सत्कर्म करो, परंतु अभिमान न करो

मनुष्यके लिये उत्तम लोकोंमें जानेके सात बड़े भारी सुन्दर दरवाजे सत्पुरुषोंने बतलाये हैं, वे ये हैं—

१. अपने धर्मपालनके लिये सुखपूर्वक नाना प्रकारके कष्टोंको स्वीकार करना। यह तप है।

२. देश, काल और पात्रको देखकर सत्कारपूर्वक निष्कामभावसे अपनी वस्तु दूसरेको देना। यह दान है।

३. विषाद, कठोरता, चंचलता, व्यर्थचिन्तन, राग-द्वेष और मोह, वैर आदि कुविचारोंको चित्तसे हटाकर उसे परमात्मामें लगाना। यह शम है।

४. विषयोंके समीप होनेपर भी इन्द्रियोंको उनकी ओर जानेसे रोक रखना। यह दम है।

५. तन, मन, वचनसे बुरे कर्म करनेमें संकोच होना। यह लज्जा है।

६. मनमें छल, कपट या दम्भका अभाव होना। यह सरलता है।

७. बिना किसी भेदभावसे प्राणिमात्रके दु:खको देखकर हृदयका द्रवित हो जाना और उनके दु:खोंको दूर करनेके लिये चेष्टा करना। यह दया है।

इन सातोंके करनेवाला पुरुष यदि इनके कारण अभिमान करता है तो उसके ये तप आदि गुण मानरूपी तमसे निष्फल होकर नष्ट हो जाते हैं!

जो मनुष्य श्रेष्ठ विद्या पढ़कर अपनेको ही पण्डित मानता है और अपनी विद्यासे दूसरेके यशको घटाता है, उसको उत्तम लोककी प्राप्ति नहीं होती और उसकी पढ़ी हुई वह उत्तम ब्रह्म-विद्या उसे ब्रह्मकी प्राप्ति नहीं कराती।

अध्ययन, मौन, अग्निहोत्र और यज्ञ—ये चार कर्म मनुष्यको भव-भयसे छुड़ानेवाले हैं, परंतु यदि यही अभिमानके साथ या मानकी प्राप्तिके लिये किये जायँ तो उलटे भय देनेवाले हो जाते हैं।

इसलिये कहीं सम्मान मिले तो फूल नहीं जाना चाहिये और अपमान हो तो संताप नहीं मानना चाहिये; क्योंकि संतलोग सदा संतोंको पूजते ही हैं और असंतोंमें संतबुद्धि आती नहीं।

‘मैंने दान दिया है, मैंने इतने यज्ञ किये हैं, मैंने इतना पढ़ा है, मैंने ऐसे-ऐसे व्रत किये हैं, इस प्रकार जो अभिमान-भरी डीगें मारता हुआ ये कर्म करता है उसको यही कर्म शुभ फल न देकर उलटा भय देनेवाले हो जाते हैं।’ इसलिये अभिमानका बिलकुल त्याग करना चाहिये (महाभारत)।