विनाशके पथपर

एक सज्जन बड़ी ही करुणापूर्ण भाषामें पढ़े-लिखे युवक-युवतियोंमें फैलते हुए व्यभिचारकी चर्चा करते हुए इस पापसे समाजके बचनेका उपाय पूछते हैं। आप लिखते हैं ‘हमारा पतन हो गया। हमारे राम-लक्ष्मण और भीष्मार्जुनका आदर्श आज नष्ट हो गया। सीता-सावित्रीका नाम लेते जी काँपता है; हमारी जबान उनका नाम लेने लायक नहीं रही।....... दूसरे प्रान्तोंका तो मुझे पता नहीं; परंतु हमारे यहाँ जो कुछ हो रहा है, उसे देख-सुनकर दिलके टूक-टूक हुए जा रहे हैं। मेरी आँखोंसे आँसू कभी सूखते नहीं।....... धर्मका खयाल जाता रहा, विवाहका बखेड़ा क्यों किया जाय यह भाव बढ़ रहा है, जवान लड़कियोंमें भी यह भाव फैल रहा है। कॉलेज युवक-युवतियोंके परस्परके आकर्षणके केन्द्र हैं और सिनेमा या सिनेमाका बहाना मिलनका। उच्छृंखलता बढ़ रही है। अनेकों क्वाँरी लड़कियाँ गर्भवती हो रही हैं, भ्रूण-हत्याएँ भी होती हैं। आजकल संतति-निरोधके कृत्रिम उपायोंके सहज हो जानेसे तो अनर्थ और भी बढ़ गया है। अब तो कोई डर ही नहीं रहा। चारों ओर स्वतन्त्रताके नामपर मर्यादाके नाशका नंगा नाच हो रहा है। अदूरदर्शी जवान लड़के और लड़कियाँ मनमानी कर रहे हैं, भागने-भगानेकी वारदातें भी बढ़ रही हैं। क्या-क्या लिखूँ, एक-एक घटनाके लिये हृदयमें आग सुलग रही है।....... ऐसा कोई उपाय बतलाइये, जिससे यह पापका प्रवाह रुके। समाजमें यह पाप घर कर गया है, ऊपरसे नहीं मालूम होता; परंतु अंदरकी हालत बहुत ही बुरी है।.......’।

पता नहीं पत्रलेखक महोदयका कथन कहाँतक सत्य है; परंतु इतना अवश्य कहा जा सकता है कि इसमें आंशिक सत्यता तो अवश्य ही है। कुछ अतिशयोक्ति भले ही हो। ये भाई बहुत ही दु:खी मालूम होते हैं, सम्भव है किसी घटनाका इनपर असर पड़ा हो। मैं इस बारेमें कुछ लिखना नहीं चाहता था, परंतु इन्होंने बहुत ही आग्रहपूर्वक आज्ञा दी है, इसलिये लिखना पड़ता है। वास्तवमें आज हमारे नौजवानोंकी दशा बहुत ही शोचनीय हो रही है। विचार करनेपर इस बुराईमें मुख्यतया निम्नलिखित कारण जान पड़ते हैं—

१-स्कूल-कॉलेजोंकी धर्महीन पढ़ाई।

२-यूरोपीय सभ्यता-संस्कृतिका प्रभाव।

३-स्कूल-कॉलेजोंमें लड़के-लड़कियोंका एक साथ पढ़ाया जाना।

४-युवती-विवाह।

५-सिनेमाओंका बढ़ता हुआ प्रचार।

६-विलासिता, फैशन, आरामतलबी और आलस्य।

७-शारीरिक सौन्दर्यका महत्त्व और रूपप्रतियोगिताका प्रचार।

८-सभी बातोंमें स्त्रियोंकी स्वतन्त्रता और समानताका दावा।

९-संतान-निरोधके कृत्रिम उपायोंका प्रचार।

१०-सुधारोन्मत्तता।

अब इनपर संक्षेपमें कुछ विचार करें।

भारतवर्षका प्राण धर्म है, धर्मज्ञान ही शिक्षाका मुख्य विषय है, धर्मज्ञानहीन मनुष्य आर्यसभ्यतामें पशु माना जाता है। परंतु आजकी शिक्षामें धर्मका कहीं नामनिशान भी नहीं है। केवल अर्थकरी विद्या वास्तविक विद्या नहीं है। फिर आज तो यह विद्या अर्थकरी भी नहीं रह गयी। विश्वविद्यालयोंसे प्रत्येक वर्ष लाखों विद्यार्थी डिग्रियाँ पाकर निकलते हैं और फिर उन्हें कहीं नौकरी भी नहीं मिलती। वर्तमान शिक्षाक्रम तो इस दृष्टिसे भी लाभदायक सिद्ध नहीं हो रहा है। धर्मको तो इस शिक्षाक्रमने उड़ा ही दिया है। इस शिक्षाका ही यह परिणाम है कि आज धर्मके नामसे भी पढ़े-लिखे होनेका अभिमान करनेवाले लोग-नाक-भौं सिकोड़ते हैं। जहाँ धर्मभाव लुप्त होगा, वहाँ संयम नहीं रहेगा और संयमके नाशसे व्यभिचार फैलेगा ही!

वर्तमान शिक्षाका एक बहुत बुरा परिणाम यह हुआ है कि भारतवासियोंकी अपने पूर्वपुरुष, अपने साहित्य, अपनी सभ्यता और संस्कृति एवं अपनी सारी त्यागमयी जीवन प्रणालीके प्रति अश्रद्धा हो गयी है। देशकी गुलामी इस मनकी गुलामीसे कहीं कम खतरनाक होती है। शारीरिक परतन्त्रता प्रयाससे सहज छूट सकती है, परंतु इस मानसिक परतन्त्रताका छूटना शारीरिक स्वतन्त्रताकी हालतमें भी बहुत कठिन है। भारतवासियोंने अपना मन पाश्चात्त्य संस्कृतिके हाथों बेच दिया। इसीसे आज बात-बातमें हमें उनकी सभ्यता अच्छी लगती है। उनके साहित्यपर हमारी श्रद्धा बढ़ रही है; उनके महात्माओंको ही हम वास्तविक महात्मा मानते हैं, हमारे धर्मग्रन्थोंकी बात भी यदि उनकी वाणीसे या कलमसे परिष्कृत होकर (बिगड़कर) हमें मिलती है तो हम उसे मान लेते हैं। अपना मस्तिष्क तो हमने उनकी गुलामीके लिये सौंप दिया। परिणाम यह हुआ रीति-नीति, वेश-भूषा, बोल-चाल, विवाह-शादी, व्यवहार-बर्ताव सभी बातोंमें आज हम उनकी नकल करनेमें ही अपनेको धन्य समझते हैं। पुरानी चालके मनुष्योंको तो अन्धविश्वासी बतलाया जाता है; परंतु आजकल पाश्चात्त्योंकी यह अन्ध-नकल इतनी बढ़ गयी है कि जिसकी कोई सीमा ही नहीं रही। महात्मा गाँधीजीके प्रभावसे वेश-भूषामें कुछ सादगी या भारतीयता आयी थी, परंतु मन तो अभी उसी ओर खिंचे चले जा रहे हैं। इस संस्कृतिका प्रभाव हमारे नौजवानोंपर सबसे अधिक पड़ा। कारण स्पष्ट है; होश सँभलते ही स्कूलोंमें गये और वहाँके नौजवान गुरु—मास्टरोंसे—जिनमेंसे अधिकांश अपना मन और मस्तिष्क बहुत अंशमें पाश्चात्त्य संस्कृतिको अर्पण कर चुके हैं—वैसी ही शिक्षा मिली। फिर कॉलेजमें भरती हुए; धर्मग्रन्थोंका कहीं अक्षर भी पढ़नेको नहीं मिला। यदि कहीं मिला तो वह पाश्चात्त्य और पाश्चात्त्य सभ्यताके भक्त, विद्वानोंके द्वारा विकृत किया हुआ। धर्मज्ञान प्राप्त ही नहीं हुआ। परिणाम यह हुआ कि इन्हें पुराना सोना भी लोहा दीखने लगा। पुराने गुलाबमें भी नाबदानकी बदबू आने लगी, क्योंकि दृष्टि और नाक ही बदल गयी। इसीका परिणाम आज हमारी लड़कियोंपर भी पड़ रहा है और पढ़-लिखकर वे भी उसी साँचेंमें ढल रही हैं। इस सभ्यताके प्रभावके कारण धर्म, लज्जा, शील-मर्यादा, भोगोंसे वैराग्य, परमार्थसाधन आदि बातें मनोंमेंसे निकल गयीं; व्यभिचारवृद्धिमें यह भी एक प्रधान कारण है!

बालविवाहसे समाजकी हानि हुई और होती है, परंतु उस बालविवाहका परिवर्तन जिस ‘युवतीविवाह’ और ‘विवाहकी अनावश्यकता’ के रूपमें हो रहा है, यह तो और भी भयंकर है। बालविवाहमें बुराई थी और है, बालविवाहकी प्रथाका बहुत दुरुपयोग हुआ और अब भी हो रहा है, इसलिये उसका निषेध आवश्यक था और अब भी है। परंतु उसमें एक बड़ा भारी लाभ अन्तर्हित था जो अब नष्ट हो रहा है। हिंदूधर्मके अनुसार विवाह एक धार्मिक संस्कार है। दो आत्माओंका परस्पर सात्त्विक मिलन है। उसमें कामवासनाको स्थान नहीं है। वहाँ धर्म है, रूपपर मोह नहीं है। इसी उद्देश्यसे लड़के और लड़कियोंके माता-पिता और अभिभावक अपने कुल, धर्म और आचारके अनुकूल घर ढूँढ़कर सम्बन्ध करते थे। उसमें लड़के और लड़कियोंकी उम्र, स्वभाव आदि तो अवश्य ही देखे जाते थे। यहाँतक कि बालकोंके माता-पितातकके स्वभावका पता लगाया जाता था और परीक्षा की जाती थी। दोनोंका जीवन सुखमय रहे, इस बातके लिये पूरा ध्यान रखा जाता था। अवश्य ही दहेजकी प्रथाका विकृत रूप हो जानेसे तथा अन्य कई कारणोंसे माता-पिताद्वारा वर-कन्याके चुनावमें दोष आ गये तथापि वह लाभ तो बहुत अंशमें था ही। जिस दिन सगाई हुई और लड़के-लड़कियोंको इस बातका जब पता लगा तभीसे उनका परस्पर स्नेहसूत्र बँध जाता था। ममत्व बढ़ता जाता था। यह निश्चय उन दोनोंके मनमें हो ही जाता था, हम दोनों पति-पत्नी हो गये। अतएव प्रेम बढ़ता था और किसी कारणसे दूसरी किसी ओर देखनेकी गुंजाइश बहुत ही कम हो जाती थी। कोर्टशिपकी कल्पना भी उनके मन नहीं आने पाती थी। इस प्रकार माता-पिताद्वारा किये जानेवाले निश्चित सम्बन्धमें उच्छृंखलता और रूपपर मोहको स्थान नहीं था। भूल वहाँ भी होती थी, परंतु बच्चोंके भावी हितकी चिन्तामें लगे हुए माता-पिता आदि अभिभावकगण किसी आवेगके वशमें न होकर शान्तचित्तसे निर्णय करते थे। उन्हें अपने कर्तव्यका खयाल रहता था। उनके अंदर सब तरहसे ‘बराबरकी जोड़ी’ ढूँढ़नेकी एक सुन्दर पवित्र भावना काम करती थी। इससे उनके निर्णयमें भूल कम होती थी। परंतु जवान उम्रमें पहुँचे हुए युवक-युवती भाँति-भाँतिके आवेगोंके वशमें होकर आवेशवश जो परस्पर चुनाव करते हैं, उसमें बड़ी भारी भूल हो जानेकी सम्भावना है। भूलें भी होती हैं, जिनके परिणाममें या तो उनका जीवन मृत्युकालपर्यन्त दु:खी रहता है अथवा उन्हें तलाकका मार्ग ढूँढ़ना पड़ता है। मेरी समझमें ‘कोर्टशिप’ जाती पसंदगी’ की प्रथाने ही तलाकके कानूनकी सृष्टि की है। यहाँ भी यही दशा रही तो तलाकका पाप-ताण्डव होगा ही। अस्तु, लड़कोंका बड़ी उम्रमें विवाह करनेकी चर्चाने ज्यों जोर पकड़ा, त्यों ही लड़कियोंके लिये भी ऐसा ही विचार आने लगा। लड़कियाँ भी युवती होनेतक कुमारी रहने लगीं। इसीका परिणाम यह हुआ जिससे हमारे पत्रलेखक भाई आज दु:खके आँसू बहा रहे हैं।

उच्च शिक्षा-प्रचारके लिये तो पुकार मची ही हुई थी। लड़कोंके साथ ही उदार महानुभावोंकी शुद्ध भावनाके दानसे और प्रचारकोंकी सदिच्छासे लड़कियोंको उच्च शिक्षा दिलानेकी व्यवस्था हुई। उच्च शिक्षासे तात्पर्य बी० ए०, एम० ए० की डिग्रियोंसे ही है। इसके लिये लड़कियाँ भी कॉलेज जाने लगीं। धर्महीन पढ़ाई, धर्ममें अश्रद्धा, युवावस्था और संयमकी शिक्षाका अभाव तो था ही, फिर जवान लड़के-लड़कियोंका एक साथ पढ़ना, काठ और आगके संयोगकी भाँति बुराई पैदा करनेमें बहुत ही सहायक हुआ। इसीके साथ एक बीमारी लड़कियोंमें फैशनकी बढ़ी; विलासिताने जोर पकड़ा। आरामतलबी तो इस शिक्षाका प्रत्यक्ष प्रमाण है। किसान या दूकानदारका लड़का अंग्रेजी पढ़कर खेती या दूकानदारी नहीं कर सकता। कई प्रकारके जूते, क्रीम, लोशन, स्नो, साबुन, पाउडर, चश्मा, फोटोग्राफी सामान आदि कई ऐसी चीजोंकी उसे आदत हो जाती है, जो उसके जीवनको आलसी, खर्चीला और आरामतलब बना देती हैं। यह रोग हमारी लड़कियोंमें तो और भी जोरसे बढ़ रहा है। पढ़ी-लिखी लड़कियाँ घरका काम न सीखती हैं, न करना चाहती हैं। उनसे उनको घृणा है। फैशन बनाना, सजना, अखबार पढ़ना, उपन्यास और काव्य पढ़ना, फोटो उतारना, लेख लिखना, सभाओं और जलसोंमें जाना आदि इतने काम उनके बढ़ गये हैं। अब घरके कामोंके लिये उन्हें फुरसत भी नहीं मिलती। सुना जाता है करोड़ों रुपये वार्षिक इस सौन्दर्यके सामानके लिये विदेश जाते हैं। फैशन और आरामतलबीसे कामुकता बढ़ती है, यह सर्वसम्मत सिद्धान्त है।

इसके बाद सिनेमाने तो बड़ा ही अनर्थ किया। समाजमें दुराचार फैलानेका काम सिनेमाओंके द्वारा बड़े जोरोंसे हो रहा है। जबतक बोलनेवाले चित्रपट नहीं थे, तबतक कुछ खैर थी। परंतु सवाक् चित्रपटोंका प्रचार जबसे हुआ तबसे तो दिनोदिन खराबी बढ़ती ही जा रही है। यह सत्य है कि चित्रपट एक कला है और कलाका विस्तार देशकी उन्नतिका सूचक है। परंतु विचार यह करना है कि जिस कलाके विस्तारसे देशके हृदयमें क्षय रोगका उदय होता हो, जो कला देशके युवक-युवतियोंको शारीरिक और मानसिक संक्रामक व्याधियोंसे ग्रस्त कर परिणाममें कराल कालके ग्रास बनानेमें और उनके आदर्श पवित्र चरित्रको नाश करनेमें सहायता करती हो, वह कला तो वस्तुत: काल ही है, फिर यह भी प्रश्न है कि कलाकी दृष्टिसे कहाँ कितना प्रचार हो रहा है? सिनेमा-कम्पनियोंके मालिकोंमें कितने ऐसे हैं जो कलाके लिये इस व्यवसायको करते हैं। मेरी समझमें शायद ही कुछके हृदयोंमें कलाकी उन्नतिका ध्यान होगा। अधिकांशका ध्यान तो धनकी ओर है। धन आता है उन्हीं चित्रपटोंसे, जिनको ज्यादा लोग देखना चाहें; और ज्यादा लोग उन्हीं चित्रपटोंको देखना चाहते हैं (कुछ तो ऐसी प्रवृत्ति स्वाभाविक है ही और कुछ सिनेमाओंद्वारा बढ़ रही है) जिनमें सुन्दरी युवती स्त्रियोंके अर्धनग्न अंगोंके प्रदर्शनयुक्त पार्ट और शृंगारके गायन हों। इसीलिये फिल्म-कम्पनियाँ बड़े-बड़े वेतनोंपर नयी-नयी सुन्दरी युवतियोंको ढूढ़-ढूँढ़कर लाती हैं। इनमें अधिकांश लज्जाशीलताको तिलांजलि दी हुई ही होती हैं। धार्मिक भावोंवाली युवती कुलकन्याएँ तो लाज-शर्मको तिलांजलि देकर परपुरुषोंके साथ मिलकर उनके अंगोंका स्पर्शतक होने देकर खुले अंगोंसे नाट्य दिखानेको क्यों आने लगीं? [दु:ख है कि कुछ समयसे भले घरोंकी लड़कियोंमें भी फिल्म-कम्पनियोंमें नाचनेकी प्रवृत्ति बढ़ रही है, यह और भी पतनका चिह्न है।] सनातनधर्मियोंको तो रोना चाहिये कि उनके आलस्य, अविवेक एवं धर्महीनताके कारण व्यर्थ ही कुमारी या मिस कहलानेवाली उच्छृंखल तरुणियोंके द्वारा प्रात:स्मरणीया जगज्जननी सीता, जो पर-पुरुषका अंग-स्पर्श होनेके डरसे श्रीहनुमान‍्जीके साथ लंकासे लौटनेको तैयार नहीं हुई थीं और भगवती योगमाया राधा, सती सावित्री, पार्वती, दमयन्ती और द्रौपदी आदिके निर्लज्ज पार्ट होते हैं!! निर्लज्ज इसीलिये कि उन्हें तो फिल्म-कम्पनियोंके मालिकोंकी नमकहलाली करनेके लिये अभिनयमें अपने अंग दिखलाकर और हाव-भाव बताकर दर्शकोंके चित्तको खींचना है और इसमें उन्हें कोई लज्जा है नहीं। बहुत बुरी बात तो यह है कि इससे दर्शकोंका चित्त केवल चित्रपट देखनेके लिये ही नहीं खिंचता, उन युवतियोंकी ओर भी बुरी वासना उनके मनमें उत्पन्न होती है। जिसका परिणाम पतनके सिवा और कुछ नहीं है। इसी प्रकार दर्शिकाओंके मनोंमें भी बुरी भावनाएँ आती हैं। लज्जा छूटती है और अमर्यादा तथा उच्छृंखलताकी भावनाएँ बढ़ती हैं। इसीका परिणाम व्यभिचार है और इसीसे भले घरोंकी लड़कियाँ भी आज धनके लोभसे या मानसिक विकारोंकी प्रेरणासे कुल-मर्यादाको मिटाकर कलाके नामपर और क्रान्तिका बहाना बताकर फिल्म-कम्पनियोंमें भर्ती होनेके लिये ललचा रही हैं। भगवान् ही जानें; इसका कितना बुरा फल होगा! [चित्रपटोंकी अधिकतासे गरीब देशकी जो आर्थिक हानि हो रही है वह भी बड़ी ही भीषण है।]

इसीके साथ पाश्चात्त्य जगत‍्की नकल करते हुए आजकल हमलोग भी शारीरिक सौन्दर्यको आवश्यकतासे अधिक महत्त्व देने लगे हैं। यूरोपमें रूपकी हाट लगती है। वहाँ सुन्दरी स्त्रियोंके सौन्दर्यकी प्रतियोगिता होती है। उसमें जो सबसे अधिक सुन्दरी साबित होती है उसको इनाम मिलता है और उसके सौन्दर्यकी ख्याति समाचारपत्रोंद्वारा देश-देशान्तरोंमें फैल जाती है। फल यह होता है कि उसका रूप बहुत-से लोगोंका मन बिगाड़नेमें कारण बनता है। कुछ लोगोंका कहना है कि इस रूप प्रतियोगिताके प्रचारका उद्देश्य स्त्रियोंके स्वास्थ्यको सुधारना है। चाहे यह उद्देश्य रहा हो परंतु आजकल जो कुछ हो रहा है वह तो बड़ा ही बीभत्स है। उससे तो समाजका मानसिक स्वास्थ्य नष्ट हो रहा है। इनाम और नामके लोभसे युवतियाँ अपने शील-संकोचको छोड़कर कामुक पुरुषोंके सामने अपने रूप-यौवनको बड़े ही निर्लज्ज भावसे कसौटीपर रखती हैं। वे ऐसा शृंगार और वेष-भूषा बनाती हैं कि जिससे उनके अंगोंका सौन्दर्य खुला दीख पड़े। स्त्रियोंके लिये शृंगार वर्जित नहीं है, परंतु वह है एक निर्दिष्ट सीमाके अंदर। स्त्री पतिकी प्रसन्नताके लिये ही, उसके प्रीति-उत्पादनके लिये ही शृंगार करती है और इस शृंगारमें भी सब अवस्थाओंमें अंग खुले नहीं रखे जाते। जो शृंगार राह चलते लोगोंको सौन्दर्य दिखानेके लिये होता है और जिसमें शरीरका अधिकांश अनावृत (खुला) रखना आवश्यक होता है, उसको पतनके सिवा और क्या कहा जाय? ऐसा तो रूपको बेचकर जीविका चलानेवाली वेश्याएँ भी नहीं करतीं। इस रूप-प्रतियोगितासे स्त्रियोंकी मर्यादा मिट्टीमें मिल रही है, वे अपने एक विशिष्ट स्थानसे नीचे—बहुत नीचे गिर रही हैं। यह पवित्र शीलवती नारी जातिका घोर पतन है। खेद है कि यह विष भारतवर्षमें भी फैल रहा है। यहाँ भी रूप-प्रतियोगिता आरम्भ हो गयी है। इस अवस्थामें भी व्यभिचार नहीं बढ़ेगा तो कब बढ़ेगा?

इसके सिवा स्वतन्त्रता और समान अधिकार तथा सुधारके नामपर आज जो अनर्गल अनाचार हो रहा है, उससे तो सुधारकी जगह संहार ही हो रहा है। आजकल जड़को काट डालना ही सुधार समझा जाता है। इस सुधारोन्मत्तताने भी दुराचारके पथपर समाजके युवक-युवतियोंको अग्रसर करनेमें बड़ी भारी सहायता पहुँचायी है।

सुधारमें भी संयमकी आवश्यकता है। असंयमपूर्ण सुधारसे जितना नाश होता है उतना सुधार न होनेसे नहीं होता। आज असंयमपूर्ण सुधारकी भयावनी धारा सब ओर बह रही है। इसमें किसी भी पुरानी मर्यादा, सद्भावना और सात्त्विकताको स्थान नहीं है। बस, विध्वंस—केवल विध्वंस!! इस विध्वंसकी चिनगारीका यह दुष्ट फल है कि हमारी सती, सदाचारिणी, शील-संकोचवती, पुण्यचरित्रा और धर्मभीरु, देवपूजिता कुल-कन्याएँ मोहवश आँखें मूँदकर नारकीय अग्निकुण्डमें कूदनेको तैयार हो रही हैं और हम उन्मत्त इसे मान रहे हैं—उन्नति!!!

मेरे विचारसे इस पापसे बचनेके उपाय ये हैं—यद्यपि कालकी प्रतिकूलतासे कठिनता बहुत है, परंतु सावधानीके साथ उत्साहपूर्वक अनवरत चेष्टा की जाय तो बहुत अंशमें यह बढ़ता हुआ पाप कम हो सकता है।

१-यथासाध्य शिक्षाक्रममें धार्मिक और सदाचार-सम्बन्धी पुस्तकें रखवाना।

२-प्राचीन कथाओं, उपदेशों और युक्तियोंद्वारा भारतीय सभ्यताके महत्त्वका प्रचार करना

३-स्कूल-कॉलेजोंमें लड़के-लड़कियोंको एक साथ नहीं पढ़ाना।

४-कन्याओंको अंग्रेजीकी उच्च शिक्षा दिलानेका मोह छोड़ देना।

५-ईश्वर और धर्ममें श्रद्धा बढ़े ऐसे साहित्य और विचारोंका प्रचार करना।

६-यथासाध्य सिनेमा आदि न देखना और उनकी बुराइयोंसे घरको तथा समाजको बचाये रखनेकी चेष्टा करना।

७-अपने जान-पहचानमें कोई लड़की चित्रपटमें नाट्य करना चाहे तो उसे समझा-बुझाकर उसकी बुराइयाँ समझाकर रोकना।

८-माता-पिता या अभिभावकोंको यह ध्यान रखना; जिसमें युवती होनेके पहले ही लड़कीका विवाह कर दिया जाय।

९-यथासाध्य लड़कोंको भी बहुत बड़ी उम्रतक क्वाँरे न रखना।

मैंने विश्वस्त सूत्रसे सुना था कि भारतवर्षके एक प्रसिद्ध बड़े नगरकी सरकारी यूनिवर्सिटीके छात्रोंमें ६० प्रतिशत अविवाहित लड़के बुरी बीमारियोंसे ग्रसित हैं। यदि यह सत्य है तो बड़े ही दु:खकी बात है। अरण्यवासी विषयत्यागी पुरुषोंके हृदयमें भी जब दु:संगवश विकार उत्पन्न हो जाता है; तब आजकलके विलासितापूर्ण अमर्यादित, धर्मभयशून्य वातावरणमें, फैशन और सजावटमें सने हुए शृंगारकी कविताएँ और नाटक-उपन्यास पढ़नेवाले, कृत्रिम उपायोंसे संतति-निरोधकी सुविधा रहते, साथ-साथ रहनेवाले युवक-युवतियोंसे सर्वथा पवित्र बने रहनेकी आशा रखना, उनकी शक्तिसे अधिक आशा करना है—दुराशामात्र है। अतएव योग्य वयमें उनका विवाह कर देना उत्तम है।

१०-पढ़नेवाली लड़कियोंमें भी फैशन न आवे और वे घरका काम-काज खुद कर सकें, ऐसी आदत माता-पिताको खुद आदर्श बनकर उनमें डालनी चाहिये। उन्हें घरका काम सिखाना और उनसे कराना चाहिये। फैशन, विलासिता, आलस्य, आरामतलबीके विषैले भावोंसे उन्हें बराबर बचाना चाहिये। याद रखना चाहिये कि गृहस्थ-संचालनमें निपुण, शील और चरित्रवती कर्तव्यपरायणा स्त्री ही वास्तवमें शिक्षिता है, कई भाषाओंको जाननेवाली नहीं।

११-रूप प्रतियोगिताके विचारोंका घोर विरोध करना चाहिये। कम-से-कम भारतीय संस्कृतिकी दृष्टिसे तो यह बहुत ही बुरी बात है। बाजारमें बैठकर रूप बेचनेवाले वेश्याओंसे भी यह व्यवहार नीचा है, क्योंकि यह भले घरोंकी कुलललनाओंद्वारा किया जाता है। हमारी आदरणीया माता और बहिनोंको इसकी बुराइयाँ समझकर इससे दूर रहना चाहिये, इतना ही नहीं, ऐसे आयोजन इस देशमें न होने पावें, ऐसी चेष्टा करनी चाहिये।

१२-जो वास्तवमें सुधार करना चाहते हैं, वे महानुभाव संयम और धीमी चालसे चलनेकी कृपा करें। डालियोंके सुधारके लिये पेड़की जड़ न उखाड़ें। ऐसा उपदेश न करें जिसमें भोगोंकी प्रवृत्ति जोर पकड़े। इन्द्रिय-भोगोंके लिये संतति-निरोधके कृत्रिम उपायोंको काममें लानेकी कभी सलाह न दें। ये उपाय अप्राकृतिक हैं और दोषयुक्त हैं तथा व्यभिचारकी वृद्धिमें बड़े ही सहायक हैं। जनसंख्याकी वृद्धि, बीमारी, दरिद्रता आदि कारणोंसे संतति-निरोधकी आवश्यकता होती है; परंतु उसका भी असली इलाज संयम ही है।

इसी प्रकार सभी विधवा बहिनोंको भी भोगोंके अभावमें दु:खोंके चित्र दिखलाकर उनके मनको न बिगाड़ें, उन्हें संयमके मार्गसे च्युत न करें। विधवामात्र ही संयमसे नहीं रह सकती, ऐसा मानना उचित नहीं है। वातावरणके दोषसे ही विकार उत्पन्न होता है। आज भी सैकड़ों पवित्र विधवाएँ हैं, उनके पवित्र शीलव्रतपालनके आत्मविश्वास और उनकी प्रबल इच्छाशक्तिको कमजोर न करें।

ऐसे साहित्य और चित्रोंका प्रचार न करें, जिनसे स्त्री-पुरुषोंके विषय-भोगकी प्रवृत्तिको उत्तेजना मिलती हो। (खेद है कि आजकल बहुत-से साहित्यिक और चित्रपटसम्बन्धी पत्रोंमें युवती स्त्रियोंके छायाचित्र बहुत अधिक मात्रासे छपते हैं, जिनका परिणाम अच्छा नहीं हो रहा है। सम्मान्य सम्पादक महोदयोंकी सेवामें मेरी नम्र प्रार्थना है कि वे एक बार इस विषयपर गम्भीरतापूर्वक विचार करें।) फैशनके दोष और सादगीके गुण उनके सामने रखें और पाश्चात्य संस्कृतिके पीछे—आँखें बंद करके बह जानेकी सलाह कृपया कभी न दें।

यह मेरी हाथ जोड़कर विनम्र प्रार्थना है; आज्ञा नहीं। मुझे इसीमें सच्चा सुधार दीख पड़ता है। ऐसा मेरे दृष्टिकोणके कारण ही हो सकता है। मैं किसीकी नीयत और ईमानदारीपर किसी प्रकारका संदेह या दोषारोपण नहीं करता हुआ नम्रतापूर्वक सबके सामने अपने ये विचार विचारार्थ रखता हूँ। इनमें जो अच्छे मालूम हों उनपर विचार करें, शेष तो मेरे विचार मेरे पास ही रहेंगे। कहीं कटूक्ति आ गयी हो तो क्षमा करें।

१३-जो सज्जन इन विचारोंके अनुकूल हों उनको चाहिये कि समाचारपत्रों तथा सामाजिक और साहित्यिक मासिक पत्रोंद्वारा इन भावोंका प्रचार करनेकी चेष्टा करें। धर्महीन शिक्षा, यूरोपकी सामाजिक संस्कृति, लड़के-लड़कियोंकी सहशिक्षा, लड़कियोंको अंग्रेजीकी उच्च शिक्षा, युवतीविवाह, फैशन और विलासिता, वर्तमान चित्रपट, सौन्दर्य प्रतियोगिता, संतान-निरोधके कृत्रिम साधन और सुधारके नामपर होनेवाले संहारके दोष नम्रता और प्रेमके साथ युक्तिपूर्ण शब्दोंमें सबके सामने बार-बार रखें और इनके विपरीत गुणोंके युक्तिपूर्ण लाभ बतलावें।

ऐसा होगा तो आपलोग दुराचारके पथपर जाते हुए हमारे समाजके जीवनस्वरूप, हमारे हृदयके टुकड़े और हमारी आँखोंके तारे कोमलहृदय लड़के-लड़कियोंको विनाशके भड़कीले पथसे हटाकर सदाचारके सुहावने पथपर ला सकेंगे।

इसमें मैंने जो कुछ लिखा है, किसीका दिल दुखानेके लिये कुछ भी नहीं लिखा है। वस्तुस्थिति जैसी कुछ मेरे ध्यानमें आयी, उसीका दिग्दर्शन कराया गया है। इसमें मेरी भूल भी हो सकती है। भूलोंके लिये मैं पहले ही क्षमा चाहता हूँ। वास्तवमें मैं ऐसा अनुभवी और दूरदर्शी मनुष्य नहीं हूँ जो समाजसुधारके लिये यथार्थ उपाय बता सकूँ! सम्भव है मेरा यह निरीक्षण और परीक्षण ही सदोष हो, परंतु मुझे अपने विचारोंमें इस समय कोई संदेह नहीं है।