श्रीशुकदेवजी

एक समय महर्षि वेदव्यासकी विवाह करके गृहस्थधर्म-पालनकी इच्छा हुई। बहुत सोच-विचारकर वे जाबालि मुनिके पास गये और उनकी कल्याणमयी कन्या वटिकाके लिये उनसे प्रार्थना की। जाबालिने बड़े हर्षसे व्यासजीके साथ अपनी कन्याका विवाह कर दिया। महर्षि व्यास वानप्रस्थाश्रममें मैथुनधर्मका आचरण करते हुए वनमें रहने लगे। समयपर व्यासपत्नी गर्भवती हुई, शुक्लपक्षके चन्द्रमाकी तरह व्यास-भार्याका गर्भ बढ़ने लगा। गर्भ बढ़ते-बढ़ते बारह वर्ष बीत गये, परंतु प्रसव नहीं हुआ। व्यासजीकी कुटियामें सर्वदा हरि-चर्चा हुआ करती थी। अपने ज्ञानकी विशेषतासे गर्भस्थ बालक जो कुछ सुनता सो स्मरण कर रखता। इस तरह उस बालकने गर्भमें ही सांग वेद, स्मृति, पुराण और सम्पूर्ण मुक्तिशास्त्रोंका अध्ययन कर लिया। वह गर्भमें ही दिन-रात स्वाध्याय किया करता। गर्भसे निकलनेके बाद बढ़ना चाहिये, इस बातकी उसे तनिक भी चिन्ता नहीं थी।

गर्भस्थ बालकके बहुत बढ़ जाने और प्रसव न होनेसे माताको बड़ी पीड़ा होने लगी। एक दिन भगवान् व्यासदेवने आश्चर्यचकित होकर बालकसे पूछा—‘तू मेरी पत्नीकी कोखमें घुसा बैठा है सो कौन है? किसलिये बाहर नहीं निकलता? क्या गर्भिणीकी हत्या करना चाहता है?’ गर्भने कहा, ‘मैं राक्षस, पिशाच, देव, मनुष्य, हाथी, घोड़ा, बकरी, मुर्गा सब कुछ बन सकता हूँ, क्योंकि मैं चौरासी लाख योनियोंमें भ्रमण कर आया हूँ, इसलिये यह कैसे बतलाऊँ कि मैं कौन हूँ? हाँ, इतना अवश्य कह सकता हूँ कि इस समय मैं मनुष्य होकर उदरमें आया हूँ। मैं किसी तरह भी गर्भसे बाहर नहीं निकलना चाहता। इस दु:खपूर्ण संसारमें सदासे भटकता हुआ अब मैं भवबन्धनसे छूटनेके लिये गर्भमें योगाभ्यास कर रहा हूँ। मैं यहींसे निश्चयरूपसे कल्याणरूप मोक्षमार्गमें जाऊँगा। द्विजश्रेष्ठ! जबतक जीव गर्भमें रहता है तबतक उसे ज्ञान, वैराग्य और पूर्वजन्मोंकी स्मृति बनी रहती है। गर्भसे निकलते ही भगवान‍्की मायाके स्पर्शमात्रसे उसके समस्त ज्ञान, वैराग्य छिप जाते हैं, इसमें कोई संदेह नहीं है, इसलिये मैं गर्भमें ही रहकर यहींसे सीधा मोक्षकी प्राप्ति करूँगा, मैं बाहर नहीं निकलना चाहता।’ व्यासजीने कहा—‘तुझपर वैष्णवी मायाका असर नहीं होगा, तू इस गर्भवासरूप घोर नरकसे निकलकर योगका आश्रय करके कल्याणके मार्गमें प्रवृत्त हो। मुझे अपना मुखकमल दिखला, जिससे मैं पितृ-ऋणसे मुक्त हो सकूँ।’ गर्भने कहा, ‘मुझपर मायाका असर नहीं होगा, इस बातके लिये यदि आप भगवान् वासुदेवकी जमानत दिला सकें तो मैं बाहर निकल सकता हूँ, अन्यथा नहीं।’

गर्भकी यह बात सुनकर व्यासदेव उसी समय द्वारिका गये और वहाँ भगवान् चक्रपाणिको अपनी सारी कष्ट-कहानी सुनायी! भक्ताधीन भगवान् जमानत देनेके लिये तुरंत उनके साथ हो लिये और व्यासजीके आश्रममें आकर गर्भस्थ बालकसे बोले, ‘बालक! गर्भसे बाहर निकलनेपर तेरी माया नाश करनेकी जिम्मेवारी मैं लेता हूँ, तू शीघ्र निकलकर सर्वश्रेष्ठ कल्याणमार्गमें गमन कर!!’

भगवान‍्के वचन सुनते ही बालक गर्भसे बाहर आकर माता-पिताको प्रणामकर तुरंत वनकी ओर जाने लगा। प्रसव होनेपर बालक बारह वर्षका प्राय: जवान-सा दीख पड़ता था। पुत्रको वन गमन करते देखकर व्यासजी बोले—‘पुत्र! घरमें रह, जिससे मैं तेरा जातकर्मादि संस्कार करूँ!’ बालकने कहा—‘मुनिवर! अनेक जन्मोंमें मेरे हजारों संस्कार हो चुके हैं, इन बन्धनकारी संस्कारोंने ही मुझे संसारसागरमें डाल रखा है!’ बालककी यह बात सुनकर भगवान‍्ने व्यासजीसे कहा—‘मुनिवर! आपका पुत्र शुककी तरह मधुर बोल रहा है, अतएव इस योगविद्याविचक्षण पुत्रका नाम ‘शुक’ रखिये। यह मोह-मायारहित शुक आपके घरमें नहीं रहेगा, इसे इच्छानुसार जाने दीजिये। इसपर अब आप स्नेह न बढ़ाइये। पुत्रमुख देखते ही आप पितृ-ऋणसे छूट गये हैं, यह मैं आपसे सत्य कहता हूँ, अब मुझे आज्ञा हो।’ इतना कहकर भगवान् तो गरुड़पर सवार होकर द्वारिकाकी तरफ चल दिये। भगवान् व्यास फिर पुत्रको समझाने लगे। दोनोंमें इस प्रकार बातचीत हुई—

व्यास—गृहस्थधर्म त्यागनेवाले लोगोंके पितृ-वचन नष्ट होते हैं, जो पुत्र पिताके वचनोंके अनुसार नहीं चलता, वह नरकगामी होता है इसलिये पुत्र! तू मेरी बात मानकर घरमें रह!

शुक—आज मैं जैसे आपसे उत्पन्न हुआ हूँ, इसी प्रकार दूसरे जन्ममें आप कभी मुझसे उत्पन्न हो चुके हैं। पिता-पुत्रका नाता यों ही बदला करता है, कृपया मुझे आप तपोवनमें जानेसे न रोकिये!’

व्यास—जहाँ वेदोक्त संस्कारोंको पाकर मनुष्य मोक्षकी प्राप्ति कर सकता है, ऐसे ब्राह्मणकुलमें बहुत पुण्यसे जन्म होता है!

शुक—शुभकर्म किये बिना यदि संस्कारोंसे ही मुक्ति मिलती होती तो व्रतधारी ढोंगियोंकी भी मुक्ति होनी चाहिये थी!

व्यास—संस्कार किये हुए मनुष्य ही पहले ब्रह्मचारी, फिर गृहस्थ, फिर वानप्रस्थ और उसके बाद संन्यासी होकर मुक्ति पाते हैं।

शुक—यदि केवल ब्रह्मचर्यसे ही मुक्ति होती तो नपुंसक जरूर ही मुक्त हो जाते! गृहस्थमें मुक्ति होती तो फिर सारा जगत् ही मुक्त है! वनवासियोंकी मुक्ति होती तो फिर सब पशु क्यों नहीं मुक्त हो जाते? और यदि धनके त्यागमें ही मुक्ति हो तो दरिद्रोंकी सबसे पहले होनी चाहिये!

व्यास—सत्यमार्गपर चलनेवाले गृहस्थीका यह लोक और परलोक दोनों सधते हैं, यह बात तो मनु महाराज ही कहते हैं।

शुक—जो लोग घरकी रक्षासे सुरक्षित और बन्धु-बान्धवोंके बन्धनसे बँधे हैं, उन मोह-रोगियोंका सत्यमार्गपर रहना ही असम्भव है।

व्यास—वनवासमें मनुष्यको बड़ा कष्ट होता है, वहाँ नित्य-कर्म ही नहीं हो सकते, सारे दैव-पितृ-कर्म रुक जाते हैं, इसलिये घरमें रहना ही सुखकर है।

शुक—वनवासी महातपस्वी भावभावित मुनियोंको समस्त तपोंका फल आप ही मिल जाता है, उनको बुरा संग तो कभी मिलता ही नहीं, यही उनके लिये बड़ा सुख है।

व्यास—गृहस्थी पुरुषोंको अनेक प्रकारकी इकट्ठी की हुई सामग्री उन्हें इस लोक और परलोकमें बड़ा सुख देती है। यहाँ भोगसे सुख होता है और दान करनेसे परलोकमें सुख मिलता है!

शुक—अग्निसे सर्दी या चन्द्रमासे चाहे गरमी मिल जाय पर संसारमें परिग्रहसे किसीको न तो आजतक कभी सुख हुआ, न है और न होगा!

व्यास—सुन्दर पुण्यबलसे मनुष्य-शरीर मिलता है और मनुष्य-शरीर पाकर गृहस्थ-धर्मको जाननेवाला पुरुष क्या नहीं प्राप्त कर सकता?

शुक—जन्मके समय मनुष्य यदि ज्ञानसम्पन्न भी होता है तो जन्म होनेके बाद अपनी अवस्था देखकर वह ज्ञान भूल जाता है!

व्यास—पुत्र! संसारमें राखसे लिपटा गदहेकी तरह चिल्लाने-वाला पुत्र भी लोगोंको सुख देनेवाला होता है।

शुक—संसारमें जो मनुष्य अपवित्र बालकोंका धूलमें खेलना देखकर और उनकी मीठी बोली सुनकर प्रसन्न होते हैं वे मूर्ख हैं!

व्यास—यमराजके यहाँ एक पुत् नामक महान् नरक है। पुत्रहीन मनुष्यको उसी नरकमें जाना पड़ता है। अतएव संसारमें रहकर पुत्र उत्पन्न करना चाहिये!

शुक—महामुने! यदि पुत्रसे ही सबको मुक्ति मिलती हो तो सूअर, कुत्ते और पतंगोंकी मुक्ति तो अवश्य हो जानी चाहिये!

व्यास—इस लोकमें पुत्रसे पितृ-ऋण, पौत्र देखनेसे देव-ऋण और प्रपौत्रके दर्शनसे मनुष्य समस्त ऋणोंसे मुक्त होता है।

शुक—गृध्रकी तो बहुत बड़ी आयु होती है। वह तो न मालूम कितने पुत्र, पौत्र, प्रपौत्रोंका मुख देखता है; परंतु उसकी मुक्ति तो नहीं होती!

इतना कहकर शुकदेव उसी समय वनको चले गये।

(स्कन्दपुराण)

भक्तका महत्त्व

एक बार देवर्षि नारदजीके मनमें यह जाननेकी इच्छा हुई कि ‘जगत‍्में सबसे महान् कौन है?’ इसलिये वे सीधे भगवान् विष्णुके पास पहुँचे। उन्होंने सोचा कि ‘सच्ची बात वहींसे मालूम होगी। क्योंकि भगवान् ही नित्य सत्य सर्वज्ञ हैं और वे अभिमानी पुरुषोंकी भाँति अपनी बड़ाई भी नहीं करेंगे; क्योंकि अपने मुँहसे अपनी बड़ाई करना तो आत्महत्याके समान महापाप है। नारदजीने वैकुण्ठमें जाकर भगवान‍्से पूछा—‘भगवन्! जगत‍्में सबसे बड़ा कौन है? यह बतानेकी कृपा कीजिये।’ भगवान् नारदजीका भाव समझ गये और बोले—

पृथ्वी तावदतीव विस्तृतिमती

तद्वेष्टनं वारिधि:

पीतोऽसौ कलशोद्भवेन मुनिना

स व्योम्नि खद्योतवत्।

तद् व्याप्तं दनुजाधिपस्य जयिना

पादेन चैकेन खं

तं त्वं चेतसि धारयस्यविरतं

त्वत्तोऽस्ति नान्यो महान्॥

‘पृथ्वी अत्यन्त विस्तारवाली है, परंतु वह समुद्रसे घिरी है; अत: वह भी बड़ी नहीं है। समुद्रको अगस्त्य मुनि पी गये, अत: वह भी बड़ा नहीं है। अगस्त्यजी महान् आकाशमें एक क्षुद्र जुगनूकी तरह चमकते हैं इससे वे भी बड़े नहीं हैं। आकाशको दैत्यराज बलिके यज्ञमें भगवान् वामनजीने एक पैरसे नाप लिया था, इसलिये वह भी बड़ा नहीं है। और भगवान‍्के पैर निरन्तर तुम्हारे (भक्त)-के चित्तमें रहते हैं, इससे वे भी बड़े नहीं हैं। बड़े हो तुम जिसने उन चरणोंको हृदयमें धारण कर रखा है। तुमसे (भक्तसे) बड़ा और कोई नहीं है।’

इससे भक्तका महत्त्व भलीभाँति प्रकट है; परंतु यह महत्त्व है इसी कारण कि उसके हृदय-देशमें भगवान‍्के मधुर मनोहर चरणारविन्द नित्य-निरन्तर निवास करते हैं। ऐसे भक्त जगत‍्में विरले ही होते हैं। भक्त कहलानेवाले तो लाखों मिलेंगे, परंतु भक्त कोई एक ही मिलेंगे। ‘राम ते अधिक राम कर दासा’ अथवा भगवान् स्वयं भक्तकी चरण-धूलिकी चाहमें निरन्तर उनके पीछे-पीछे चलते हैं, ‘अनुव्रजाम्यहं नित्यं पूयेयेत्यङ्घ्रिरेणुभि:’ के शास्त्र-प्रमाण देकर अपनेको भगवान‍्से भी बढ़कर सिद्ध करने और मान-सम्मान-सेवा-पूजा प्राप्तकरनेवाले भक्त-नामधारियोंमें कितने वास्तविक भक्त हैं, यह बतलाना बहुत कठिन है।

सचमुच भक्त तो अपनेको भक्त मानता ही नहीं। नम्रता और विनयके खयालसे नहीं, भक्तोचित व्यवहारकी दृष्टिसे नहीं, सचमुच ही उसके मनमें यह स्पष्ट अनुभव होता है कि ‘मैं भक्त नहीं हूँ। दीन, मलीन साधनहीनपर भी करुणामय भगवान् कृपा करते हैं—यह उनका महत्त्व है। मुझमें तो भक्तिका लेश भी नहीं है।’ इसी अनुभूतिके कारण ‘सूर’ और ‘तुलसी’-सरीखे महान् भक्त अपनी दशापर करुणामय भगवान‍्के सामने रो पड़ते हैं* और सच्चे हृदयसे अपने दैन्यकी घोषणा करते हैं।

वे इसलिये ऐसा नहीं करते कि लोग उन्हें अधिक विनयी समझकर उनकी पूजा करें; बल्कि वे ऐसा ही अनुभव करते हैं। यह भक्तिका आभूषण है। और ऐसे ही सच्चे भक्तोंसे जगत‍्की वास्तविक सेवा और विश्वका यथार्थ कल्याण होता है; क्योंकि भगवान‍्की कृपाशक्ति ऐसे ही ‘निर्मानमोह’ सच्चे भक्तोंपर उतरती है।

ऐसे भक्तोंका संग ही असली सत्संग है। इनसे अपने-आप ही भगवद्भावकी स्फूर्ति होती है। भगवद्भावका अणु-परमाणुमें भी बहुत दूरतक विस्तार होता है और उससे सहज ही जगत‍्का कल्याण होता रहता है और वह भाव इतना सुदृढ़ तथा शक्तिसम्पन्न होता है कि अनन्तकालतक उसका नाश नहीं होता।

ऐसे भक्तोंका सम्मान भगवान‍्को प्रिय और अपमान भगवान‍्को अप्रिय है। वे और सारे अपराध क्षमा कर देते हैं, परंतु भक्तापराध सहजमें क्षमा नहीं करते। स्कन्दपुराणमें कहा गया है—

हन्ति निन्दति वै द्वेष्टि वैष्णवान् नाभिनन्दति।

क्रुध्यते याति नो हर्षं दर्शने पतनानि षट्॥

पूजिते भगवान् विष्णुर्जन्मान्तरशतैरपि।

प्रसीदति न विश्वात्मा वैष्णवे चापमानिते॥

भक्तोंको मारना, उनकी निन्दा करना, उनसे द्वेष करना, उनका यथायोग्य सम्मान न करना, उनपर क्रोध करना और उन्हें देखकर हर्षित न होना—ये छ: पतन हैं।’

‘जो मनुष्य भक्तका अपमान करता है, वह यदि सौ जन्मोंतक भी भगवान‍्की पूजा करे तो भी विश्वात्मा भगवान् उसपर प्रसन्न नहीं होते।’

ऐसे भक्तों—महात्माओंका चरण-रज-सेवन ही भक्ति अथवा भगवत्प्राप्तिका मुख्य साधन है। श्रीमद्भागवतमें कहा है—

रहूगणैतत्तपसा न याति

न चेज्यया निर्वपणाद् गृहाद्वा।

न च्छन्दसा नैव जलाग्निसूर्यै-

र्विना महत्पादरजोऽभिषेकम्॥

(५।१२।१२)

महात्मा जडभरतजी कहते हैं—‘रहूगण! वे ज्ञानस्वरूप भगवान् महापुरुषोंके चरणोंकी धूलिसे अपनेको नहलाये बिना तप, यज्ञादि वैदिक कर्म, अन्नादिके दान, अतिथिसेवा—दीनसेवा आदि गृहस्थोचित कर्म, वेदाध्ययन अथवा जल, अग्नि और सूर्यकी उपासना आदि किसी भी साधनसे प्राप्त नहीं हो सकते।’

भक्तराज प्रह्लादजीने अपने सहपाठी दैत्य-बालकोंको विशुद्ध भागवत-धर्मका मर्म बतलाकर कहा—

ज्ञानं तदेतदमलं दुरवापमाह

नारायणो नरसख: किल नारदाय।

एकान्तिनां भगवतस्तदकिंचनानां

पादारविन्दरजसाऽऽप्लुतदेहिनां स्यात्॥

(श्रीमद्भा० ७।६।२७)

‘यह ज्ञान उन्हीं लोगोंको प्राप्त हो सकता है, जिन्होंने भगवान‍्के अनन्य प्रेमी और अकिंचन भक्तोंकी चरणारविन्द-धूलिसे अपने देहको सराबोर कर दिया है।’ महाराज युधिष्ठिरने भक्तप्रवर विदुरजीसे कहा है—

भवद्विधा भागवतास्तीर्थभूता: स्वयं विभो।

तीर्थीकुर्वन्ति तीर्थानि स्वान्त:स्थेन गदाभृता॥

(श्रीमद्भा० १।१३।१०)

‘आप-जैसे भगवान‍्के भक्त स्वयं ही तीर्थरूप हैं। आपलोग अपने हृदयमें विराजमान भगवान‍्के द्वारा तीर्थोंको भी महान् तीर्थ बनाते हुए विचरा करते हैं।’

अपने साधुहृदय भक्तोंके संगकी महिमा वर्णन करते हुए स्वयं भगवान् आनन्दकन्द श्रीकृष्णचन्द्र कहते हैं—

न रोधयति मां योगो न सांख्यं धर्म एव च।

न स्वाध्यायस्तपस्त्यागो नेष्टापूर्तं न दक्षिणा॥

व्रतानि यज्ञश्छन्दांसि तीर्थानि नियमा यमा:।

यथावरुन्धे सत्संग: सर्वसंगापहो हि माम्॥

(श्रीमद्भा० ११।१२।१-२)

‘जगत‍्की समस्त आसक्तियोंको नष्ट करनेवाले सत्संगसे मैं जैसा वशमें होता हूँ, वैसा योग, ज्ञान, धर्मानुष्ठान, स्वाध्याय, तप, त्याग, इष्टापूर्त कर्म और दक्षिणा आदिसे नहीं होता। यहाँतक कि व्रत, यज्ञ, वेद, तीर्थ और यम-नियम भी सत्संगके समान मुझको वशमें करनेमें समर्थ नहीं हैं।’

उपर्युक्त अवतरणोंसे भक्तोंका कुछ महत्त्व समझमें आया होगा, परंतु सचमुच ही ऐसे भक्त विरले ही होते हैं।

आजकल तो भक्तोंका बाजार लगा है। कौन कैसा है, जानना-पहचानना बड़ा ही कठिन है। असलमें कलियुगका प्रभाव ही ऐसा है कि लोग अपनी भोगेच्छाकी सिद्धिके लिये जिस क्षेत्रको और जिस वेषको सफल साधन समझते हैं, उसीको अपना लेते हैं। इसीसे आज ऐसा कोई भी आध्यात्मिक, धार्मिक, राजनीतिक और सामाजिक क्षेत्र नहीं, जहाँ ऐसे लोगोंकी भरमार न हो। इस भक्तिके क्षेत्रमें भी आज ऐसे लोगोंकी कमी नहीं है, जो किसी-न-किसी प्रकारसे अपनेको भक्त सिद्ध करके, भगवान‍्के पवित्र स्थानपर अपने विषय-विलासरत, भोग-विभ्रमपरायण व्यक्तित्वको लाकर बैठा देना चाहते हैं और भोले लोगोंकी श्रद्धा-भक्तिका दुरुपयोग कर भगवान‍्को धोखा देनेकी चेष्टा करके स्वयं धोखा खा रहे हैं और अपने अमूल्य जीवनको नष्ट कर रहे हैं; परंतु ऐसे लोगोंसे भोले साधकोंका बड़ा नुकसान होता है।

यह सत्य है कि किसी साधकका अनन्य लक्ष्य यदि केवल भगवत्प्राप्ति हो और वह धोखेमें आकर किसी दम्भी अभक्तको भी भक्त मानकर उसका श्रद्धापूर्वक सेवन करे तो उसके निर्मल हृदय, निष्कपट श्रद्धा और परमश्रेष्ठ अनन्य उद्देश्यको देखकर अन्तर्यामी सर्वसमर्थ प्रभु उसे बचा लेते हैं। इतना ही नहीं, उसे सरलहृदय साधक मानकर सच्ची राह बतलाते और अपनी कृपाशक्तिसे ही अपनी ओर खींच ले जाते हैं। दम्भी अभक्तके संगसे उसका पतन नहीं होता। बल्कि कहीं-कहीं तो दम्भी गुरुका भी ऐसे निर्मल हृदय परम श्रद्धालु शिष्यके संगसे निस्तार हो जाता है; परंतु ऐसा बहुत कम हुआ करता है। परम श्रद्धालु और अनन्य लक्ष्यवाले साधक कोई-कोई ही होते हैं। अधिकांश तो ऐसे होते हैं, जो संसारका भी सुख चाहते हैं—साथ ही भगवत्प्राप्तिकी भी कुछ इच्छा रखते हैं। ऐसा मध्यम श्रेणीका पुरुष यदि दम्भी विषयासक्त पुरुषको सच्चा भक्त मानकर उसमें श्रद्धा करने लगता है तो उसकी विषयासक्तिका असर उसपर भी हो जाता है और वह भी धीरे-धीरे उस दम्भी विषयासक्त पुरुषके साथ विषय-सेवन करनेमें प्रवृत्त होकर पापजीवन बन जाता है। फिर उसके मनसे भगवत्प्राप्तिकी रही-सही इच्छा भी मिट जाती है और वह साधारण विषयी पुरुषसे भी अधिक भयानक भेड़के रूपमें भेड़िया बनकर जगत‍्में पाप-तापका विस्तार करता है और स्वयं भी अपने दम्भी गुरुके साथ भीषण नरकयन्त्रणाको प्राप्त होता है।

ऐसी स्थितिमें भगवत्प्राप्तिकी इच्छावाले सरलहृदय साधकोंको बड़ी सावधानीके साथ अपना मार्ग निश्चय करना चाहिये और एकमात्र श्रीभगवान‍्का ही सीधा आश्रय लेकर उन्हींसे करुण प्रार्थना करनी चाहिये। भगवान् सच्ची प्रार्थनाको सुनेंगे और उसके लिये किसी सच्चे पथप्रदर्शक भक्त या संत पुरुषकी सुन्दर व्यवस्था कर देंगे। यहाँतक कि आवश्यकता होनेपर स्वयं ही संत, भक्त या पथ-प्रदर्शकके रूपमें प्रकट होकर उसका जीवनसूत्र अपने हाथोंमें लेकर उसे अपनी भक्तिके मार्गपर ले चलेंगे। बस, होनी चाहिये सच्ची इच्छा और सच्ची प्रार्थना।