स्त्रीका अपराध

एक पत्र मिला है जिसका सार यह है—‘एक स्त्रीने ऐसा अपराध किया है जो पातिव्रतधर्मके सर्वथा प्रतिकूल है। यह सत्य है कि अपराधका मूल कारण अज्ञान या लोभ है और जहाँतक अनुमान है, यह उसका पहला अपराध है। अपराध बहुत बड़ा है। उसपर भविष्यमें विश्वास किया जा सकता है या नहीं। पति घोर मानसिक अशान्तिसे पीड़ित है, वह क्या करे? इसका क्या दण्ड या प्रायश्चित्त है? क्या यह स्त्री सर्वथा त्याज्य है?’ इस विषयपर उन्होंने शीघ्र सम्मति चाही है। नहीं तो डर है मानसिक अशान्तिके कारण वह और कुछ कर न बैठे।

‘वह और कुछ कर न बैठे’ इसी वाक्यको पढ़कर इस विषयपर कुछ लिखना आवश्यक समझा गया है। पत्रसे अनुमान होता है घटना चरित्रसम्बन्धी ही है। घटना बड़ी ही दु:खद है, परंतु ऐसी घटनाएँ आजके युगमें बिरली ही नहीं होतीं। मेरी समझसे इसमें प्रधान दोषी पुरुष हैं, जो अपनी बुरी वासनाकी तृप्तिके लिये भोली-भाली स्त्रियोंको कुमार्गपर लाते हैं। सच्ची बात तो यह है कि स्त्रियोंको बुराईकी ओर खींचनेवाले और लोभ आदि देकर उन्हें धर्मसे डिगानेवाले ऐसे पुरुष जितने महान् पतित और दण्डके पात्र हैं, उतनी स्त्रियाँ नहीं हैं। तथापि जिस बहिनसे यह अपराध हुआ है, उसके पतिको भयानक मानसिक पीड़ा होना स्वाभाविक है। उन भाईका यह कर्तव्य है कि वे आजकलकी पुरुषजातिकी नीचताकी ओर ध्यान देकर और साथ ही यह भी सोचकर कि पुरुषोंके द्वारा ऐसे ही अपराध होनेपर उनको हमलोग कितना दण्ड देते हैं, अपनी पत्नीको क्षमा करें, उसका तिरस्कार न करें। न पाँच आदमियोंमें बदनामी करें, न निन्दा करें और अपने चरित्रसम्पन्न जीवन, पवित्र सदाचार और प्रेमपूर्ण सद्‍व्यवहारसे ऐसी स्थिति उत्पन्न कर दें जिससे पत्नीको अपनी भूलपर महान् पश्चात्ताप हो। मेरी समझसे सच्चे पश्चात्तापसे बढ़कर और कोई प्रायश्चित्त नहीं है। पश्चात्तापहीन दण्ड या प्रायश्चित्त पापकी जड़ नहीं काट सकता। बल्कि देखा जाता है कि दण्ड तो भूलसे पाप करनेवालोंको बार-बार क्लेश भुगताकर स्वाभाविक पापी बना देता है। इसलिये दण्ड न देकर ऐसा अच्छा बर्ताव करना चाहिये, जिससे अपराधीके मनमें आत्मग्लानि जाग उठे और वह पश्चात्ताप करे।

एक बार एक महात्माके पास एक स्त्रीको साथ लेकर पाँच पुरुष आये और उन्होंने कहा कि ‘इस स्त्रीका चरित्र खराब है, हम इसे पत्थरोंसे मारना चाहते हैं।’ इसपर महात्माने कहा—‘जरूर, इसका अपराध भयंकर है, इसे मारना चाहिये, परंतु मारे वही जिसकी आँखें कभी परस्त्रीकी ओर न गयी हों और जिसके मनमें कभी परस्त्रीके प्रति कोई पाप न आया हो। नहीं तो, मारनेवाला ही मर जायगा।’ महात्माकी इस बातको सुनकर तो सभी एक-दूसरेका मुँह ताकने लगे। महात्माने कहा, ‘मारते क्यों नहीं?’ उन्होंने कहा, ‘भगवन्! कैसे मारें, ऐसी भूल तो हम सभीसे होती है।’ तब महात्मा बोले—‘भलेमानसो! तुम स्वयं जो अपराध करते हो, उसीके लिये दूसरेको मारना चाहते हो, तुम्हारे न्यायानुसार पहले तुम्हींको क्यों नहीं मारना चाहिये?’

बात यह है कि पुरुष आज स्त्रियोंकी अपेक्षा कहीं अधिक मात्रामें पाप करते हैं, पर अपने पापोंका कोई प्रायश्चित्त नहीं करना चाहते, उनका स्त्रियोंको दण्ड देनेका विचार करना एक प्रकारसे हास्यास्पद ही है।

इन सभी बातोंपर विचार करनेसे यही ठीक मालूम होता है कि उस बहिनका प्रथम अपराध और वह भी अज्ञानकृत होनेसे क्षमाके योग्य है और वह अब अपने पति तथा घरवालोंके द्वारा ऐसा प्रेमपूर्ण सद्‍व्यवहार प्राप्त करनेकी अधिकारिणी है कि जिससे भविष्यमें उसके मनमें ऐसी कोई पापकी कल्पना ही न आने पावे। यह विश्वास रखना चाहिये कि जिनसे छोटी उम्रमें अज्ञानवश कुसंगतिमें पड़नेसे अपराध हो जाते हैं, उनका भविष्य-जीवन यदि अच्छा संग मिले तो बहुत ही पवित्र हो सकता है। ऐसे बहुत-से उदाहरण हमारे सामने हैं। मानसिक चिन्ता त्यागकर सद्‍व्यवहार करने तथा बुरे संगको बचानेसे ऐसा अवश्य हो सकता है। मेरे इस कथनसे जरा भी पापका समर्थन कदापि न समझना चाहिये।

ऐसे अपराधोंमें आजकल एक कारण और हो गया है, वह है स्त्रियोंका पुरुषोंके साथ बेरोक-टोक मिलना-जुलना। स्त्री-स्वातन्त्र्यके नामपर यह यदि बढ़ता रहा तो दशा और भी शोचनीय होगी।

यह सब होते हुए भी जो बहिन किसी भी कारणसे ऐसा पाप कर बैठती है, वह हिंदू-आदर्शकी दृष्टिसे तो बड़ा ही भयानक पाप करती है। किसी प्रकार कुसंगमें पड़कर किसीसे ऐसा पाप बन जाय तो उसे अपने मनमें बड़ा ही पश्चात्ताप करना चाहिये और कम-से-कम एक लाख भगवन्नाम-जप और तीन उपवास करना चाहिये। साथ ही भगवान‍्को साक्षी देकर दृढ़ प्रतिज्ञा करनी चाहिये कि किसी भी स्थितिमें अब मैं किसी भी कारणवश ऐसा पाप नहीं करूँगी और भगवान‍्से करुणभावसे प्रार्थना करनी चाहिये कि वे दया करके क्षमा करें। हिंदू स्त्री हँसते-हँसते अपने प्राण त्याग देती है, परंतु ऐसे किसी बुरे विचारको भी सहन नहीं कर सकती। रानी शरत् सुन्दरी छोटी उम्रमें ही विधवा हो गयी थी। अंग्रेज कलक्टरकी स्त्री उनसे मिलने आयी और अपने देशकी प्रथाके अनुसार उनसे पुनर्विवाह करनेको कह दिया। उसके ऐसा कहनेमें कुछ भी बुरा भाव नहीं था, परंतु सती शरत् सुन्दरीको बड़ा ही दु:ख हुआ। उनको ऐसी पापकी बात अपने कानों सुननी पड़ी, इसीका बड़ा संताप हुआ और उन्होंने इसके प्रायश्चित्तके लिये अन्न-जलका त्याग कर दिया। कलक्टर-पत्नीको पता लगा तब उसने आकर उनको समझाया और क्षमा माँगी। हिंदू-स्त्रीके लिये सबसे बड़ी मूल्यवान् उसका सम्पत्ति सतीत्व है और इसीके संरक्षणमें उसका लोक-परलोकमें महान् कल्याण निश्चित है। इस विषयपर गोस्वामी तुलसीदासजी महाराजके श्रीरामचरितमानसमें अनसूयाजीने जगज्जननी सीताजीसे जो कुछ कहा है, उसे पढ़ना चाहिये—

एकइ धर्म एक ब्रत नेमा।

कायँ बचन मन पति पद प्रेमा॥

जग पतिब्रता चारि बिधि अहहीं।

बेद पुरान संत सब कहहीं॥

उत्तम के अस बस मन माहीं।

सपनेहुँ आन पुरुष जग नाहीं॥

मध्यम परपति देखइ कैसें।

भ्राता पिता पुत्र निज जैसें॥

धर्म बिचारि समुझि कुल रहई।

सो निकिष्ट त्रिय श्रुति अस कहई॥

बिनु अवसर भय तें रह जोई।

जानेहु अधम नारि जग सोई॥

पति बंचक परपति रति करई।

रौरव नरक कल्प सत परई॥

छन सुख लागि जनम सत कोटी।

दुख न समुझ तेहि सम को खोटी॥

बिनु श्रम नारि परम गति लहई।

पतिब्रत धर्म छाड़ि छल गहई॥

पति प्रतिकूल जनम जहँ जाई।

बिधवा होइ पाइ तरुनाई॥

सो०—सहज अपावनि नारि पति सेवत सुभ गति लहइ।

जसु गावत श्रुति चारि अजहुँ तुलसिका हरिहि प्रिय॥

अर्थात् शरीर, वचन और मनसे पतिके चरणोंमें प्रेम करना, स्त्रीके लिये बस, यह एक ही धर्म है, एक ही व्रत है और एक ही नियम है। जगत‍्में चार प्रकारकी पतिव्रताएँ हैं। वेद, पुराण और संत सब ऐसा कहते हैं कि उत्तम श्रेणीकी पतिव्रताके मनमें ऐसा भाव बसा रहता है कि जगत‍्में [मेरे पतिको छोड़कर] दूसरा पुरुष स्वप्नमें भी नहीं है। मध्यम श्रेणीकी पतिव्रता पराये पतिको कैसे देखती है, जैसे वह अपना सगा भाई, पिता या पुत्र हो। (अर्थात् समान अवस्थावालेको वह भाईके रूपमें देखती है, बड़ेको पिताके रूपमें और छोटेको पुत्रके रूपमें देखती है।) जो धर्मको विचारकर और अपने कुलकी मर्यादा समझकर बची रहती है वह निकृष्ट (निम्न श्रेणीकी) स्त्री है, ऐसा वेद कहते हैं। और जो मौका न मिलनेसे या भयवश पतिव्रता बनी रहती है, जगत‍्में उसे अधम स्त्री जानना।

पतिको धोखा देनेवाली जो स्त्री पराये पतिसे रति करती है, वह तो सौ कल्पोंतक रौरव नरकमें पड़ी रहती है। क्षणभरके सुखके लिये जो सौ करोड़ (असंख्य) जन्मोंके दु:खको नहीं समझती, उसके समान दुष्टा कौन होगी। जो स्त्री छल छोड़कर पातिव्रत-धर्मको ग्रहण करती है, वह बिना ही परिश्रम परम गतिको प्राप्त करती है। किंतु जो पतिके प्रतिकूल चलती है वह जहाँ भी जाकर जन्म लेती है, वहीं जवानी पाकर (भरी जवानीमें) विधवा हो जाती है। स्त्री जन्मसे ही अपवित्र है, किंतु पतिकी सेवा करके वह अनायास ही शुभ गति प्राप्त कर लेती है। [पातिव्रत-धर्मके कारण ही] आज भी ‘तुलसीजी’ भगवान‍्को प्रिय हैं और चारों वेद उनका यश गाते हैं।