श्रीविष्णुप्रियाजीको पादुका-दान

श्रीगौरांगदेव संन्यासके बाद घर आ रहे हैं, परसों वे नवद्वीप पहुँचेंगे, माता शची और गौरांगप्रिया देवी श्रीविष्णुप्रिया इस बातको जानती हैं। श्रीविष्णुप्रिया दिन गिनती हैं। वे कभी-कभी प्रेमावेशमें इस बातको भूल जाती हैं कि ‘श्रीगौरांग इस समय संन्यासी हैं, उनका अब मुझसे पति-पत्नीका कोई सम्बन्ध नहीं रहा।’ वे सोचती हैं, मानो स्वामी परदेशसे घर लौट रहे हैं, इसीसे पल-पलमें उन्हें स्मरणकर वे व्याकुल हो रही हैं।

प्रभु कुलिया पधारे हैं, बीचमें नदी है। संन्यासीको एक बार जन्मभूमिमें जाना चाहिये। इसीलिये वे नवद्वीप आ गये, लाखों लोगोंकी भीड़ साथ है, शहरभरमें कोलाहल मच रहा है, सभी देखनेको दौड़ते हैं। स्त्रियाँ अटारियों और छतोंपर खड़ी होकर यह अभूतपूर्व दृश्य देख रही हैं। प्रभु खड़ाऊँ पहने घाटपर उतरे और चिरपरिचित स्थानोंको देखते हुए आगे बढ़े!

प्रभुका घर आ गया, वे घरके सामने वहीं खड़े हो गये, जहाँ छ: वर्ष पहले गयाके गदाधरके चरणकमलोंका वर्णन करते हुए मूर्च्छित होकर गिर पड़े थे! माता शचीसे तो पहले भी भेंट हो गयी थी, परंतु श्रीविष्णुप्रियाजीका संन्यासके बाद पति-मुख-दर्शनका यह पहला ही अवसर है। विष्णुप्रिया सोचती हैं—‘प्रभु तो अब केवल मेरे स्वामी ही नहीं हैं, उन्होंने तो जगत् भरके दु:खियोंका दु:ख दूर करनेका ठेका लिया है। वे तो अब सबकी सम्पत्ति हैं, जैसा उनसे सबका सम्बन्ध है, वैसा ही मेरा भी है। फिर मैं उनपर अपना अधिकार विशेष क्यों समझूँ? पर क्या करूँ, मन नहीं मानता, उनके आनेके समाचारसे ही चित्तमें जो भाव-तरंगें उठीं और जिन्होंने कई बार मनमें ऐसा भाव उत्पन्न कर दिया कि एक बार वे आ जायँ। उनके चरण पकड़कर धरना दूँगी, अपने हृदयके प्रेम-सिन्धुकी मर्यादा तोड़कर उसके प्रबल प्लावनमें सारे नवद्वीपके स्त्री-पुरुषोंके साथ ही उनको भी बहा दूँगी। वे मेरे हैं, मेरे हृदयके धन हैं, क्या मेरी अवहेलना करेंगे? पर आज सोचती हूँ, मेरा हृदय तो उन्हें अर्पित है, उनके सुखमें ही मुझे परम सुख है, जीवोंकी बड़ी ही बुरी दशा है, उनके उद्धारके लिये ही प्रभुने मेरा त्याग किया है। पतितोंको पावन करनेवाली प्रभुकी इस विशाल भावधारामें क्या मुझे कभी आपत्ति करनी चाहिये? नहीं, नहीं! मेरे स्वामी! जगत‍्के कल्याणके लिये तुम जो कुछ कर रहे हो, उसीमें मुझे बड़ी प्रसन्नता है, मेरे त्यागसे तुम्हारे जगत्-उद्धारके कार्यमें लाभ पहुँचता है, यही मेरे लिये बड़ा गौरव है, परंतु नाथ! क्या मेरा उद्धार नहीं होगा? क्या मैं इसके लिये पात्र नहीं हूँ?’ इस तरह श्रीविष्णुप्रियाके मनमें अनेक तरंगें उठ रही हैं और उसे प्रभु-दर्शनके लिये व्याकुल कर रही हैं। इस समयकी श्रीविष्णुप्रियाके मनकी दशाका पता उन्हींको है, दूसरा कोई उसका अनुमान नहीं कर सकता।

परंतु श्रीविष्णुप्रिया क्या गौरांगके पास जायँगी? प्रभु तो स्त्रीको देखते ही दूर हट जाते हैं, प्रभु उससे क्यों बोलेंगे। फिर जहाँ लाखोंकी भीड़ है, वहाँ एक कुलकामिनी सबके सामने कैसे जा सकती है? उन्नीस सालकी तरुण अवस्था है, कभी घरसे बाहर नहीं निकलीं, आज कैसे बाहर जायँ? श्रीविष्णुप्रियाको अभी बाह्यज्ञान है, वे यह सब सोचती हैं पर कुछ निश्चय नहीं कर पातीं। आड़में खड़ी होकर पतिमुख-दर्शनकी चेष्टा करने लगीं, पर नहीं कर सकीं। मनमें प्रबल इच्छा थी कि एक बार सदाके लिये जी भरकर देख लूँ, पर कैसे बाहर जायँ? फिर सोचा, ‘स्त्रीके लिये जो स्वामी इस लोक और परलोकका एकमात्र आश्रय है, उसके चरणोंमें जाते लोक-लाज कैसी?’ यों सोचते-सोचते उनका बाह्यज्ञान जाता रहा, उसी समय उसी मैली साड़ीसे सिरसे पैरतक सारा बदन ढककर श्रीविष्णुप्रिया दौड़ीं और घरसे बाहर राज्यपथमें खड़े हुए प्रभुके चरणोंमें—‘हा प्रभु!’ पुकारती हुई गिर पड़ीं। अश्रुधारासे सारा बदन भींग गया, प्रभुके चरणकमल प्रेमाश्रुधाराके पुनीत जलसे धुलने लगे!

प्रभुने किसी स्त्रीको पड़ी हुई देखा और ‘तुम कौन हो?’ कहकर पीछे हट गये। किसीने भी प्रभुके प्रश्नका उत्तर नहीं दिया। इस दृश्यको देखकर लोगोंका हृदय भर आया। महाप्रभु चरणोंमें पड़ी हुई मलिनवस्त्रा युवतीकी ओर देखने लगे।

जब लोगोंने कोई जवाब नहीं दिया तब श्रीमतीने गद‍्गदकण्ठसे कहा—‘नाथ! मैं तुम्हारी दासियोंकी दासी हूँ।’ प्रभु समझ गये कि श्रीविष्णुप्रिया हैं। प्रभुके मुखपर भी क्षणभरके लिये उदासीकी रेखा झलकने लगी। प्रभुने कहा—‘तुम क्या चाहती हो?’ श्रीविष्णुप्रिया बोलीं, ‘प्रभो! तुम सारे संसारका उद्धार कर रहे हो, तब क्या तुम्हारी यह दासी विष्णुप्रिया ही भवकूपमें पड़ी रहेगी?’

इतना सुनते ही चारों ओरसे क्रन्दनकी ध्वनि उठी, करुणाका समुद्र उमड़ पड़ा, छोटे-बड़े सभी पुकार-पुकारकर रोने लगे! उस समय आँसू नहीं थे केवल प्रभुकी और प्रभुकी योग्य पत्नी पतिपरायणा विष्णुप्रियाकी आँखोंमें! प्रभुने सिर नीचा करके धीरसे कहा—‘तुम विष्णुप्रिया हो, अपना नाम सार्थक करो, तुम श्रीकृष्णकी प्रिया बनो।’

श्रीविष्णुप्रिया बोलीं—‘मैं तुम्हें छोड़कर श्रीकृष्णको नहीं देख सकती! प्रभु कुछ क्षणोंतक चुपचाप खड़े रहे; फिर दोनों चरणोंसे खड़ाऊँ निकालकर बोले—‘साध्वी! मैं संन्यासी हूँ, तुम्हें देनेको मेरे पास कुछ भी नहीं है। यह मेरी खड़ाऊँ लो और इन्हींसे अपने विरहको शान्त करो।’ श्रीविष्णुप्रियाने खड़ाऊँको प्रणाम किया, उन्हें मस्तकपर रख लिया और फिर उन्हें चूमकर हृदयसे लगा लिया। लाखों लोग गद‍्गदकण्ठसे ‘हरि-हरि’ पुकार उठे!