सर्वत्र भगवद्दर्शन और व्यवहार

अन्तिम अवस्थामें भीष्मपितामह जब शरशय्यापर पड़े हुए थे तो उन्होंने पास खड़े हुए लोगोंसे तकिया माँगा। लोग नाना प्रकारके उपधान लेकर दौड़े; परंतु उन्होंने एकको भी स्वीकार नहीं किया। अन्तमें अर्जुन बुलाये गये। उन्होंने तीन बाण भीष्मजीके मस्तकमें बेधकर जमीनपर टिका दिये। भीष्मपितामह बड़े प्रसन्न हुए और उन्होंने आशीर्वाद दिया, ‘बेटा! तुम्हारी विजय हो।’

जिस समय जैसा वेष होता है उसीके अनुसार ही व्यवहार करना पड़ता है। प्रश्न यह उठता है कि जब हम सर्वत्र भगवान‍्को ही देखें और सबको भगवान‍्का शरीर ही मानें तो उनके साथ व्यवहार कैसे करें! सर्वत्र भगवान‍्को देखनेवाला भगवान‍्से कड़ी बात कैसे कहेगा, क्रोध कैसे करेगा और उनसे कैसे लड़ेगा? अयोग्य बात भगवान‍्से कैसे करें? इसका सहज समाधान यही है कि क्रोधके वशमें होकर किसीको कड़वी जबान कहना या किसीसे लड़ना तो पाप ही है, वह तो कभी नहीं होना चाहिये। भगवान‍्को पहचानकर भगवान‍्के आज्ञानुसार नाट्यकी तरह शास्त्रोक्त आचरण करना दूसरी बात है। जहाँ वैसे कड़े आचरणकी आवश्यकता हो वहाँ सावधान रहते हुए भगवत्प्रीत्यर्थ ही भगवान‍्की आज्ञा समझकर ऐसा करना चाहिये। वेष ही हमें यह कहता है, उस वेषमें आये हुए भगवान् ही हमें आज्ञा देते हैं कि उनके योग्य जो कर्म है वही करो। पिताका वेष धारण करके जब वे आये हैं, स्वयं ही आज्ञा दे दी है कि इस रूपमें मेरी सेवा करो। ये भगवत्स्वरूप हैं ऐसा समझकर ही उनकी पूजा करनी चाहिये। यदि भगवान् पुत्रके रूपमें आवें या स्त्रीके वेषमें आवें तो उस रूपमें आये हुए भगवान‍्से प्यार करो और शास्त्रानुकूल उनकी सेवा भी स्वीकार करो। वहाँ प्यार और सेवा-स्वीकार ही उनकी उचित पूजा है। यदि हम उस वेषके प्रतिकूल व्यवहार करते हैं तो भगवान‍्की आज्ञाका उल्लंघन करते हैं। ‘स्वकर्मणा तमभ्यर्च्य’ का भावार्थ यही है कि वे जिस वेषमें आते हैं, उस वेषके अनुरूप ही वैसे कर्मसे उनकी उपासना हो। आवश्यकता इस बातकी है कि एक क्षणके लिये भी उनको भिन्न-भिन्न रूपोंमें पहचाननेमें भूल न हो और भिन्न-भिन्न स्वाँगोंमें आये हुए अपने परम प्रियतमकी उन्हें भीतरसे पहचानते हुए ही हर समय उचित पूजा करते रहें। ‘यत: प्रवृत्तिर्भूतानाम्’ का भी यही अभिप्राय है कि उस परम प्रभु परमात्मासे सारी सृष्टिका स्फुरण—उद्भव हुआ। जो कुछ हम देख रहे हैं या अनुभव कर रहे हैं या कल्पना कर सकते हैं, वह सब भगवान‍्से पैदा हुए हैं और वही भगवान् सबमें सब जगह व्याप्त हैं। सृष्टि उन्हींमेंसे निकली और उन्होंने अपनेसे अलग कोई सृष्टि रची ऐसी बात भी नहीं। अत: माता, पिता, पुत्र, स्त्री, मित्र, बन्धु, सबमें वही समानरूपसे; अखण्डरूपसे व्याप्त हैं। उनके सिवा और उनके बाहर कुछ है ही नहीं। सबमें वही भरे हैं। वे ही हमारे सामने इन नाना रूपोंमें खड़े हैं। सबमें ओतप्रोत हैं, हममें भी वे ही हैं; वे मुझमें और मैं उनमें घुला-मिला हूँ।

भूल इसलिये होती है कि हम अपनेको भगवान‍्से अलग मानकर कर्ममें प्रवृत्त होते हैं और कर्मोंके द्वारा भगवान‍्की कैसे अर्चा होती है इसे भूल जाते हैं। यह सब कुछ वासुदेव हैं, इस निश्चयको दृढ़ रखते हुए भी भक्त यह स्वीकार कर लेता है कि यह सारी सृष्टि वासुदेवमय और मैं उनका सेवक हूँ—

सो अनन्य जाकें असि मति न टरइ हनुमंत।

मैं सेवक सचराचर रूप स्वामि भगवंत॥

जो कुछ भी है वह भगवान‍्का स्वरूप ही है। सारी सृष्टि—सारा चराचर ‘सियाराममय’ है और मैं उसका दास हूँ ‘दासोऽहम्, दासोऽहम्’ की धुन लग जानेपर ‘दा’ छिन जाता है और ‘सोऽहम्, सोऽहम्’ की अनुभूति होने लगती है, नर नारायणमें लय हो जाता है, परंतु भक्त ऐसा चाहता नहीं, वह तो अपने प्रियतमके साथ रसानुभूतिके लिये—लीलानन्दके लिये द्वैतको सहर्ष वरण कर लेता है, और वह इस अभिमानको एक क्षण भी नहीं छोड़ना चाहता कि मैं सारी सृष्टिमें व्याप्त प्रियतम प्रभुका सेवक हूँ—

अस अभिमान जाइ जनि भोरे।

मैं सेवक रघुपति पति मोरे॥

नौकर और मालिक दो न रहें तो खेलका आनन्द ही न रहे। जिस किसीसे व्यवहार होता है—जिस किसी रूपमें वे प्रकाशित हैं, वे हैं, केवल ‘वे ही’। सब जगह हमारे साथ मन्दिर चलता है, सब जगह हम पुजारी रहते हैं और सर्वत्र हम उनकी पूजा करते हैं। रातके समय सोते हुए भी बिछौनेपर हम भगवान‍्के मन्दिरमें हैं। प्रत्येक स्थिति, प्रत्येक अवस्था, प्रत्येक व्यक्तिके साथ व्यवहार करते हुए हम भगवान‍्की पूजा कर सकते हैं। जैसा वेष वैसी ही पूजा—

आत्मा त्वं गिरिजा मति: सहचरा:

प्राणा: शरीरं गृहं

पूजा ते विषयोपभोगरचना

निद्रा समाधिस्थिति:।

संचार: पदयो: प्रदक्षिणविधि:

स्तोत्राणि सर्वा गिरो

यद्यत्कर्म करोमि तत्तदखिलं

शम्भो तवाराधनम्॥

‘भगवन्! मेरा आत्मा ही आपका स्वरूप है। मेरी बुद्धि ही गिरिराजकिशोरी उमा है, मेरे प्राण आपके सहचर—लीला-परिकर हैं, यह शरीर ही आपका मन्दिर है, विषय-भोगका साज-सामान ही आपकी पूजा-सामग्री है, मेरी निद्रा ही समाधि है—ध्याननिष्ठा है। मेरे दोनों चरणोंका चलना-फिरना आपकी परिक्रमा है। अपने मुखसे जो कुछ भी मैं कहता हूँ वह सब आपका स्तवन है। अधिक क्या कहूँ, मैं जो-जो कार्य करता हूँ, वह सब आपकी आराधना ही है।’

व्यवहारमें यह अवश्य याद रहे कि व्यवहार केवल भगवत्-पूजाके लिये हो। वर्णाश्रम भगवान‍्के खेलका एक सुन्दर साधन है। जिसका जो कर्म नियत हो, उसी कर्मसे वह भगवान‍्की पूजा करे। सभी कर्मोंसे तो भगवान‍्की ही पूजा होती है। इस अवस्थामें मेहतरका कर्म उतना ही महत्त्वपूर्ण है जितना ब्राह्मणका। अपने-अपने काममें सभी महत्तर हैं, अपने-अपने स्थानपर सभीकी आवश्यकता और सभीका महत्त्व है। व्यष्टिमें जो सत्य है और स्वाँगका महत्त्व है वही महत्त्व उसी प्रकार ही समष्टिमें भी है। सब सर्वत्र अपने-अपने समस्त कर्मोंसे भगवान‍्की ही पूजा करते हैं। अपराधीके प्रति यदि हम कड़ा व्यवहार करते हैं और उस व्यवहारमें यह स्मरण रखते हैं कि इस रूपमें हमारे प्रियतम आये हुए हैं और उन्हींकी यह आज्ञा है कि हम उन्हें इस खेलमें कड़ी बातें कहें तो वही क्रोधका नाट्य सात्त्विकरूप धारण करके भगवत्-प्रीतिका साधन जाता है। मुख्य बात तो पहचाननेकी ही है और न पहचानना ही सारी भूलोंकी जड़ है। चोररूपमें आये हुए परमात्माकी चोरी न करने देनेकी आज्ञा है। डाकूरूपमें आये हुएको बलपूर्वक भगानेकी आज्ञा है और आततायीरूपमें आये हुएको दण्ड देनेकी।

भगवद्भाव जब इतना प्रगाढ़ हो जाय कि स्वाँग भी न दीखे और साक्षात् वे ही दीखने लगें तब तो दोषीको डाँटने या चोरको चोरी न करने देना भी असह्य हो उठेगा। गदाधर भट्टने अपने घरमें आये हुए चोरको हरिरूपमें देखा है तो उनके बोझको भारी देखकर अपने ही हाथों उनके सिरपर उठा दिया। यह भगवद्भावकी प्रगाढ़ अवस्थाका लक्षण है। हरिके सिवा कुछ दीखता ही नहीं और इसी हेतु जो कुछ भी व्यवहार होता है, वह उनकी उपासनाका मधुर रूप लेकर ही व्यक्त होता है। स्वाँगका पर्दा हट गया, वह सच्चे रूपमें आ गया।

पर भगवान‍्को पहचानकर किये जानेवाले विषम व्यवहारमें भी यदि हम सबको भगवान् समझें तो हमारे द्वारा वस्तुत: कोई अशुभ कर्म होगा ही नहीं। जैसी उनकी आज्ञा होगी वैसा ही करेंगे। जिसमें उनकी हाँ होगी वही हमारे द्वारा होगा। तात्पर्य यह कि हम भगवदीय सत्ताके यन्त्रमात्र हो जायँगे और भगवान् ही यन्त्री बनकर अपना काम हमारे द्वारा करेंगे। उसमें हमारा कुछ मतलब नहीं होगा। उनकी आज्ञा ही हमारे लिये प्रेरक-शक्ति होगी। पापकी या बुरे कर्मोंकी प्रेरणा अथवा आज्ञा भगवान‍्की ओरसे हो ही कैसे सकती है? कामना, आसक्ति, ममता और अहंकारका स्वयं नाश हो जायगा; क्योंकि ये सब भी तो भगवान‍्के अर्पित हो जायँगे। इससे व्यवहारमें कोई आपत्ति नहीं आयेगी। जिस रूपमें जो आवे उसका वैसा ही सत्कार, उस रूपमें आये हुए हरिकी वैसी ही पूजा। जहाँ जैसा स्वाँग, वहाँ वैसी ही पूजा। जहाँ यह भाव होगा वहाँ स्वार्थवश अत्याचार-अनाचार आदि हो नहीं सकते। नौकरके रूपमें भगवान् घरमें हैं। नौकरका अपमान न करे, उससे घृणा न करे पर व्यवहारमें तो मालिक ऊपर बैठेगा और नौकर नीचे ही। भगवान‍्की आज्ञा है कि हम अपने नौकरको आज्ञा दें, उससे काम लें। परंतु उसका किसी प्रकार अपमान न करें। उसको अपनेसे नीचा न मानें। उसे भगवान् समझकर यह न करें कि उसकी ही आज्ञाकी प्रतीक्षा करें और उसके कहे अनुसार चलें। ऐसा करना उसको काहिल, सुस्त और बेईमान बनाना होगा, नाटक बिगड़ेगा। नौकरके रूपमें आये भगवान‍्की यही आज्ञा है कि भीतरमें हम उन्हें ठीक-ठीक पहचानते हुए और पहचानमें जरा भी भूल न करते हुए बाहरसे स्वाँगरूपमें प्रेमपूर्वक उन्हें उचित आज्ञा दें और उनसे यथायोग्य काम लें। यदि हम इस स्वाँगकी अवहेलना करते हैं और भगवान‍्की आज्ञाको यथार्थरूपमें स्वीकार नहीं करते तो इससे खेल बिगड़ता है और भगवान‍्का यह अभिनय वास्तविकरूपमें नहीं चलता। जहाँ खेल ठीक-ठाक हुआ वहीं सांगोपांग पूजा होती है।

यदि सामाजिक व्यवस्था अथवा पारिवारिक बन्धनोंके नियमोंका उल्लंघन करके उनकी अवहेलना करते हैं तो भगवान‍्की आज्ञा नष्ट होती है और खेल बिगड़ता है। खेलको अपना न माने पर खेल बिगड़े नहीं। जहाँ ठीक खेल हुआ, वहाँ भगवान‍्की उपासना हुई। भगवान‍्का सर्वत्र दर्शन करनेवाला वस्तुत: किसी अन्य वस्तुकी कामना कैसे करेगा, किसीपर क्रोध क्यों करेगा और किसीपर आसक्त क्यों होगा—

उमा जे राम चरन रत बिगत काम मद क्रोध।

निज प्रभुमय देखहिं जगत केहि सन करहिं बिरोध॥

सब पूजाके पात्र हैं। सब पूजनीय हैं। लक्ष्मी-नारायणपर बिल्वपत्र नहीं चढ़ाया जाता और शिवपर तुलसीदल नहीं चढ़ाया जाता। जैसा देवता, वैसी ही पूजा। धतूरे और आकके फूलके बिना शिवजीकी पूजा कैसे पूरी होगी? इसका अभिप्राय यही है कि भिन्न-भिन्न वेषमें एक ही प्रभु आये हुए हैं और उनकी वैसी ही वेषके अनुरूप ही पूजा होनी चाहिये।

कुरुक्षेत्रमें भगवान् जब कालरूपमें प्रकट हुए और अर्जुनसे यह कहा, ‘कालोऽस्मि लोकक्षयकृत्प्रवृद्ध:’ मैं कालरूप होकर यहाँ सबको निगलनेके लिये प्रकट हुआ हूँ; उस समय भगवान‍्की पूजा अर्जुन केवल एक ही प्रकारसे कर सकते थे और वह प्रकार था रणांगणमें सब लोगोंको वीरगतिपर पहुँचाना। सबको भगवान् खा जानेके लिये उस समय प्रकट हुए थे और उन्होंने कहा, इस समय मेरी पूजा यही है—तुम निमित्त बनकर इन सबको मेरे मुँहमें डाल दो। वहाँ यही स्वकर्म था। भगवत्पूजनका प्रकृष्ट—उत्कृष्ट प्रकार था।

मयि सर्वाणि कर्माणि संन्यस्याध्यात्मचेतसा।

निराशीर्निर्ममो भूत्वा युध्यस्व विगतज्वर:॥

(गीता ३।३०)

सुखदु:खे समे कृत्वा लाभालाभौ जयाजयौ।

ततो युद्धाय युज्यस्व नैवं पापमवाप्स्यसि॥

(गीता २।३८)

‘इसलिये अर्जुन! तू अध्यात्मनिष्ठ चित्तसे सम्पूर्ण कर्मोंको मुझमें समर्पण करके, आशारहित, ममतारहित और संतापरहित होकर युद्ध कर। (यदि तुझे स्वर्ग तथा राज्यकी इच्छा न हो तो भी) सुख-दु:ख, लाभ-हानि और जय-पराजयको समान समझकर तत्पश्चात् तू युद्धके लिये तैयार हो, इस प्रकार युद्ध करनेसे तू पापको नहीं प्राप्त होगा।’

अर्जुन तो भगवान‍्की इस सामयिक पूजासे हट रहे थे। वे अपने कर्तव्यसे च्युत होने जा रहे थे। वहाँ तो रक्त-दानसे ही पूजा होती थी। भगवान‍्ने तीसरे अध्यायमें अर्जुनको यह आज्ञा दी है कि ‘मेरे लिये आसक्ति छोड़कर भलीभाँति कर्म करो।’ यह कर्म ही यज्ञ है। इन सबका अभिप्राय यही है कि प्रत्येक अवस्थामें प्रत्येक मनुष्य प्रत्येक शास्त्रोक्त कर्मसे भगवान‍्की पूजा कर सकता है। यही महान् साधन है। इतनी याद रहे कि सर्वत्र-सर्वदा, सबमें—पशु, पक्षी, वृक्ष, पतंग आदि सबमें एकमात्र भगवान् ही हैं और उन्हें देखते हुए ही उनके साथ व्यवहार करे।

सीय राममय सब जग जानी।

करउँ प्रनाम जोरि जुग पानी॥

जहाँ व्यवहार पड़े वहाँ याद कर ले कि सर्वत्र सीताराम ही हैं। मन-ही-मन उन्हें प्रणाम कर लिया, पहचान लिया और आज्ञाके अनुसार कार्यमें प्रवृत्त हुए।