भगवान्का अलौकिक समग्ररूप
भगवान्का यह स्वभाव है कि जो जिस प्रकारसे उनका आश्रय लेता है, वे भी उसी प्रकारसे उसको आश्रय देते हैं और जो जिस भावसे उनका भजन करता है, वे भी उसी भावसे उसका भजन करते हैं—
ये यथा मां प्रपद्यन्ते तांस्तथैव भजाम्यहम्।
(गीता ४। ११)
जब भगवान्की बात चलती है, तब भक्त उसीमें मस्त हो जाता है और दूसरी सब बातें भूल जाता है। इसी तरह गीताजीमें छठे अध्यायके अन्तमें भक्तकी बात चली—
तपस्विभ्योऽधिको योगी ज्ञानिभ्योऽपि मतोऽधिक:।
कर्मिभ्यश्चाधिको योगी तस्माद्योगी भवार्जुन॥
(गीता ६। ४६)
‘तपस्वियोंसे भी योगी श्रेष्ठ है, ज्ञानियोंसे भी योगी श्रेष्ठ है और कर्मियोंसे भी योगी श्रेष्ठ है—ऐसा मेरा मत है। अत: हे अर्जुन! तू योगी हो जा।’
योगिनामपि सर्वेषां मद्गतेनान्तरात्मना।
श्रद्धावान् भजते यो मां स मे युक्ततमो मत:॥
(गीता ६। ४७)
‘सम्पूर्ण योगियोंमें भी जो श्रद्धावान् भक्त मेरेमें तल्लीन हुए मनसे (प्रेमपूर्वक) मेरा भजन करता है, वह मेरे मतमें सर्वश्रेष्ठ योगी है।’
भक्तकी बात चलनेपर भगवान् उसीमें मस्त हो गये, दूसरी सब बातें भूल गये और अर्जुनके द्वारा प्रश्न किये बिना ही भक्तिकी बात कहनेके लिये अपनी तरफसे सातवाँ अध्याय शुरू कर दिया! भगवान्ने कहा कि मैं वह विज्ञानसहित ज्ञान कहूँगा, जिससे तू मेरे समग्ररूपको जान जायगा। मेरे समग्ररूपको जाननेके बाद फिर कुछ भी जानना शेष नहीं रहेगा; क्योंकि जब मेरे सिवाय किंचिन्मात्र भी कुछ है ही नहीं, फिर जानना क्या बाकी रहा?—‘मत्त: परतरं नान्यत्किञ्चिदस्ति धनञ्जय।’(गीता ७। ७), ‘यज्ज्ञात्वा न पुनर्मोहमेवं यास्यसि पाण्डव।’ (गीता ४। ३५)। भगवान्के इस समग्ररूपको शरणागत भक्त ही जान सकते हैं। इसलिये जो भक्त भगवान्की शरण लेकर लगनपूर्वक साधन करते हैं, वे विज्ञानसहित ज्ञानको अर्थात् भगवान्के समग्ररूपको जान लेते हैं। भगवान् कहते हैं—
जरामरणमोक्षाय मामाश्रित्य यतन्ति ये।
ते ब्रह्म तद्विदु: कृत्स्नमध्यात्मं कर्म चाखिलम्॥
साधिभूताधिदैवं मां साधियज्ञं च ये विदु:।
प्रयाणकालेऽपि च मां ते विदुर्युक्तचेतस:॥
(गीता ७। २९-३०)
‘जरा और मरणसे मोक्ष पानेके लिये जो मेरा आश्रय लेकर यत्न करते हैं, वे उस ब्रह्मको, सम्पूर्ण अध्यात्मको और सम्पूर्ण कर्मको भी जान जाते हैं। जो मनुष्य अधिभूत, अधिदैव और अधियज्ञके सहित मुझे जानते हैं, वे युक्तचेता मनुष्य अन्तकालमें भी मुझे ही जानते अर्थात् प्राप्त होते हैं।’
ब्रह्म (निर्गुण-निराकार), अध्यात्म (अनन्त जीव) तथा अखिल कर्म (उत्पत्ति-स्थिति-प्रलयकी सम्पूर्ण क्रियाएँ)—यह ‘ज्ञान’का विभाग है और अधिभूत (अपने शरीरसहित सम्पूर्ण पांचभौतिक जगत् ), अधिदैव (मन-इन्द्रियोंके अधिष्ठातृ देवतासहित ब्रह्माजी आदि सभी देवता), तथा अधियज्ञ (अन्तर्यामी विष्णु और उनके सभी रूप)—यह ‘विज्ञान’का विभाग है। ज्ञानके विभागमें निर्गुणकी और विज्ञानके विभागमें सगुणकी मुख्यता है।
गीतामें भगवान्ने दो निष्ठाएँ बतायी हैं—कर्मयोग और ज्ञानयोग। ये दोनों ही निष्ठाएँ लौकिक हैं—‘लोकेऽस्मिन्द्विविधा निष्ठा’ (गीता ३। ३)। परन्तु भक्तियोग अलौकिक निष्ठा है। कारण कि कर्मयोगमें ‘क्षर’ (संसार)-की प्रधानता है और ज्ञानयोगमें ‘अक्षर’ (जीवात्मा)- की प्रधानता है। क्षर और अक्षर—दोनों ही लोकमें हैं।—‘द्वाविमौ पुरुषौ लोके क्षरश्चाक्षर एव च।’ (गीता १५। १६)। इसलिये कर्मयोग और ज्ञानयोग—दोनों लौकिक निष्ठाएँ हैं। परन्तु भक्तियोगमें ‘परमात्मा’ की प्रधानता है, जो क्षर और अक्षर दोनोंसे विलक्षण है—
उत्तम: पुुरुषस्त्वन्य: परमात्मेत्युदाहृत:।
(गीता १५। १७)
‘उत्तम पुरुष तो अन्य ही है, जो परमात्मा नामसे कहा गया है।’
यस्मात्क्षरमतीतोऽहमक्षरादपि चोत्तम:।
(गीता १५। १८)
‘मैं क्षरसे अतीत हूँ और अक्षरसे भी उत्तम हूँ।’
क्षरं प्रधानममृताक्षरं हर:
क्षरात्मानावीशते देव एक:।
(श्वेताश्वतर० १। १०)
‘प्रकृति तो क्षर (नाशवान्) है और इसको भोगनेवाला जीवात्मा अमृतस्वरूप अक्षर (अविनाशी) है। इन क्षर और अक्षर—दोनोंको एक ईश्वर अपने शासनमें रखता है।’
इसलिये भक्तियोग अलौकिक निष्ठा है। भगवान्के समग्ररूपमें ब्रह्म, अध्यात्म तथा कर्म—इनमें लौकिक निष्ठा (कर्मयोग और ज्ञानयोग)-की बात आयी है और अधिभूत, अधिदैव तथा अधियज्ञ— इनमें अलौकिक निष्ठा (भक्तियोग)-की बात आयी है।
ज्ञान लौकिक है* और विज्ञान अलौकिक है।
आत्मज्ञान लौकिक है और परमात्मज्ञान अलौकिक है। मुक्ति लौकिक है और प्रेम अलौकिक है। करणसापेक्ष साधन लौकिक है और करणनिरपेक्ष साधन अलौकिक है। लौकिक तथा अलौकिक—दोनों ही समग्रभगवान्के रूप हैं।
प्रश्न—ब्रह्म, अध्यात्म और कर्म—ये तीनों लौकिक कैसे हैं?
उत्तर—भगवान्ने ब्रह्मको ‘अक्षर’ कहा है—‘अक्षरं ब्रह्म परमम्’(गीता ८। ३) और जीवको भी ‘अक्षर’ कहा है—‘द्वाविमौ पुरुषौ लोके क्षरश्चाक्षर एव च।’ (गीता १५। १६)। अत: ब्रह्म और जीवकी एकता होनेसे ब्रह्म भी लौकिक है। इसलिये जीव और ब्रह्मको एक माना गया है—‘जीवो ब्रह्मैव नापर:’। क्षेत्रके साथ सम्बन्ध होनेसे जो ‘जीव’ कहलाता है, वही क्षेत्रके साथ सम्बन्ध न होनेसे ‘ब्रह्म’ कहलाता है—‘क्षेत्रज्ञं चापि मां विद्धि सर्वक्षेत्रेषु भारत।’(गीता १३। २)। तात्पर्य है कि जो व्यष्टिरूपसे जीव है, वही समष्टिरूपसे ब्रह्म है। अत: जैसे जीव लोकमें है, ऐसे ही ब्रह्म भी लोकमें है अर्थात् ब्रह्म लौकिक निष्ठासे प्रापणीय तत्त्व है।
‘अध्यात्म’ अर्थात् जीवने जगत्को धारण किया हुआ है—‘जीवभूतां महाबाहो ययेदं धार्यते जगत्॥’ (गीता ७। ५)। जीवकी अपनी स्वतन्त्र सत्ता नहीं है। इसलिये जगत्के संगसे जीव भी जगत् अर्थात् लौकिक हो जाता है। अत: गीतामें जीवके लिये ‘जगत्’ शब्द भी आया है—
त्रिभिर्गुणमयैर्भावैरेभि: सर्वमिदं जगत्।
मोहितं नाभिजानाति मामेभ्य: परमव्ययम्॥
(गीता ७। १३)
‘इन तीनों गुणरूप भावोंसे मोहित यह सब जगत् इन गुणोंसे पर अविनाशी मेरेको नहीं जानता।’
लोकमें होनेके कारण जीव लौकिक है—‘द्वाविमौ पुरुषौ लोके क्षरश्चाक्षर एव च।’(गीता १५। १६), ‘ममैवांशो जीवलोके जीवभूत: सनातन:’ (गीता १५। ७)।
कर्म दो प्रकारके होते हैं—सकाम और निष्काम। ये दोनों ही कर्म लोकमें होनेसे लौकिक हैं—
यज्ञार्थात्कर्मणोऽन्यत्र लोकोऽयं कर्मबन्धन:॥
(गीता ३। ९)
क्षिप्रं हि मानुषे लोके सिद्धिर्भवति कर्मजा॥
(गीता ४। १२)
‘कर्मानुबन्धीनि मनुष्यलोके’
(गीता १५। २)
लोकेऽस्मिन्द्विविधा निष्ठा पुरा प्रोक्ता मयानघ।
ज्ञानयोगेन साङ्ख्यानां कर्मयोगेन योगिनाम्॥
(गीता ३। ३)*
प्रश्न—अधिभूत, अधिदैव और अधियज्ञ—ये तीनों अलौकिक कैसे हैं?
उत्तर—अधिभूत अर्थात् सम्पूर्ण पांचभौतिक जगत् भगवान्का शरीर होनेसे अलौकिक ही हुआ—
खं वायुमग्निं सलिलं महीं च
ज्योतींषि सत्त्वानि दिशो द्रुमादीन्।
सरित्समुद्रांश्च हरे: शरीरं
यत्किञ्च भूतं प्रणमेदनन्य:॥
(श्रीमद्भा० ११। २। ४१)
‘आकाश, वायु, अग्नि, जल, पृथ्वी, ग्रह-नक्षत्र, जीव-जन्तु, दिशाएँ, वृक्ष, नदियाँ, समुद्र—सब-के-सब भगवान्के ही शरीर हैं—ऐसा मानकर भक्त सभीको अनन्यभावसे प्रणाम करता है।’
भगवान्ने अर्जुनको अपना जो विराट्रूप दिखाया था, वह दिव्य (अलौकिक) था—‘नानाविधानि दिव्यानि’ (गीता ११। ५),‘अनेकदिव्याभरणं दिव्यानेकोद्यतायुधम्’(गीता ११। १०),‘दिव्यमाल्याम्बरधरं दिव्यगन्धानुलेपनम्’(गीता ११। ११),‘ब्रह्माणमीशं कमलासनस्थमृषींश्च सर्वानुरगांश्च दिव्यान्’ (गीता ११। १५)। वह दिव्य विराट्रूप भगवान्ने अपने शरीरमें ही दिखाया था—
भगवान्के वचन हैं—‘मम देहे गुडाकेश’ (११। ७)
संजयके वचन हैं—‘अपश्यद्देवदेवस्य शरीरे’ (११। १३)
अर्जुनके वचन हैं—‘पश्यामि देवांस्तव देव देहे’ (११। १५)
अत: भगवान्का ही विराट्रूप होनेसे यह पांचभौतिक जगत् भी अलौकिक ही है। भगवान्ने अपनी विभूतियोंको भी दिव्य कहा है—‘हन्त ते कथयिष्यामि दिव्या ह्यात्मविभूतय:’(१०। १९),‘नान्तोऽस्ति मम दिव्यानां विभूतीनां परन्तप’ (१०। ४०)। अर्जुनने भी कहा है—‘वक्तुमर्हस्यशेषेण दिव्या ह्यात्मविभूतय:’(१०। १६)। परन्तु जीवको अज्ञानवश अपनी बुद्धिसे राग-द्वेषके कारण यह जगत् लौकिक दीखता है। इसलिये जगत् न तो महात्माकी दृष्टिमें है और न भगवान्की दृष्टिमें है, प्रत्युत जीवकी दृष्टिमें है। महात्माकी दृष्टिमें सब कुछ भगवान् ही हैं—‘वासुदेव: सर्वम्’(गीता ७। १९), भगवान्की दृष्टिमें सत्-असत् सब कुछ वे ही हैं—‘सदसच्चाहमर्जुन’ (गीता ९। १९), पर जीवने राग-द्वेषके कारण जगत्को अपनी बुद्धिमें धारण कर रखा है—‘ययेदं धार्यते जगत्’ (गीता ७। ५)।
अधिदैव अर्थात् ब्रह्माजी आदि सभी देवता अलौकिक, दिव्य हैं। अधियज्ञ अर्थात् अन्तर्यामी भगवान् सबके हृदयमें रहते हुए भी निर्लिप्त होनेके कारण अलौकिक हैं—
द्वा सुपर्णा सयुजा सखाया
समानं वृक्षं परिषस्वजाते।
तयोरन्य: पिप्पलं स्वाद्वत्त्य-
नश्नन्नन्यो अभिचाकशीति॥
(मुण्डक० ३। १। १; श्वेताश्वतर० ४। ६)
‘एक साथ रहनेवाले तथा परस्पर सखाभाव रखनेवाले दो पक्षी—जीवात्मा और परमात्मा एक ही वृक्ष—शरीरका आश्रय लेकर रहते हैं। उन दोनोंमेंसे एक (जीवात्मा) तो उस वृक्षके सुख-दु:खरूप कर्मफलोंका स्वाद ले-लेकर उपभोग करता है, पर दूसरा (परमात्मा) न खाता हुआ केवल देखता रहता है।’
समग्ररूप बतानेका तात्पर्य है कि जड़-चेतन, सत्-असत् जो कुछ भी है, वह सब भगवान्का ही स्वरूप है—‘सदसच्चाहमर्जुन’ (गीता ९। १९)। इसलिये भगवान्ने समग्ररूप वर्णनके आदि और अन्तमें ‘माम्’ पद दिया है—‘मामाश्रित्य’ (गीता ७। २९) और ‘मां ते विदु:’(गीता ७। ३०)। सब कुछ भगवान् ही हैं—इस प्रकार जो मनुष्य भगवान्के समग्ररूपको जान लेते हैं, वे‘युक्तचेता’ हैं। ऐसे युक्तचेता भक्त अन्तकालमें मनके विचलित होनेपर भी योगभ्रष्ट नहीं होते, प्रत्युत भगवान्को ही प्राप्त होते हैं—‘प्रयाणकालेऽपि च मां ते विदुर्युक्तचेतस:’। कारण कि उनकी दृष्टिमें जब भगवान्के सिवाय किंचिन्मात्र भी दूसरी सत्ता है ही नहीं, तो फिर मनके विचलित होनेका प्रश्न ही पैदा नहीं होता। दूसरी सत्ताकी मान्यता न होनेके कारण उनका मन जहाँ जायगा, परमात्मामें ही जायगा, फिर उनका मन कैसे विचलित होगा और मनके विचलित हुए बिना वे योगभ्रष्ट कैसे होंगे? कारण कि योगसे मनके विचलित होनेपर ही मनुष्य योगभ्रष्ट होता है— ‘योगाच्चलितमानस:’(गीता ६। ३७)। इसलिये भगवान्ने कहा है—
अनन्यचेता: सततं यो मां स्मरति नित्यश:।
तस्याहं सुलभ: पार्थ नित्ययुक्तस्य योगिन:॥
(गीता ८। १४)
‘हे पार्थ! अनन्यचित्तवाला जो मनुष्य मेरा नित्य-निरन्तर स्मरण करता है, उस नित्ययुक्त योगीके लिये मैं सुलभ हूँ।’
एक मार्मिक बात है कि जबतक साधक एक भगवान्की सत्ताके सिवाय दूसरी सत्ता मानेगा, तबतक उसका मन सर्वथा निरुद्ध नहीं हो सकता। कारण कि जबतक अपनेमें दूसरी सत्ताकी मान्यता है, तबतक रागका सर्वथा नाश नहीं हो सकता और रागका सर्वथा नाश हुए बिना मन सर्वथा निर्विषय नहीं हो सकता। रागके रहते हुए मनका सीमित निरोध होता है, जिससे लौकिक सिद्धियोंकी प्राप्ति होती है, वास्तविक तत्त्वकी प्राप्ति नहीं होती। दूसरी सत्ताकी मान्यता रहते हुए जो मन निरुद्ध होता है, उसमें व्युत्थान होता है अर्थात् उसमें समाधि और व्युत्थान—ये दो अवस्थाएँ होती हैं। कारण कि दूसरी सत्ता माने बिना दो अवस्थाएँ सम्भव ही नहीं हैं। दूसरी सत्ताकी मान्यता न रहनेके कारण भक्तका प्रेम भी अनन्य होता है। अत: जैसे व्यवहारमें एकता करना महान् गलती है, ऐसे ही तत्त्व (चिन्मय सत्ता)-में भेद करना भी महान् गलती है।
गोस्वामी तुलसीदासजी महाराजने कहा है—
जड़ चेतन गुन दोषमय बिस्व कीन्ह करतार।
(मानस, बाल० ६)
तात्पर्य है कि जड़ और चेतन—दोनों ब्रह्माजीकी सृष्टिमें होनेसे लौकिक हैं। गीतामें भी भगवान्ने कहा है—
द्वाविमौ पुरुषौ लोके क्षरश्चाक्षर एव च।
क्षर: सर्वाणि भूतानि कूटस्थोऽक्षर उच्यते॥
(गीता १५। १६)
‘इस लोकमें क्षर और अक्षर—ये दो प्रकारके पुरुष हैं। सम्पूर्ण प्राणियोंके शरीर क्षर (नाशवान्) हैं और कूटस्थ जीवात्मा अक्षर (अविनाशी) कहा गया है।’
इस दृष्टिसे क्षर और अक्षर, शरीर और शरीरी, देह और देही, क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ—ये सभी लौकिक हैं।
दैवी सम्पत्ति मुक्त करनेवाली और आसुरी सम्पत्ति बाँधनेवाली है—‘दैवी सम्पद्विमोक्षाय निबन्धायासुरी मता’(गीता १६। ५)। दैवी और आसुरी—दोनों ही सम्पत्तिवाले प्राणी लौकिक हैं—‘द्वौ भूतसर्गौ लोकेऽस्मिन् दैव आसुर एव च’ (गीता १६। ६)। इसलिये मोक्ष और बन्धन भी लौकिक हैं।
न निरोधो न चोत्पत्तिर्न बद्धो न च साधक:।
न मुमुक्षुर्न वै मुक्त इत्येषा परमार्थता॥
(आत्मोपनिषद् ३१, माण्डूक्यकारिका २। ३२, तत्त्वोपदेश ८१, विवेकचूड़ामणि ५७५)
‘न प्रलय है और न उत्पत्ति है, न बद्ध है और न साधक है, न मुमुक्षु है और न मुक्त है—यही परमार्थता अर्थात् वास्तविक तत्त्व है।’
तात्पर्य है कि बन्धन और मोक्ष—दोनों ही सापेक्ष होनेसे लौकिक हैं। निरपेक्ष तत्त्वमें न बन्धन है और न मोक्ष है। अत: वास्तविक तत्त्व अलौकिक है। इसलिये प्रेमी भक्त कहता है—
अब तो बंध मोक्षकी इच्छा
व्याकुल कभी न करती है।
मुखड़ा ही नित नव बन्धन है,
मुक्ति चरणसे झरती है॥
चेतन और जड़, जीव और जगत् विचारके विषय हैं; अत: ‘ज्ञान’ लौकिक है। परन्तु भगवान् विचारके विषय नहीं हैं, प्रत्युत श्रद्धाविश्वासके विषय हैं*; अत: ‘भक्ति’ अलौकिक है।
ज्ञानमार्गमें जबतक विवेक रहता है, तबतक लौकिकता रहती है। जब विवेक तत्त्वज्ञानमें परिणत हो जाता है, तब ज्ञानीमें भी अलौकिकता आ जाती है। कारण कि ज्ञान (तत्त्वज्ञान) अज्ञानका नाशक है। अज्ञानका नाश करके ज्ञान भी शान्त हो जाता है और ज्ञानीमें अलौकिकता आ जाती है। इसलिये जैसे भक्तिमार्गमें मीराबाईका शरीर चिन्मय होकर लीन हो गया था, ऐसे ही ज्ञानमार्गमें भी कबीर साहेबका शरीर चिन्मय होकर लीन हो गया था।
अवतारके समय लौकिक दृष्टिसे दीखनेपर भी भगवान् सदा अलौकिक ही रहते हैं। लोकमें अवतार लेनेपर भी उनकी अलौकिकता ज्यों-की-त्यों रहती है। भगवान् कहते हैं—
अजोऽपि सन्नव्ययात्मा भूतानामीश्वरोऽपि सन्।
प्रकृतिं स्वामधिष्ठाय सम्भवाम्यात्ममायया॥
(गीता ४। ६)
भगवान् ही जगत् -रूपसे प्रकट हुए हैं, इसलिये यह जगत् भगवान्का आदि अवतार कहा जाता है—‘आद्योऽवतार: पुरुष: परस्य’ (श्रीमद्भा० २। ६। ४१)। जैसे भगवान्ने राम, कृष्ण आदि रूपोंसे अवतार लिया है, ऐसे ही जगत्-रूपसे भी अवतार लिया है। इसको अवतार इसलिये कहते हैं कि इसमें भगवान् दृश्यरूपसे दीखनेमें आ जाते हैं।
अवतारके समय भगवान् अलौकिक होते हुए भी राग-द्वेषके कारण अज्ञानियोंको लौकिक दीखते हैं—
अव्यक्तं व्यक्तिमापन्नं मन्यन्ते मामबुद्धय:।
(गीता ७। २४)
मूढोऽयं नाभिजानाति लोको मामजमव्ययम्॥
(गीता ७। २५)
अवजानन्ति मां मूढा मानुषीं तनुमाश्रितम्।
(गीता ९। ११)
वास्तवमें लौकिक-अलौकिकका विभाग राग-द्वेषके कारण ही है। राग-द्वेष न हो तो सब कुछ अलौकिक (चिन्मय) ही है—‘वासुदेव: सर्वम्’। कारण कि लौकिककी स्वतन्त्र सत्ता ही नहीं है। राग-द्वेषके कारण ही लौकिककी सत्ता और महत्ता दीखती है। राग-द्वेषके कारण ही जीवने भगवत्स्वरूप संसारको भी लौकिक बना दिया और खुद भी लौकिक बन गया! इसलिये भगवान्ने राग-द्वेषको साधकका महान् शत्रु बताया है—
इन्द्रियस्येन्द्रियस्यार्थे रागद्वेषौ व्यवस्थितौ।
तयोर्न वशमागच्छेत्तौ ह्यस्य परिपन्थिनौ॥
(गीता ३। ३४)
‘इन्द्रिय इन्द्रियके अर्थमें अर्थात् प्रत्येक इन्द्रियके प्रत्येक विषयमें मनुष्यके राग और द्वेष व्यवस्थासे (अनुकूलता और प्रतिकूलताको लेकर) स्थित हैं। मनुष्यको उन दोनोंके वशमें नहीं होना चाहिये; क्योंकि वे दोनों ही इसके (पारमार्थिक मार्गमें विघ्न डालनेवाले) शत्रु हैं।’
काम एष क्रोध एष रजोगुणसमुद्भव:।
महाशनो महापाप्मा विद्धॺेनमिह वैरिणम्॥
(गीता ३। ३७)
‘रजोगुणसे उत्पन्न हुआ यह काम ही क्रोध है। यह बहुत खानेवाला और महापापी है। इस विषयमें तू इसको ही वैरी जान।’
‘क्षर’ (नाशवान्)-की मुख्यता माननेसे जीव असुर बन जाता है, ‘अक्षर’ (अविनाशी)-की मुख्यता माननेसे जीव ज्ञानी बन जाता है और ‘पुरुषोत्तम’ (समग्र भगवान्)-की मुख्यता माननेसे जीव प्रेमी बन जाता है। प्रेमी बननेसे भक्त और भगवान्के बीच प्रेमका आदान-प्रदान होता है। जैसे बच्चेकी चेष्टा माँको और माँकी चेष्टा बच्चेको प्रसन्न करनेवाली होती है, ऐसे ही भक्तकी चेष्टा भगवान्को और भगवान्की चेष्टा भक्तको प्रसन्न करनेवाली, आनन्द देनेवाली, प्रेमरसकी वृद्धि करनेवाली होती है। प्रेमी और प्रेमास्पदकी इस अभिन्नताको गोस्वामीजी महाराजने बड़े सुन्दर ढंगसे कहा है—
गिरा अरथ जल बीचि सम कहिअत भिन्न न भिन्न।
(मानस, बाल० १८)
अर्थात् जो वाणी तथा उसके अर्थ और जल तथा उसकी लहरके समान कहनेमें ही अलग-अलग दीखते हैं, पर वास्तवमें एक ही हैं, यहाँ गोस्वामीजीने पहले स्त्रीवाचक ‘गिरा’ शब्द देकर फिर पुरुषवाचक ‘अरथ’ शब्द दिया है और उसके बाद पहले पुरुषवाचक ‘जल’ शब्द देकर फिर स्त्रीवाचक ‘बीचि’ शब्द दिया है। इससे यह तात्पर्य निकलता है कि स्त्रीवाचक ‘सीता’ और पुरुषवाचक ‘राम’—दोनों अभिन्न हैं। अत: चाहे ‘सीता’ पहले कहो (सीताराम कहो), चाहे ‘राम’ पहले कहो (रामसीता कहो)—दोनोंमें कोई फर्क नहीं है*।
प्रेममें कोई भेद नहीं रहता। प्रेममें भक्त और भगवान्—दोनों समान हैं—
तस्मिंस्तज्जने भेदाभावात्।
(नारदभक्ति० ४१)
‘भगवान्में और उनके भक्तमें भेदका अभाव है।’