महाभारत-सार

(भारत-सावित्री)

मातापितृसहस्राणि पुत्रदारशतानि च।

संसारेष्वनुभूतानि यान्ति यास्यन्ति चापरे॥

‘मनुष्य इस जगत् में हजारों माता-पिताओं तथा सैकड़ों स्त्री-पुत्रोंके संयोग-वियोगका अनुभव कर चुके हैं, करते हैं और करते रहेंगे।’

हर्षस्थानसहस्राणि भयस्थानशतानि च।

दिवसे दिवसे मूढमाविशन्ति न पण्डितम्॥

‘अज्ञानी मनुष्यको प्रतिदिन हर्षके हजारों और भयके सैकड़ों अवसर प्राप्त होते रहते हैं; किन्तु विद्वान् मनुष्यके मनपर उनका कोई प्रभाव नहीं पड़ता।’

ऊर्ध्वबाहुर्विरौम्येष न च कश्चिच्छृणोति मे।

धर्मादर्थश्च कामश्च स किमर्थं न सेव्यते॥

‘मैं दोनों हाथ ऊपर उठाकर पुकार-पुकारकर कह रहा हूँ, पर मेरी बात कोई नहीं सुनता! धर्मसे मोक्ष तो सिद्ध होता ही है, अर्थ और काम भी सिद्ध होते हैं तो भी लोग उसका सेवन क्यों नहीं करते!’

न जातु कामान्न भयान्न लोभाद्

धर्मं त्यजेज्जीवितस्यापि हेतो:।

नित्यो धर्म: सुखदु:खे त्वनित्ये

जीवो नित्यो हेतुरस्य त्वनित्य:॥

‘कामनासे, भयसे, लोभसे अथवा प्राण बचानेके लिये भी धर्मका त्याग न करे। धर्म नित्य है और सुख-दु:ख अनित्य हैं। इसी प्रकार जीवात्मा नित्य है और उसके बन्धनका हेतु (राग) अनित्य है।’

इमां भारतसावित्रीं प्रातरुत्थाय य: पठेत्।

स भारतफलं प्राप्य परं ब्रह्माधिगच्छति॥

‘यह महाभारतका सारभूत उपदेश ‘भारत-सावित्री’ के नामसे प्रसिद्ध है। जो प्रतिदिन सबेरे उठकर इसका पाठ करता है, वह सम्पूर्ण महाभारतके अध्ययनका फल पाकर परब्रह्म परमात्माको प्राप्त कर लेता है।’

(महाभारत,स्वर्गारोहण०५।६०—६४)