राजनीतिक आन्दोलनमें भाग लेनेवाले भाई-बहिनोंसे—
यद्यपि हिन्दूधर्ममें राजनीति धर्मका एक अंग है! हमारे दोनों प्रधान अवतार मर्यादापुरुषोत्तम भगवान् श्रीरामचन्द्रजी और लीलापुरुषोत्तम भगवान् श्रीकृष्णचन्द्रजी राजनीतिसे अलग नहीं थे, परंतु यह अवश्य ही सत्य है कि न तो केवल राजनीति ही हमारे धर्मका या धार्मिक जीवनका एकमात्र कर्तव्य है और न राजनीतिक उद्देश्यकी सिद्धि या स्वराज्यकी प्राप्ति ही मनुष्य-जीवनका परम ध्येय है; क्योंकि यह जीवन तो हमारे अनन्त आत्मजीवनका एक क्षुद्र अंशमात्र है। मनुष्यका एकमात्र ध्येय है—परमात्माको प्राप्त करना और गीताके अनुसार थोड़े शब्दोंमें उसके लिये उपाय है—‘परमात्माके स्वरूपको समझकर स्वधर्मद्वारा प्राप्त कर्तव्योंके पालनद्वारा श्रद्धाभक्तिपूर्वक संयतचित्तसे परमात्माकी पूजा करना।’ जिस भावना या जिस कर्मसे मनुष्यका मन परमात्मासे हटकर विषयकी ओर झुकता हो, चाहे वह कर्म सांसारिक दृष्टिसे कितना ही महान् क्यों न हो, उसका त्याग कर देना ही श्रेयस्कर है। पक्षान्तरमें जो कार्य देखनेमें छोटे मालूम होते हों और लोकदृष्टिमें उनका विशेष महत्त्व नहीं भी होता, परंतु यदि वे परमात्माकी पूजाके योग्य हैं और मनुष्यके लक्ष्यको विषयोंसे हटाकर परमात्मामें लगाते हैं तो वे ही कार्य मनुष्यके लिये परम कर्तव्य हैं। भगवान्ने कहा है—
यत: प्रवृत्तिर्भूतानां येन सर्वमिदं ततम्।
स्वकर्मणा तमभ्यर्च्य सिद्धिं विन्दति मानव:॥
(गीता १८।४६)
‘जिस परमात्मासे समस्त भूतोंकी उत्पत्ति हुई है और जो परमात्मा समस्त भूतोंमें (बर्फमें जलकी भाँति) व्याप्त है, उसकी अपने कर्मद्वारा पूजा करके ही मनुष्य (भगवत्प्राप्तिरूप) परम सिद्धिको प्राप्त होता है।’ जिस कर्मसे इस प्रकार परमात्माकी पूजा होती है—उस कर्मका कोई खास एक ही स्वरूप नहीं है। जिसका जो स्वधर्म हो—अपना कर्म हो, प्राप्त कर्तव्य हो, वह उसीका निष्कामभावसे परमात्माके लिये भगवान्की पूजाके निमित्त पालन करे। ऐसे कर्मोंमें गीताके अनुसार भीषण युद्धतकका भी समावेश है, अवश्य ही वह युद्ध स्वार्थ-प्रेरित न होना चाहिये। दूसरोंके स्वत्व-अपहरण करने या अपनी अतृप्त लिप्साको तृप्त करनेके निमित्त, निर्दोषोंको लूटने-मारनेके लिये न होना चाहिये। वह होना चाहिये ‘धर्मयुद्ध’। भगवान्ने युद्धको नहीं, ‘धर्मयुद्ध’ को ही क्षत्रियका धर्म बतलाया है। परंतु वह धर्मयुद्ध भी निष्काम और ईश्वरकी पूजाके योग्य तभी हो सकता है, जब उसमें आसक्ति या लौकिक फलका अनुसन्धान बिलकुल न हो। जब वह भगवान्के आज्ञानुसार केवल भगवान्के लिये ही किया जाता हो। भगवान्ने युद्धकी आज्ञा देते समय अर्जुनको जो उपदेश किया है, उसमें कुछको स्मरण करनेसे यह विषय स्पष्ट हो जायगा—
सुखदु:खे समे कृत्वा लाभालाभौ जयाजयौ।
ततो युद्धाय युज्यस्व नैवं पापमवाप्स्यसि॥
(गीता २।३८)
योगस्थ: कुरु कर्माणि संगं त्यक्त्वा धनंजय।
सिद्ध्यसिद्ध्यो: समो भूत्वा समत्वं योग उच्यते॥
(गीता २।४८)
मयि सर्वाणि कर्माणि संन्यस्याध्यात्मचेतसा।
निराशीर्निर्ममो भूत्वा युध्यस्व विगतज्वर:॥
(गीता ३।३०)
‘सुख-दु:ख, लाभ-हानि, जय-पराजयको समान मानकर तत्पश्चात् तू युद्ध कर, ऐसा करनेसे तू पापको प्राप्त नहीं होगा। आसक्तिको त्यागकर और सिद्धि-असिद्धिमें समबुद्धि होकर योगमें स्थित रहता हुआ तू कर्म कर, ‘समत्व’ का नाम ही योग है। अध्यात्म-चित्तसे सम्पूर्ण कर्मोंको मुझमें समर्पण करके आशा और ममतासे रहित होकर सारी व्यथाओंसे भलीभाँति छूटकर युद्ध कर।’ इन तीनों श्लोकोंमें ‘कृत्वा’, ‘त्यक्त्वा’, ‘भूत्वा’ शब्द बहुत ही विचारणीय हैं। इनसे यह सिद्ध होता है कि जो मनुष्य पहले इस प्रकारका बनकर फिर कर्तव्य-कर्म करता है, वही पापोंसे लिप्त नहीं होता और उसीके कर्म निष्काम कर्म कहला सकते हैं। जबतक मनुष्य आसक्ति और कामनाको छोड़कर सिद्धि-असिद्धिमें सम होकर निराशी और निर्मम नहीं हो जाता, तबतक उसका चित्त अशान्त रहता है और अशान्त चित्तसे वह कभी सुखी भी नहीं हो सकता—‘अशान्तस्य कुत: सुखम्?’ परंतु बिना किसी हेतुके कर्म हो ही नहीं सकते, इसलिये निष्काम कर्ममें भी हेतु होना चाहिये और वह हेतु होता है—ईश्वर-पूजा। इसी हेतुकी प्रधानता रखकर पुन: युद्धके लिये आज्ञा देते हुए भगवान् अर्जुनको इसका साधन बतलाते हैं—
तस्मात् सर्वेषु कालेषु मामनुस्मर युध्य च।
मय्यर्पितमनोबुद्धिर्मामेवैष्यस्यसंशयम्॥
(गीता ८। ७)
‘इसलिये अर्जुन! सर्वकालमें निरन्तर मेरा स्मरण करता हुआ ही युद्ध भी कर, इस प्रकार मुझमें (भगवान्में) अर्पित किये हुए मन-बुद्धिसे युक्त तू नि:सन्देह मुझको ही प्राप्त होगा।’ क्षत्रियको युद्ध करना चाहिये, परंतु राज्यकी आसक्ति या कामनासे नहीं, भगवान्की प्राप्तिके लिये भगवान्की आज्ञा मानकर भगवत्पूजाकी बुद्धिसे। ऐसे ही ‘ज्ञानसमन्वित भगवद्भक्तियुक्त निष्काम कर्म’ से भगवान्की प्राप्ति होती है, जो मनुष्य-जीवनका एकमात्र ध्येय है। इसके विपरीत अन्य हेतुओंसे होनेवाले सभी शुभाशुभ कर्म बन्धनकारक हैं। भगवान्ने कहा है—
यज्ञार्थात्कर्मणोऽन्यत्र लोकोऽयं कर्मबन्धन:।
तदर्थं कर्म कौन्तेय मुक्तसंग: समाचर॥
(गीता ३। ९)
‘अर्जुन! यज्ञ अर्थात् परमात्माकी सेवाके लिये किये जानेवाले कर्मोंके अतिरिक्त अन्य हेतुओंसे होनेवाले कर्मोंमें प्रवृत्त मनुष्य उन कर्मोंद्वारा बन्धनको प्राप्त होता है। इसलिये तू आसक्ति छोड़कर उस परमेश्वरके लिये ही कर्मोंका सम्यक् प्रकारसे आचरण कर।’ कर्म चाहे धर्मोपदेश हो, धर्मयुद्ध हो, वाणिज्य हो, सेवा हो या अन्य कोई हो, होना चाहिये परमात्माकी सेवाके लिये।
इसी सिद्धान्तके अनुसार इस वर्तमान राजनीतिक आन्दोलनमें प्रवृत्त लोगोंको भी उनकी अपनी-अपनी भावना या हेतुके अनुरूप ही फलकी प्राप्ति होगी। इस बातका तो पता नहीं कि लौकिक दृष्टिमें इसका फल कैसा होगा? पर यह निश्चय है कि परम दयालु और परम न्यायकारी सर्वशक्तिमान् मंगलमय ईश्वरके मंगल-विधानके अनुसार इसका जो कुछ भी चरम फल होगा, वह दोनों ही पक्षोंके लिये परिणाममें लाभदायक अवश्य होगा। देखनेमें वह भले ही एक पक्षके लिये अनुकूल और दूसरेके लिये प्रतिकूल हो। यह बात स्मरण रखनी चाहिये कि परमात्मा किसी भी देश, जाति, धर्म या वर्णके साथ पक्षपात नहीं कर सकते। वे सबके हैं और सारा जगत् उन्हींकी अभिव्यक्ति है। या यों कहिये कि हम सभी एक ही परमात्मारूपी स्नेहमयी जननीकी प्यारी संतान हैं। जननीकी दृष्टिमें सब संतान एक-सी होती हैं। दो भाई परस्पर लड़ते हैं, दोनोंका झगड़ा माताके पास जाता है तो वह दोनोंके प्रति स्नेह रखती हुई जिसका अपराध देखती है उसे धमकाती है, समयपर थप्पड़ भी लगा देती है और जो निर्दोष होता है उससे प्यार करके गोदमें उठाकर उसका मुख चूमने लगती है। परंतु वह जिसे धमकाती या मारती है, उसका भी कल्याण ही चाहती है और कल्याणकामनासे ही उसके साथ वैसा व्यवहार करती है; क्योंकि वह भी उसे उतना-ही प्यारा है जितना दूसरा है। इसी प्रकार परमात्मा भी सबसे समान भावसे प्यार करते हुए किसीको दण्डित और किसीको पुरस्कृत करके उनका कल्याण करते हैं। परमात्मा दोनोंकी सुनते हैं, परंतु पुरस्कारका—उनके प्रत्यक्ष प्रेमका पात्र वही बनता है, जो निर्दोष होता है, जो परमात्माका यथार्थ विनम्र आज्ञाकारी होता है और जो अचल भावसे सत्यपर स्थित होता है। सत्य परमात्माका स्वरूप है। हम चाहे किसी भी पक्षमें हों—अन्तरात्माकी सच्ची प्रेरणाके अनुसार कोई-सा भी काम करते हों, हमें सत्यपर डटे रहकर परमात्माके लिये ही उस कामको करना चाहिये। पद-पदपर बड़ी सावधानीकी आवश्यकता है, कहीं भगवान्के स्थानमें हमारे हृदयमें भोगको स्थान न मिल जाय, हमारा कामनाका विषय परमात्माकी जगह सांसारिक स्वार्थ न हो जाय। सांसारिक स्वार्थ कामना और आसक्तिसे युक्त होता है, एवं कामना तथा आसक्ति ही पापका कारण है। गीताके दूसरे अध्यायमें भगवान्ने स्पष्ट कहा है कि विषयोंके चिन्तनसे उनमें आसक्ति होती है, आसक्तिसे कामना होती है, कामनामें बाधा होनेपर क्रोध उत्पन्न होता है, क्रोधसे क्रमश: सम्मोह, स्मृति-नाश होकर अन्तमें बुद्धिका नाश हो जाता है। बुद्धिके नाशसे सर्वनाश होना—परमार्थपथसे गिरना स्वाभाविक ही है। इससे सिद्ध है कि क्रोधके पहले कामना और आसक्तिका होना आवश्यक है। जब अर्जुनने कातर कण्ठसे भगवान्से पूछा—
अथ केन प्रयुक्तोऽयं पापं चरति पूरुष:।
अनिच्छन्नपि वार्ष्णेय बलादिव नियोजित:॥
(गीता ३।३६)
‘भगवन्! यह मनुष्य किसीके द्वारा बलात् कराये जानेके सदृश न चाहनेपर भी किससे प्रेरित होकर पापाचरण करता है?’ तब भगवान् बोले—
काम एष क्रोध एष रजोगुणसमुद्भव:।
महाशनो महापाप्मा विद्ध्येनमिह वैरिणम्॥
(गीता ३।३७)
‘रजोगुणसे उत्पन्न काम ही क्रोध है, यही अग्निके सदृश कभी न तृप्त होनेवाला महान् पापी है, इसे ही तू अपना वैरी जान।’ ‘रजोगुणका स्वरूप बतलाते हुए भगवान्ने कहा ‘रजो रागात्मकं विद्धि’—‘रजोगुणको रागात्मक यानी आसक्तिरूप समझ।’ इससे यह सिद्ध है कि विषयासक्तिसे कामना होती है और कामनासे क्रोध होता है। निष्काम कर्ममें कामना और आसक्ति नहीं रहती। इसीसे तो वह निष्काम है, अत: जो निष्काम पुरुष है वह क्रोधी नहीं हो सकता। वह लोक-शिक्षाके लिये कभी क्रोधका-सा नाट्य भले ही करे, परंतु उसमें क्रोधरूपी विकार यथार्थमें नहीं रह सकता। ऐसा कामना और आसक्तिका त्यागी पुरुष ही परमात्माका निरन्तर स्मरण करता हुआ परमात्माके लिये सब कार्य करता है, उसीकी मन-बुद्धि परमात्माके अर्पित रहती है और उसीको प्राप्त कर्तव्य कर्मोंके करते हुए ही भगवत्प्राप्ति होती है। इसी प्रकारके कर्मका उपदेश अर्जुनको दिया गया था। आज राजनीतिक क्षेत्रमें भी काम करनेवाले सभी पक्षके लोगोंको यही लक्ष्य रखकर कार्य करना चाहिये। कारागारमें जाना, मरना, कष्ट सहना—सभी कुछ केवल परमात्माके लिये ही होना उचित है, यदि वह धर्मपालनके निमित्तसे, देशसेवा या देशकी दुर्दशा मिटानेके निमित्तसे या दु:खी जीवोंकी सेवाके निमित्तसे हो तो और भी उत्तम है। राजनीतिक क्षेत्रमें लोग जो ईश्वरके अधिष्ठानको भुला देते हैं, ईश्वरप्राप्तिके लिये कर्म करनेकी बात तो अलग रही, ईश्वरके अस्तित्वतककी भी अवहेलना कर आसक्ति और कामनावश मनमाना काम कर बैठते हैं, यह कदापि उचित और परिणाममें सुखदायक नहीं है। काम कैसा ही हो, कर्ताको फल उसकी अपनी भावनाके अनुसार ही प्राप्त होगा। भगवान्के लिये मरनेवालोंको भगवान् और द्वेषके लिये मरनेवालोंको निश्चय ही दु:खोंकी प्राप्ति होगी। श्रीगाँधीजीके इन शब्दोंको प्रत्येक क्षेत्रमें निरन्तर याद रखना चाहिये। ये शब्द सम्मान्य श्रीमहादेव भाई देसाईजीके पहली बार पकड़े जानेपर उन्होंने कहे थे—
‘जहाँ महादेव गये हैं, वहाँ मेरा एक-एक साथी चला जाय तो भी क्या है? मैं अपनेको अकेला मानता ही नहीं। मेरा साथी, रक्षक, सलाहकार जो कुछ भी है, एक ईश्वर है। महादेव, स्वामी (आनन्द) या सरदार (श्रीवल्लभ भाई पटेल)-के भरोसे अथवा किसी मनुष्यके भरोसे यह जंग नहीं छेड़ा है। अतएव चाहे जितने साथी क्यों न चले जायँ मैं तो निश्चिन्त हूँ, निर्बलको चिन्ता किस बातकी? बलवान्का बल घटाया जा सकता है, पर निर्बलके बलको कौन मिटा सकता है? लेकिन निर्बल होते हुए भी मैं अपनेको बलवान् मानता हूँ; क्योंकि मैं ईश्वरके बलपर जूझता हूँ।’
वास्तवमें बात ठीक है, निर्बलके बल राम हैं ही। जिनको श्रीरामका बल है, भगवान्का भरोसा है, जो उन्हींके लिये कार्य करते हैं, वे ही तो सत्यके उपासक हैं, वे आसक्तिवश पाप कैसे कर सकते हैं, वे किसीके भी साथ घृणा या द्वेष कैसे कर सकते हैं? हाँ, जो रामके बदले आरामके उपासक हैं, कष्ट सहकर भी जो उसके बदलेमें इन्द्रियोंकी तृप्तिके लिये विषय-भोग ही चाहते हैं, वे ही प्रतिद्वन्द्वीसे घृणा और द्वेष रख सकते हैं और वे ही परिणाममें कष्ट भी पाते हैं।
इसमें कोई सन्देह नहीं कि जो महानुभाव देशके लिये जितना भी त्याग करते हैं और कष्ट सहते हैं, वे चाहे किसी भी भावसे वैसा करते हों, एक प्रकारसे तप ही करते हैं और सराहनीय हैं। तथापि मेरी यह प्रार्थना और भावना अवश्य है कि यदि सब लोग ईश्वर-प्राप्तिकी कामनासे, ईश्वर-प्रीत्यर्थ, यथासाध्य राग-द्वेषको त्यागकर, घृणाके भावको निकालकर, जय-पराजय और सफलता-असफलताकी चिन्ताको छोड़कर कार्य करें तो भगवान्के इच्छानुसार देशका और उनका—दोनोंका ही परम कल्याण हो सकता है। जिनका जितना त्याग है, वे तो अवश्य ही उतने अंशमें परम प्रशंसनीय हैं। देखा-देखी या जोशमें आकर तो नहीं, पर जिनकी अन्तरात्मा इस कार्यके साथ हो, लेकिन जो भय या स्वार्थवश हटे हुए हों, उन्हें तो आत्माके अमरत्वपर विश्वासकर, भय त्यागकर ईश्वर-प्रीत्यर्थ अवश्य ही सानन्द कष्ट सहनेको तैयार हो जाना चाहिये और इस कार्यमें भाग लेकर कर्तव्यका पालन करना चाहिये। जो जितने अंशमें सत्यतापूर्वक सहमत हैं, वह उतने ही अंशमें साथ दें। परंतु अपनी कमजोरियोंको ढँकनेके लिये कभी बहानेबाजी या मिथ्या युक्तिवादका सहारा लेकर आत्माको धोखा न दें, जेलयात्रा या कष्टसहनसे बचनेके लिये युक्तियोंका बहाना न करें; क्योंकि शरीर-क्लेशके भयसे किये जानेवाले त्यागको भगवान्ने राजस त्याग बतलाया है। अवश्य ही जिनका सिद्धान्त इसके अनुकूल न हो, जो यथार्थमें दूसरे सिद्धान्त रखते हों, वे अपनी-अपनी क्रियाओंद्वारा ही परमात्माकी सेवा कर सकते हैं। स्थूल जगत्के सर्वथा परस्पर-विरोधी कार्योंमें भी सत्पथपर डटे रहनेसे दोनोंको ही सत्यकी प्राप्ति हो सकती है। सुधन्वा और अर्जुनकी भाँति दोनों ही भगवान्के भक्त हो सकते हैं, परंतु होना चाहिये यथार्थमें सत्यका आश्रय!
जेलमें गये हुए या अब जिनको जेलमें जाना पड़े, उन मेरे सम्मान्य भ्राता एवं माँ-बहिनोंसे भी एक नम्र प्रार्थना है कि वे अपने जेल-जीवनको पवित्र, सात्त्विक और ईश्वरमय बनानेकी यथासाध्य पूरी चेष्टा करें। जेलको परमात्माका आशीर्वाद और परम तप समझें। जेलका समय अपनी-अपनी रुचि, अधिकार, योग्यता और अवकाशके अनुसार अपने-अपने विश्वासके अनुरूप परमात्माके ध्यानचिन्तन, नाम-जप, सद्ग्रन्थोंके अध्ययन, प्रणयन और विचार आदिमें ही बितावें। अपने प्रेमपूर्ण बर्तावसे जेलके अधिकारियों और अन्यान्य सहयोगी भाइयोंके हृदयपर अधिकार कर लें। अपने आदर्श आचरणोंसे साधारण कैदी और जेलके कर्मचारियोंके आचरणोंको उन्नत बना दें। लोकमान्य तिलकने जेल-जीवनमें रहकर ‘कर्मयोग-रहस्य’ के रूपमें हमें कैसी अपूर्व निधि दे दी।
इन्हीं सब बातोंको आदर्श मानकर जेल-जीवनको पवित्र, शान्त, तपोमय बनाना चाहिये और वहाँसे ऐसे साधनसम्पन्न होकर निकलना चाहिये, जिसमें वापस आकर और भी उत्साह, दृढ़ता, पवित्रता, शान्ति और प्रेमके साथ देशके या अन्य किसी भी निमित्तसे भगवान्की ठोस सेवा कर सकें।
एक बात अहिंसाके सम्बन्धमें भी विचारणीय है। हिंसा मन, वाणी, शरीर—तीनोंसे ही होती है और वह कृत, कारित, अनुमोदित इन तीनों रूपोंमें ही की जा सकती है। शरीरसे किसीको पीड़ा पहुँचाना जैसे हिंसा है, वाणीसे पीड़ा पहुँचाना वैसे ही हिंसा है और मनसे किसीका अनिष्ट-चिन्तन भी वैसे ही हिंसा है। हम एक आदमीको शरीरसे तो पीड़ा नहीं देते, किंतु वाणीसे या लेखनीसे उसका अनिष्ट करते हैं। द्वेषपूर्ण नारे लगाते हैं या मनसे बुरा चाहते हैं तो वह भी हिंसा ही है। स्वयं बुरा करना, बुरा कहना या बुरा चाहना जैसे हिंसा है, वैसे ही दूसरेके द्वारा बुरा करवाना, कहलाना और दूसरेके द्वारा बुरा होते देखकर उसका मन-वाणीसे अनुमोदन करना अथवा किसीके अनिष्टको देखकर प्रसन्न होना भी हिंसा ही है। ऐसी हिंसाओंसे भी जरूर बचना चाहिये। ऊँची बात तो यह है कि भगवद्भक्त प्रह्लादकी भाँति मारनेवालोंके लिये भी ईश्वरसे कल्याण-कामना करनी चाहिये और उनकी बुद्धि शुद्ध होनेके लिये परमात्मासे प्रार्थना करनी चाहिये। इस बातको नहीं भूलना चाहिये कि जगत्में कोई भी जीव हमारा द्वेष्य नहीं है, द्वेष्य हैं तो हमारे दुर्गुण हैं और हमारा असंयत चित्त है। उन्हें ही मारनेकी चेष्टा करना उचित है। श्रीगाँधीजीके इन स्वर्ण शब्दोंको याद रखना चाहिये—
‘जब हमारे आदमी मारे जाते हैं तो मेरा दिल नहीं धड़कता अथवा धड़कता है तो उसे दबा सकता हूँ। परंतु जब एक भी प्रतिपक्षीका खून हो जाता है तब मुझे शर्म मालूम होती है और हमारी उन्नतिमें भय पैदा हो जाता है × ×। इस लड़ाईका उद्देश्य वैर बढ़ाना नहीं, वैर घटाना है।’
यदि लोग महात्माजीके इन शब्दोंको भुलाकर अपने आचरणोंसे वैर घटानेके बदले बढ़ा लेंगे तो उनका उद्देश्य ही नष्ट हो जायगा। हमारा कोई भी कार्य ऐसा नहीं होना चाहिये, जिससे हमारी सात्त्विकता घटे, हमारे महान् उद्देश्यका आदर्श नीचा हो जाय। जान-बूझकर किसीका अनिष्ट करनेके लिये कुछ भी नहीं करना चाहिये। हमारे सभी काम ऐसे होने चाहिये जिनसे सारे विश्वको सुख मिले। हमारा सुख सभीके सुखका कारण हो। अतएव इस दिशामें भी बहुत ही सावधान रहनेकी आवश्यकता है। मार खाते हुए भी मन, वाणी, शरीरसे मारनेवालोंकी कल्याण-कामना करनी चाहिये। हमारी तपस्या उनकी बुद्धिके शुद्ध होनेके लिये होनी चाहिये, न कि उनके विनाशके लिये! तभी वह सच्ची तपस्या है और तभी हमारा वह कर्म ईश्वरको प्रिय होगा। राजनीतिक-क्षेत्रमें इतनी कड़ाईके मौकेपर मानसिक सहिष्णुता कम होकर राग-द्वेष उत्पन्न हो जाना बहुत ही सहज है। समालोचना करना या उपदेश देना जितना सहज है, अन्याययुक्त लाठियाँ या गालियाँ सहते हुए मनसे उनका कल्याण चाहना और उनके प्रति मनमें द्वेषको स्थान न देना उतना ही कठिन है। यह बात सर्वथा सत्य है, तथापि शुद्ध आदर्श तो हमें अपने सामने रखना ही चाहिये। इसी क्षेत्रमें क्यों, प्रत्येक क्षेत्रमें ही, इन्द्रियोंके प्रत्येक अर्थमें ही, राग-द्वेषरूपी लुटेरे तो हमारे हृदयसे परमेश्वरके लक्ष्यरूपी परमधनको—ज्ञानको लूटनेके लिये तैयार रहते ही हैं। हमें सर्वदा सर्वत्र ही उनसे बचनेके लिये चेष्टा करनी चाहिये। भगवान्ने कहा है—
इन्द्रियस्येन्द्रियस्यार्थे रागद्वेषौ व्यवस्थितौ।
तयोर्न वशमागच्छेत्तौ ह्यस्य परिपन्थिनौ॥
(गीता ३।३४)
‘राग-द्वेष प्रत्येक इन्द्रियके विषयमें स्थित हैं, इन दोनोंके वशमें नहीं होना चाहिये। ये दोनों ही कल्याण-मार्गमें विघ्न करनेवाले महान् शत्रु हैं।’ जो राग-द्वेषसे बचकर मन-इन्द्रियोंको वशमें करके संसारके विषयोंको भोगता है, उसीका अन्त:करण प्रसादको प्राप्त होता है। अतएव हम किसी भी कार्यको करें, चाहे वह धर्मका हो, देशका हो, समाजका हो या व्यक्तिगत हो, यदि वह राग-द्वेषरहित ‘ईश्वरार्थ’ होता है तो वही भक्तिका कारण बन जाता है। इसी बातको ध्यानमें रखकर सभी क्षेत्रोंमें लोगोंको अपने प्राप्त कर्तव्यका पालन करना चाहिये। परंतु यह ध्यान रखना चाहिये कि न तो सबके सिद्धान्त एक-से होते हैं और न सब एक-सा काम ही कर सकते हैं। सिद्धान्तभेदसे मनुष्यकी ईमानदारीमें कोई अन्तर नहीं पड़ता। जो सच्चे हृदयसे जिस लोकहितकर कर्मको धर्म समझता है, उसे वही करना चाहिये और उसीमें उसका कल्याण निहित है। भगवत् की प्राप्तिमें मुख्य भाव है, कार्य नहीं।
इसी प्रसंगमें खादीपर कुछ शब्द निवेदन करने हैं।
खादीका सम्बन्ध तो सदाचार, वैराग्य, ईश्वरभक्तिसे है, राजनीतिक दृष्टिसे नहीं। मैं तो अपने विश्वासके अनुसार शुद्ध धार्मिक दृष्टिसे ही खादीका व्यवहार करनेके लिये सभी महानुभावोंसे प्रेमपूर्वक अनुरोध करता हूँ। इस समय ऐसा कोई वस्त्र उपलब्ध नहीं है, जो खादीसे ज्यादा पवित्र हो या जिसमें कम हिंसा होती हो। विलायती और मिलके कपड़ोंमें चर्बी लगती है, जिससे अपवित्रता और हिंसा दोनों ही सिद्ध हैं। रेशमी वस्त्रोंको प्राचीनकालमें शुद्ध मानते थे पर अब तो रेशम बनानेमें ही असंख्य जीव उबलते हुए जलमें डाले जाते हैं। इससे रेशम भी अपवित्र और हिंसामय है। ऊनी कपड़े इस गरम देशमें हमेशा लोग पहन नहीं सकते। परंतु खादी उपर्युक्त दोनोंकी अपेक्षा पवित्र और हिंसारहित है। पवित्रताका असर मनपर होता है जिससे भगवान्में मन लगता है।
खादी पहनते ही सादगी आ जाती है, शौकीनी छूटते ही अनेक दोष आप ही चले जाते हैं। खादीके स्वाभाविक ही मोटी होनेसे विलासिता दूर होती है और सहज ही वैराग्य बढ़ता है। सदाचार तो उसमें आ ही गया। पवित्रता, सादगी, सदाचारके मिल जानेसे एक ऐसी शक्ति उत्पन्न होती है जो परमार्थमें बड़ी सहायता करती है।
इसके सिवा खादीमें सबसे बड़ी बात है गरीब भूखोंकी सेवा और देशकी संस्कृतिका बदल जाना। हमारे लाखों भाइयोंको कार्यके अभावसे अन्न-वस्त्र नहीं मिलता। देशके लोग खादी पहनने लगें तो पींजने, कातने, बुनने आदिमें लगकर करोड़ों गरीब भाई-बहिन सुखी हो सकते हैं। घरसे कुछ दिये बिना ही बड़ा दान और विराट्रूप भगवान्की पूजा हो जाती है। साथ ही परमुखापेक्षी जनता स्वावलम्बन सीखकर सुखी हो सकती है।
इस प्रकार खादीमें पवित्रता, अहिंसा, सादगी, स्वावलम्बन, सदाचार, वैराग्य, दान भगवान्की पूजारूप परमार्थ भरा है, अतएव सभी भाई-बहिनोंको खादी जरूर ही पहननी चाहिये। परंतु यह भी करना चाहिये मनके पवित्र भावसे। खादी पहननेमें कहीं स्वार्थसाधन, फैशन, नेता बननेकी स्पृहा, पुजवाने या मान-सम्मान प्राप्त करनेकी कामना हो तो उसका फल अच्छा नहीं होगा। अतएव खादीका व्यवहार भी करना चाहिये—ईश्वरको स्मरण करते हुए ईश्वरके लिये ही भगवान्के इन शब्दोंको कभी नहीं भूलना चाहिये—
‘अर्जुन! तू जो कुछ कर्म करता है, जो कुछ खाता है, जो कुछ हवन करता है, जो कुछ दान देता है, जो कुछ तपस्या करता है वह सब मेरे ही अर्पण कर।’* (गीता ९। २७)