स्वाधीनता या स्वराज्य
स्वाधीनता आत्माका स्वभाव है, इसलिये सभी जीव परतन्त्रतासे घबराते हैं और स्वतन्त्रता चाहते हैं। परतन्त्रताको दु:ख और स्वतन्त्रताको ही सुख बतलाया गया है—
सर्वं परवशं दु:खं सर्वमात्मवशं सुखम्।
परंतु विचार इस बातका करना है कि वास्तविक पराधीनताका स्वरूप क्या है? शास्त्रके नियमोंकी, धर्मकी, राजाकी, माता-पिताकी, गुरुकी, स्वामीकी और सत्यादि सद्गुणोंकी परतन्त्रता यानी इनके वशमें रहकर इनके आज्ञानुसार जीवनयापन करना पराधीनता है या इनसे सर्वथा स्वतन्त्र होकर मन-इन्द्रियोंकी अधीनतामें यथेच्छ आचरण करना पराधीनता है। असलमें ‘पर’ क्या है, इसपर विचार करना है। अवश्य ही अत्याचारपरायण स्वेच्छाचारी राजा ‘पर’ है, संतान और शिष्यका अहित चाहनेवाले माता-पिता और गुरु भी ‘पर’ हैं, स्वार्थी स्वामी भी ‘पर’ है और अन्यायाचरणमें प्रवृत्त करानेवाला धर्म-नामधारी मत-विशेष भी ‘पर’ है। इनका विरोध करना और इनकी वशतासे मुक्त होना आवश्यक भी है और ऐसा होता भी आया है। ‘वेन’ और ‘कंस’ सरीखे राजाओंका विरोध और उनका विनाश धर्मसंगत माना गया। हिरण्यकशिपु-से पिता और कैकेयी-सी माता तथा शुक्राचार्य-से गुरुकी बात भी नहीं मानी गयी। अधर्मपरायण भगवद्विमुख स्वामियोंका भी त्याग किया गया और अधर्ममूलक मतोंका भी बहिष्कार करना पड़ा, तथा ऐसा करना उचित भी था। इसीसे तुलसीदासजीने गाया—
जाके प्रिय न राम-बैदेही।
तजिये ताहि कोटि बैरी सम,
जद्यपि परम सनेही॥
तज्यो पिता प्रह्लाद, बिभीषन
बंधु, भरत महतारी।
बलि गुरु तज्यो कंत ब्रज-बनितन्हि,
भये मुद-मंगलकारी॥
नाते नेह रामके मनियत
सुहृद सुसेव्य जहाँ लौं।
अंजन कहा आँखि जेहि फूटै,
बहुतक कहौं कहाँ लौं॥
तुलसी सो सब भाँति परम हित,
पूज्य, प्रानते प्यारो।
जासों होय सनेह राम-पद,
एतो मतो हमारो॥
यह सब सत्य होनेपर भी असलमें ये ही ‘पर’ नहीं हैं। ‘पर’ तो हैं हमारे अन्त:करणकी मलिन वासनाएँ, भोगकामनाएँ और विविध प्रकारके काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद, मत्सर, वैर, हिंसा, दम्भ, द्रोह, अभिमान स्वार्थ, अधिकारलोलुपता, आसक्ति और ममता आदि मानसिक दोष। इन दोषोंकी उत्पत्ति अज्ञानसे है और अज्ञानका कारण है ‘प्रकृति-परवशता।’
श्रीभगवान्ने गीतामें कहा है—
पुरुष: प्रकृतिस्थो हि भुङ्क्ते प्रकृतिजान् गुणान्।
कारणं गुणसंगोऽस्य सदसद्योनिजन्मसु॥
(१३।२१)
‘प्रकृतिमें स्थित पुरुष ही प्रकृतिसे उत्पन्न तीनों गुणोंको भोगता है और इन गुणोंका संग ही इस जीवके अच्छी-बुरी योनियोंमें जन्म होनेका कारण है।’
यह ऐसी परवशता है, जिसके कारण बिना इच्छा भी भाँति-भाँतिकी योनियोंमें भटकना और प्रारब्धानुसार सुख-दु:खोंका भोग बाध्य होकर करना पड़ता है। मनुष्य जबतक इस प्रकृतिके दासत्वसे नहीं छूट जाता, तबतक उसकी आत्माको स्वराज्य नहीं मिल सकता, वह सच्ची स्वाधीनता नहीं प्राप्त कर सकता। हमारा मन, शरीर और इन्द्रियाँ—ये सभी, यदि हमारे वशमें नहीं हैं तो हमारे ‘स्व’ के प्रतिद्वन्द्वी हैं—विरोधी हैं। आजकल जो यह कहा जाता है कि ‘हम किसीके भी अधीन नहीं रहेंगे, किसी भी नियमके बन्धनमें नहीं रहेंगे; केवल अपनी अबाध असंयत प्रवृत्तियोंके अधीन रहेंगे, अपने मन-इन्द्रियोंकी इच्छाका अनुसरण करेंगे।’ यही पराधीनता है और ऐसा माननेवाले ही वस्तुत: पूरे पराधीन हैं। मनुष्य सामाजिक प्राणी है और समाजबद्ध होकर रहनेमें सभीको कुछ-न-कुछ परतन्त्रता स्वीकार करनी पड़ती है। परंतु मनुष्यके यथेच्छाचारी हो जानेपर समाजकी यह शृंखला टूट जाती है और फलत: दु:ख-ही-दु:ख आ जाते हैं। स्वाधीनताके इस विकृत स्वरूप यथेच्छाचारका ही यह फल है कि आज कहीं भी व्यवस्था या अनुशासनका सम्मान नहीं है। पिता-पुत्रमें, माँ-बेटीमें, गुरु-शिष्यमें, राजा-प्रजामें, मालिक-नौकरमें, पति-पत्नीमें, सास-पतोहूमें और भाई-भाईमें अनवरत मनोमालिन्य और असद्भाव पैदा हो गया है। इसीसे आज राष्ट्रगत, समाजगत, परिवारगत और व्यक्तिगत सब प्रकारकी सुख-शान्ति नष्ट होती जा रही है।
भगवान्ने गीतामें कहा है—
य: शास्त्रविधिमुत्सृज्य वर्तते कामकारत:।
न स सिद्धिमवाप्नोति न सुखं न परां गतिम्॥
(१६।२३)
‘जो मनुष्य शास्त्रकी विधिको छोड़कर मनमाना आचरण करता है, वह न तो सिद्धिको प्राप्त होता है, न सुखको ही और न (मरनेके बाद) परम गतिको ही।’
शास्त्रके किसी भी नियन्त्रणको न माननेवाले मनुष्यकी मन-इन्द्रियाँ सर्वथा अनियन्त्रित और निरंकुश हो जाती हैं। उसका चित्त असंयत कामना-वासनाकी क्रीड़ास्थली बन जाता है और उनके वशमें होकर वह नाना प्रकारसे लोभ-मोह, वैर-विरोध, दम्भ-दर्प और द्वेष-हिंसाकी क्रियाएँ करता है। इससे उसको जीवनमें कभी भी निर्बाध और सत्य सिद्धि नहीं मिलती। वह प्राणपणसे चेष्टा करके जिस सिद्धिको प्राप्त करता है, वही असिद्धिके रूपमें परिणत हो जाती है; क्योंकि उसकी प्रत्येक क्रिया ही होती है कामना-लोभ और क्रोध-वैरको लेकर। ऐसे ‘काम-क्रोधपरायण’ पुरुषके बाहरी शत्रुओंका कभी अभाव नहीं होता। वह किसी भी स्थितिको क्यों न प्राप्त कर ले, वहीं उसके प्रतिद्वन्द्वी, उसके वैरी, उसके मार्गमें विघ्न पैदा करनेवाले तैयार रहते हैं और साथ ही उसकी दुर्दमनीय लोभ-वृत्ति उसे किसी भी स्थितिमें संतुष्ट नहीं होने देती। फलत: वह निरन्तर मानसिक शत्रुओंके परवश होकर ऐसी क्रियाएँ करता रहता है, जिससे बाहरके शत्रु सदा ही बढ़ते रहते हैं। इससे उसको जीवनमें कभी सुख नहीं होता और जीवनभर उद्दाम कामनाके वशमें होकर न्यायान्याय—धर्माधर्म-विचारसे रहित यथेच्छाचरण करनेवालेको परम गति तो मिल ही कैसे सकती है? इसीसे भगवान् कहते हैं—
अहंकारं बलं दर्पं कामं क्रोधं च संश्रिता:।
मामात्मपरदेहेषु प्रद्विषन्तोऽभ्यसूयका:॥
तानहं द्विषत: क्रूरान्संसारेषु नराधमान्।
क्षिपाम्यजस्रमशुभानासुरीष्वेव योनिषु॥
आसुरीं योनिमापन्ना मूढा जन्मनि जन्मनि।
मामप्राप्यैव कौन्तेय ततो यान्त्यधमां गतिम्॥
(गीता १६।१८—२०)
‘अहंकार, बल, घमंड, कामना और क्रोध आदिका आश्रय लिये हुए, दूसरोंके गुणोंमें दोषारोपण करनेवाले और अपने तथा दूसरोंके शरीरोंमें स्थित मुझ (भगवान्)-से द्वेष करनेवाले ऐसे उन द्वेषयुक्त पापकर्मा, निर्दयी नराधमोंको मैं बार-बार आसुरी योनियोंमें गिराता हूँ। अर्जुन! वे मूढ़ मनुष्य जन्म-जन्ममें बार-बार आसुरी योनिको प्राप्त होते हैं। मुझको न पाकर उस (आसुरी योनि)-से भी और अति नीच गति (घोर नरकादि)- को प्राप्त होते हैं।’
आज शान्तिप्रिय सुकोमल-मति भारतीय तरुण-वर्गके मनमें स्वाधीनताके जिस उद्दाम-भावका उदय हुआ है, उसका भारतवासियोंको गर्व होना चाहिये। देशके युवकोंमें ऐसी लहरका बह जाना बड़े-से-बड़े त्याग-तपकी और उसके फलस्वरूप महान् सुफलकी पूर्व सूचना मानी जा सकती है, परंतु भयकी बात इतनी ही है कि दूसरोंकी देखा-देखी स्वाधीनताका अर्थ यदि अनुशासनशून्यता, उच्छृंखलता, स्वार्थपूर्ण अधिकारप्रियता, मनमाना आचरण या मन-इन्द्रियोंकी दासता हो गया तो उसका फल कभी शुभ नहीं होगा!
सच्ची स्वाधीनता प्राप्त करनेका और उसके फलस्वरूप सब दु:खोंके नाश करनेवाले प्रसादको प्राप्त करनेका उपाय भगवान्ने गीतामें बतलाया है—
रागद्वेषवियुक्तैस्तु विषयानिन्द्रियैश्चरन्।
आत्मवश्यैर्विधेयात्मा प्रसादमधिगच्छति॥
प्रसादे सर्वदु:खानां हानिरस्योपजायते।
(२।६४-६५)
‘अन्त:करणको जिसने अपने वशमें कर लिया है, ऐसा पुरुष राग-द्वेषसे रहित अपने वशमें की हुई इन्द्रियोंके द्वारा जब विषयोंका सेवन करता है, तब वह प्रसादको प्राप्त होता है और उस प्रसादके प्राप्त होनेपर उसके समस्त दु:खोंका नाश हो जाता है।’
यही सच्ची स्वाधीनता है। सच्ची बात तो यह है कि हमलोग किसी दूसरेके दास नहीं हैं। शरीर परतन्त्र रहनेपर भी यदि हमारा मन और हमारी इन्द्रियाँ तथा मानसिक वासनाएँ हमारे अधीन हैं तो हम स्वाधीन ही हैं। ऐसी स्थितिमें शारीरिक पराधीनताका नाश करना बहुत सहज है। परंतु मन-इन्द्रियोंकी और कामना-वासनाओंकी गुलामी तो ऐसी चीज है कि इनके रहते शारीरिक और वैधानिक स्वतन्त्रता प्राप्त कर लेनेपर भी मनुष्य कभी स्वतन्त्र नहीं हो सकता और कभी सच्चे स्वराज्य-सुखका उपभोग नहीं कर सकता। अतएव आत्माकी अपार शक्ति और नित्य विशुद्धिको समझकर बुद्धिके द्वारा मनको वशमें करके मन-इन्द्रियोंमें रहनेवाले इस दुर्जय कामरूप शत्रुको मारना चाहिये।
एवं बुद्धे: परं बुद्ध्वा संस्तभ्यात्मानमात्मना।
जहि शत्रुं महाबाहो कामरूपं दुरासदम्॥
(गीता ३।४३)
ऐसा करनेसे ही असली स्वाधीनता प्राप्त होगी। भारतवर्ष इस समय वैधानिक या शारीरिक स्वतन्त्रता—स्वराज्यकी गौरवमयी प्राप्ति कर चुका है। यह बड़े आनन्दकी बात है। परंतु यहाँ बहुत बड़ी सावधानीकी आवश्यकता है। हमारी यह स्वाधीनता केवल शरीरतक ही सीमित न रहे। भगवान्को आश्रय बनाकर हम यदि इस स्वाधीनताको—इस स्वराज्यको आत्माका स्वराज्य बना सकें, मन-इन्द्रियोंकी उद्दाम असंयम प्रवृत्तियोंपर विजय प्राप्त करके उनके दासत्वसे छूट सकें, तभी हमारा वह स्वराज्य परम आदर्श होगा और लोक-परलोक दोनोंमें कल्याणकारक होगा। भारतीय स्वराज्य या रामराज्यका यही स्वरूप है।