सबका कल्याण हो

हिंदू-शास्त्रोंकी दृष्टिसे संसारके समस्त प्राणी एक भगवान‍्के स्वरूप हैं, भगवान‍्के निवासस्थान हैं या भगवान‍्के सनातन अंश—उनकी प्रिय संतान हैं। तीनों सिद्धान्त भिन्न-भिन्न-से प्रतीत होनेपर भी वस्तुत: एक ही सत्यका प्रतिपादन करते हैं। यदि ज्ञानकी दृष्टिसे कहा जाय तो इसी तत्त्वको यों कहा जाता है कि एक ही अखण्ड आत्मा विभिन्न स्थूल-सूक्ष्म जीवोंके रूपोंमें वैसे ही प्रकाशित है, जैसे एक ही अखण्ड महाकाश समस्त देशों, नगरों, गाँवों, मकानों और कोठरियोंके रूपमें प्रकट है। इसीलिये सर्वत्र भगवद्दर्शन अथवा सर्वत्र आत्मदर्शन करनेवाले पुरुष हिंदू-शास्त्रकी दृष्टिसे महात्मा माने जाते हैं—

बहूनां जन्मनामन्ते ज्ञानवान् मां प्रपद्यते।

वासुदेव: सर्वमिति स महात्मा सुदुर्लभ:॥

(गीता ७।१९)

‘बहुत जन्मोंके अन्तमें जो ज्ञानप्राप्त पुरुष सब वासुदेव ही है, इस प्रकार मुझको (भगवान् को) भजता है, वह महात्मा अति दुर्लभ है।’

भगवान‍्ने कहा है—

मत्त: परतरं नान्यत्किंचिदस्ति धनंजय।

मयि सर्वमिदं प्रोतं सूत्रे मणिगणा इव॥

(गीता ७।७)

‘अर्जुन! मेरे अतिरिक्त किंचिन्मात्र भी दूसरी वस्तु नहीं है। यह सम्पूर्ण (जगत् ) सूत्रमें (सूतके) मणियोंकी भाँति मुझमें ही पिरोया हुआ है।’

इस प्रकार जो सर्वत्र और सर्वदा श्रीभगवान‍्को देखता है, उसे सर्वत्र सबमें सब समय भगवान् ही मिलते हैं। भगवान‍्ने कहा है—

यो मां पश्यति सर्वत्र सर्वं च मयि पश्यति।

तस्याहं न प्रणश्यामि स च मे न प्रणश्यति॥

(गीता ६।३०)

‘जो सर्वत्र मुझ भगवान‍्को देखता है और सबको मुझ भगवान‍्में देखता है, उसके लिये न मैं कभी परोक्ष होता हूँ और न वह मेरे लिये परोक्ष होता है।’

इस प्रकार सर्वभूतप्राणियोंमें भगवान‍्को और भगवान‍्में सर्वभूतप्राणियोंको देखनेवाला, व्यावहारिक जगत‍्में अपने वर्णाश्रमके अनुसार—स्वाँगके अनुसार अभिनय करनेवाले नटकी भाँति—जो कुछ भी व्यवहार करे, उसके सारे भाव होते हैं भगवान‍्में ही; क्योंकि उसके अनुभवमें एक भगवान‍्के अतिरिक्त और कुछ रहता ही नहीं। इसीपर गीतामें श्रीभगवान् कहते हैं—

सर्वभूतस्थितं यो मां भजत्येकत्वमास्थित:।

सर्वथा वर्तमानोऽपि स योगी मयि वर्तते॥

(६।३१)

‘जो पुरुष एकत्व (एकमात्र भगवद्भाव)-में स्थित होकर सब भूत-प्राणियोंमें स्थित मुझ भगवान‍्को भजता है; वह योगी सब प्रकारसे व्यवहार-बर्तावमें लगा हुआ भी वस्तुत: मुझ भगवान‍्में ही लगा रहता है।’

ऐसा महापुरुष सर्वत्र-समस्त जीवोंमें समबुद्धि होकर सबके सुख-दु:खकी अनुभूति अपने-आपकी तुलनासे करता है। भगवान् फिर कहते हैं—

आत्मौपम्येन सर्वत्र समं पश्यति योऽर्जुन।

सुखं वा यदि वा दु:खं स योगी परमो मत:॥

(गीता ६।३२)

‘जो पुरुष अपनी उपमासे सबमें सबके सुख अथवा दु:खको सम देखता है वह योगी परमश्रेष्ठ माना गया है।’

मतलब यह कि अपने एक ही शरीरके सभी अवयवोंमें आत्मभाव समान होनेके कारण उनमें होनेवाले सुख-दु:खको मनुष्य समान देखता है। चोट चाहे गुदामें लगे चाहे सिरमें—दु:ख मनमें समान होता है, इसी प्रकार आराम चाहे पैरको मिले चाहे मुखको—सुख भी समान ही होता है। बर्ताव-व्यवहारमें भले ही पूरा-पूरा भेद रहे और वह रहना अनिवार्य है। पैर और हाथके अथवा गुदा और मुँहके न तो काम एक-से होते हैं और न उनके साथ व्यवहार ही एक-सा हो सकता है; परंतु ‘आत्मौपम्य समता’ सबमें एक-सी है।

हिंदू-सिद्धान्तके अनुसार इस प्रकार जानने-माननेवाला पुरुष किसीके साथ कैसे वैर कर सकता है और कैसे किसीका अनिष्टचिन्तन कर सकता है? भगवान‍्ने ‘उसीको विशिष्ट पुरुष बतलाया है जो सुहृद् , मित्र, शत्रु, उदासीन, मध्यस्थ, द्वेष्य, बन्धु, साधु और पापकर्मियोंमें भी समबुद्धि है।’ अर्थात् इन सभीके अंदर जो एक भगवान‍्को विराजित देखता है या इन सभीके रूपमें जो एक भगवान‍्के दर्शन करता है, वह सर्वश्रेष्ठ है।

असलमें उसकी बुद्धिमें न शत्रु है न मित्र है; न बुरा है न भला; सब श्रीभगवान‍्के ही रूप हैं। ऐसा माननेपर भी व्यवहारमें उसे स्वधर्मोचित कर्तव्यका पालन करना पड़ता है। इसलिये यह बात तो रहती ही नहीं कि हिंदू किसीको विधर्मी मानकर उससे द्वेष करे। हिंदू, मुसलमान, पारसी, ईसाई इत्यादि भेद वस्तुत: व्यवहारमें हैं, आत्मामें नहीं हैं। आत्मा न हिंदू है, न मुसलमान। वह तो नित्य शुद्ध-बुद्ध सच्चिदानन्दस्वरूप है। उसमें भेदकी कल्पना ही नहीं है। अतएव भेद स्वरूपतत्त्वमें नहीं है। भेद व्यवहारमें है। आजकल व्यवहारमें तो अभेदकी चेष्टा होती है और मनमें भेद बढ़ते रहते हैं; इसीलिये इतना कलह और विद्वेष है। नहीं तो मुसलमान अपने निर्दोष धर्मका पालन करें और हिंदू अपनेका करें, किसीको क्यों आपत्ति होनी चाहिये और क्यों किसीके हृदयमें वेदना पहुँचानेके लिये धर्मके नामपर कोई अनुचित क्रिया ही होनी चाहिये। यदि सबमें ‘आत्मौपम्य एकता’ का भाव रहे तो सभी परस्पर एक-दूसरेके सहायक और विश्वासपात्र रक्षक तथा सेवक होंगे। परस्पर एक-दूसरेको सुख पहुँचायेंगे। किसीको दु:ख पहुँचानेकी इच्छा या चेष्टा तभी होती है, जब हम उसे पराया समझते हैं और उसके लाभमें अपनी हानि तथा उसके सुखमें अपना दु:ख मानते हैं। आज भारतवर्षमें सच्ची धार्मिकताका अभाव होनेसे यही बात हो गयी है और इसीसे परस्पर वैर-विरोध और द्वेष-दु:खकी प्रवृत्ति बढ़ रही है।

लहसुनके बीजसे केसर नहीं उत्पन्न होती, इसी प्रकार बुराईसे भलाई नहीं पैदा होती। हम यदि किसीके साथ बुरा बर्ताव करेंगे तो बीज-फल-न्यायसे वही बुराई हमें अनन्तगुनी होकर मिल जायगी। आज भारतके हिंदू-मुसलमानोंमें अज्ञानवश जो परस्पर बुरा बर्ताव हो रहा है, उसका फल दोनोंके लिये ही बहुत बुरा होना चाहिये। तारतम्य इतना ही है कि जिसका पक्ष न्यायका होगा और जिसने बुराईकी शुरुआत नहीं की होगी, उसका बचाव (बहुत अंशोंतक) न्यायकारिणी भागवती शक्ति करेगी। वह चाहे हिंदू हो या मुसलमान। भगवान‍्के न्यायमें हमारे यहाँके भेदसे कोई भेद नहीं होगा। भगवान् जैसे हिंदूके हैं, वैसे ही मुसलमानके हैं। आत्माके रूपमें जो परमात्मा एक हिंदूमें है, ठीक वही मुसलमानमें है और सृष्टिकर्ता भगवान‍्के रूपमें हिंदू जिस भगवान‍्की संतान है, मुसलमान भी उसीकी है। इसी प्रकार यदि हिंदू भगवान‍्का स्वरूप है तो मुसलमान भी भगवान‍्का स्वरूप है। जो मनुष्य भगवान‍्की पूजा करे और भगवत्स्वरूप ही किसी जातिविशेषके व्यक्तिसे द्वेष करे, उसका बुरा चाहे, उसकी पूजा भगवान् कैसे ग्रहण करेंगे। जो व्यक्ति एक अंगको पूजे और दूसरेको काटे, उस अंगका अंगी वह पुरुष उससे कैसे प्रसन्न होगा। जो व्यक्ति माताके एक बच्चेसे प्यार करे और दूसरेके गलेपर छूरी फेरे, उससे माता कैसे प्रसन्न होगी। इसी प्रकार जो हिंदू मुसलमानको दु:ख देता या मारता है, अथवा जो मुसलमान हिंदूको दु:ख देता या मारता है, वह अपने भगवान‍्को असंतुष्ट ही करता है। चाहे, उसके भगवान‍्का नाम अल्लाह हो या परमात्मा।

इस दृष्टिसे किसीको भी जान-बूझकर कष्ट पहुँचाने या किसीका अहित करनेकी इच्छा या चेष्टा कदापि नहीं करनी चाहिये। मनुष्यकी तो बात ही क्या है—पशु-पक्षी, कीट-पतंगको भी कष्ट पहुँचाने या उनका अहित करनेकी कल्पना नहीं करनी चाहिये। सबके साथ वैसा ही बर्ताव करना चाहिये, जैसा हम दूसरोंसे अपने प्रति चाहते हैं। जो बातें अपनेको बुरी लगती हों, वे दूसरोंके साथ नहीं करनी चाहिये।

‘आत्मन: प्रतिकूलानि परेषां न समाचरेत्।’

सबमें और सब कुछ भगवान् ही है, इस तत्त्वसिद्धान्तको ध्यानमें रखनेवाला पुरुष तो ऐसा करेगा ही। जो लौकिक सुख-शान्ति चाहता है, उसे भी वस्तुत: पहले अपने बर्तावको सुधारना चाहिये। व्यवहारमें चार बातोंका सावधानीके साथ त्याग करना चाहिये—१. किसीका असम्मान न हो, २. किसीके साथ कपटका व्यवहार न हो, ३. किसीके साथ द्वेषका बर्ताव न हो और ४. किसीका अहित करनेकी चेष्टा न हो। इसके विपरीत सम्मान, सत्य, प्रेम और हितका बर्ताव होना चाहिये। ऐसा बर्ताव होगा तो अपने-आप ही बदलेमें यहाँ चीजें प्राप्त होने लगेंगी, जिससे जीवनमें सुख-शान्ति आयेगी और पारमार्थिक लाभ भी निश्चय ही होगा।

अब प्रश्न यह है कि ‘आजके वातावरणमें ऐसे भावोंकी रक्षा कैसे हो और कैसे आचरणमें इनका प्रयोग हो, जब कि एक पक्ष उन्मत्त होकर दूसरेको हर तरहसे कष्ट पहुँचाने और उसका अहित करनेपर उतारू है?’ इसका उत्तर यह है कि वास्तवमें तो किसीका अहित किसी दूसरेके द्वारा हो ही नहीं सकता। दूसरा निमित्त भले ही बने पर इस सिद्धान्तको मानते हुए भी व्यवहारके क्षेत्रमें प्रतिपक्षके हितकी भावनासे, मनमें किसी प्रकारका दुर्भाव यथासाध्य न आने देकर ऐसी अवस्थाका निर्माण करना चाहिये—ऐसी स्थिति पैदा कर देनी चाहिये, जिनमें उक्त पक्षको अपने असत् प्रयत्नमें सफलताकी आशा न रहे और वह निराश होकर उस बुरे प्रयत्नसे अपनेको अलग कर दे और ऐसा करनेमें बाहरसे यदि कहीं कठोर उपाय काममें लाने पड़ें तो कोई आपत्ति नहीं है। अवश्य ही उस समय दो बातोंका ध्यान रहे—जो कुछ किया जाय भगवान‍्को स्मरण रखते हुए और भगवान‍्की सेवाके लिये किया जाय। उसमें कहीं भी द्वेष या रोष नहीं होना चाहिये। कहीं भी बदला लेनेकी या किसीको कष्ट पहुँचाकर सुखी होनेकी भावना नहीं होनी चाहिये। अर्जुनका महान् भीषण संग्राम-कर्म गीताके इसी सिद्धान्तपर स्थिर था। संग्राम था, बड़ा भीषण कर्म था; परंतु भगवान‍्की आज्ञा थी और अर्जुन भगवान‍्के आज्ञानुसार ‘करिष्ये वचनं तव’ की प्रतिज्ञा करके बड़ी सावधानीके साथ अपनेको भगवान‍्का आज्ञाकारी सेवक मानकर ही संग्रामरूप कर्म कर रहे थे। इसीसे उनका वह कर्म भी भगवत्पूजन ही था।

भगवान‍्की निर्भ्रान्त आज्ञाके दो श्लोक यहाँ उद‍्धृत किये जाते हैं। भगवान् अपने प्रिय भक्त अर्जुनको आज्ञा करते हैं—

मयि सर्वाणि कर्माणि संन्यस्याध्यात्मचेतसा।

निराशीर्निर्ममो भूत्वा युध्यस्व विगतज्वर:॥

(गीता ३।३०)

‘भगवान‍्में लगाये हुए चित्तसे सब कर्मोंको मुझ भगवान‍्में निक्षेप करके आशा और ममताको छोड़कर तथा मनकी जलनको मिटाकर युद्ध कर।’

तस्मात् सर्वेषु कालेषु मामनुस्मर युध्य च।

मय्यर्पितमनोबुद्धिर्मामेवैष्यस्यसंशयम्॥

(गीता ८।७)

‘अतएव सब समय निरन्तर मेरा स्मरण कर और युद्ध कर। मुझमें अर्पण किये हुए मन-बुद्धिवाला तू निस्सन्देह मुझको ही प्राप्त होगा।’

भगवत्प्रीतिका यह भाव समझमें न आ सके तो समाज तथा देशकी—समाज तथा देशके धर्मकी, जिससे समाज सुखी रह सकता है; रक्षाके लिये त्यागकी भावनासे किसीका बुरा चाहे बिना ही वीरत्वका बाना धारण करके अन्याय, अधर्म तथा अत्याचारको मिटानेके लिये अत्याचारीका बलपूर्वक सामना करना चाहिये। अन्याय और अत्याचारका कायरतापूर्वक सहन करना भी अपराध है। समाजके अच्छे पुरुष यदि यह अपराध करने लगें तो सारा समाज अत्याचारमय हो जा सकता है। अतएव अत्याचारका विरोध भगवान‍्की कृपाशक्ति पर विश्वास रखकर अवश्य करना चाहिये।

असलमें पापकर्म करनेवालेका पतन किसीको करना नहीं पड़ता। उसका पापरूप कर्म ही उसे गिरा देता है। परंतु जबतक किसीको समाजमें रहना है, तबतक समाजसेवाका उसपर दायित्व है और उस दायित्वकी रक्षाके लिये ही उसे पापकर्मका बलपूर्वक विरोध करना चाहिये और शीघ्र-से-शीघ्र उस पापका नाश होकर पापकर्मी विशुद्ध बन जाय—इस भावनासे उसे समुचित शिक्षा भी देनी चाहिये। घृणा पापसे करनी चाहिये, पापीसे नहीं। नाश पापका करना चाहिये, पापीका नहीं। उसे तो निष्पाप और विशुद्ध बनाना है सावधानीके साथ कड़वी दवा देकर! सम्भव है इस दवाके देनेमें वह आपको शत्रु समझे। पागल मनुष्य अत्यन्त स्नेहीको भी मार बैठता है, ऐसे ही आपपर भी वह प्रहार कर बैठे। परंतु आपको तो शान्त तथा सावधानीके साथ ही—अपनेको बचाते हुए—उसके प्रति उसे नीरोग करनेकी क्रिया करनी है। इसमें हित और प्रेमकी भावना होनेके कारण इससे भी जीवनमें सुख-शान्ति और पारमार्थिक लाभकी प्राप्ति होगी। हमारी तो यही भावना रहनी चाहिये कि सभी सुखी हों, सभी तन-मनसे नीरोग हों, सभी सदा मंगलोंका साक्षात्कार करें और दु:खका भाग किसीको भी न मिले।

सर्वे भवन्तु सुखिन: सर्वे सन्तु निरामया:।

सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चिद् दु:खभाग् भवेत् ॥