प्राचीन आचार
आचाराल्लभते चायुराचाराल्लभते सुखम्।
आचारात् स्वर्गमोक्षं च आचारो हन्त्यलक्षणम्॥
अनाचारो हि पुरुषो लोके भवति निन्दित:।
दु:खभागी च सततं व्याधितोऽल्पायुरेव च॥
नरके नियतं वासो ह्यनाचारान्नरस्य च।
आचाराच्च परं लोकमाचारं शृणु तत्त्वत:॥
(पद्मपुराण, सृष्टिखण्ड)
ब्रह्माजी देवर्षि नारदजीसे कहते हैं—
‘मनुष्य आचारसे आयु, सुख, स्वर्ग और मोक्षको प्राप्त करता है। आचारसे अशुभ लक्षणोंका नाश हो जाता है। आचारहीन मनुष्य संसारमें निन्दित, सदा दु:खका भागी, रोगी और अल्पायु होता है। अनाचारी मनुष्यको निश्चय ही नरकमें निवास करना पड़ता है और आचारसे श्रेष्ठ लोककी प्राप्ति होती है; इसलिये तुम आचारका तात्त्विक वर्णन सुनो।’
यद्यपि वर्तमान युगके मनुष्य प्राय: प्राचीन आचारकी बातोंको बहुत ही क्षुद्र समझकर उनका पालन करना आवश्यक नहीं समझते; परंतु खोज करनेपर उन छोटी-छोटी दैनिक व्यवहारकी बातोंमें बड़ा तत्त्व मिलता है। यदि आज हम उन सबका तात्पर्य न भी समझ सकें तो भी हमें उनका निरादर नहीं करना चाहिये। यह आचार-पद्धति उन देवों और महर्षियोंद्वारा स्थापित है, जो भूत-भविष्यसे तथा अन्तर्जगत्की रचना और संचालनसे परिचित थे। अतएव उसे जानकर यथासाध्य श्रद्धापूर्वक तदनुसार आचरण करनेसे नि:सन्देह बहुत लाभ हो सकता है। प्राय: सभी प्राचीन स्मृति और पुराणोंमें कुछ-कुछ न्यूनाधिकताके साथ आचारकी पद्धतियाँ बतलायी गयी हैं। उनमेंसे आज यहाँ पद्मपुराणके सृष्टिखण्डमें नारद-ब्रह्मा-संवादके रूपमें उल्लिखित आचारका वर्णन कुछ संक्षेप करके प्रकाशित किया जाता है। आशा है, श्रद्धालु पाठक इसे अनावश्यक और छोटी बात समझकर इसकी अवहेलना नहीं करेंगे और यथासाध्य इसका पालन करके लाभ उठावेंगे। ब्रह्माजी कहते हैं—
द्विजको रात्रिके अन्तिम प्रहरमें उठकर प्रतिदिन भगवान्, देवता और पुण्यवान् व्यक्तियोंका स्मरण करना चाहिये। ‘गोविन्द, माधव, कृष्ण, हरि, दामोदर, नारायण, जगन्नाथ, वासुदेव, अज, विभु, सरस्वती, महालक्ष्मी, वेदमाता, सावित्री, ब्रह्मा, सूर्य, चन्द्रमा, दिक्पालगण, ग्रहसमूह, शंकर, शिव, शम्भु, ईश्वर, महेश्वर, गणेश, स्कन्द, गौरी, भागीरथी गंगा, पुण्यश्लोक राजा नल, पुण्यश्लोक जनार्दन, पुण्यश्लोका जानकी, पुण्यश्लोक युधिष्ठिर और अश्वत्थामा, बलि, व्यास, हनुमान्, विभीषण, कृपाचार्य तथा परशुराम—इन सात चिरंजीवी पुरुषोंके नाम जो मनुष्य नित्यप्रति प्रात:काल उठकर स्मरण करता है, वह ब्रह्महत्यादि पातकोंसे छूट जाता है।’*
तदनन्तर साफ जगह मल-मूत्रका त्याग करे, रात्रिको दक्षिणाभिमुख और दिनमें उत्तरकी ओर मुख करके मल-मूत्रका त्याग करना चाहिये। अंगोंमें मिट्टी लगाकर उन्हें शुद्ध करे। लिंगमें एक बार, गुदामें तीन बार, बायें हाथमें दस बार और दोनों हाथोंमें सात बार मिट्टी लगावे। फिर ‘हे मृत्तिके! मेरे सारे पूर्वसंचित पापोंको दूर करो*।’
इस मन्त्रसे सारे अंगोंमें मिट्टी लगावे। तदनन्तर गूलर आदिके दाँतुनसे दन्तधावन करके नद, नदी, कुँए या तालाबमें स्नान करे। प्रात:स्नान अत्यन्त ही स्वास्थ्यप्रद और पापनाशक है। स्नानके बाद संयत होकर संध्या करे। प्रात:काल रक्तवर्णा, मध्याह्नमें शुक्लवर्णा और संध्या-समय कृष्णवर्णा गायत्रीका ध्यान करे। लोकान्तरगत पितृगणोंको उत्तम जल नहीं मिलता, इसलिये पितृव्रतपरायण शिष्य, पुत्र, पौत्र, दौहित्र, बन्धु और मित्र अपने मरे हुए सम्बन्धियोंकी तृप्तिके लिये नित्य तर्पण करें। तर्पण कुश हाथमें लेकर करना चाहिये। पितरोंको काले तिलसे बहुत तृप्ति होती है। अतएव तिल मिले हुए जलसे तर्पण करे। स्नान करके पवित्र वस्त्र पहने। धोबीसे धुला हुआ कपड़ा अपवित्र होता है, उसे पुन: स्वच्छ जलसे धोकर पहनना चाहिये। नित्य देवपूजन करे। विघ्ननाशके लिये गणेशकी, बीमारी मिटनेके लिये सूर्यकी, धर्म और मोक्षके लिये विष्णुकी, कामनापूर्तिके लिये शिवकी और शक्तिकी पूजा करे। नित्य बलिवैश्वदेव और हवन करे। इस प्रकार सब देवों और सब प्राणियोंकी तृप्ति करनेके बाद स्वयं भोजन करे। स्नान, तर्पण, जप, देवपूजन और संध्योपासना नियमपूर्वक नित्य करे। इनके न करनेसे बड़ा पाप होता है।
घरके कच्चे आँगनको रोज गोबरसे लीपे; बर्तनोंको रोज माँजे। काँसेका बर्तन राखसे, ताँबेका खटाईसे, पत्थरका तेलसे, सोने-चाँदीका जलसे और लोहेका अग्निसे शुद्ध होता है। खोदने, जलाने, लीपने और धोनेसे पृथ्वी पवित्र होती है। बिछौने, स्त्री, शिशु, वस्त्र, उपवीत और कमण्डलु सदा ही पवित्र हैं, परंतु अपने हों तो। दूसरोंके हों तो कभी शुद्ध नहीं हैं। एक कपड़ा पहनकर कभी स्नान या भोजन न करे। धोती और अँगोछा दोनों हों। दूसरेका स्नानवस्त्र कभी न पहने। रोज सबेरे बालोंको और दाँतोंको धोवे। गुरुजनोंको नमस्कार करे। दोनों हाथ, दोनों पैर और मुख—इन पाँचों अंगोंको गीले रखकर (धोकर) भोजन करे। जो नियमित पंचार्द्र (इन पाँचोंको गीले रखकर) भोजन करते हैं, वे सौ वर्ष जीते हैं। देवता, गुरु, राजा, स्नातक, आचार्य, ब्राह्मण और यज्ञादिमें दीक्षित व्यक्तिकी छायाको जान-बूझकर न लाँघे। गौ, ब्राह्मण, अग्नि और दम्पति (पति-पत्नी)-के बीचसे न जाय। अग्नि, ब्राह्मण, देवता, गुरु, अपना मस्तक, फूलोंका पेड़, यज्ञवृक्ष और अधार्मिक मनुष्य, इनका जूठे मुँह स्पर्श न करे। सूर्य, चन्द्रमा और तारे—इन तीनों तेजमय पदार्थोंको जूठे मुँह ऊपरकी ओर ताककर न देखे। विप्र, गुरु, देवता, राजा, संन्यासी, योगी, देवकार्यमें लगे हुए मनुष्य और धर्मोपदेशक पुरुषको भी जूठे मुँह न देखे। समुद्र और नदीके किनारेपर यज्ञ-(वट, पीपल आदि) वृक्षोंके नीचे, बगीचेमें, पुष्पवाटिकामें, जलमें, ब्राह्मणके घरमें, राजमार्गमें और गोशालामें शरीरका कोई भी मल न त्याग करे। मंगलवारको हजामत न करावे। रवि और मंगलवारको तैल न लगावे। मुखमें नख कभी न ले। अपने शरीरको और आसनको न बजावे। गुरुके साथ एक आसनपर न बैठे। श्रोत्रिय, देवता, गुरु, राजा, तपस्वी, पंगु, अन्धे और स्त्रियोंका धन किसी तरह हरण न करे। ब्राह्मण, गौ, राजा, रोगी, बोझ लादे हुए, गर्भिणी स्त्री और कमजोर मनुष्यके लिये रास्ता छोड़ दे। राजा, ब्राह्मण और चिकित्सक (वैद्य-डॉक्टर)-से विवाद न करे। पतित, कुष्ठरोगी, चाण्डाल, गो-मांसभोजी, समाजबहिष्कृत और मूर्खसे सदा अलग रहे। दुष्टा, बुरी वृत्तिवाली, अपवाद लगानेवाली, कुकर्म करनेवाली, कलहप्रिया, प्रमत्ता, अधिक अंगवाली, निर्लज्जा, बाहर घूमने-फिरनेवाली, खर्चीली और अनाचारिणी स्त्रियोंसे दूर रहे। मलिन अवस्थामें गुरु-पत्नीको प्रणाम न करे। गुरुपत्नीको भी बिना प्रयोजन न देखे। पुत्रवधू, भ्रातृवधू, कन्या तथा अन्य जो भी स्त्रियाँ युवती हों तो बिना प्रयोजन उनकी ओर न देखे, स्पर्श तो कभी न करे। स्त्रियोंके साथ व्यर्थ बातचीत न करे, न उनके नेत्रोंकी ओर देखे, न कलह करे और न अमर्यादित वाणी बोले। तुष, चिनगारी, हड्डी, कपास, देवनिर्माल्य और चिताकी लकड़ीपर पैर न रखे। दुर्गन्धवाली, अपवित्र और जूठी चीज न खाय। क्षणभरके लिये भी कुसंगमें न रहे और न जाय। दीपककी छायामें और बहेड़ाके पेड़के नीचे न रहे। अस्पृश्य, पापात्मा और क्रोधी मनुष्यसे बात न करे। चाचा और मामा उम्रमें अपनेसे छोटे हों तो उनका अभिवादन न करे, परंतु उठकर उन्हें आसन दे और कृतांजलि हुआ करे। तेल लगाये हुए, जूठे मुँहवाले, गीला कपड़ा पहने, रोगी, समुद्रमें उतरे हुए, उद्विग्न, यज्ञके कर्ममें लगे हुए, स्त्रीके साथ क्रीड़ा करते हुए, बालकके साथ खेलते हुए, पुष्प या कुश हाथोंमें लिये हुए, और बोझ उठाये हुए, इन मनुष्योंको अभिवादन न करे; क्योंकि बदलेमें उन्हें वैसा करनेमें असुविधा होगी। मस्तक या दोनों कानोंको ढककर, चोटी खोलकर जलमें अथवा दक्षिणाभिमुख होकर आचमन न करे। आचमनके समय पैर धोने चाहिये। सूखे पैर सोना और गीले पैर भोजन करना चाहिये। अँधेरेमें न सोवे, न भोजन करे, क्योंकि बिछौने या भोजनमें जीव-जन्तु रह सकते हैं। पश्चिम और दक्षिणकी ओर मुँह करके दाँतोंको न धोवे। उत्तर और पश्चिमकी ओर सिर करके न सोवे। दक्षिण और पूर्वकी ओर सिर करके सोना चाहिये। दिन-रातमें एक बार भोजन करना देवताओंका, दो बार मनुष्योंका, तीन बार प्रेत-दैत्योंका और चार बार राक्षसोंका होता है।
स्वर्गसे आये हुए मनुष्योंकी चार पहचान हैं—खुले हाथों दान, मीठी वाणी, देवताओंका पूजन और ब्राह्मणोंको तृप्त करना। नरकसे आये हुए जीवोंकी छ: पहचान हैं—कंजूसी, मैला-कुचैला रहना, स्वजनोंकी निन्दा, नीच जनोंकी भक्ति, अत्यन्त क्रोध और कठोर वाणी। जो धर्मके बीजसे उत्पन्न हैं, उनकी प्रत्यक्ष पहचान हैं—नवनीतके समान कोमल वाणी और दयासे कोमल हृदय और जो पापके बीजसे पैदा हुए हैं, उनके प्रत्यक्ष लक्षण हैं—हृदयमें दयाका अभाव और केवड़ेके पत्तों-जैसी कँटीली और तीखी वाणी!*