विषय-चिन्तनसे सर्वनाश और भगवच्चिन्तनसे परम शान्ति

(एक प्रवचनका सारांश)

वंशीविभूषितकरान्नवनीरदाभात्

पीताम्बरादरुणबिम्बफलाधरोष्ठात्।

पूर्णेन्दुसुन्दरमुखादरविन्दनेत्रात्

कृष्णात्परं किमपि तत्त्वमहं न जाने॥

ध्यानाभ्यासवशीकृतेन मनसा

तन्निर्गुणं निष्क्रियं

ज्योति: किंचन योगिनो यदि परं

पश्यन्ति पश्यन्तु ते।

अस्माकं तु तदेव लोचनचम-

त्काराय भूयाच्चिरं

कालिन्दीपुलिनेषु यत्किमपि त-

न्नीलं महो धावति॥

पूज्य गुरुजनो और बन्धुओ!

अखिल विश्वनायक सर्वात्मा भगवान् श्रीकृष्ण और समस्त गुरुजनोंके चरणोंमें भक्तिपूर्वक प्रणाम करनेके अनन्तर सेवामें कुछ निवेदन करता हूँ।

माता-पिता आदि गुरुजनोंको अपने बच्चेका खेल कैसा भी हो आनन्दप्रद होता है। मैं समझता हूँ कि मुझे भी यह सौभाग्य प्राप्त है, इसीसे आप मुझे कुछ सुनानेकी आज्ञा देते हैं। मैं भी यह आशा करता हूँ कि आप गुरुजन मुझे बालक समझकर मेरे उचित-अनुचित कथनपर ध्यान न देकर सब प्रकार अपना स्नेहपात्र ही समझेंगे।

कई सज्जनोंने मुझसे भिन्न-भिन्न कई प्रश्न किये हैं और उन प्रश्नोंके उत्तरमें निवेदन करनेकी आज्ञा दी है। इस समय मैं जो कुछ कहूँगा, उसमें उनके प्रश्नोंका उत्तर आ जाय तो वे समझ लेंगे। किसी दार्शनिक विषयपर कुछ कहनेकी न तो मुझमें योग्यता है, न अधिकार है, मैं तो एक बालककी तरह जैसा मेरी वाणीसे निकलेगा कहता जाऊँगा। आपलोग क्षमा तो करेंगे ही।

सबसे पहली बात तो यह कहनी है कि विषय-चिन्तनसे हमारा सर्वनाश होता है और भगवच्चिन्तनसे हमें कभी नाश न होनेवाली परम शान्तिकी प्राप्ति हो जाती है। इसीसे गीतामें एक जगह आता है ‘प्रणश्यति’ और दूसरी एक जगह आता है ‘न प्रणश्यति’। भगवान् कहते हैं—

ध्यायतो विषयान् पुंस: संगस्तेषूपजायते।

संगात् संजायते काम: कामात् क्रोधोऽभिजायते॥

क्रोधाद् भवति सम्मोह: सम्मोहात् स्मृतिविभ्रम:।

स्मृति भ्रंशाद् बुद्धिनाशो बुद्धिनाशात् प्रणश्यति॥

(२। ६२-६३)

‘विषयोंका चिन्तन करनेवाले पुरुषकी विषयोंमें आसक्ति हो जाती है, आसक्तिसे कामना उत्पन्न होती है, कामनासे क्रोध पैदा होता है, क्रोधसे भलीभाँति मूढता उत्पन्न हो जाती है, मूढतासे स्मरणशक्ति नष्ट हो जाती है और स्मृतिनाशसे बुद्धिनाश होकर अन्तमें सर्वनाश हो जाता है।’ दूसरी जगह श्रीभगवान् घोषणा करते हैं—

अपि चेत्सुदुराचारो भजते मामनन्यभाक्।

साधुरेव स मन्तव्य: सम्यग्व्यवसितो हि स:॥

क्षिप्रं भवति धर्मात्मा शश्वच्छान्तिं निगच्छति।

कौन्तेय प्रति जानीहि न मे भक्त: प्रणश्यति॥

(९। ३०-३१)

‘अत्यन्त दुराचारी भी यदि अनन्यभावसे (एकमात्र मुझको ही शरण्य मानकर) मुझको भजता है तो उसे साधु ही मानना चाहिये; क्योंकि उसने यथार्थ निश्चय कर लिया है। वह शीघ्र ही धर्मात्मा हो जाता है और शाश्वती शान्तिको प्राप्त होता है। अर्जुन! तू निश्चयपूर्वक सत्य जान कि मेरे भक्तका नाश नहीं होता।’

समझनेकी बात है। एक अच्छा आदमी है, उसके संचित भी अच्छे हैं, वह भी कुसंगतिमें पड़कर यदि विषयचिन्तनमें लग जाता है तो क्रमश: सर्वनाशके पथपर अग्रसर होता है। और एक महापापी भी अच्छे संगके प्रभावसे यदि मनमें निश्चय करके अनन्यभावसे भगवच्चिन्तन करने लगता है तो सब पापोंसे छूटकर शीघ्र ही परम शान्तिको प्राप्त होता है। इसीलिये संतोंने कहा है—आगे-पीछेकी चिन्ताको छोड़कर वर्तमानको सुधारो।

कर्म तीन प्रकारके हैं—संचित, प्रारब्ध और क्रियमाण। पिछले असंख्य जन्मोंके और इस क्षणसे पूर्वतकके जितने भी कर्म बिना भोगे हुए जमा हैं उनका नाम ‘संचित’ है, संचितमेंसे कर्मोंका जितना अंश इस जीवनमें भोग देनेके लिये प्रवृत्त है वह ‘प्रारब्ध’ है और जो कुछ सकामभावसे नये कर्म किये जाते हैं वह ‘क्रियमाण’ है। मनमें होनेवाली स्फुरणाओंमें प्रधान कारण प्राय: ‘संचित’ है। जैसा अच्छा-बुरा संचित होता है वैसी ही अच्छी-बुरी स्फुरणाएँ होती हैं, परंतु अधिकतर स्फुरणाएँ उसी संचितकी होती हैं जो नवीन होता है। किसी गोदाममें बहुत-सी चीजें रखी हैं। उसमेंसे निकालने जानेपर वही चीज सबसे पहले निकलेगी जो सबके बाद रखी गयी है। पुरानी चीजें या तो पीछे पड़ी हैं या नीचे दबी हैं। यद्यपि बीच-बीचमें उनकी भी गन्ध आया करती है। इसी प्रकार हमारे वर्तमान कर्म जैसे होते हैं वैसा ही संचित होता है और उसीके अनुसार स्फुरणाएँ होती हैं। फिर बार-बार जैसी स्फुरणा होती है वैसे ही कर्ममें प्रवृत्ति होती है। जैसे लड़कपनमें जब हम पढ़ते थे, तब पढ़नेके सम्बन्धकी बातें ही अधिक याद आया करती थीं। अब यदि व्यापार करते हैं तो हमें रात-दिन व्यापारसम्बन्धी बातें ही अधिक याद आती हैं; क्योंकि यही वर्तमानका नवीन कर्म है, जो संचित बनता है और उसीके अनुसार स्फुरणा होकर फिर उसी व्यापारमें ही प्रवृत्ति होती है। इस प्रकार वर्तमान नवीन कर्मके अनुसार नवीन संचित, नवीन संचितके अनुसार स्फुरणा, स्फुरणाओंके अनुसार फिर वैसा ही नवीन कर्म, कर्मके अनुसार फिर संचित और स्फुरणा। यों वर्तमान कर्मके अनुसार एक चक्र बन जाता है जो उसी प्रकारके संचितको बढ़ाता रहता है। अतएव यदि हमारे संचितकी गोदाममें पहलेके बहुत पुण्य जमा हों, परंतु वर्तमानमें कुसंगमें पड़कर यदि हम बुरे कर्म करने लगते हैं तो उन्हींके अनुसार विषयोंका चिन्तन होता है और उनसे फिर वैसे ही बुरे कर्म बनते हैं और हम सर्वनाशके मुँहमें चले जाते हैं। पाप इतने बढ़ जाते हैं कि उनसे दबे हुए पुण्योंकी गन्ध भी कहीं मुश्किलसे आती है और एक महापापी अपने पूर्व पापोंको छोड़कर ‘गयी सो गयी, अब राख रहीको’ इस युक्तिके अनुसार अपना शेष जीवन भगवान‍्के समर्पण कर भगवान‍्का अनन्य चिन्तन करने लगता है तो इस चिन्तनरूपी कर्मसे उसका वैसा ही संचित बनता है और वैसी ही स्फुरणा होती है। इस प्रकार भगवच्चिन्तनरूप कर्मका चक्र बन जानेसे ज्ञानाग्नि पैदा होकर उसके कर्मकी सारी गोदामको जला देती है और वह परम शान्तिको प्राप्त हो जाता है।

यह बात याद रखनी चाहिये कि पापोंका मूल विषयासक्ति है। कुछ लोग यह कहते हैं कि पाप प्रारब्धसे होते हैं, परंतु यह बात ठीक नहीं। गीताके तीसरे अध्यायमें अर्जुनका प्रश्न है कि ‘भगवन्! वह क्या वस्तु है जो इच्छा न होनेपर भी मनुष्यको मानो जबरदस्तीसे पापमें प्रवृत्त कर देती है?’ इसके उत्तरमें भगवान् गीता ३।३७ में कहते हैं—

काम एष क्रोध एष रजोगुणसमुद्भव:।

महाशनो महापाप्मा विद्‍ध्येनमिह वैरिणम्॥

यहाँ भगवान‍्ने कामको ही पापका हेतु बताया है। कहा है कि यह रजोगुणसे उत्पन्न है, रज रागात्मक है यानी आसक्ति या संग ही रजोगुण है। यह आसक्ति विषयोंके चिन्तनसे होती है अतएव विषयचिन्तन ही सर्वनाशका प्रधान कारण है। यदि इस सर्वनाशसे बचकर शाश्वती शान्ति प्राप्त करनेकी इच्छा हो तो विषय-चिन्तन छोड़कर भगवच्चिन्तन करना चाहिये। उपर्युक्त ९। ३१ के श्लोकमें भगवान् प्रतिज्ञा करके कहते हैं कि मेरे ऐसे भक्तका नाश नहीं होता। यहाँ एक बात और याद आ गयी, उपर्युक्त श्लोकके अन्तिम अर्धांशका यह अर्थ भी किया जाता है कि ‘अर्जुन! तू प्रतिज्ञा कर कि मेरा भक्त नाशको प्राप्त नहीं होता।’ यद्यपि यह अर्थ कुछ असंगत-सा मालूम होता है। बात भगवान् कहें और प्रतिज्ञा अर्जुन करें। परंतु विचार करनेपर मालूम होता है कि भगवान‍्ने यहाँ ऐसा कहकर मानो भक्तके साथ अपने एक विलक्षण सम्बन्धका परिचय दिया है। भगवान‍्की प्रतिज्ञा कभी टलनेवाली नहीं होती, परंतु यदि उस प्रतिज्ञाके विरुद्ध किसी भक्तका प्रण अड़ जाय तो वहाँ भगवान‍्को अपनी प्रतिज्ञा छोड़ देनी पड़ती है। इसका प्रत्यक्ष प्रमाण कुछ ही दिनों बाद महाभारत-युद्धमें मिलनेवाला था। सर्वज्ञ भगवान् इस बातको जानते थे कि भक्त-शिरोमणि भीष्मपितामहकी प्रतिज्ञा पूरी करनेके लिये मुझे अपनी प्रतिज्ञा छोड़नी पड़ेगी। इसीलिये यहाँ अपने कथनको और भी पुष्ट करनेके लिये भक्तवर अर्जुनसे प्रतिज्ञा करवाते हैं। इस विचारसे यह अर्थ भी ठीक बैठता है। यहाँ कोई यह शंका करे कि बिना भोगे ही पापोंका नाश होना तो कर्म-सिद्धान्तके विपरीत बात है; इसका समाधान यह है कि कर्म-सिद्धान्तकी रचना करनेवाले भगवान‍्ने ही इस नियमको भी रचा है कि जो पुरुष मेरे शरण होकर मेरा अनन्य चिन्तन करता है, उसके पाप-ताप तुरंत ही नष्ट हो जाते हैं। भगवान‍्ने श्रीरामके रूपमें भी यही कहा है—

सनमुख होइ जीव मोहि जबहीं।

जन्म कोटि अघ नासहिं तबहीं॥

एक सज्जन पूछते हैं कि ‘इस समय भजनकी जैसी प्रवृत्ति दिनोंदिन बढ़ रही है यदि यह इसी प्रकार बढ़ती रही और अच्छे-अच्छे सभी लोग इसमें लग गये तो फिर लौकिक कर्तव्यका पालन कौन करेगा?’ इसपर मेरा यह निवेदन है कि प्रथम तो ऐसा सम्भव नहीं कि सब लोग भजनमें लग जायँ और यदि सम्भव भी हो तो दूसरी बात यह है कि भगवान‍्के सच्चे भक्त कर्तव्यकी सीमासे परे पहुँच जाते हैं। वे अपना सर्वस्व भगवान‍्के चरणोंमें समर्पण कर सर्वथा निश्चिन्त हो जाते हैं। इसका यह अर्थ नहीं कि वे अकर्मण्य बन जाते हैं। उनका अपना कोई कर्म नहीं रहता। भगवान् जैसा चाहें वैसा ही उनके द्वारा करवा सकते हैं। भगवान् जो कुछ करायेंगे वही उन्हें प्रसन्नतासे स्वीकृत होगा। वे कर्मके स्वरूपको प्रधानता न देकर भगवान‍्की मंगलमयी रुचिको और उनके संकेतको प्रधानता देंगे। अतएव उनके कर्म भगवत्-प्रेरित होनेके कारण स्वाभाविक ही लोकहितकारी, निर्दोष और भगवान‍्की पूजास्वरूप होंगे। उन कर्मोंमें न आसक्ति होगी, न विषयवासना और न लोकैषणा ही। इस प्रकार भक्तोंके द्वारा कर्म होंगे, पर अमंगल कर्म नहीं होंगे। अतएव इस शंकाको कोई स्थान नहीं। जहाँ जिस लौकिक कर्मको भक्तोंसे करवानेकी भगवान् आवश्यकता समझेंगे वहाँ करा लेंगे और उसमें भक्तोंको कभी इनकार नहीं है। सच्चे भक्तोंके द्वारा जगत‍्का सर्वथा मंगल ही होता है।

हाँ, जो लोग भजनके नामपर आलस्य और अकर्मण्यताको आश्रय देते हैं, भगवान‍्के संकेतको न समझकर चुपचाप पड़े रहना चाहते हैं उनकी बात दूसरी है, परंतु जो लोग यथार्थ ही भजनके लिये संसार-त्यागकर वनवासी हो जाते हैं और भगवान‍्की इच्छासे केवल भजनमें ही रत रहते हैं, वे इनमें शामिल नहीं हैं। ऐसे एकान्तसेवी भजनानन्दी भक्तोंसे जगत‍्का बड़ा कल्याण होता है। महत्त्व तो भगवत्प्रेममें है, काम छोड़ने और न छोड़नेमें नहीं। गोपियाँ वनवासिनी नहीं थीं, परंतु उनका प्रेम इतना बढ़ा हुआ था कि वनवासी गृहत्यागी महात्माओंने भी उन्हें प्रेमपथकी आचार्या माना है। भगवान् श्रीकृष्णने स्वयं कई बार गोपांगनाओंके महत्त्वका श्रीमुखसे वर्णन किया है। अपनेको उनका ऋणी माना है और उनका महत्त्व बड़े-बड़े देवताओं, महर्षियों, भक्तों और पटरानियोंको दिखलाया है। ऐसी अनेकों कथाएँ मिलती हैं।

एक सज्जनने मुझसे पूछा है कि ‘प्रेममें ‘अद्वैत’ है या नहीं?’ मेरा उत्तर है कि अवश्य ‘अद्वैत’ है। प्रेम अनिर्वचनीय है और अनिर्वचनीय तत्त्व अद्वैत ही होता है। प्रेमसे ही यथार्थ तत्त्वका रहस्य जाननेमें आता है और प्रेमसे ही प्रेमास्पदके साथ प्रेमीका सहज एकात्म्य होता है। किंतु यह अद्वैत ‘रसाद्वैत है—आनन्दाद्वैत है।’

एक दूसरे सज्जनका कहना है कि भगवान् सर्वव्यापी हैं या किसी देशविशेषके निवासी? यदि सर्वव्यापी हैं तो भक्तोंके इस कथनकी संगति कैसे बैठती है—

वृन्दावनं परित्यज्य पादमेकं न गच्छति।

भगवान् वृन्दावनसे बाहर एक पग भी नहीं जाते और यदि यही ठीक है तो वे सर्वव्यापी कैसे हैं? इसपर मेरा यह निवेदन है कि दोनों ही बातें ठीक हैं। अवश्य ही गोपियोंके भगवान् वृन्दावनको छोड़कर कहीं एक पग भी नहीं जाते। वह निरन्तर उनकी आँखोंके सामने ही रहते हैं। यदि वृन्दावनमें गीताके ‘काल’ रूप भगवान् आ जायँ तो गोपियाँ उनसे डर जायँ। अर्जुन भी डर गये थे और वृन्दावनमें ‘तोत्त्रवेत्रैकपाणय:’ सारथिरूप भगवान‍्की आवश्यकता भी नहीं है। वृन्दावनके भगवान् तो दिव्य सौन्दर्य और माधुर्यके सागर हैं। वे ललित त्रिभंगीलाल हैं। मुरली हाथमें लिये ऐसी बाँकी छटासे नाचते रहते हैं कि बड़े-बड़े ऋषि-मुनि भी इस स्वरूपको देखनेकी इच्छा करते हैं और देखते ही सब कुछ भूलकर मोहित हो जाते हैं। ये नटवर मुरलीमनोहर यदि महाभारतकी रणभूमिमें चले जायँ तो रसभंग न हो जायगा? अतएव रसिकशिरोमणि श्रीकुंजविहारीका वृन्दावनकी निकुंज-वीथियोंसे बाहर न निकलना ठीक ही है। भगवान‍्की जहाँ जैसी लीला होती है, उसीके अनुरूप उनका दिव्य मंगल विग्रह होता है। परंतु यह ध्यानमें रहे कि भगवान‍्का मंगलमय विग्रह इस मायाका बना हुआ नहीं होता। वह सच्चिदानन्दघन होता है, इसीसे वाल्मीकिजीने भगवान् श्रीरामसे कहा—

चिदानंदमय देह तुम्हारी।

बिगत बिकार जान अधिकारी॥

और इसीसे बड़े-बड़े ब्रह्मनिष्ठ पुरुष भगवान‍्के दिव्य मंगल विग्रहको देखकर प्रेमकी बाढ़में बह जाते हैं। मिथिलापुरीमें जिस समय ब्रह्मनिष्ठशिरोमणि महाराज जनकने पहले-पहल भगवान् श्रीरामको लक्ष्मणके साथ देखा, उस समय उनका प्रेम इतना उमड़ा कि वे अपने आँसुओंको न रोक सके और विश्वामित्रसे पूछने लगे कि ‘भगवन्! ये दोनों कौन हैं? मेरा हृदय स्वाभाविक ही वैराग्यरूप है। मुझे वैराग्यके लिये कोई साधना नहीं करनी पड़ती, परंतु आज इन बालकोंके स्वरूपको देखकर मेरा मन इतना विवश हो गया कि मैं अपने मनको नहीं रोक सकता। इन्हें देखते ही इतना प्रेम बढ़ गया कि बरबस मेरा मन ब्रह्मसुखको त्यागकर इस प्रेमानन्दमें मग्न हो गया—

सहज बिरागरूप मनु मोरा।

थकित होत जिमि चंद चकोरा॥

इन्हहि बिलोकत अति अनुरागा।

बरबस ब्रह्मसुखहि मन त्यागा॥

भला, भगवान‍्का यह रूप पांचभौतिक होता तो क्या ब्रह्मविद्वरिष्ठ जनकजीको ऐसा मोह हो सकता था? स्वयं जनक इस बातको स्वीकार करते हैं कि ब्रह्मज्ञानमें मेरा प्रवेश है, परंतु राम और रामके भक्तोंके प्रेमको समझना मेरे अधिकारकी बात नहीं है। जिस समय चित्रकूटमें भरतजी भगवान‍्से अयोध्या लौटनेके लिये आग्रह कर रहे थे, उसी समय जनकजी भी वहाँ जा पहुँचे थे। माता कौसल्याको भरतकी प्रेमातिशयता देखकर यह संदेह हुआ कि राम यदि भरतकी बात न स्वीकार करेंगे तो सम्भव है भरत अपने प्राण विसर्जन कर देंगे। इसलिये उन्होंने जनककी पत्नी सुनयनाके द्वारा जनकजीको संदेश कहलवाया कि वे रामजीको समझा दें। सुनयनाकी प्रार्थना सुनकर जनकजीने कहा—

धरम राजनय ब्रह्मबिचारू।

इहाँ जथामति मोर प्रचारू॥

सो मति मोरि भरत महिमाही।

कहै काह छलि छुअति न छाँही॥

देबि परंतु भरत रघुबर की।

प्रीति प्रतीति जाइ नहिं तरकी॥

श्रीमद्भागवतमें आया है कि जिस समय जन्मसे ही सिद्ध ब्रह्मविद्-शिरोमणि सनकादि वैकुण्ठमें पहुँचे, उस समय भगवान‍्के चरणोंकी तुलसीगन्धने उनके चित्तको क्षुभित कर दिया। क्या मायारचित पार्थिव गन्ध ऐसे मुनियोंके चित्तको आकर्षित कर सकती थी? भक्तोंके लिये तो भगवान‍्का दिव्य मंगलविग्रह प्रत्यक्ष सिद्ध है। कोई उसे मायिक बतलावे तो उसकी उन्हें चिन्ता नहीं।

प्रसंगवश भगवान‍्के दिव्य सौन्दर्यमाधुर्यनिधि मंगलविग्रहकी बात बीचमें आ गयी। मैं यह कह रहा था कि वृन्दावनके भगवान‍्का वृन्दावनसे कहीं न जाना ठीक ही है। इसपर एक कथा सुनाता हूँ। बंगालके प्रसिद्ध भक्त और विद्वान् स्वर्गीय शिशिरकुमार घोषका एक बँगला ग्रन्थ है, उसका नाम है ‘कालाचाँद गीता’। उसमेंके एक प्रसंगका यह भाव है—

किसी निकुंजमें बैठी पाँच सखियाँ परस्पर श्रीकृष्णकी चर्चा करती हुई हार गूँथ रही थीं। इतनेमें ही उधरसे एक महात्मा आ निकले। महात्मासे सखियोंने पूछा—स्वामीजी! हमारे श्रीकृष्ण कहीं छिप गये हैं, हम वनमें उन्हें ढूँढ़ रही हैं। आप महात्मा हैं, उन्हें कहीं देखा हो तो बतलाइये, वे कहाँ हैं?

महात्मा—तुम भगवान् श्रीकृष्णकी बात पूछती हो?

सखियाँ—हाँ, हम अपने प्यारे भगवान् श्रीकृष्णकी बात पूछती हैं।

महात्मा—अरी! तुम बड़ी पगली हो। क्या भगवान् श्रीकृष्ण इस प्रकार निकुंजमें बैठकर फूल गूँथनेसे मिलते हैं? यदि तुम भगवान‍्को पाना चाहती हो तो इस नखशिख शृंगारका त्याग करके तपस्विनी बनो। वेणी बाँधना छोड़ो, पहले अपने केश कटवाओ, व्रत-उपवासादि करके शरीरको कृश करो और फिर दीर्घकालतक तप और ध्यानमें लगी रहकर उनकी आराधना करो।

सखियाँ—(डरकर) ‘स्वामीजी! हम वेणी बाँधनेके लिये फूल गूँथ रही हैं। वेणी न बाँधेंगी तो हमारे रसिकशेखरको बड़ा दु:ख होगा। उनका स्वभाव हम जानती हैं। हम उपवास करके शरीर सुखाने लगेंगी तो वे कभी प्रसन्न न होंगे। सिरके केश मुड़वा लेंगी तो आँसुओंकी धारासे धोये हुए प्रियतमके अरुण चरणकमलोंको फिर किस चीजसे पोंछेंगी। हम योग-याग करके उन्हें क्यों भुलाने जायँ? वे तो पराये नहीं हैं। वे हमारे स्वामी हैं। तब हम उनकी सेवा ही क्यों न करें? साधू बाबा! यह तो बताओ, तुम्हारे वे कृष्ण कौन हैं और उनसे तुम्हारा क्या सम्बन्ध है?’

महात्मा—अरी! तुम भी बड़ी बावली हो। श्रीकृष्ण भी क्या दो-चार हैं। वे भगवान् एक ही सर्वव्यापक, सर्वान्तर्यामी, सर्वेश्वर और सर्वनियन्ता हैं, वे राजराजेश्वर हैं, न्यायकर्ता हैं; वरदाता हैं और दण्डधारी हैं। उनके प्रसन्न होनेपर सम्पत्ति, रूठनेपर विपत्ति मिलती है। हम न मालूम कितना कष्ट उठाते हैं, तब भी उन्हें प्रसन्न नहीं कर पाते। डरते हैं, कहीं उनका कोई नियम भंग न हो जाय।

सखियाँ—(प्रसन्न होकर) बड़ी विपदा टली। आपके श्रीकृष्ण दूसरे हैं।

महात्मा—अच्छा बतलाओ, तुमलोगोंके श्रीकृष्ण कैसे हैं।

सखियाँ—साधू बाबा! तुम्हारी पहली बात सुनकर तो हमारे प्राण ही निकल-से गये थे। अब तुम्हारी इस बातसे वे मानो लौट आये हैं। तुमने जिनकी बात कही, वे चाहे कोई हों, हमारे प्राणनाथ नहीं हैं। हमारे श्रीकृष्ण तो श्यामसुन्दर हैं। वे हमारे प्रियतम हैं, हमारे स्वामी हैं। वे दण्डधारी नहीं हैं—हमारे निजजन हैं। उनका जो कुछ है, वह सब हमारा ही है, फिर उनसे हम क्या चाहें? भण्डारकी चाभी तो हमारे पास है। दण्डकी बात सुनकर तो डर लगता है। जब हम उन्हींकी प्रेयसियाँ हैं तब वे हमें दण्ड क्यों देंगे? कुपथ्यसेवनसे रोग हो जानेपर यदि हमारे स्वामी कोई कड़वी दवा खिलावें या कहीं फोड़ा होनेपर उसे चिरवा दें तो क्या इसे दण्ड कहते हैं? क्या स्नेहका नाम ही दण्ड है? यह तो प्राणनाथका परम प्रसाद है। तुमलोग पुरुष हो, राजसभामें जा सकते हो, राजाको कर देते हो, हमपर यदि कोई कर लगता होगा तो उसे प्राणनाथ आप ही भर देंगे। हमें दण्ड और पुरस्कारसे क्या मतलब! हम तो तुम्हारे उस राजेश्वर कृष्णको देखकर डर जायँगी। हमारे श्रीकृष्ण राजा नहीं हैं, वे तो रसिकशेखर हैं। हमने अपने देह, मन, प्राण सब उन्हींके चरणोंमें सौंप दिये हैं। हम सरलहृदया स्त्रियाँ तप और आराधनाकी बात क्या जानें? हमारे प्राणनाथ तो इस निकुंजभवनमें ही कहीं छिपे हैं। वे कहीं जाते नहीं, हमसे यों ही खेल किया करते हैं। तुमने कहीं देखा है तो कृपा करके बतलाओ।

सखियोंकी प्रेमभरी सरल बातें सुनकर महात्माका हृदय द्रवित हो गया, उनकी आँखोंमें प्रेमाश्रु भर आये। उन्होंने कहा—‘अच्छा, तुम अपने श्रीकृष्णके स्वरूपका तो कुछ वर्णन करो।’

स्वरूपकी याद दिलाते ही सखियोंके हृदय आनन्दसे भर गये, उनके मुखकमल खिल उठे और भगवान‍्के स्वरूपका वर्णन करते-करते प्रेमातिशयताके कारण देहकी सुधि-बुधि भूलकर वे नाच उठीं। उनके प्रेमसे प्रभावित होकर महात्माजी भी अपने-आपको न रोक सके और श्रीकृष्णके नामका कीर्तन करके नाचने लगे।

ऐसे प्रेमी भक्त अपने भगवान‍्को जहाँ रखना चाहते हैं, वहीं उन्हें रहना पड़ता है। इसलिये भक्तोंका यह कहना है कि भगवान् वृन्दावनको छोड़कर एक पग भी कहीं नहीं जाते, सर्वथा सत्य ही है।

अब रही, ‘सर्वव्यापी’ की बात, इसका उत्तर यह है कि भगवान् अवश्य ही सर्वव्यापी भी हैं। ऐसा कौन-सा स्थान है, जहाँ भगवान् नहीं हैं? परंतु सर्वव्यापी होनेपर भी वे केवल सर्वव्यापी ही नहीं हैं, यदि वे सर्वव्यापी हैं तो फिर यह ‘सर्व’ क्या है? सर्व भी तो वही हैं। वे ही सर्व हैं, वे ही सर्वव्यापी हैं, वे ही सर्वातीत हैं। भगवान् सभी कुछ हैं। हमें तो उनपर विश्वास करके अपनेको उनके चरणोंमें समर्पण कर देना चाहिये। फिर वे क्या हैं, इसका रहस्य वे स्वयं ही हमें समझा देंगे।

ददामि बुद्धियोगं तं येन मामुपयान्ति ते॥

एक प्रश्न और आया था कि ‘यदि हम भगवान‍्की दयापर ही विश्वास करें तो क्या हमें प्रयत्न करना सर्वथा छोड़ देना चाहिये?’ हाँ, अहंकारसे प्रेरित प्रयत्न अवश्य छोड़ देना चाहिये अथवा भोगकामनावश किये जानेवाले निषिद्ध प्रयत्नोंका सर्वथा त्याग कर देना चाहिये, परंतु भगवान‍्के अनुकूल कर्म तो अवश्य ही करने पड़ेंगे। दयापर विश्वास करनेका यह अर्थ नहीं है कि हम भगवान‍्के अनुकूल कर्मोंका त्याग करके आलसी बन जायँ। जो यह कहता है कि ‘भगवन्! मुझको तो आपकी दयामें ही विश्वास है, परंतु मैं आपकी आज्ञा नहीं मानना चाहता’ उसका वास्तवमें भगवान‍्की दयामें विश्वास ही नहीं है। दयामें विश्वासका तो यही आशय है कि हम स्वार्थवश जो बुरे कर्म करते हैं उन्हें छोड़ दें और कर्तृत्वाभिमान त्यागकर भगवान‍्की प्रेरणासे ही कर्म करें। यह भी नहीं समझ लेना चाहिये कि भगवान‍्का स्मरण करते हुए संसारका काम नहीं हो सकता। भगवान‍्ने तो अर्जुनको आज्ञा दी है—

तस्मात् सर्वेषु कालेषु मामनुस्मर युध्य च।

‘निरन्तर मेरा स्मरण करो और समयपर युद्ध करते जाओ।’ युद्धमें तो बहुत सावधान रहनेकी आवश्यकता है। एक ही बाणमें मृत्यु हो सकती है। शारीरिक वेदना भी कम नहीं रहती। यदि भगवान‍्की स्मृति रखते हुए ऐसे संकटमय क्षेत्रमें भी कर्म किया जा सकता है तो भगवान‍्का स्मरण करते हुए संसारके अन्य साधारण कर्म किये जायँ इसमें कौन बड़ी बात है?

अतएव यदि हमलोग भगवान‍्की आज्ञा मानकर यथासाध्य विषय-चिन्तनका त्याग करके भगवच्चिन्तन करते हुए ही भगवदर्थ संसारके आवश्यक वैध कर्मोंको करें तो हमें भगवान‍्का प्रेम अवश्य प्राप्त होगा और हमारा मनुष्यजन्म सफल हो जायगा।

एक सज्जन पूछते हैं कि मन यदि मुक्ति नहीं चाहता तो क्या चाहता है? मेरा निवेदन है कि वहाँ चाहने-न-चाहनेका प्रश्न ही नहीं रह जाता। भक्त अपने भगवान‍्के चिन्तनमें ही मस्त हुआ रहता है। यह तो सिद्धान्त ही है—

भुक्तिमुक्तिस्पृहा यावत् पिशाची हृदि वर्तते।

तावद् भक्तिसुखस्यात्र कथमभ्युदयो भवेत्॥

जबतक भोग और मोक्षकी पिशाचिनी चाह मनमें वर्तमान है तबतक भक्तिसुख वहाँ कैसे प्रकट हो सकता है। अतएव भक्तको कोई चाह नहीं होती, उसको ऐसी वस्तु मिली रहती है, जिससे सारी चाह समाप्त हो जाती है। उसका जो कुछ कार्य होता है सब अपने प्रियतम भगवान‍्के लिये ही होता है। उसके रोम-रोमसे मानो यही ध्वनि निकलती है—

अब तो भोग-मोक्षकी इच्छा

व्याकुल कभी न करती है।

मुखड़ा ही नित नव बंधन है

मुक्ति चरणसे झरती है॥