भगवत्प्राप्तिका सुगम तथा शीघ्र सिद्धिदायक साधन
जो साधन करनेवाले हैं, परमात्मतत्त्वको प्राप्त करना चाहते हैं, ऐसे भाई-बहनोंके मनमें एक बात रहती है कि कोई ऐसा सीधा-सरल मार्ग बता दे, जिससे हम सुगमतासे और तत्काल परमात्माकी प्राप्ति कर लें। उनके लिये एक विशेष साधन बताया जाता है।
एक ऐसी स्थिति है, जहाँ पहुँचनेपर मनुष्य कृतकृत्य, ज्ञात-ज्ञातव्य और प्राप्त-प्राप्तव्य हो जाता है अर्थात् उसके लिये कुछ भी करना, जानना और पाना बाकी नहीं रहता। वहाँ पहुँचनेके लिये तीन मार्ग हैं—कर्मयोग, ज्ञानयोग और भक्तियोग। कर्मयोगसे कृतकृत्यता हो जाती है, ज्ञानयोगसे ज्ञातज्ञातव्यता हो जाती है और भक्तियोगसे प्राप्तप्राप्तव्यता हो जाती है। यह अन्तिम स्थिति है। अगर कोई साधक कमर कस ले कि मेरेको तो उस अन्तिम स्थितिकी तत्काल प्राप्ति करनी है, उसके लिये एक ऐसा साधन बताया जाता है, जिससे वह सब साधनोंसे ऊँचे उठकर उस अन्तिम स्थितिका आरम्भमें ही अनुभव कर सकता है। श्रीमद्भागवतमें भगवान् उद्धवजीसे कहते हैं—
सर्वं ब्रह्मात्मकं तस्य विद्ययाऽऽत्ममनीषया।
परिपश्यन्नुपरमेत् सर्वतो मुक्तसंशय:॥
अयं हि सर्वकल्पानां सध्रीचीनो मतो मम।
मद्भाव: सर्वभूतेषु मनोवाक्कायवृत्तिभि:॥
(११। २९ । १८-१९)
‘जब सबमें परमात्मबुद्धि की जाती है, तब सब कुछ परमात्मा ही हैं—ऐसा दीखने लगता है। फिर इस परमात्मदृष्टिसे भी उपराम होनेपर सम्पूर्ण संशय स्वत: निवृत्त हो जाते हैं।’
‘मेरी प्राप्तिके जितने साधन हैं, उनमें मैं तो सबसे श्रेष्ठ साधन यही समझता हूँ कि समस्त प्राणियों और पदार्थोंमें मन, वाणी और शरीरकी समस्त वृत्तियोंसे मेरी ही भावना की जाय।’*
तात्पर्य है कि सब जगह एक परमात्मा-ही-परमात्मा परिपूर्ण हैं—‘सर्वं ब्रह्मात्मकम्’। उसमें न मैं है, न तू है, न यह है, न वह है; न भूत है, न भविष्य है, न वर्तमान है; न सर्ग है, न प्रलय है; न महासर्ग है, न महाप्रलय है; न देवता है, न मनुष्य है; न पशु है, न पक्षी है; न भूत है, न प्रेत है, न पिशाच है; न जड है, न चेतन है; न स्थावर है, न जंगम है; कुछ भी नहीं है! एक परमात्मा ही इन सब रूपोंमें बने हुए हैं। इस बातको दृढ़तासे मान लें, स्वीकार कर लें। यह सब साधनोंसे श्रेष्ठ साधन है। भागवत, एकादश स्कन्धके उनतीसवें अध्यायके उन्नीसवें श्लोककी टीकामें एकनाथजी महाराज भगवान्की ओरसे लिखते हैं कि हे उद्धव! सबमें मेरेको देखनेसे बढ़कर और कोई साधन नहीं है—यह मैं माँ देवकीकी सौगन्ध खाकर कहता हूँ!*
सब कुछ भगवान् ही हैं—यह बात हमारेको दीखे चाहे न दीखे, हम जानें चाहे न जानें, हमारेको अनुभव हो चाहे न हो, परन्तु यह दृढ़तासे स्वीकार कर लें कि बात वास्तवमें यही सर्वोपरि है। कमी है तो हमारे माननेमें कमी है, वास्तविकतामें कमी नहीं है। जैसे, पहले क-ख-ग आदि अक्षरोंको सीखते हैं, फिर पुस्तकोंमें वे वैसे ही दीखने लग जाते हैं, ऐसे ही पहले केवल इस बातको मान लें कि ‘सब कुछ भगवान् ही हैं’, फिर वैसा ही अनुभव होने लग जायगा। इसका अनुभव करनेके लिये कुछ करना नहीं है, कहीं आना-जाना नहीं है। भजन-ध्यान, सत्संग-स्वाध्याय आदि जो कर रहे हैं, वे करते रहें। इसके लिये कोई नया साधन नहीं करना है, केवल दृढ़तासे स्वीकार कर लेना है कि सब कुछ परमात्मा ही हैं। कारण कि सृष्टि-रचनाके समय भगवान्ने कहींसे कोई मसाला, सामग्री नहीं मँगायी, प्रत्युत यह संकल्प किया कि मैं एक ही बहुत रूपोंसे हो जाऊँ—
‘तदैक्षत बहु स्यां प्रजायेयेति’
(छान्दोग्य० ६। २। ३)
‘सोऽकामयत बहु स्यां प्रजायेयेति’
(तैत्तिरीय० २। ६)
‘एकं रूपं बहुधा य: करोति’
(कठ० २। २। १२)
‘एकोऽपि सन् बहुधा यो विभाति’
(गोपालपूर्वतापनीय०)
वे एक ही परमात्मा अनेक रूपोंसे प्रकट हुए हैं। उनके रूप असंख्य हैं—‘अनेकरूपरूपाय विष्णवे प्रभविष्णवे’। चौरासी लाख योनियाँ हैं और एक-एक योनिमें करोड़ों-अरबों जीव हैं, पर सब-के-सब एक परमात्मा ही हैं। इस बातको मान लें और जहाँतक बने, कभी भूलकर भी शरीरसे किसीके अहितका बर्ताव न करें, मनसे किसीके अहितका चिन्तन न करें, वाणीसे कड़वी बात कहकर किसीको दु:ख न दें। इस विषयमें सावधान रहें। कभी चूक हो जाय तो चरणोंमें गिरकर माफी माँग लें। भूल हो जाय तो फिर उसको सुधार लें। एक मारवाड़ी कहावत है—‘पड़ पड़ कर सवार होवे’ अर्थात् घोड़े, साइकिल आदिपर चढ़ते ही मनुष्य पूरा सवार नहीं हो जाता, प्रत्युत कई बार पड़कर (गिरकर) ही सवार बनता है। इसी तरह कोई भूल हो जाय तो आगे सावधान हो जायँ।
एक कहानी है। एक सिंहने शृगाली (सियारी)-के बच्चेको अकेला देखा तो दयावश होकर उसको उठा ले आया और सिंहनीको दे दिया। सिंहनीके दो पुत्र थे। उसने शृगालीके बच्चेको अपना तीसरा पुत्र मान लिया और उसका पालन-पोषण करने लगी। वे तीनों बच्चे एक साथ खेलते थे और सिंहनीका दूध पीते थे। जब वे थोड़े बड़े हुए, तब शिकारके लिये इधर-उधर घूमने लगे। एक दिन उस जंगलमें एक हाथी आया। उसको देखकर शृगालीका बच्चा डरकर घरकी तरफ भागा तो यह देखकर सिंहनीके दोनों बच्चे भी हतोत्साहित होकर घर चले आये और अपनी माँसे बड़े भाई (शृगालीके बच्चे)-की बात सुनायी कि किस तरह वह हाथीको देखकर भाग आया। शृगालीका बच्चा उनकी उपहासपूर्ण बात सुनकर गुस्सेमें भर गया और बोला कि क्या मैं इन दोनोंसे किसी बातमें कम हूँ, जो ये मेरा उपहास कर रहे हैं? उसका गुस्सा देखकर सिंहनी हँसी और बोली—
शूरोऽसि कृतविद्योऽसि दर्शनीयोऽसि पुत्रक।
यस्मिन्कुले त्वमुत्पन्नो गजस्तत्र न हन्यते॥
(पंचतन्त्र ६, लब्ध० ४४)
‘हे पुत्र! तू शूरवीर है, शिकार करनेकी विद्या भी जान गया है और सुन्दर भी बहुत है; परन्तु जिस कुलमें तू पैदा हुआ है, उसमें हाथीको मारनेकी रीति नहीं है।’
इसी तरह परमात्माको प्राप्त करनेकी रीति मनुष्य योनिमें ही है, अन्य योनियोंमें नहीं। गायका शरीर मनुष्यशरीरसे भी अधिक पवित्र है, यहाँतक कि उसके गोबर-गोमूत्र भी पवित्र हैं और उसके खुरोंसे उड़ी धूल (गोधूलि) भी पवित्र है*।
पर गायोंमें परमात्मप्राप्तिकी रीति, योग्यता नहीं है। यह रीति, योग्यता मनुष्योंमें ही है। परमात्मप्राप्तिके लिये कोई भी मनुष्य अनधिकारी नहीं है। लखपति-करोड़पति सब नहीं बन सकते, राजा-महाराजा, मिनिस्टर सब नहीं बन सकते, पर परमात्माकी प्राप्ति सब कर सकते हैं। भाई हो चाहे बहन हो, ब्राह्मण हो चाहे शूद्र हो, साधु हो चाहे गृहस्थ हो, बड़ा हो चाहे छोटा हो, नीरोग हो चाहे रोगी हो, विद्वान् हो चाहे अपढ़ हो, कैसा ही क्यों न हो, उसके कुलमें परमात्माको प्राप्त करनेकी रीति है अर्थात् वे सब-के-सब परमात्माको प्राप्त कर सकते हैं। बेटा कोई बड़ा होता है, कोई छोटा होता है, कोई पढ़ा-लिखा होता है, कोई अपढ़ होता है, कोई समझदार होता है, कोई बेसमझ होता है, कोई धनी होता है, कोई निर्धन होता है, कोई योग्य होता है, कोई अयोग्य होता है, पर अपनी माँको अपना कहनेका अधिकार सबको समान होता है। इसी तरह भगवान्को अपना कहनेका अधिकार सबको समान है। सभी भगवान्से कह सकते हैं—
त्वमेव माता च पिता त्वमेव
त्वमेव बन्धुश्च सखा त्वमेव।
त्वमेव विद्या द्रविणं त्वमेव
त्वमेव सर्वं मम देवदेव॥
इसलिये हम तो योग्य नहीं हैं, हम भक्त नहीं हैं, हम ज्ञानी नहीं हैं, हम योगी नहीं हैं, हम अधिकारी नहीं हैं—इन बातोंको लेकर हिम्मत नहीं हारनी चाहिये, प्रत्युत भगवान्से ऐसा कहना चाहिये कि भले ही हम कुछ न हों, अंश तो हम आपके ही हैं। हम आपके हैं और आप हमारे हैं—इसमें दो मत नहीं हैं। इस प्रकार नि:सन्देह होकर दृढ़तासे भगवान्के भजनमें लग जाना चाहिये।
अभी फौजमें कोई भरती होना चाहे तो उसकी भलीभाँति जाँच की जाती है, उसकी योग्यता, पढ़ाई, अवस्था, कद, स्वास्थ्य आदि देखा जाता है। परन्तु भगवान्की फौजमें बन्दर, भालू आदि भी भरती हो गये! भगवान्की फौजमें कोई बन्धन नहीं है कि इतना बड़ा होना चाहिये, ऐसी योग्यता होनी चाहिये, इतना कद होना चाहिये आदि-आदि। भगवान्के दरबारमें ध्रुव, प्रह्लादजी आदि छोटे-छोटे बालक भी भरती हो गये, जटायु आदि पक्षी भी भरती हो गये, पत्थर बनी हुई अहल्या भी भरती हो गयी, नेत्रहीन सूरदास भी भरती हो गये! सूरदासजीको एक अँगुली भी नहीं दीखती थी, पर वे सूर्यके समान हो गये—‘सूर सूर तुलसी शशी’! भगवान्का दरबार सबके लिये सदा खुला है!
भगवत्प्राप्तिकी ऊँची-से-ऊँची और सीधी-सरल बात है—‘सर्वं ब्रह्मात्मकम्’, ‘वासुदेव: सर्वम्’। इस विषयमें यह बात पहले कही जा चुकी है कि हमारी समझमें आये या न आये, दिखायी दे या न दे, कोई परवाह नहीं, केवल नि:सन्देह होकर दृढ़तासे यह स्वीकार कर लें कि सब कुछ भगवान् ही हैं। गीता, रामायण, भागवत आदि ग्रन्थ, सन्त-महात्मा सभी यही बात कहते हैं; क्योंकि यह वास्तविक बात है। सब कुछ परमात्मा-ही-परमात्मा हैं—ऐसा मानते हुए उपराम हो जायँ—‘परिपश्यन्नुपरमेत्’(श्रीमद्भा० ११। २९। १८)। ‘उपरमेत्’ पदका अर्थ है कि ‘सब कुछ परमात्मा हैं’—इस वृत्तिसे भी उपराम हो जायँ, इस वृत्तिको भी छोड़ दें। वृत्ति छूटनेपर एक परमात्मा ही रह जाते हैं। फिर न कोई साधक रहता है और न कोई साधन रहता है, प्रत्युत एकमात्र साध्यतत्त्व (परमात्मा) शेष रह जाता है। तात्पर्य है कि साधक साधन करते-करते साधनरूप हो जाता है और साधनरूप होकर साध्यमें लीन हो जाता है।
जैसे घड़ा मिट्टीसे बनता है और अन्तमें मिट्टीमें ही मिल जाता है, ऐसे ही सब संसार परमात्मासे ही उत्पन्न होता है और परमात्मामें ही लीन हो जाता है—‘अहं कृत्स्नस्य जगत: प्रभव: प्रलयस्तथा’(गीता ७। ६)। अत: सब कुछ परमात्मा ही हुए—
मत्त: परतरं नान्यत्किञ्चिदस्ति धनञ्जय।
मयि सर्वमिदं प्रोतं सूत्रे मणिगणा इव॥
(गीता ७। ७)
‘हे धनंजय! मेरेसे बढ़कर इस जगत्का दूसरा कोई किंचिन्मात्र भी कारण तथा कार्य नहीं है। जैसे सूतकी मणियाँ सूतके धागेमें पिरोयी हुई होती हैं, ऐसे ही सम्पूर्ण जगत् मेरेमें ही ओतप्रोत है।’
योगवासिष्ठमें मयूरीके अण्डेका उदाहरण आया है कि जैसे उस एक अण्डेमेंसे अनेक तरहके रंगोंवाला पक्षी निकल आता है, ऐसे ही एक ही परमात्मा अनेक रूपोंसे प्रकट हो जाते हैं। जैसे—मनुष्य, पशु-पक्षी, वृक्ष-लता आदि सब मिट्टीसे बने हैं। भाई-बहनोंके तरह-तरहके रंग-बिरंगे वस्त्र भी मिट्टीसे बने हैं। इसलिये इन सबको आग लगा दें तो अन्तमें एक मिट्टी शेष रह जायगी। ऐसे ही एक परमात्मा अनेक रूपोंसे प्रकट हुए हैं। परन्तु इसको भगवान्की कृपासे ही जान सकते हैं—
सोइ जानइ जेहि देहु जनाई।
जानत तुम्हहि तुम्हइ होइ जाई॥
तुम्हरिहि कृपाँ तुम्हहि रघुनंदन।
जानहिं भगत भगत उर चंदन॥
(मानस, अयोध्या० १२७। २)
वह भगवान्की कृपा हमारेपर है, तभी ऐसी बात हमें मिली है! अगर कृपा नहीं होती तो ऐसी बात मिल नहीं सकती थी। अपने बलसे, धनसे, विद्यासे, योग्यतासे, उद्योगसे ऐसी बात पढ़ने-सुननेको नहीं मिल सकती। भगवान्की अहैतुकी कृपासे ही यह बात पढ़ने-सुननेको मिलती है।
भगवान् कहते हैं—
मनसा वचसा दृष्टॺा गृह्यतेऽन्यैरपीन्द्रियै:।
अहमेव न मत्तोऽन्यदिति बुध्यध्वमञ्जसा॥
(श्रीमद्भा० ११। १३। २४)
‘मनसे, वाणीसे, दृष्टिसे तथा अन्य इन्द्रियोंसे भी जो कुछ ग्रहण किया जाता है, वह सब मैं ही हूँ। अत: मेरे सिवाय और कुछ भी नहीं है—यह सिद्धान्त आपलोग विचारपूर्वक शीघ्र समझ लें, स्वीकार कर लें।’ तात्पर्य है कि जो भी चिन्तन करते हो, मेरा ही चिन्तन करते हो। जो भी सुनते हो, मेरेको ही सुनते हो। जो भी देखते हो, मेरेको ही देखते हो। जो भी चखते हो, मेरेको ही चखते हो। जो भी स्पर्श करते हो, मेरा ही स्पर्श करते हो। जो भी सूँघते हो, मेरेको ही सूँघते हो। तात्पर्य है कि सम्पूर्ण इन्द्रियाँ-मन-बुद्धिका विषय मैं ही हूँ। मेरे सिवाय कुछ भी नहीं है। इससे बढ़कर कोई सिद्धान्त नहीं है। अन्तमें यहीं पहुँचना है। इसलिये इसको अभी वर्तमानमें ही स्वीकार कर लें।