साहित्यका सदुपयोग

मनुष्य-जीवनका प्रधान उद्देश्य है भगवत्-साक्षात्कार या भगवत्प्रेम! इसीमें जीवनकी सार्थकता है अतएव जगत‍्की प्रत्येक वस्तु भी तभी सार्थक होती है जब उसका प्रयोग भगवान‍्के लिये हो। साहित्य एक बड़ी महत्त्वकी वस्तु है। उसमें मनुष्यके चित्तको खींचकर उसे चाहे जिस ओर लगा देनेकी शक्ति है। साहित्यका ही प्रभाव था कि एक दिन भारतकी गति सर्वथा भगवदभिमुखी थी। जिसकी जीवन-संस्कृतिमें सर्वप्रथम ब्रह्मचर्याश्रमकी संयममयी शिक्षा इसी उद्देश्यसे होती थी कि मानव भगवत्-साक्षात्कारकी योग्यता प्राप्त कर ले। ‘यदिच्छन्तो ब्रह्मचर्यं चरन्ति’ (कठोपनिषद् १।२।१५, गीता ८।११) और आज यह साहित्यका ही प्रभाव है कि भारतीय मानव भगवद्विमुख होकर भोगोंकी ओर दौड़ रहा है। परंतु इसमें साहित्यकी सार्थकता नहीं है। यह उसका दुरुपयोग है। जो साहित्य भगवत्प्रीत्यर्थ प्रस्तुत होता है, जो मनुष्यकी अन्तरकी सुप्त पवित्र सात्त्विक वासनाओंको जगाकर उसे भगवदभिमुखी बना देता है, वही सत्-साहित्य है और उसीसे मानव-कल्याण होता है। इसके विपरीत जिस साहित्यसे भोगवासना बढ़ती है, जो अंदरकी असत्-वृत्तियोंको उभाड़कर मानवको भगवान‍्की ओरसे हटा देता है और भोगोंकी अदम्य लालसासे व्याकुल कर देता है, वह असत्-साहित्य है और उससे मानव-जगत‍्का सर्वतोमुखी पतन होता है।

आजकल ‘कला’ के नामपर ऐसे उच्छृंखलता बढ़ानेवाले साहित्यका बड़े जोरोंसे निर्माण हो रहा है और पत्र-पत्रिकाओं, पुस्तक-पुस्तिकाओं, स्कूल-कॉलेजों और नाटक-सिनेमाओंके द्वारा उसका बड़े चाव और उत्साहसे प्रचार किया जा रहा है। ऐसे साहित्यकारोंका कहना है कि ‘कला ही साहित्यका प्राण है। जिसमें ‘कला’ नहीं वह साहित्य ही नहीं। किस साहित्यका समाज-जीवनपर क्या परिणाम होगा, वह उससे भोगोन्मुख बनेगा या भगवदभिमुख। इस विचारसे कोई मतलब नहीं। देखना तो यह है कि साहित्यमें ‘कला’ है या नहीं, वह अपने कला-सौन्दर्यसे जनसमाजके चित्तको आकर्षित करता है या नहीं, तत्काल उनके मन, इन्द्रियोंको प्रफुल्लित करता है या नहीं, फिर चाहे वह भला कहा जाय या बुरा। उसकी भलाई-बुराईका मापदण्ड कला है न कि समाजपर होनेवाला परिणाम!’

ऐसे आकर्षक साहित्यके प्रचारसे—जो ‘ललित कला’ की नकाब पहनकर समाजमें—खास करके नववयस्क और अपरिणतमति युवक-युवतियोंमें विशेष आदर पा रहा है—समाजका कितना अकल्याण हो रहा है, वह किस तेजीसे पतनकी ओर जा रहा है, इसका विचार करते ही हृदय काँप उठता है। ऐसे साहित्यमें अनीति या बुराईको बड़ी चतुरता और शब्दच्छटाके साथ अत्यन्त चित्ताकर्षकरूपमें और त्यागको—धर्म तथा भगवद्भावको नितान्त हेयरूपमें अंकित किया जाता है, जिससे युवक-युवतियाँ बड़े आग्रहके साथ उसे पढ़ते हैं, परिणामस्वरूप उनमें भोगकामना बढ़ जाती है और वे उस कुत्सित भोगवासनाकी तृप्तिके लिये औपन्यासिक स्वप्नराज्यमें विचरण करते हुए कलुषितचित्त होकर और संयम-नियमके सारे बन्धनोंको तोड़कर उच्छृंखल अनीतिको अपना लेते हैं। कुछ वर्षों पूर्व साप्ताहिक ‘हिंदू’ में भाई परमानन्दजीका ‘अपनी कन्याओंको बचाओ’ शीर्षक एक लेख निकला था, जिसमें उन्होंने हिंदू-युवतियोंमें बढ़ती हुई उच्छृंखलताओंका उल्लेख करते हुए लिखा था—

‘इन कॉलेजके चलानेवालोंको जरा खयाल नहीं कि इन कन्याओंका क्या बनेगा और इस नयी पश्चिमी शिक्षाका क्या प्रभाव हो रहा है। ये तो एक प्रकारसे हिंदू-समाजको नष्ट करनेवाले शिक्षणालय हैं। इस शिक्षाके फलपर विचार करना आवश्यक है। किसी दैनिक पत्रमें विवाहके विज्ञापन देखिये। अनेक लालच देकर वर तलाश करनेकी आवश्यकता होती है। इस शिक्षाकी प्रथा बहुत बढ़ रही है; इसलिये इसके अतिरिक्त और कोई उपाय नहीं कि इन कॉलेजोंको बंद कर दिया जाय। इस शिक्षामें बड़ी आपत्ति तो यह है कि इससे कन्याओंमें अनुचित बातोंकी आदत बढ़ती जा रही है। ×××× स्वतन्त्रता निस्संदेह अच्छी वस्तु है, किंतु बच्चों और निर्बलोंके लिये ऐसी आदतें भला करनेके बजाय पतन करनेवाली सिद्ध होती हैं। ××××× इन दिनों लाहौरके कांग्रेसी पत्रोंमें दो लेख प्रकाशित हुए हैं, जिनमें ‘कन्यादान’ शब्दपर हँसी उड़ाते हुए बताया गया है कि ‘कन्यादान’ की प्रथा बहुत बुरी है। इसके अर्थ यह हैं कि कन्याएँ बड़ी होकर स्वयं अपने लिये वरकी खोज करें, जैसा कि इंग्लैंड और अमेरिकामें होता है। इनके लिखनेवालोंको यह ज्ञान नहीं कि पतिकी खोजकी इस विधिसे इंग्लैंड और अमेरिकाके समाजमें कितनी बुराइयाँ उत्पन्न हुई हैं......। अन्तमें आपने दो घटनाओंका उल्लेख किया था—लाहौरकी एक कन्या अपनी माँके सारे गहने लेकर शिक्षकके साथ चलती बनी। पकड़े जानेपर उसने बतलाया कि १५-१६ दूसरी कन्याएँ भी इसी तरह भागनेको तैयार हैं। दूसरी घटना इस प्रकार है कि एक कन्याकी किसी विवाहित नवयुवकसे मित्रता बढ़ गयी; जिससे उसको गर्भ रह गया। नवयुवककी पूर्वपत्नीको आठ-दस हजार रुपये देकर अलग कर उस कन्यासे विवाह ठीक कर दिया गया। जब वह विवाह करनेके लिये बारात लेकर आया, तो उसी दिन कन्याने बच्चेको जन्म दिया। इसपर लोग कहने लगे कि कन्याके विवाहमें न केवल दहेज मिला है किंतु वह बच्चा भी साथ लायी है!

यह सब इन्द्रियतृप्तिके लिये उन्मत्त बना देनेवाले असत् साहित्यका दुष्परिणाम है! भगवान‍्ने जिन सज्जनोंको साहित्यनिर्माणकी शक्ति दी है, उनपर एक बहुत बड़ा दायित्व है। उन्हें अपनी शक्तिका दुरुपयोग कर साहित्यको अनर्थोत्पादक कदापि नहीं बनाना चाहिये; परंतु कठिनता तो यह आ गयी है कि इस प्रकारके विचारोंका मनन करते-करते और इसी प्रकारके साहित्यको पढ़ते-पढ़ते ऐसे असत्-साहित्यमें और उसके द्वारा होनेवाले परिणाममें लोगोंकी ‘सत्’ बुद्धि हो गयी है और इसलिये वे जनकल्याणकारी समझकर विशेष लगनके साथ कलापूर्ण चित्ताकर्षकरूपसे उसका निर्माण करने लगे हैं। और इसी विपरीत बुद्धिके कारण नवीन विकासोन्मुख प्रतिभाशाली लेखक भी उन्हींका अनुसरण कर रहे हैं। असत‍्में यह श्रद्धा और रुचि बड़ी ही भयानक है। पता नहीं, इसका क्या परिणाम होगा!

परंतु जो लोग इस बातको समझते हैं कि भगवान‍्के कथनानुसार विषयके साथ इन्द्रियका संयोग होनेपर जो सुख होता है, वह पहले अमृत-सा प्रतीत होनेपर भी परिणाममें विषका-सा काम करता है। (गीता १८। ३८) उन्हें चाहिये कि वे इस विनाशकारी बाढ़को रोकनेके लिये सत्-साहित्यका निर्माण और प्रसार करनेकी चेष्टा करें। आपातरमणीय असत् साहित्यकी ओर आकर्षित लोगोंको यह समझा दें कि साहित्यमें कलाका स्थान निस्संदेह महत्त्वपूर्ण है, परंतु कला होनी चाहिये समाजको श्रेय-साधनपर सुप्रतिष्ठित करनेके लिये। नहीं तो, कोरी कला समाजके लिये काल बन जायगी।

वर्तमान समयमें, जहाँ बीमारी बढ़ चुकी है और बड़े-बड़े सम्मान्य विद्वान् तथा आदरणीय लोकनायकगण भी भोगोन्मुखी शिक्षा और साहित्यके प्रचारपर जोर दे रहे हैं, जहाँ समाजका आदर्श ‘भगवान‍्के लिये त्याग’ न रहकर केवल जागतिक ऐश्वर्यकी वृद्धिके लिये ‘भोग’* हो चुका है और जहाँ जनताको शिक्षित बनानेके लिये प्रचुर धन लगाकर भोगोन्मुखी स्कूल-कॉलेजोंका निर्माण जोरोंसे हो रहा है, वहाँ लोगोंकी मनोवृत्तिको इस ओरसे मोड़कर भगवान‍्की ओर लगाना अवश्य ही बहुत कठिन है।

तथापि भगवान‍्की कृपाके बलपर विश्वासी पुरुषोंको यथाशक्ति प्रयत्न तो करना ही चाहिये। लगन सच्ची और भगवत्कृपापर सच्चा विश्वास होनेपर ऐसा कौन-सा कार्य है जो न हो सके।