछु और॥
नारी नाहीं जम अहै, तू मन राचै जाय।
मंजारी ज्यों बोलि के काढ़ि कलेजा खाय॥
नैनों काजर पाइ कै गाढ़े बाँधे केस।
हाथों मेहँदी लाइ कै बाघिन खाया देस॥
महात्मा सुन्दरदासजी कहते हैं—
कामिनी को अंग अति मलिन महा अशुद्ध,
रोम रोम मलिन, मलिन सब द्वार है।
हाड़, माँस, मज्जा, मेद, चर्म सू लपेट राखे,
ठौर ठौर रकत के भरेहू भंडार है॥
मूत्र हू पुरीष आँत एकमेक मिल रही,
और हू उदर माँहि बिबिध बिकार है।
सुन्दर कहत नारी नख सिख निन्दा रूप,
ताहि जो सराहै, सो तो बड़ोई गँवार है॥
इसी प्रकार अन्यान्य शास्त्रों और संतोंने नारीकी विविध प्रकारसे निन्दा की है और यह सत्य ही है कि जो पुरुष नारीके उच्चतम हृदय, उसके त्यागमय और स्नेहमय मातृत्व तथा उसके पवित्रतम देवी-भावकी ओर न देखकर उसके शरीरस्थ स्थूल माँसपिण्डों और मल-मूत्रके गह्वरोंकी ओर लालायित सतृष्ण दृष्टिसे देखेगा, उसे इसके बदलेमें पवित्र अमृत थोड़े ही मिलेगा? उसके लिये नारी वरदायिनी देवीके रूपमें थोड़े ही आत्मप्रकाश करेगी? उसके लिये तो वह निश्चय ही नरकका द्वार,* भीषण बाघिनि, विषधरी सर्पिणी और सर्वहरा मृत्यु ही होगी।
विचार करनेपर पता लगेगा कि इस नारी-निन्दामें नारी-रक्षा भी अन्तर्हित है। नारीके पतनमें कारण है पुरुषकी नीच प्रवृत्ति। पुरुषकी नीच प्रवृत्ति यदि किसी कारणसे मर जाय तो नारीका पतन हो ही नहीं सकता। एक तो उसके पास पातिव्रत्यका रक्षा-कवच है; दूसरे यदि वह कहीं गिरना भी चाहेगी तो शास्त्रके वचनानुसार नारीकी भीषणतासे डरा हुआ, उसे भयानक बाघिनि तथा नरककी खानि समझनेवाला, नीच प्रवृत्तिसे रहित पुरुष उससे स्वाभाविक ही दूर रहेगा। फलत: नारीका पतन भी नहीं होगा। इस प्रकार दोनों ही पतनसे बच जायँगे और दोनों ही धर्मपथपर आरूढ़ होकर मानव-जीवनके परम लक्ष्य भगवान्को प्राप्त कर सकेंगे।
अतएव शास्त्रों और संतोंके द्वारा की गयी नारी-निन्दा नारी और पुरुष दोनोंके लिये ही कल्याणकारिणी है और इसी सत्-उद्देश्यसे की गयी है। वस्तुत: सत्यस्थिति भी यही है।
दूसरी दृष्टिसे विचार करनेपर यह सिद्ध होता है कि यह निन्दा वस्तुत: साध्वी-सती नारीकी नहीं है। सती-साध्वी नारी तो अपने पवित्र पातिव्रत्यके प्रतापसे पापी पुरुषोंकी पाप-भावनाको या पापात्मा पुरुषोंके शरीरको अपने संकल्पमात्रसे नष्ट कर सकती है। यह निन्दा तो कुलटा स्त्रियोंकी है, जो अपनी दूषित आन्तरिक वृत्ति या बाह्य क्रियाओंसे पुरुषोंको कलंकित किया करती है।
ब्रह्मवैवर्तपुराणमें श्रीनारदजी कहते हैं—‘स्त्रियाँ तीन प्रकारकी होती हैं—साध्वी, भोग्या और कुलटा। जो परलोकके भयसे, यशकी इच्छासे तथा स्नेहवशत: स्वामीकी निरन्तर सेवा करती है वह ‘साध्वी’ है। जो मनोवांछित गहने-कपड़ोंकी चाहसे कामस्नेहयुक्त होकर पतिकी सेवा करती है, उसे ‘भोग्या’ कहते हैं और ‘कुलटा’ नारी तो वैसी ही होती है, जैसा ‘कुलांगार’ पुरुष होता है। यह कपटसे पतिसेवा करती है, इसमें पति-भक्ति नहीं होती। इसका हृदय छूरेकी धार-सा तेज होता है, पर इसकी वाणी अमृत-सी होती है। इसका काम पुरुषसे आठगुना, आहार दूना, निष्ठुरता चौगुनी और क्रोध छ:गुना होता है। ऐसी पुंश्चली नारी जारके लिये पतितकको मार डालनेमें नहीं हिचकती (ब्र० वै० ब्रह्मखण्ड, अध्याय २३)।’
इस प्रकारकी कुलटा नारीसे तो सभीको बचना चाहिये; परंतु वैराग्यकी साधना करनेवाले मुमुक्षु पुरुषके लिये तथा संन्यासी, वानप्रस्थ और ब्रह्मचारियोंके लिये तो नारीमात्र ही साधन-पथका अवरोध करनेवाली होती है। इस दृष्टिसे भी नारीकी निन्दा करना सार्थक है। इस प्रकार नारीमें दोष देखकर गृहस्थ पर-स्त्रीका त्याग करे और ब्रह्मचारी, वानप्रस्थ तथा संन्यासी नारीमात्रका। यही नारी-निन्दाका उद्देश्य है।
आजकल तो पुरुषजातिकी नीचता उत्तरोत्तर बढ़ती जा रही है। वे भाँति-भाँतिसे नारीका पतन करनेमें लगे हुए हैं। शास्त्रोंमें नारीकी जो निन्दा की गयी है, उससे सचमुच कहीं अधिक निन्दाका पात्र वर्तमान कालका पुरुषवर्ग है। वस्तुत: आज नारीको ही इस दुष्ट पुरुषसमाजसे बचना चाहिये। नारी इस बातको न समझकर जो पुरुष-संस्रवमें अधिक आने लगी है और इसीमें अपना अभ्युदय मान रही है, यह उसकी बहुत बड़ी भ्रान्ति है। आजके कुत्सितहृदय पुरुषसमाजने उसे बहकाकर भ्रममें डाल दिया है। नारी बाघिन-साँपिन हो या न हो; परंतु आजका नीच-स्वार्थके वशमें पड़ा हुआ यह पुरुष तो नारीके लिये साँप-बाघसे भी बढ़कर भयानक है, जो ऊपरसे साँप-बाघ-सा डरावना न दीखनेपर भी—वरं मित्र-सा प्रतीत होनेपर भी—वस्तुत: नारीके महान् पतनके सतत प्रयत्नमें लगा है।