भागवत-धर्म-सार

मनसा वचसा दृष्ट्या गृह्यतेऽन्यैरपीन्द्रियै:।

अहमेव न मत्तोऽन्यदिति बुध्यध्वमञ्जसा॥

श्रीभगवान् बोले—‘मनसे, वाणीसे, दृष्टिसे तथा अन्य इन्द्रियोंसे भी जो कुछ (वस्तु , व्यक्ति आदि संसार) ग्रहण किया जाता है अर्थात् अनुभवमें आता है, वह सब मैं ही हूँ। अत: मेरे सिवाय और कुछ भी नहीं है, यह सिद्धान्त आप शीघ्र समझ लें अर्थात् स्वीकार कर लें।’

गुणेषु चाविशच्चित्तमभीक्ष्णं गुणसेवया।

गुणाश्च चित्तप्रभवा मद्रूप उभयं त्यजेत्॥

‘बार-बार विषयोंका सेवन करते रहनेसे चित्त विषयोंमें फँस गया है और विषय चित्तमें बस गये हैं तो उन दोनों (विषय और चित्त)-को मेरे स्वरूपमें स्थित होकर त्याग देना चाहिये अर्थात् अपनेमें नहीं मानना चाहिये।’

(श्रीमद्भागवत११।१३।२४,२६)

मामेव सर्वभूतेषु बहिरन्तरपावृतम्।

ईक्षेतात्मनि चात्मानं यथा खममलाशय:॥

‘शुद्ध अन्त:करणवाला भक्त आकाश-की तरह मुझ आवरणरहित परमात्माको ही देहसहित अपनेमें तथा सम्पूर्ण प्राणियोंके बाहर और भीतर परिपूर्ण देखे।’

इति सर्वाणि भूतानि मद्भावेन महाद्युते।

सभाजयन् मन्यमानो ज्ञानं केवलमाश्रित:॥

‘हे महामते उद्धवजी! केवल इस ज्ञानको धारण करके जो भक्त सम्पूर्ण प्राणियोंमें मेरा ही भाव रखता हुआ अर्थात् उनमें मुझे ही देखता हुआ और उनका आदर करता हुआ—

ब्राह्मणे पुल्कसे स्तेने ब्रह्मण्येऽर्के स्फुलिङ्गके।

अक्रूरे क्रूरके चैव समदृक् पण्डितो मत:॥

ब्राह्मण और चाण्डालमें, ब्राह्मण-भक्त और चोरमें, सूर्य और चिनगारीमें तथा कृपालु और निर्दयमें भी समानदृष्टि रखता है, वह भक्त ज्ञानी माना गया है।’

नरेष्वभीक्ष्णं मद्भावं पुंसो भावयतोऽचिरात्।

स्पर्धाऽसूयातिरस्कारा: साहङ्कारा वियन्ति हि॥

‘जब भक्तका सम्पूर्ण स्त्री-पुरुषोंमें निरन्तर मेरा ही भाव हो जाता है अर्थात् उनमें मुझे ही देखता है, तब शीघ्र ही उसके चित्तसे ईर्ष्या, दोषदृष्टि, तिरस्कार आदि दोष अहंकार-सहित सर्वथा दूर हो जाते हैं।’

विसृज्य स्मयमानान् स्वान् दृशं व्रीडां च दैहिकीम्।

प्रणमेद् दण्डवद् भूमावाश्वचाण्डालगोखरम्॥

‘हँसी उड़ानेवाले अपने लोगोंको और अपने शरीरकी दृष्टिको भी लेकर जो लज्जा आती है, उसको छोड़कर अर्थात् उसकी परवाह न करके कुत्ते, चाण्डाल, गौ एवं गधेको भी पृथ्वीपर लम्बा गिरकर भगवद् बुद्धिसे साष्टांग प्रणाम करे।’

यावत् सर्वेषु भूतेषु मद्भावो नोपजायते।

तावदेवमुपासीत वाङ्मन: कायवृत्तिभि:॥

‘जबतक सम्पूर्ण प्राणियोंमें मेरा भाव अर्थात् ‘सब कुछ परमात्मा ही हैं’, ऐसा वास्तविक भाव न होने लगे, तबतक इस प्रकार मन, वाणी और शरीरकी सभी वृत्तियों (बर्ताव)-से मेरी उपासना करता रहे।’

सर्वं ब्रह्मात्मकं तस्य विद्ययाऽऽत्ममनीषया।

परिपश्यन्नुपरमेत् सर्वतो मुक्तसंशय:॥

पूर्वोक्त साधन करनेवाले भक्तका ‘सब कुछ परमात्मस्वरूप ही है’—ऐसा निश्चय हो जाता है। फिर वह इस अध्यात्मविद्या (ब्रह्मविद्या) द्वारा सब प्रकारसे संशयरहित होकर सब जगह परमात्माको भलीभाँति देखता हुआ उपराम हो जाय अर्थात् ‘सब कुछ परमात्मा ही है’—यह चिन्तन भी न रहे, प्रत्युत साक्षात् परमात्मा ही दीखने लगें।

अयं हि सर्वकल्पानां सध्रीचीनो मतो मम।

मद्भाव: सर्वभूतेषु मनोवाक्कायवृत्तिभि:॥

‘मेरी प्राप्तिके सम्पूर्ण साधनोंमें सबसे श्रेष्ठ साधन मैं यही समझता हूँ कि सम्पूर्ण प्राणियोंमें मन, वाणी और शरीरकी सभी वृत्तियों (बर्ताव)-से मेरी ही भावना की जाय।’

न ह्यङ्गोपक्रमे ध्वंसो मद्धर्मस्योद्धवाण्वपि।

मया व्यवसित: सम्यङ्निर्गुणत्वादनाशिष:॥

‘प्यारे उद्धवजी! मेरे इस भागवत्-धर्मका निष्कामभावपूर्वक किये गये आरम्भका भी किंचिन्मात्र नाश नहीं होता; क्योंकि मैंने ही इस धर्मको तीनों गुणोंसे रहित होनेके कारण सर्वश्रेष्ठ निश्चय किया है।’

यो यो मयि परे धर्म: कल्प्यते निष्फलाय चेत्।

तदायासो निरर्थ: स्याद् भयादेरिव सत्तम॥

‘हे सर्वश्रेष्ठ उद्धवजी! इस धर्मका पालन करनेवाला जो कोई भक्त यदि भयसे भागने, रोने-पीटने आदिकी तरह निरर्थक कर्म भी निष्कामभावसे मेरे अर्पण कर दे अर्थात् उस होनहारमें मेरी मरजी मानकर निश्चिन्त हो जाय तो वे निरर्थक कर्म भी परमधर्म हो जाते हैं!’

एषा बुद्धिमतां बुद्धिर्मनीषा च मनीषिणाम्।

यत् सत्यमनृतेनेह मर्त्येनाप्नोति मामृतम्॥

‘बुद्धिमानोंकी बुद्धि और चतुरोंकी चतुराई इसीमें है कि वे इस मरणधर्मा और असत्य शरीरसे अर्थात् शरीर और उसकी सम्पूर्ण क्रियाओंको मेरे अर्पण करके मुझ अविनाशी और सत्य परमात्माकी प्राप्ति कर लें।’

(श्रीमद्भागवत ११।२९।१२—२२)