अलौकिक साधन—भक्ति
संसारसे सम्बन्ध-विच्छेद करके परमात्माको प्राप्त करनेके तीन मुख्य साधन हैं—कर्मयोग, ज्ञानयोग और भक्तियोग। भागवतमें भगवान् कहते हैं—
योगास्त्रयो मया प्रोक्ता नृणां श्रेयोविधित्सया।
ज्ञानं कर्म च भक्तिश्च नोपायोऽन्योस्ति कुत्रचित्॥
(श्रीमद्भा० ११। २०। ६)
‘अपना कल्याण चाहनेवाले मनुष्योंके लिये मैंने तीन योगमार्ग (भगवद्गीतामें) कहे हैं—ज्ञानयोग, कर्मयोग और भक्तियोग*।
इन तीनोंके सिवाय दूसरा कोई कल्याणका मार्ग नहीं है।’
कर्मयोग तथा ज्ञानयोगमें संसारसे सम्बन्ध-विच्छेद करनेकी मुख्यता है और भक्तियोगमें भगवान्से सम्बन्ध जोड़नेकी मुख्यता है। इसलिये कर्मयोग तथा ज्ञानयोग ‘लौकिक साधन’ हैं और भक्तियोग ‘अलौकिक साधन’ है। लौकिक साधन ‘विवेकमार्ग’ है और अलौकिक साधन ‘विश्वासमार्ग’ है। विवेकमार्गमें विवेककी मुख्यता और श्रद्धा-विश्वासकी गौणता है तथा विश्वासमार्गमें श्रद्धा-विश्वासकी मुख्यता और विवेककी गौणता है। संसारसे सम्बन्ध-विच्छेद करनेमें विवेक काम आता है और भगवान्से सम्बन्ध जोड़नेमें विश्वास काम आता है। साधकसे प्राय: यह भूल होती है कि वह विवेकमें विश्वास और विश्वासमें विवेक मिलाता है अर्थात् विवेकमार्गमें विश्वासकी मुख्यता और विश्वासमार्गमें विवेककी मुख्यता करता है। इस कारण उसका साधन जल्दी सिद्ध नहीं होता। संसारसे मेरा सम्बन्ध है कि नहीं है—इसमें विश्वास नहीं करना है, प्रत्युत विवेक करना है। भगवान् हैं कि नहीं हैं और मेरे हैं कि नहीं हैं—इसमें विवेक नहीं करना है, प्रत्युत विश्वास करना है। कारण कि जगत् तथा जीव विचारके विषय हैं और भगवान् केवल विश्वास (मान्यता)-के विषय हैं। विवेक (विचार) वहीं लगता है, जहाँ सन्देह होता है और सन्देह अल्प ज्ञानमें अथवा अधूरे ज्ञानमें होता है। तात्पर्य है कि जिसके विषयमें हमारा आंशिक ज्ञान है अर्थात् कुछ जानते हैं, कुछ नहीं जानते, वहीं विवेक चलता है। परन्तु जिसके विषयमें कुछ नहीं जानते, वहाँ विश्वास ही चलता है। विश्वासमें सन्देह नहीं होता। विश्वास करने अथवा न करनेमें सब स्वतन्त्र हैं*।
ज्ञानी संसारके साथ माने हुए सम्बन्धका त्याग करता है और भक्त एक भगवान्के सिवाय अन्य किसीसे अपना सम्बन्ध मानता ही नहीं। दूसरे शब्दोंमें ज्ञानी ‘मैं’ व ‘मेरा’ का त्याग करता है और भक्त ‘तू’ व ‘तेरा’ को स्वीकार करता है। इसलिये ज्ञानी पदार्थ व क्रियाका त्याग करता है और भक्त पदार्थ व क्रियाको भगवान्के अर्पण करता है (गीता ९। २६-२७) अर्थात् उनको अपना न मानकर भगवान्का और भगवत्स्वरूप मानता है। त्यागकी अपेक्षा अर्पण सुगम होता है। कारण कि जिस वस्तुमें मनुष्यकी सत्यत्व और महत्त्वबुद्धि होती है, उसको मिथ्या समझकर यों ही त्याग देनेकी अपेक्षा किसी व्यक्तिके अर्पण कर देना, उसकी सेवामें लगा देना सुगम पड़ता है। फिर जो परम श्रद्धास्पद, प्रेमास्पद भगवान् हैं, उनको अर्पण करनेकी सुगमताका तो कहना ही क्या! क्योंकि सम्पूर्ण वस्तुएँ (मात्र संसार) पहलेसे ही भगवान्की हैं। उनको भगवान्के अर्पण करना केवल अपनी भूल मिटाना है। संसारको भगवान्का मानते ही संसारसे सम्बन्ध-विच्छेद हो जाता है। अत: संसारसे सम्बन्ध-विच्छेद करनेके लिये भक्तको विवेककी जरूरत नहीं है। तात्पर्य है कि भक्त संसारसे सम्बन्ध-विच्छेद नहीं करता, प्रत्युत उसको भगवान्का और भगवत्स्वरूप मानता है।
विवेक पारमार्थिक विषयमें भी काम करता है और लौकिक विषयमें भी। लौकिक विषयमें विवेकका उपयोग करके मनुष्य बड़ा वैज्ञानिक, जज, वकील आदि बन सकता है, तरह-तरहके आविष्कार कर सकता है, पर तत्त्वप्राप्ति नहीं कर सकता। कारण कि राग साथमें रहनेसे लौकिक विषयोंका विवेक भोग और संग्रहका महत्त्व बढ़ाकर संसारमें फँसाता है, पापोंमें लगाकर पतन करता है। तात्पर्य है कि संसारकी सत्ता और महत्ता साथमें रहनेसे विवेक बहुत घातक, अनर्थका हेतु होता है। वास्तवमें लौकिक विषयोंका विवेक ‘अविवेक’ ही है। पारमार्थिक विषयका विवेक अर्थात् सत्-असत् का विवेक ही वास्तविक विवेक है*।
सत्-असत् का विवेक होनेसे पारमार्थिक अथवा लौकिक दोनों कार्य ठीक होते हैं; क्योंकि विवेकी मनुष्यकी बुद्धि हरेक विषयमें प्रविष्ट होती है।
पारमार्थिक विवेकवाला मनुष्य लौकिक विषयोंका भी ठीक ढंगसे उपयोग कर सकता है। परन्तु केवल लौकिक विवेकवाला मनुष्य लौकिक विषयोंका भी ठीक ढंगसे उपयोग नहीं कर पाता—
उपभोक्तुं न शक्नोति श्रियं प्राप्यापि मानव:।
आकण्ठजलमग्नोऽपि श्वा लेढीति स्वजिह्वया॥
‘प्रारब्धवश धन-सम्पत्ति प्राप्त करके भी अविवेकी मनुष्य उसका ठीक ढंगसे उपभोग नहीं कर सकता; जैसे—गलेतक जलमें डूबे होनेपर भी कुत्ता जीभसे ही जलको चाटता है (उसको सीधे जल पीना आता ही नहीं)।’
वास्तविक विवेक वैराग्यका जनक है। यदि वैराग्य न हो तो विवेक वास्तविक (असली) नहीं है। ‘मेरा असत् के साथ सम्बन्ध है ही नहीं’—इस विवेकसे वैराग्य होता ही है। विवेकमें सत् और असत्—दो चीज होती है, इसलिये वैराग्य होनेपर भी अन्त:करणमें असत् की अति सूक्ष्म सत्ता रहनेसे उसकी सूक्ष्म वासना रह जाती है। वह वासना प्रेम-भक्तिसे ही दूर होती है—
प्रेम भगति जल बिनु रघुराई।
अभिअंतर मल कबहुँ न जाई॥
(मानस, उत्तर० ४९। ३)
उस सूक्ष्म वासनाको सर्वथा नष्ट करनेकी ताकत प्रेममें ही है। प्रेममें बिना विचार किये स्वत: असत् का आकर्षण मिटता है; क्योंकि सत्-तत्त्वमें प्रेम होनेपर असत् की तरफ दृष्टि जाती ही नहीं, असत् से सर्वथा विमुखता हो जाती है—‘सपनेहुँ आन पुरुष जग नाहीं’(मानस, अरण्य० ५। ६)। तात्पर्य है कि प्रेममें दो चीज नहीं होती, प्रत्युत एक भगवान् ही होते हैं। अत: विवेक तो तटस्थ रहता है, पर प्रेम भगवान्में लगाता है। संसारमें जैसे रुपयोंमें आकर्षित करनेकी शक्ति लोभमें ही है, ऐसे ही भगवान्में आकर्षित करनेकी शक्ति प्रेममें ही है। यह शक्ति विवेकमें नहीं है। हाँ, यदि तीव्र जिज्ञासा हो तो विवेकमें भी सत्-तत्त्वकी मुख्यता हो जाती है। सत्-तत्त्वकी मुख्यता होनेपर वह विवेक केवल वैराग्यका जनक ही नहीं रहता, प्रत्युत तत्त्वबोधका प्रापक हो जाता है।
विवेकमार्गमें सत् और असत् —दोनोंकी मान्यता साथ-साथ रहनेसे असत् की अति सूक्ष्म सत्ता अर्थात् अति सूक्ष्म अहम् दूरतक साथ रहता है। यह सूक्ष्म अहम् मुक्त होनेपर भी रहता है। यह सूक्ष्म अहम् जन्म-मरण देनेवाला तो नहीं होता, पर यह परमात्मासे अभिन्न होनेमें बाधक होता है। इसलिये विवेकमार्गमें ज्ञानियोंकी अथवा दार्शनिकोंकी मुक्ति तो हो सकती है, पर परमात्माके साथ अभिन्नता अर्थात् प्रेम नहीं हो सकता। इस सूक्ष्म अहम्के कारण ही दार्शनिकोंमें और उनके दर्शनोंमें परस्पर मतभेद रहता है। विश्वासमार्गमें आरम्भसे ही भक्त एक परमात्माके सिवाय और किसीकी स्वतन्त्र सत्ता नहीं मानता। इसलिये वह परमात्माके साथ अभिन्न हो जाता है। परमात्माके साथ अभिन्न होनेपर सूक्ष्म अहम् नहीं रहता और उससे पैदा होनेवाले सम्पूर्ण मतभेद समाप्त हो जाते हैं। इसलिये ज्ञानकी एकतासे प्रेमकी एकता श्रेष्ठ है। कारण कि ज्ञानमें तो भेद रह सकता है, पर प्रेममें कोई भेद रहता ही नहीं।
विवेकमार्गमें विवेकपूर्वक किया जानेवाला साधन दो प्रकारका होता है—विध्यात्मक और निषेधात्मक। विध्यात्मक साधनमें सूक्ष्म अहम् बना रहता है। कारण कि इसमें अभ्यासकी मुख्यता रहनेसे असत् का आश्रय रहता है। इसमें साधकका यह विचार रहता है कि मुझे सत् में स्थिति करनी है। यह विचार रहनेसे असत् का संग छूटनेपर भी सत् में ‘स्थितिवाला’ रह जाता है—यही सूक्ष्म अहम् है। यह सूक्ष्म अहंभाव दार्शनिकोंमें एकता नहीं होने देता। दार्शनिकोंमें मतभेद रहनेसे उनके दर्शनोंमें भी मतभेद रहता है अर्थात् वे अपने-अपने मतके अनुसार परमात्माको मानते हैं, जो कि समग्रका अंश (आंशिक) होता है, समग्र नहीं। वे परमात्माके उस समग्र रूपको नहीं जानते, जिसमें कोई मतभेद नहीं है।
दार्शनिकोंकी दृष्टिमें उनका अपना मत साध्य है, जो वास्तवमें साध्य न होकर साधन-तत्त्व है*।
वास्तविक साध्य (समग्र परमात्मा)- में कोई दार्शनिक मतभेद नहीं है। सूक्ष्म अहम् रहनेसे दार्शनिकोंको अपना मत (मार्ग) श्रेष्ठ दीखता है, दूसरेका मत उतना श्रेष्ठ, लाभदायक नहीं दीखता, और उनकी ऐसी मान्यता रहती है कि ज्ञानके बिना मुक्ति नहीं हो सकती या निष्कामकर्मके बिना मुक्ति नहीं हो सकती अथवा भक्तिके बिना मुक्ति नहीं हो सकती। इसलिये वे अपने मतका मण्डन और दूसरेके मतका खण्डन करते हैं। दूसरेके मतका खण्डन वे बुरी नीयतसे नहीं करते, प्रत्युत इस शुद्ध नीयतसे करते हैं कि लोग विपरीतगामी न होकर अपना कल्याण कर लें। लोगोंके कल्याणके उद्देश्यसे वे अपने मत (मार्ग)-का प्रचार करते हैं; क्योंकि उस मतका उन्होंने खुद अनुभव किया है और उसमें वे नि:सन्देह हुए हैं, उनको शान्ति मिली है। अत: उनका वैसा कहना उचित ही है। परन्तु उन दार्शनिकोंके अनुयायियोंमें प्राय: देहाभिमानके कारण अपने मतका आग्रह रहता है। आग्रह रहनेसे वे अपने मतका अनुसरण न करके दूसरे मतका खण्डन करते हैं और दूसरे मतको माननेवालोंसे द्वेष करते हैं। दूसरे मतको माननेसे भी कल्याण हो सकता है—यह बात उनको जँचती ही नहीं! उलटे वे दूसरे मतको भ्रम मानते हैं। वे ऐसा मानते हैं कि दूसरोंको हमारे मतमें आना ही पड़ेगा, तभी उनका कल्याण होगा! उनका दूसरे मतको माननेवालोंसे जो द्वेष होता है, वह सामान्य सांसारिक राग-द्वेषसे भी मजबूत और भयंकर होता है। उस द्वेषके कारण वे दूसरे मतको सर्वथा मिटा देना चाहते हैं! इस प्रकार लड़ाई दार्शनिकोंमें नहीं होती, प्रत्युत उनके अनुयायियोंमें होती है।
अपने साधनके प्रति कृतज्ञता, महत्ताका भाव रहना दोष नहीं है, पर दूसरेके मतका खण्डन करना दोष है। इसलिये साधकको दूसरेके मतका खण्डन तथा अपने मतका आग्रह न करके अपने मतके अनुसार साधन करना चाहिये। वह दूसरेके मतका खण्डन न करके अधिक-से-अधिक यह कह सकता है कि उस प्रणालीको मैं जानता नहीं! अपनी अज्ञता कहनेमें दोष नहीं है, प्रत्युत अपना गुण कहनेमें दोष है। कारण कि अपनी अज्ञता (अपूर्णता) कहनेसे दूसरेमें पूर्णता दीखती है और अपना गुण कहनेसे दूसरेमें दोष दीखता है। इसलिये साधकको कभी भी अपनेको सिद्ध नहीं मानना चाहिये, प्रत्युत सदा साधक ही मानना चाहिये। अपनेमें सिद्धि, पूर्णता माननेसे उसका आगे बढ़ना रुक जायगा और अपने साथ धोखा भी हो जायगा अर्थात् अपनेमें कोई कमी भी होगी तो वह बनी रहेगी।
प्रश्न—क्या मुक्त होनेपर भी सूक्ष्म अहम् रहता है?
उत्तर—मुक्त होनेपर भी ज्ञानी (दार्शनिक)-में सूक्ष्म अहम् रहता है, जिससे दार्शनिकोंमें परस्पर अलगाव, भिन्नता, भेद रहता है। यह सूक्ष्म अहम् वास्तवमें अहंकारका संस्कार है, जो जन्म-मरणका कारण नहीं होता। गुणोंका संग ही जन्म-मरणका कारण होता है—‘कारणं गुणसङ्गोऽस्य सदसद्योनिजन्मसु’ (गीता १३। २१)। मार्गका संग जन्म-मरणका कारण नहीं होता। मार्गका संग है—जिस मार्गसे सिद्धि (मुक्ति) मिली, उस मार्गका संस्कार, जो ‘सूक्ष्म अहम्’ कहलाता है। सूक्ष्म अहम्में स्वयं संसारके सम्मुख न होकर परमात्मतत्त्वके सम्मुख रहता है। यह सूक्ष्म अहम् ज्ञानकी एकतामें रहता है, प्रेमकी एकतामें नहीं। कारण कि भक्तकी खुदकी निष्ठा नहीं होती, प्रत्युत वह भगवन्निष्ठ होता है; परन्तु ज्ञानीकी खुदकी निष्ठा होती है। अत: भक्तिमें अहंता बदलकर भगवान्में लीन हो जाती है, जिससे अहम्का संस्कार नहीं रहता। परन्तु ज्ञानमें अहंताको मिटानेसे अत्यन्त सूक्ष्म अहम् रह जाता है। हाँ, अधिक भूमिका चढ़ जानेसे ज्ञानीका भी वह अत्यन्त सूक्ष्म अहम् मिट जाता है।
भेद ज्ञानमें रहता है, प्रेममें नहीं। प्रेममें समग्र परमात्माकी प्राप्ति होती है; क्योंकि समग्रता (‘वासुदेव: सर्वम्’)-की प्राप्तिमें प्रेम कारण है, ज्ञान कारण नहीं है। एक विचित्र बात है कि ज्ञानमार्गमें मुक्ति भी प्रेमसे ही होती है! कारण कि अपने स्वरूप (सत्ता)-में प्रेम, आकर्षण हुए बिना स्वरूपमें स्थिति नहीं होती। ज्ञानीका अपने स्वरूपमें जो प्रेम होता है, वह प्रेम उसको मुक्त तो कर देगा, पर समग्रताकी प्राप्ति करा दे—यह नियम नहीं है। कारण कि सत्ताका यह प्रेम सांसारिक आसक्तिकी तरह जन्म-मरण देनेवाला तो बिलकुल नहीं होता, पर सब मतोंका समान आदर करनेमें बाधक होता है, जबकि वास्तवमें साधन करनेवाले, असत् से विमुख होकर सत् के सम्मुख होनेवाले सब आदरणीय होते हैं। स्थूल दृष्टिसे भी देखें तो ज्ञानी दूसरोंके साथ एक नहीं होता, जबकि भक्त सबके साथ एक हो जाता है। कारण कि ज्ञानीमें आरम्भमें अभिमान रहता है और भक्तमें आरम्भसे ही नम्रता, दीनता रहती है। हाँ, अगर भक्तमें अभिमान होगा तो वह भी दूसरोंके साथ एक नहीं हो सकेगा। अभिमानका नाश तभी होगा, जब ज्ञानी नहीं रहेगा, प्रत्युत केवल ज्ञान रहेगा; प्रेमी नहीं रहेगा, प्रत्युत केवल प्रेम रहेगा।
ज्ञानमें अखण्ड आनन्दकी प्राप्ति होती है और भक्तिमें अनन्त आनन्दकी प्राप्ति होती है। अखण्ड आनन्दमें ज्ञानी एकाकी (अकेला) रहता है, इसलिये अखण्ड आनन्दसे उसकी तृप्ति नहीं होती—‘एकाकी न रमते’। अखण्ड आनन्दसे अरुचि होनेपर उसमें अनन्त आनन्द अर्थात् प्रतिक्षण वर्धमान प्रेमकी पिपासा (प्रेम-प्राप्तिकी लालसा) जाग्रत् होती है।
जीवन्मुक्तिका आनन्द भी भोग है। उसके छूटनेपर ही प्रेमकी प्राप्ति होती है। जीवन्मुक्तिका आनन्द छूटनेका आनन्द है और प्रेमका आनन्द मिलनेका आनन्द है। प्रेमीको मुक्ति भी खारी लगती है। भगवान् भी प्रेमके भूखे हैं, ज्ञानके भूखे नहीं। ज्ञानके तो वे स्वरूप ही हैं—‘सच्चित्सुखैकवपुष:’, ‘चिदानंदमय देह तुम्हारी’ (मानस, अयोध्या० २। १२७। ३)।
वास्तविक अद्वैत प्रेममें ही है। प्रेममें एक भगवान्के सिवाय अन्यकी सत्ता ही नहीं है। प्रेममें प्रेमी और प्रेमास्पद एक होते हुए भी दो हैं और दो होते हुए भी एक हैं। प्रेमीमें अन्यके भावकी स्फुरणा ही नहीं है। अन्यकी तरफ प्रेमीकी दृष्टि कभी गयी ही नहीं, है ही नहीं, जायगी ही नहीं, जा सकती ही नहीं; क्योंकि प्रेममें अन्यका अत्यन्त अभाव है। प्रेमीको सब जगह अपना प्रेमास्पद ही दीखता है—‘जित देखौं तित स्याममयी है’। इसलिये प्रेमका स्वरूप अनिर्वचनीय कहा गया है—
अनिर्वचनीयं प्रेमस्वरूपम्। मूकास्वादनवत्।
(नारदभक्तिसूत्र ५१-५२)
जबतक अन्यकी सत्ता है, तबतक वह साधन-प्रेम है, साध्य-प्रेम (परमप्रेम या पराभक्ति) नहीं। इसलिये ज्ञानमें ‘अनिर्वचनीय ख्याति’ है और प्रेममें ‘अनिर्वचनीय स्वरूप’ है। तात्पर्य है कि ज्ञानमें अन्यका निषेध है और प्रेममें अन्यका अत्यन्त अभाव है। कारण कि प्रेममें समग्र परमात्माकी प्राप्ति है। इसलिये प्रेमीका किसीसे भी वैर-विरोध नहीं होता। प्रेमीकी दृष्टिमें सभी समग्रका अंग होनेसे अपने प्रभु ही हैं, फिर कौन वैर करेगा, किससे करेगा और क्यों करेगा—‘निज प्रभुमय देखहिं जगत केहि सन करहिं बिरोध’?
उदाहरणके लिये, कोई रामका, कोई कृष्णका, कोई शिवका प्रेमी है तो वे सब परस्पर एक हो सकते हैं, पर सब ज्ञानी परस्पर एक नहीं हो सकते। अगर प्रेमी और ज्ञानी परस्पर मिलें तो प्रेमी ज्ञानीका जितना आदर करेगा, उतना ज्ञानी प्रेमीका नहीं कर सकेगा। इसलिये भक्तोंका लक्षण बताया है—‘सबहि मानप्रद आपु अमानी’ (मानस, उत्तर० ३८। २)। रामायणके आरम्भमें गोस्वामी तुलसीदासजी महाराज सज्जनोंके साथ-साथ दुष्टोंकी भी वन्दना करते हैं और सच्चे भावसे करते हैं—‘बहुरि बंदि खल गन सतिभाएँ’ (मानस, बाल० ४। १)। ऐसा भक्त ही कर सकता है, ज्ञानी नहीं! यद्यपि ज्ञानीका किसीसे कभी किंचिन्मात्र भी वैर नहीं होता, तथापि उसमें उदासीनता, तटस्थता रहती है। विवेकमार्ग (ज्ञान)-में वैराग्यकी मुख्यता रहती है, और वैराग्य रूखा होता है। इसलिये ज्ञानीमें भीतरसे कठोरता न होनेपर भी वैराग्य, उदासीनताके कारण बाहरसे कठोरता प्रतीत होती है।
गीतामें कर्मयोगीके लक्षण भी आये हैं (२। ५५—७२, ६। ७—९), ज्ञानीके लक्षण भी आये हैं (१४। २२—२५) और भक्तके लक्षण भी आये हैं (१२।१३—१९); परन्तु केवल भक्तके लक्षणोंमें ही भगवान्ने कहा है—
‘अद्वेष्टा सर्वभूतानां मैत्र: करुण एव च।’
(१२। १३)
‘भक्त सब प्राणियोंमें द्वेष-भावसे रहित, सबका मित्र (प्रेमी) और दयालु होता है।’
—यह लक्षण (मैत्र: करुण:) न कर्मयोगीके लक्षणोंमें आया है, न ज्ञानीके लक्षणोंमें, प्रत्युत केवल भक्तके लक्षणोंमें आया है।
भक्तमें ज्ञान और वैराग्य स्वत: आते हैं, लाने नहीं पड़ते*।
कारण कि ज्ञान और वैराग्य भक्तिके बेटे हैं और जहाँ माँ जायगी, वहाँ बेटे जायँगे ही! इसमें एक मार्मिक बात है कि भक्तमें जो ज्ञान और वैराग्य आते हैं, वे ज्ञानीमें आनेवाले ज्ञान और वैराग्यसे भी विलक्षण होते हैं। जैसे, ज्ञान-मार्गमें तो निर्गुण ब्रह्मका ज्ञान होता है, पर भक्तिमार्गमें समग्रका ज्ञान होता है; क्योंकि भगवान् स्वयं भक्तको ज्ञान देते हैं* इसी तरह ज्ञानमार्गमें वैराग्य होता है तो वस्तुके रहते हुए उसमें राग मिट जाता है, पर भक्तिमार्गमें वैराग्य होता है तो वस्तुकी स्वतन्त्र सत्ता ही मिट जाती है और वह भगवत्स्वरूप हो जाती है—‘वासुदेव: सर्वम्’ (गीता ७। १९), ‘सदसच्चाहमर्जुन’ (गीता ९। १९)। कारण कि अधिभूत अर्थात् सम्पूर्ण पांचभौतिक जगत् भी समग्र परमात्माका ही एक अंग है—‘साधिभूताधिदैवं मां साधियज्ञं च ये विदु:’(गीता ७। ३०)।