पाँच प्रकारके पुत्र

१—न्यासानुबन्धी—किसीको बहुत ईमानदार और अपना सुहृद् समझकर कोई अपने रुपये-पैसे, गहने, जमीन अथवा दूसरी वस्तुएँ धरोहरके रूपमें उसके पास रखता है। परंतु कुछ दिनों बाद रखनेवाला जब वापस माँगता है, तब उसे वह वस्तु नहीं मिलती। जिसके यहाँ रखी गयी थी वह बेईमानीसे उसे हड़प जाता है और रखकर जानेवालेको अँगूठा दिखा देता है। वह न्यासापहारक—धरोहर हजम करनेवाला कहलाता है। उसे इस पापके फलस्वरूप नरकादिकी प्राप्ति तो होती ही है, धरोहर वापस न पानेवाला आसक्तिवश धरोहरका धन वसूल करनेके लिये उसके यहाँ जन्म लेता है और उसे दु:ख दे-देकर मर जाता है।

वह बहुत सुन्दर, गुणवान् और अच्छे-अच्छे लक्षणोंसे युक्त होता है। दिनोदिन बड़ी भक्ति दिखलाता है, बहुत प्यारा बोलता है, मधुर स्वभावका होता है; बोलनेमें बहुत चतुर और स्नेह बढ़ानेवाला होता है। इस प्रकारकी संतानको पाकर माँ-बाप प्रसन्न हो जाते हैं। परंतु वह स्नेह दिखला-दिखलाकर खेलकी सामग्रियों, अच्छे-अच्छे कपड़ों-गहनों, बीमारियोंके बहाने चिकित्सा और ओषधियों आदिके द्वारा अपनी धरोहर वसूल करता रहता है और दारुण दु:ख देकर छोटी ही आयुमें मर जाता है। पिता जब ‘हाय-हाय’ करके रोता है तब वह मानो यों कहकर हँसता है कि—‘इसने पूर्वजन्ममें मेरा रखा हुआ धन हड़प लिया था, इससे मुझे बड़े-बड़े दु:ख उठाकर मरना पड़ा था। आज मैं अपना वही धन लेकर जा रहा हूँ। कौन मेरा पिता है, मैं किसका पुत्र हूँ। अब यह पिशाचकी भाँति रोता और भटकता रहेगा।’ इस प्रकार कहकर वह बार-बार हँसता है और जबतक अपनी धरोहर मिल नहीं जाती—वासना, आसक्ति और प्रतिहिंसाकी वृत्तिसे बार-बार पुत्रके रूपमें जन्म ले-लेकर उसे दु:ख दे-देकर मरता है—

‘दु:खं दत्त्वा प्रयात्येवं भूत्वा भूत्वा पुन: पुन:।’

२-ऋणानुबन्धी—जो मनुष्य किसीसे कर्ज लेकर बेईमानी कर जाता है और चुकानेमें समर्थ होनेपर भी उसे चुकाता नहीं, ऋण देनेवाला अगले जन्मोंमें उसके यहाँ संतान होकर जन्म लेता है। वह जन्मसे ही निठुर और निर्दयी होता है। सदा कड़ुआ बोलता है; घरमें छीन-छीन अच्छी-अच्छी चीजें खा जाता है। रोकनेपर खीझकर गालियाँ बकता है, माँ-बापकी निन्दा करता है, हृदयमें बड़ी करुणा उत्पन्न करनेवाले और डरा देनेवाले कठोर वचन बोलता है। जूआ खेलता है, चोरी करता है, लूट-लूटकर खाता है, लड़कपनसे ही मौज-शौक, बीमारी, सगाई, विवाह आदिमें खूब खर्च करवाता है। वह कहता है सब कुछ ‘मेरा’ ही है। पिता-माताको बोलने भी नहीं देता। बोलते हैं तो लातों-घूसों तथा लाठी-डंडोंसे उनकी खबर लेता है। पिता मर जाता है तब माताको इसी प्रकार दु:ख देता है। श्राद्ध-दान आदि सत्कर्म कभी नहीं करता और इस प्रकार अपना ऋण वसूल करता है। संसारमें ऐसे ही पुत्र पैदा होते हैं—

‘एवंविधाश्च वै पुत्रा: प्रभवन्ति महीतले।’

३-वैरानुबन्धी—पूर्वजन्ममें वैरभावसे किसीको दु:ख पहुँचाया हो तो वह अपना बदला चुकानेके लिये इस जन्ममें पुत्र होकर पैदा होता है। वह लड़कपनसे ही माँ-बापके साथ वैरीका-सा आचरण करता है। खेल-ही-खेलमें पिता-माताको बुरी तरह मारकर हँसता हुआ भाग जाता है। यों बार-बार मारता है, नित्य-निरन्तर गुस्सेमें भरा हुआ उन्हें जली-कटी सुना-सुनाकर जलाता रहता है। सुखकी नींद कभी नहीं सोने देता। जबतक वे जीते हैं, तबतक दु:ख-ही-दु:ख देता है, प्रत्यक्ष वैरीका-सा बर्ताव करता है और अन्तमें वह दुष्टात्मा अपने पिता-माताको मारकर अपना बदला चुकाकर चला जाता है—

पितरं मारयित्वा च मातरं च तत: पुन:।

प्रयात्येवं स दुष्टात्मा पूर्ववैरानुभावत:॥

४- उपकारानुबन्धी—जिसका पूर्वजन्ममें सकामभावसे उपकार किया हो, जिसे सुख पहुँचाया हो, वह सुख देनेके लिये पुत्ररूपमें जन्म लेता है। ऐसा पुत्र बड़ा ही सुशील, प्रिय और सुखदायी होता है। वह जन्मसे लेकर बहुत बड़ी आयुतक माँ-बापको सुख देता है, उनका प्रिय कार्य करता है। भक्ति और स्नेहभरे वचनों तथा कार्योंसे संतुष्ट करता है। उनकी सेवा करता है। उन्हें अच्छे-अच्छे भोजन कराता है और दान-पुण्य करवाता है। माता-पिताके मरनेपर दु:खी होकर स्नेहवश रोता है और श्राद्ध-पिण्ड-दानादि सब क्रियाओंको श्रद्धापूर्वक करता है और अपना सारा जीवन उनकी कीर्ति-विस्तारमें लगाता है। वह पुत्र होकर इस प्रकार पिता-माताके संतोषार्थ ही सब कुछ करता है—

‘पुत्रो भूत्वा महाप्राज्ञ अनेन विधिना किल।’

५—उदासीन—जो किसी प्रकारका भला-बुरा बदला चुकानेके लिये जन्म नहीं लेता, वह उदासीन पुत्र कहलाता है। वह न कुछ देता है, न लेता है, न किसीपर क्रोधित होता है और न तो संतोष प्रकाश करता है। उसकी सभी क्रियाएँ उदासीनकी तरह होती हैं। उसका सारा जीवन उदासीन भावमें ही बीतता है—

‘उदासीनेन भावेन सदैव परिवर्तते।’

जैसे पूर्वजन्मोंका बदला चुकानेके लिये ये पुत्र होते हैं, वैसे ही अन्य सम्बन्धी आदि भी होते हैं—

यथा पुत्रस्तथा भार्या पिता माताथ बान्धवा:॥

भृत्याश्चान्ये समाख्याता: पशवस्तुरगास्तथा।

राजा महिष्यो दासाश्च .................................॥

पुत्रकी तरह पत्नी, पिता, माता, बन्धु-बान्धव, नौकर, गौ, घोड़े, हाथी, भैंस और दास आदि भी पूर्वजन्मके अच्छे-बुरे कर्मोंका फल देने और बदला चुकानेके लिये होते हैं।*