पुरुषोत्तम-मासके नियम

पुरुषोत्तम-मासका दूसरा नाम मलमास है। ‘मल’ कहते हैं पापको और ‘पुरुषोत्तम’ नाम है भगवान् का। इसलिये हमें इसका अर्थ यों लगाना चाहिये कि पापोंको छोड़कर भगवान् पुरुषोत्तममें प्रेम करें और वह ऐसा करें कि इस एक महीनेका प्रेम अनन्त कालके लिये चिरस्थायी हो जाय। भगवान‍्में प्रेम करना ही तो जीवनका परम पुरुषार्थ है, इसीके लिये तो हमें दुर्लभ मनुष्य-जीवन और सदसद्विवेक प्राप्त हुआ है। हमारे ऋषियोंने पर्वों और शुभ दिनोंकी रचना कर उस विवेकको निरन्तर जाग्रत् रखनेके लिये सुलभ साधन बना दिया है, इसपर भी यदि हम न चेतें तो हमारी बड़ी भूल है।

इस पुरुषोत्तम-मासमें परमात्माका प्रेम प्राप्त करनेके लिये यदि सभी नर-नारी निम्नलिखित नियमोंको महीनेभरतक सावधानीके साथ पालें तो उन्हें बहुत कुछ लाभ होनेकी सम्भावना है।

१-प्रात:काल सूर्योदयसे पहले उठें।

२-गीताके पुरुषोत्तम-योग नामक पंद्रहवें अध्यायका प्रतिदिन श्रद्धापूर्वक पाठ करें। श्रीमद्भागवतका पाठ करें, सुनें।

३-स्त्री-पुरुष दोनों एक मतसे महीनेभरतक ब्रह्मचर्य-व्रतका पालन करें। जमीनपर सोवें।

४-प्रतिदिन घंटेभर किसी भी नियत समयपर मौन रहकर अपनी-अपनी रुचि और विश्वासके अनुसार भगवान‍्का भजन करें।

५-जान-बूझकर झूठ न बोलें। किसीकी निन्दा न करें।

६-भोजन और वस्त्रोंमें जहाँतक बन सके, पूरी शुद्धि और सादगी बरतें। पत्तेपर भोजन करें, भोजनमें हविष्यान्न ही खायँ।

७-माता, पिता, गुरु, स्वामी आदि बड़ोंके चरणोंमें प्रतिदिन प्रणाम करें। भगवान् पुरुषोत्तम श्रीकृष्णकी पूजा करें।

पुरुषोत्तम-मासमें दान देनेका और त्याग करनेका बड़ा महत्त्व माना गया है, इसलिये जहाँतक बन सके, जिसके पास जो चीज हो, वही योग्य पात्रके प्रति दान देकर परमात्माकी सेवा करनी चाहिये। त्याग करनेमें तो पापोंका त्याग ही सबसे पहले करना है। जो भाई या बहिन हिम्मत करके कर सकें, वे जीवनभरके लिये झूठ, क्रोध और दूसरोंकी जान-बूझकर बुराई करना छोड़ दें।

जीवनभरका व्रत लेनेकी हिम्मत न हो सके तो जितने अधिक दिनोंका ले सकें, उतना ही लें। परंतु जो भाई-बहिन दिलकी कमजोरी, इन्द्रियोंकी आसक्ति, बुरी संगति अथवा बिगड़ी हुई आदतके कारण मांस, मद्य खाते-पीते हैं और पर-स्त्री और पर-पुरुषसे अनुचित सम्बन्ध रखते हैं, उनसे तो हम हाथ जोड़कर प्रार्थना करते हैं कि वे इन बुराइयोंको सदाके लिये छोड़कर दयामय प्रभुसे अबतककी भूलके लिये क्षमा माँगें।

जो भाई-बहिन ऊपर लिखे सातों नियम जीवनभर पाल सकें, पालनेकी चेष्टा करें; कम-से-कम चातुर्मास, नहीं तो पुरुषोत्तम-महीनेभर तो जरूर ही पालें और भविष्यमें सदा पालनेके लिये अपनेको तैयार करें। अपनी कमजोरी देखकर निराश न हों, दयाके सागर परम सुहृद् भगवान‍्का आश्रय लेनेसे असम्भव ही सम्भव हो जाता है।*