प्रेमकी पराकाष्ठा

जगाई-मधाई-उद्धार

श्रीचैतन्यदेवने हरिनाम वितरण करनेके लिये श्रीहरिदास और श्रीनित्यानन्दको विशेषरूपसे आदेश दिया। प्रभुने कहा, ‘इस नवद्वीपके घर-घरमें मूर्ख-पण्डित, साधु-असाधु, ब्राह्मण-चाण्डाल सभीको हरिनाम दो और उनका उद्धार करो।’ दोनों ही भक्त इस काममें अनुभवी और निपुण थे। प्रथम तो ये परम दयालु और शक्ति-संचार करनेमें समर्थ थे। दूसरे दोनों ही संन्यासी थे। नवद्वीपमें नित्य नियमसे हरिनाम बँटने लगा। हरिदास और नित्यानन्द प्रात:काल किसी गृहस्थके दरवाजेपर जाकर खड़े हुए। गृहस्थने तेज:पुंज संन्यासियोंको देखकर जब भीख देनी चाही, तब वे दोनों कहने लगे, ‘तुमलोग कृष्ण-कृष्ण कहो, कृष्णका भजन करो—हमारी यही भीख है।’ इतना कहकर भीख बिना लिये ही दूसरे घर चले गये। इसी तरह घर-घर नाम-प्रचार करने लगे।

उस समय जगन्नाथ और माधव नामक दो ब्राह्मण भाई नवद्वीपमें निवास करते थे। एक तरहसे वे नगरके मालिक थे। धनसे काजीको वशमें कर दोनों भाई नवद्वीपमें यथेच्छाचरण करते थे, इन्हें धर्माधर्मका कोई ज्ञान नहीं था, ये सदा शराबके नशेमें चूर रहा करते थे। जरा-सी बातपर खून कर डालना और मनमाने डाके डालना इनके बायें हाथका खेल था। इनके पास बड़ी सेना थी, जिससे बलमें कोई इनसे बढ़कर नहीं था। नवद्वीप-निवासी प्राय: विद्याचर्चामें ही लगे रहते, इससे वे सब इनके प्रतीकारका कोई उपाय न कर चुपचाप अत्याचार सहा करते थे। ये दोनों भाई जगाई-मधाईके नामसे प्रसिद्ध थे।

एक दिन नित्यानन्दने हरिदाससे कहा—‘चलो भाई! आज उन दोनों भाइयोंको भी प्रभुका आदेश सुनावें। सुनेंगे तो अच्छी बात है, नहीं तो अपना कुछ बिगड़ता नहीं।’ यों सलाह करके दोनों जा पहुँचे। वहाँ दोनों भाई शराबमें मतवाले हुए बैठे थे। नित्यानन्दने जाते ही कहा—कृष्ण कहो, कृष्ण भजो। हमें यही भीख दो।’ यह सुनते ही उनके क्रोधका पारा बहुत चढ़ गया। उन्होंने कहा—‘ठीक! क्या प्राणोंका डर नहीं है जो हमारे सामने इतनी बड़ी-बड़ी बातें करते हो, पकड़ो तो कोई इन दोनों पाखण्डियोंको।’ इतना कहकर स्वयं ही उन्हें पकड़नेको दौड़े। नित्यानन्द और हरिदास जोरसे भाग छूटे। नगरके विरोधी लोग हँसते हुए कहने लगे—‘आज खूब हुई पाखण्डियोंमें।’

महाप्रभुके पास पहुँचकर उन्होंने सारी कथा आद्योपान्त सुनायी। तदनन्तर नित्यानन्द कहने लगे—‘साधुसे तो कृष्ण-नाम सभी कहला सकते हैं। जगाई-मधाईके मुखसे कृष्ण-नाम कहला सकें, तभी तुम्हारी बड़ाई है। इन दोनों भाइयोंका उद्धार करके जगत‍्में अपनी दयाका परिचय तुम्हें देना पड़ेगा।’ प्रभु हँसकर कहने लगे—‘श्रीपाद! जब तुम उन दोनोंकी कल्याण-कामना करते हो तब अवश्य ही उनका उद्धार होगा।’ प्रभुके इन वचनोंसे भक्तोंने समझ लिया कि अब जगाई-मधाईका उद्धार हो गया। आनन्दसे भक्तगणोंने हरिध्वनिसे आकाश गुँजा दिया।

श्रीवासके घर कीर्तन हो रहा था। कीर्तनका शब्द सुनकर जगाई-मधाई देखने आये; दोनों ही शराबके नशेमें पागल हो रहे थे। दरवाजा बंद था; इसलिये अंदर नहीं जा सके। बाहर खड़े भीतरसे आती हुई हरिध्वनि सुनने लगे। शराबके नशेमें दोनों नाचने लगे। सारी रात यों ही नाचते बीती। प्रात:काल कीर्तन समाप्तकर जब भक्तोंने गंगाजी जानेके लिये दरवाजा खोला तो सामने जगाई-मधाई नाचते हुए दिखायी दिये। सरलचित्त भक्त डर गये। श्रीचैतन्य एक बगलसे जाने लगे; तब उन दोनोंने नशेमें झूमते हुए ही कहा, ‘निमाई पण्डित! यह तुम्हारा क्या सम्प्रदाय है? क्या मंगलचण्डीके गीत गाते हो, तुम्हारा गाना हमें बहुत अच्छा लगा! एक दिन हमारे घर भी इसी तरह गान करना होगा।’ श्रीचैतन्यने कोई उत्तर नहीं दिया और वे सबके साथ गंगास्नानके लिये चले गये।

दोपहरके समय नित्यानन्दजी प्रभुसे कहने लगे—‘प्रभो! साधुओंका उद्धार तो सभी कर सकते हैं। आज जगत‍्में सबसे दीन-हीन जगाई-मधाई हैं। इनका उद्धार करके पतितपावन नामको सार्थक करो।’ नित्यानन्दने दूसरे सब भक्तोंको पहलेसे ही गाँठ रखा था अतएव सभीने जगाई-मधाईके उद्धारके लिये प्रभुसे प्रार्थना की।

प्रभुने कहा—‘जब तुम सभी उनकी कल्याण-कामना करते हो, तब श्रीकृष्ण उनका उद्धार शीघ्र करेंगे। उनकी पाप-कथाएँ याद आते ही हृदय सूखने लगता है। भविष्यमें मिलनेवाले पापोंके फलको विचारकर हृदय दहल उठता है। ऐसे कठिन रोगकी एकमात्र औषध श्रीहरिका नाम ही है। अत: जाओ। सब भक्तोंको बुला लो। सभी एक साथ कीर्तन करते-करते जाकर उनको हरिनाम देंगे। आज जगत् देखेगा, हरिनाममें कितनी शक्ति है।’

भक्तगण एकत्र हो गये। नगर-कीर्तनकी तैयारी हुई। श्रीचैतन्यका यही पहला नगर-कीर्तन था। इससे पहले बाहरके लोगोंने कभी चैतन्यका कीर्तन नहीं देखा था। भक्तोंमें किसीके हाथमें ढोल है, किसीके करताल है, किसीके शंख है, किसीने भेरी ले रखी है। पैरोंमें सबने घुँघरू बाँध लिये हैं। संध्याका समय है। श्रीनित्यानन्द, श्रीअद्वैताचार्य, श्रीवास, गदाधर, हरिदास, मुरारि, मुकुन्द और नरहरि आदि सभी भक्त कीर्तन करते हुए चल रहे हैं। श्रीचैतन्यदेव बीचमें हैं, आनन्दसे उनका शरीर डगमगा रहा है, आँखोंकी पलकें पड़नी बंद हो गयी हैं, प्रेमाश्रुओंकी पिचकारी छूट रही है, अनेक प्रकारसे भाव बता-बताकर प्रभु नृत्य कर रहे हैं, उनके प्रत्येक अंगसे मानो अमृत बरस रहा है। भक्तगण उन्हें घेरकर कीर्तन करते हुए नाचते जा रहे हैं। श्रीनित्यानन्दजी सबसे आगे हैं। वे जगाई-मधाईकी दुर्दशा आँखों देख चुके हैं। उन लोगोंके दु:खसे नित्यानन्दका हृदय विदीर्ण हो गया था। आज प्रभुको तैयार करके वे कमर कसकर दोनों भाइयोंका उद्धार करने जा रहे हैं। आज नित्यानन्दके गौरव और आनन्दकी सीमा नहीं है।

जगाई-मधाई रातभर शराब पीकर इस समय नींदमें बेहोश पड़े हैं। शाम हो गयी है, परंतु अभी वे सोकर नहीं उठे हैं। कीर्तनकी आकाशव्यापी ध्वनिसे उनकी नींद टूटी। हो-हल्लेसे चिढ़कर उन्होंने पहरेदारसे कहा—‘जा! कौन हल्ला कर रहे हैं, उन्हें रोक दे, जिससे हमारे सोनेमें बाधा न हो।’ पहरेदारने जाकर कीर्तनमें उन्मत्त भक्तोंसे यह बात कही। पर वहाँ उसकी कौन सुनता था। भक्तगण और भी उच्च स्वरसे कीर्तन करने लगे। उसने लौटकर अपने मालिकोंसे कहा—‘सरकार! निमाई पण्डित कीर्तन करते हुए इधर चले आ रहे हैं। मेरी बात किसीने नहीं सुनी।’

इस समय जगाई-मधाईका नशा उतरा हुआ था, पहरेदारके मुखसे आज्ञा न माननेकी बात सुनकर दोनों क्रोधसे भर उठे। कपड़े पहनते-पहनते ही उठकर दौड़े। लाल-लाल आँखें करके कहने लगे—‘आज नदियाके इन सब वैष्णवोंका नाश कर देना है।’

भक्तगणोंने उन्हें आते देखा, परंतु आज किसीको कोई भय नहीं हुआ, कीर्तन और नृत्य अधिक उत्साहसे होने लगा। इसे जगाई-मधाईकी क्रोधाग्निमें मानो घृतकी आहुति पड़ गयी। हरिनामसे तो उनकी स्वाभाविक चिढ़ थी, दोनों भाई भक्तोंको मारने दौड़े। नित्यानन्द सबसे आगे थे; इससे सबसे पहले वे ही इनके सामने पड़े। इन लोगोंको क्रोधके आवेशमें सामने आते देखकर भी नित्यानन्दको भय या क्रोध नहीं हुआ, वरं उनकी इस दशापर निताईको बड़ी दया आयी। उनकी छाती फटने लगी। उन दोनों भाइयोंकी दुर्गति देखकर उनकी ओर देखते हुए वे रोने लगे। दीनदयार्द्रचित्त नित्यानन्द बड़ी ही करुणाभरी दृष्टिसे उनकी ओर देख-देखकर आँसू बहा रहे थे, परंतु इससे उन दोनों भाइयोंका हृदय द्रवित नहीं हुआ। उनमें नरमी नहीं आयी; प्रत्युत उनका क्रोध और भी बढ़ा। नित्यानन्दने दोनों भाइयोंको सामने आया देखकर और मधाईकी अपेक्षा जगाईका कुछ भला जानकर रोते-रोते गद‍्गद स्वरसे कहा, ‘जगाई! हरि बोलो, एक बार हरिनाम उच्चारण करके मुझे खरीद लो।’ नित्यानन्दके इन शब्दोंने जगाईको कुछ स्पर्श किया, वह चुप होकर खड़ा हो गया। परंतु मधाईका हृदय बहुत ही कठोर था। अत: उसका मन नहीं पसीजा, वह क्रोधसे काँपने लगा। क्रोधान्ध मधाईको वहाँ और तो कुछ नहीं मिला, एक फूटे घड़ेका गलौबा पड़ा था, उसे उठाकर नित्यानन्दके सिरपर जोरसे दे मारा, उन्हें गहरी चोट लगी, खूनकी पिचकारी छूट गयी। नित्यानन्द हरिनाम ले-लेकर जोर-जोरसे नाचने लगे।

नित्यानन्द इसी आनन्दमें नाच रहे थे कि अब निश्चय ही इनका उद्धार हो जायगा। वे बार-बार ‘गौर-गौर’ पुकारने लगे। मधाई तो क्रोधमें पागल हो रहा है, एक बारकी मारसे उसे संतोष नहीं हुआ, उसने फिर घड़ेका गलौबा उठाकर मारना चाहा; पर उसी समय जगाईने उसका हाथ पकड़कर कहा—‘भाई! क्या कर रहे हो? इस विदेशी संन्यासीको मारनेमें तुम्हारा कौन-सा पौरुष प्रकट होगा? और इसमें लाभ ही क्या है?’

नित्यानन्दने नाचते-नाचते कहा—‘मुझे तुमने मारा, अच्छा किया, मैं मारकी चोट सह सकता हूँ; परन्तु तुम लोगोंकी, दुर्गति मुझसे नहीं सही जाती। भाई! मुझे मारनेमें कोई नुकसान नहीं है। एक बार मुखसे मधुर हरिनाम तो बोलो।’

इतनेमें एक भक्तने जाकर प्रेमोन्मत्त श्रीचैतन्यको निताईके चोट लगनेकी खबर दी; सुनते ही प्रभु दौड़कर वहाँ आ गये और निताईको पकड़ लिया। बड़े प्रेमसे प्रभुने नित्यानन्दको गोदमें बैठाया और वे अपने कपड़ेसे उनका खून पोंछने लगे। तदनन्तर उन्होंने कातर स्वरसे मधाईको सम्बोधन करके कहा—‘मधाई! तूने मेरे प्राणप्यारे निताईको किसलिये मारा?’ यह कहते-कहते प्रभुको क्रोध आ गया, वे दोनों भाइयोंसे कहने लगे—‘अरे पापात्माओ! इतने पाप करके भी तुमलोगोंकी पाप-तृष्णा अभी शान्त नहीं हुई? अब भी पापोंसे अलग होनेकी इच्छा नहीं हुई? जीवनभर पापोंमें लगे रहकर, आज श्रीनित्यानन्दको चोट पहुँचाकर तुमलोगोंने पापकी पराकाष्ठा ही कर दी!’

जगाई-मधाईने आजतक किसीके सामने सिर नहीं झुकाया था। इस समय वे दोनों भाई अपने घरके सामने अनेक शस्त्रधारी रक्षकोंसे घिरे हुए थे। वे चाहते तो इशारेसे ही भक्तोंको मरवा सकते थे। एक तरहसे वे नवद्वीपके राजा थे। इतनेपर भी वे आज निमाई पण्डित (चैतन्य)-के ऐसे कठोर वचन चुपचाप क्यों सह रहे हैं? इसका कारण यह है कि जगाई तो पहलेसे ही नरम हो गया था, प्रभुको देखते ही मधाईमें भी इतनी शिथिलता आ गयी कि उसमें हाथ-पैर हिलानेकी शक्ति भी जाती रही। प्रभु फिर कहने लगे, ‘रे पापात्माओ! नित्यानन्दने तुमलोगोंका क्या बिगाड़ा था, तुमने उन्हें क्यों मारा? इस विदेशी संन्यासीको मारते तुम्हारे मनमें तनिक-सी भी दया नहीं आयी? तुमलोगोंके और त्रिभुवनके परम सुहृद् क्रोध और अभिमानशून्य नित्यानन्दको घायल कर आज तुमलोगोंने अपने पापका घड़ा पूरा भर लिया है। अब दण्ड सहनेको तैयार हो जाओ।’

जैसे खूनी मनुष्य न्यायाधीशके सामने उसके मुँहकी ओर ताकता हुआ काँपा करता है, उसी प्रकार वे दोनों भाई आज क्या दण्ड होगा, इस बातकी चिन्ता करते हुए प्रभुके मुखकी ओर देख-देखकर काँपने लगे। उनके मनमें यह विश्वास हो गया कि हम बड़े अपराधी हैं और प्रभु हमें दण्ड देनेमें सर्वथा समर्थ हैं। इतनेमें प्रभुने उच्च स्वरसे ‘चक्र, चक्र’ पुकारा। यह देखकर सभी स्तम्भित हो गये। मुरारि गुप्तके शरीरमें हनुमान‍्का आवेश हुआ करता था। उसने गरजकर कहा—‘प्रभु! चक्रको क्यों स्मरण करते हैं, मुझे अनुमति दें। मैं अभी इन दोनोंको यमसदन पहुँचा देता हूँ।’

यह सब देख-सुनकर नित्यानन्द अपनी चोटकी वेदना भूल गये। उन्होंने मुरारिके दोनों हाथ पकड़कर कहा—‘भाई! क्षमा कर।’ इतनेमें पीछेकी ओर देखा तो उन्हें दिखायी दिया मानो सुदर्शन चक्र अग्निका आकार धारण कर जगाई-मधाईकी ओर बढ़ रहा है। नित्यानन्द अत्यन्त व्याकुल होकर हाथ जोड़कर कहने लगे—‘सुदर्शन! क्षमा करो। इन दोनों भाइयोंको न मारो, मैं प्रभुके चरण पकड़कर अभी इनके लिये प्राणभिक्षा लेता हूँ।’ इतना कहकर वे प्रभुके चरणोंपर गिर पड़े और बोले—‘प्रभो! क्या कर रहे हो, क्या सब भूल गये? इस बार तो तुम्हें किसीको दण्ड देनेका अधिकार नहीं है। अबकी बार तो भक्ति और करुणाके रसमें डुबाकर ही मलिन जीवोंका उद्धार करनेकी बात हुई थी न? जो दुष्ट हैं, उन्हींका वध करोगे तो फिर उद्धार किसका करोगे?’

नित्यानन्द इस तरह कह रहे हैं, जगाई-मधाई, भक्तगण और उपस्थित नागरिक चुपचाप देख-सुन रहे हैं। निताई फिर कहने लगे—

‘प्रभो! इन दीनोंके प्राणोंकी मुझे भीख दो! मैं इन दोनों जीवोंको पाकर तुम्हारे दीनबन्धु और पतितपावन आदि नामोंकी महिमा रखूँगा।’ यह सुनकर भी श्रीचैतन्य कोमल नहीं हुए। प्रभुकी यह अवस्था देखकर नित्यानन्द फिर कहने लगे—‘प्रभो! मेरे सिरमें मामूली चोट लगी थी, वह भी दैवात् लग गयी थी। जगाई-मधाई तो मुझे केवल डराना चाहते थे। मुझे मारना इनका उद्देश्य नहीं था। मैं सच कहता हूँ, मुझे जरा-सा भी दु:ख नहीं हुआ। प्रभो! अब इस मायाको छोड़ो, तुम इस समय जो कुछ कर रहे हो, सो केवल मेरा गौरव और मान बढ़ानेके लिये कर रहे हो। प्रभो! मेरे मानको धूलमें मिल जाने दो। अपने अभय चरणोंमें इन दोनों महान् दु:खी जीवोंको स्थान दो!’ इतना कहकर नित्यानन्द बड़े ही करुणभावसे रोने लगे।

इतना सब होनेपर भी श्रीचैतन्य नरम नहीं पड़े। तब नित्यानन्दने कहा—‘प्रभो! एक बात और है, तुम इन दोनोंको तो दण्ड दे ही नहीं सकते। कारण जगाईने स्वयं मेरे प्राण बचाये हैं।’ इतना सुनते ही प्रभुका कठोर भाव जाता रहा। वे कहने लगे—‘हैं! क्या जगाईने तुम्हारे प्राण बचाये हैं?’ निताईने कहा—‘हाँ, मधाई जब दूसरी बार मुझे मारनेको तैयार हुआ तब जगाईने ही उसे समझाकर उसका हाथ पकड़कर रोक लिया था!’

प्रभुने कहा—‘क्या यह सच है? इसी जगाईने मधाईका हाथ पकड़कर तुम्हें बचाया था? इसी जगाईने बचाया था? अरे जगाई! तूने ही मेरे नित्यानन्दके प्राणोंकी रक्षा की थी? तब तो मैं तेरा ही हो चुका। आ, इधर आ!’ इतना कहकर श्रीचैतन्यने सबके सामने अस्पृश्य पामर सैकड़ों खून करनेवाले नराधम जगाईको जोरसे छातीसे लगा लिया। जगाईने कुछ कहना चाहा, पर जबान रुक गयी, वह बेहोश होकर जड़ कटे हुए पेड़की तरह जमीनपर गिर पड़ा!

मधाई सब कुछ देख रहा है। उसने देखा प्रभुका रुद्र रूप! फिर देखा, जगाईपर कृपा करते हुए प्रभुका सौम्य रूप! अब देखता है, अपने सारे पापोंके आधे हिस्सेदार भाई जगाईको धूलमें लोटते हुए और श्रीगौरांगके दाहिने पैरको हृदयपर रखकर उसे अश्रुजलधारासे धोते हुए! मधाईको होश हुआ और वह भी ‘रक्षा करो, रक्षा करो’ पुकारता हुआ महाप्रभुके चरणोंमें गिर पड़ा।

प्रभु कुछ पीछे हटकर कहने लगे—‘अरे तू तो नदियाकी हुकूमतमें पागल होकर जीवोंपर अत्याचार कर रहा था, आज उस हुकूमतको भूलकर यहाँ धूलमें किसलिये लोट रहा है? क्या यह तेरी शानके अनुकूल है? क्या इसमें तुझे लज्जा नहीं आती?’ मधाईने कातर-स्वरसे कहा—‘प्रभो! तुम जगत्-पिता हो, यदि तुम्हीं मुझे त्याग दोगे तो मैं किसके पास जाऊँगा? हम दोनोंने साथ ही पाप किये थे। तुम दयामय हो, तुमने जगाईको अपना लिया और मुझे छोड़ दोगे? क्या यह उचित होगा?’ प्रभु बोले—

‘जगाई मेरा अपराधी था, उसका अपराध क्षमा करना मेरे अधिकारमें था, पर मधाई! तू तो नित्यानन्दजीका अपराधी है, भक्तद्रोहियोंको तो दण्ड ही देना उचित है।’ मधाईने फिर कहा, ‘प्रभो! मैंने जैसे भयानक कुकर्म किये हैं, उनको देखते क्षमा माँगनेका मेरे लिये कोई मार्ग ही नहीं रह गया है। इससे मैं तुमसे क्षमा नहीं चाहता, केवल अपने मनकी बात सरलतासे कहता हूँ। मेरे हृदयसे आशा दूर नहीं हो रही है। तुम बिलकुल त्याग दोगे। ऐसी धारणा मेरे मनमें होती ही नहीं। मुझे बतलाओ, किस उपायसे मेरा उद्धार होगा। तुम कहोगे वही करूँगा।’

प्रभु पिघल गये हैं। मनका भाव छिपाना चाहते हैं, परंतु करुणाभरी आँखें छिपाने नहीं देतीं। तथापि यथासाध्य मनके भाव छिपाकर श्रीचैतन्यने कहा—‘मधाई! तुमने नित्यानन्दके शरीरसे खून बहाया, तुम उनके अपराधी हो, श्रीनित्यानन्द दयामय हैं, उनके दोनों चरण पकड़ लो। यदि वे तुम्हारा अपराध क्षमा कर देंगे तो तुम्हारा काम बन जायगा।’ नित्यानन्दजी प्रभुकी इस करुण लीलाको देख-देखकर मन-ही-मन प्रफुल्लित और संकुचित हो रहे थे। प्रफुल्लता मधाईपर प्रभुकी कृपा देखकर हो रही थी और संकोच प्रभुको अपना गौरव बढ़ाते देखकर हो रहा था। मधाईने तुरंत ही संकोचसे पीछे हटते हुए नित्यानन्दजीके चरण पकड़ लिये और कहा—‘प्रभो! तुम्हारे क्षमा करनेसे ही भगवान् मुझे अपने चरणोंमें स्थान देंगे।’

इतनेमें श्रीचैतन्यने नित्यानन्दका हाथ पकड़कर कहा—‘श्रीपाद! तुम बड़े दयालु हो, इसके क्षमा चाहनेसे पहले ही तुम क्षमा कर चुके हो, यह सभी जानते हैं। परंतु ऐसा करना कुछ अनुचित है, क्योंकि इससे पापी अपने अपराधको कम समझने लगते हैं। अब मैं इस अधमका अपराध क्षमा करनेके लिये तुमसे विनय करता हूँ, इससे इसको यह ज्ञान होगा कि मेरा अपराध बहुत भारी है। श्रीपाद! तुम मधाईको क्षमा करो; साधुगण अनुतप्त और चरणाश्रित व्यक्तियोंको सदासे ही क्षमा करते आये हैं। अतएव इस अधमका अपराध क्षमाकर इस बातका—साधु और पापियोंके भेदका परिचय करा दो।’

इसपर नित्यानन्दजी गद‍्गद होकर कहने लगे—‘प्रभो! तुम मुझे उपलक्ष्यकर इन दोनों पापियोंका उद्धार करोगे; यह मैं जानता हूँ। मेरा गौरव बढ़ानेके लिये ही तुम मुझसे अनुमति चाहते हो। यही हो। मैं इसे क्षमा करता हूँ। इतना ही नहीं; यदि मैंने किसी भी जन्ममें कोई सत्कर्म किये हैं तो उन सबका पुण्य भी मैं मधाईको देता हूँ। तुम इस परम दु:खी अनुतप्त जीवको चरणोंमें आश्रय दो। तदनन्तर नित्यानन्द चरणोंमें पड़े हुए मधाईको सम्बोधन करके बोले—‘रे निर्बोध! देख कृपामय प्रभुकी तुझपर पहलेसे ही कितनी कृपा है। आज तेरे लिये प्रभु मुझसे विनय कर रहे हैं। आ, आ मेरे प्यारे मधाई! तुझे छातीसे लगाऊँ।’ इतना कहकर नित्यानन्दने मधाईको उठाकर हृदयसे लगा लिया; परंतु मधाई तुरंत ही बेहोश होकर जगाईके पास गिर पड़ा। दोनों भाई धूलमें पड़े हैं, आँखें खुली हुई हैं। उनमेंसे कुछ-कुछ आँसू निकल रहे हैं। बाह्यज्ञान बिलकुल नहीं है। समस्त अंग शिथिल हो रहे हैं। भक्तगण ‘हरि बोल’, ‘हरि बोल’ की ध्वनि करते हुए दोनोंको घेरकर नाचने लगे।

उस समय नवद्वीपमें इतना कोलाहल मचा कि भक्त, अभक्त सभी विह्वल हो गये। जगाई-मधाईको इसी अवस्थामें छोड़कर श्रीचैतन्यदेव भक्तोंसहित घर लौट गये। थकावट मिटानेके लिये भक्तगण इधर-उधर जा बैठे। इस अद‍्भुत घटनाको देखकर सभी प्रेमानन्दमें निमग्न हो रहे थे। संध्या हो गयी थी। इतनेमें ही बाहरसे पुकार सुनायी दी—‘प्रभो! प्रभो!’ पता लगानेपर मालूम हुआ कि जगाई-मधाई दरवाजेपर खड़े पुकार रहे हैं। प्रभुने मुरारिको उन्हें लानेके लिये बाहर भेजा। मुरारि वीरकी तरह दोनों भाइयोंको पीठपर उठा लाया। अंदर आते ही दोनों सूखे काठकी तरह सीधे गिर पड़े। तब प्रभुने नित्यानन्दजीसे कहा—‘श्रीपाद! दोनोंको गंगातटपर ले जाकर कानोंमें श्रीहरिनाम दो।’ इतना कहकर भक्तोंके साथ प्रभु चल पड़े। जगाई-मधाई बेहोश थे। अतएव मुर्देकी तरह उन्हें उठाकर भक्तगण कीर्तन करते हुए निकले। ले जाकर घाटपर लिटा दिया। जगाई-मधाईकी इस दशाको देखनेके लिये नगर उलट पड़ा। कुछ समय पहले जो नदियाके राजा थे, जो चाहते सो कर सकते थे, वे ही दोर्दण्ड प्रतापशाली राजबन्धु आज दीनकी तरह धूलमें पड़े हैं!

श्रीचैतन्यने वज्रगम्भीर स्वरसे कहा, ‘श्रीपाद! ये दोनों जीव मैं आपको सौंपता हूँ, आप इन्हें गंगास्नान करवाकर हरिनाम प्रदान करें।’ नित्यानन्द दोनों भाइयोंको पुकारकर कहने लगे—‘आओ, मेरे प्यारे जगाई-मधाई! मुझे मारा, बहुत ही अच्छा किया; आओ, आज ‘हरि बोल’ बोलो और नाचो। तुम्हारे प्रहारका दण्ड यह हरिनाम ही है।’ जगाई-मधाई अभीतक बेहोश थे। भक्तोंने महान् आनन्दसे दोनोंको कंधोंपर उठाया। जब दोनों भाइयोंको भक्तगण जलके अंदर ले गये, तब उन्हें होश हुआ। सभीने गंगामें स्नान किया।

गंगातटपर भीड़ लग रही है। हजारों नर-नारी कौतुक देख रहे हैं। चाँदनी रात है, अतएव दीखनेमें कोई बाधा नहीं है। भक्तोंके बीचमें श्रीगौरांग और जगाई-मधाई खड़े हैं। जगाई-मधाईके हाथमें तुलसी दी गयी। महाप्रभुने कहा—‘भाई माधव! भाई जगन्नाथ! मुझे एक चीज देनी पड़ेगी। देनेकी प्रतिज्ञा करो।’ जगाई-मधाई तो प्राण देनेको प्रस्तुत थे, उन्होंने कहा—‘प्रभो जो इच्छा हो सो ले सकते हो!’ यह सुनकर प्रभु बोले—‘भाई! तुमलोगोंने अबतक जितने पाप किये हैं, वे सब ताम्र, तुलसी और गंगाजल हाथमें लेकर मुझे दान कर दो। तुमलोग निष्पाप और निर्मल हो जाओ!’ इतना कहकर महाप्रभुने सबके सामने पाप ग्रहण करनेके लिये हाथ बढ़ा दिया।

इस बातको सुनकर जगाई-मधाईको जो मार्मिक पीड़ा हुई सो अकथनीय है। वे अत्यन्त कातर हो गये। उन्होंने प्रभुके करुणमुखकी ओर देखकर कहा—‘भक्त तो तुम्हारे चरणोंपर पुष्प-चन्दन चढ़ाते हैं और हम दोनों भाई—पापात्मा, नीच तुम्हारे हाथोंमें पाप-दान करें? प्रभो? यह नहीं होगा। हमने अपराध किये हैं, बड़ी खुशीसे दण्ड भोगेंगे। तुम केवल इतनी ही कृपा करो कि पापोंके निमित्त चाहे जितना कष्ट सहते समय भी तुम्हारे श्रीचरणोंकी विस्मृति न हो। हम तुम्हें पाप नहीं दे सकते।’

प्रभुने उनकी बातोंका कुछ भी उत्तर न देकर केवल यही कहा, ‘जगाई-मधाई! तुम्हारे पाप मुझे देकर तुमलोग सुखपूर्वक हरिनाम लो।’ जगाई-मधाईने बार-बार क्षमा माँगी, पाप देनेसे सर्वथा इनकार किया। परंतु अन्तमें महाप्रभु और श्रीनित्यानन्दजीके आग्रहसे उन्हें बाध्य होकर पापोंका दान करना पड़ा। नित्यानन्दजीने संकल्पका मन्त्र पढ़ा, प्रभुने दान लेकर गम्भीर स्वरसे कहा—‘तुमलोगोंके पाप मैंने ग्रहण किये।’

अन्तरंग भक्तोंने देखा प्रभुके स्वर्ण-वर्णपर कुछ कालिमा-सी आ गयी!

तदनन्तर स्नान करके सब घर लौट आये। रातभर नृत्य-कीर्तन होता रहा। तबसे जगाई-मधाई घर नहीं गये। वे अनशन करने लगे, उनके दैन्यको देखकर भक्तोंको बड़ा दु:ख होने लगा।

जगाई-मधाई गंगाके तीरपर जा बैठे। फटा-मैला कपड़ा पहन रखा है; उपवास, क्रन्दन और नींदसे शरीर दुर्बल हो गया है। दो लाख नामजप प्रतिदिनका नियम है। जो कोई घाटपर आता है, मधाई उठकर उसीके चरणों पड़ता और कातर स्वरसे रो-रोकर कहता है—‘आप कृपा करके मेरा उद्धार करें। मैंने जानमें-अनजानमें आपको कोई दु:ख दिया है उसके लिये आप मुझ दीनको क्षमा करें।’

बालक-वृद्ध, नर-नारी, ब्राह्मण-चाण्डाल सभीके चरणोंमें पड़कर रोते हुए क्षमा-प्रार्थना करना और नामजप करते रहना—यही उनकी जीवनचर्या है।

मधाईने अपने हाथों एक घाट बनाया था, वह नवद्वीपमें अब भी मधाईके घाटके नामसे प्रसिद्ध है। मधाईके वंशज अभी हैं, वे श्रोत्रिय ब्राह्मण और परम वैष्णव हैं।